Friday, October 28, 2016

शुभ दिवाली

शुभ दिवाली 

ट्रांस फैट पेरोडी - ड्यूएट वर्जन

       एक दिन मैं ट्रांस फैट पर लेख लिख रहा था। ट्रांस फैट सस्ते तेलों को हाइड्रोजनेट करके फैक्ट्री में बनाया जाता है। सबसे पहले 1911 में प्रोक्टर एंड गैंबल ने इसे क्रिस्को के नाम से बनाया। इंडिया में यह डालडा, रथ या वनस्पति के नाम से आया। उस रात चाय पीते समय मैंने अमित जी की पुरानी ब्लॉक बस्टर फिल्म लावारिस का वो मशहूर गीत (मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है) बजाया। मैं गीत गुगुनाता रहा और ट्रांस फैट पर यह ड्यूएट बनकर सामने आया। इसमें रेखा जी ट्रांस फैट के रूप में है। इस गीत में अमित जी रेखा (ट्रांस फैट) को कहते हैं कि मेरे इंडिया में तुम जैसी कातिल और जानलेवा फैट का क्या काम है। तुमने मेरे देशवासियों को बहुत बीमार किया है, लाखों लोगों की जान ली है। लेकिन घमंडी और बेशर्म रेखा (ट्रांस फैट) खिसकने के लिए तैयार ही नहीं होता। उसका संपर्क अंबानी और टाटा जैसे बड़े-बड़े उद्योगपतियों से जो है। वह तो अमित जी से यह तक कह देती है कि आपने तो कभी मुझसे प्यार किया है, मेरे साथ कई फिल्में की हैं, मेरा प्रचार किया है, नन्हें बच्चों को ट्रांस फैट मिली डेयरी मिल्क खिलाई है। अमित जी सकपका जाते हैं और गुस्सें में अपना धैर्य खो बैठते हैं, कहते हैं कि तुम लोगों ने घी और बटर को व्यर्थ ही बदनाम किया है और उनकी टांग तोड़ने तक की बात कह जाते हैं।

मेरे इंडिया में क्रिस्को क्या काम है
मेरे इंडिया में ट्रांस फैट क्या काम है
तू है बड़ी कातिल तू ही तो बदनाम है
ट्रांसफैट मुझको पुकारे दुनिया सारी
वनस्पति मुझको बुलाए दुनिया सारी
तबाही मचाऊं लेती हूँ सबकी जान मैं
अंबानी है मेरा टाटा भी मेरी जान है
रिलायंस मेरा टाटा भी मेरी जान है
मल्टीनेशनल को बनाऊँ धनवान मैं
जोड़ जाम कर दूँ शुगर को भी बढ़ाऊँ मैं
घुटने जाम कर दूँ शुगर को भी बढ़ाऊँ मैं
दिल की धमनियों में मचाऊँ कोहराम मैं
बेकरी में रहती हलवाई भी गुलाम है
बेकरी रहती हलवाई बॉय फ्रैंड है
पिज्ज़ा और बर्गर बनाना मेरा काम है
समोसा इमरती को तलना मेरा काम है

तुमने भी किया है मेरा एड कुछ ध्यान है
डेयरी मिल्क में भी मिलाया यही माल है
बच्चों को भी तुमने खिलाया ट्रांस फैट है
बटर और घी को क्यों किया बदनाम है
गले को दबा दूँ खींचूंगा तेरी टांग मैं
मुंडी को मरोड़ूँ खींचूंगा तेरी टांग मैं

मेरे इंडिया में क्रिस्को क्या काम है
मेरे इंडिया में ट्रांस फैट क्या काम है
तू है बड़ी कातिल तू ही तो बदनाम है
धुन - मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है

Saturday, October 8, 2016

My Birthday and Amitabh's film PINK

My Birthday and Amitabh's film PINK 


     दोस्तों, कल हम उत्सव मना रहे थे। मेरे जन्म दिन का अवसर था। शाम मैं पत्नी के साथ एक बहुपटीय चलचित्रशाला में अमित जी की पिंक देखने चला गया। घर आकर फिल्म के रिव्यूज़ भी पढ़े। फिल्म में अमित जी का ड़ायलॉग नो मीन्स नो देर रात तक सोचने को मजबूर करता रहा। 

   

           कहने को तो हम परिवर्तन और विकास के दौर से गुज़र रहे हैं। जीने का तौर तरीका, रहन-सहन और विचार सबकुछ बदल रहे हैं। लेकिन स्त्रियों के प्रति हमारी सोच बदलने के लिए हम आज भी तैयार नहीं हैं। हम उन्हें स्वच्छंद परिंदे की उड़ते चहचहाते देख ही नहीं सकते। हमारे लिए उनकी भावनाओं और स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं। 

        आज स्त्रियां अपने यौवनकाल या "चाइल्ड बियरिंग एज" का आधे से ज्यादा हिस्सा अपना करियर संवारने में गुजार देती हैं। और हम फिर भी अपेक्षा करते हैं कि वह अपनी वर्जिनिटी को बचाकर रखे। कल मुझे मेरे एक पुराने लेख "स्त्री-स्वास्थ्य का अनदेखा और अनछुआ पहलू - लैंगिक विकार" की प्रस्तावना की चार पंक्तियां याद आ गई। 

        यदि नारियां ऐसा सोचती हैं कि आधुनिक चिकित्सकों ने उनकी लैंगिक समस्याओं को अनदेखा किया है, उनके लैंगिक कष्टों के निवारण हेतु समुचित अनुसंधान नहीं किये हैं तो वे सही हैं। सचमुच हमें स्त्रियों के लैंगिक विकारों की बहुत ही सतही और ऊपरी जानकारी है। हम उनकी अधिकतर समस्याओं को कभी भूत प्रेत की छाया तो कभी उसकी बदचलनी का लक्षण या कभी मनोवैज्ञानिक मान कर उन्हें ज़हरीली दवायें खिलाते रहे, झाड़ फूँक करते रहे, प्रताड़ित करते रहे, जलील करते रहे, त्यागते रहे और वो अबला जलती रही, कुढ़ती रही, घुटती रही, रोती रही, सुलगती रही, सिसकती
रही, सहती रही.............. 

         लेकिन अब समय बदल रहा है। यह सदी नारियों की है। अब जहाँ नारियाँ स्वस्थ, सुखी और स्वतंत्र रहेंगी, वही समाज सभ्य माना जायेगा। अब शोधकर्ताओं ने उनकी¬ समस्याओं पर संजीदगी से शोध शुरू कर दी है। देर से ही सही आखिरकार चिकित्सकों ने नारियों की समस्याओं के महत्व को समझा तो है। ये स्त्रियों के लिये आशा की किरण है। 1999 में अमेरिकन मेडीकल एसोसियेशन के जर्नल (JAMA) में प्रकाशित लेख के अनुसार 18 से 59 वर्ष के पुरुषों और स्त्रियों पर सर्वेक्षण किये गये और 43% स्त्रियों और 31% पुरुषों में कोई न कोई लैंगिक विकार पाये गये। 43% का आंकड़ा बहुत बड़ा है जो दर्शाता है कि समस्या कितनी गंभीर है।
    
    पूरे लेख को आप यहाँ पढ़ सकते हैं  http://www.slideshare.net/flaxindia/female-sexual-dysfunction-66871714

Wednesday, October 5, 2016

Who says that doctors of Oncology are against Budwig Protocol?

             Friends, you are all well aware that Dr. Suresh H. Advani is not only India’s but also Asia's
Dr Suresh H. Adwan
best knows cancer specialist. Satish Sharma of Raipur Chhattisgarh show his wife (Patient of Colon Cancer) to Dr Suresh H. Adwan. Dr. Advani advised that she should consume plenty of cheese. Satish Sharma said that he wants to give cheese with Flax oil. Then Dr. Advani said that she may have FO and CC together, no problem at all. Dr. Adwani further smiled and told, “you seem to have read Bdvig Protocol. Oncosurgeon Dr Nitin Khunteta from Mahaveer Hospital Jaipur often recommends Budwig Protocol to several patients. Soon we may start a Budwig wellness Center in Jaipur.
            Dr Suresh H Advani is a famous oncologist who pioneered Hematopoietic stem cell transplantation in India. He has received many awards, such as Rashtriyra Krantiveer Award, Ujjain (2014), Padma Bhushan award by Government of India (2012), Dr. B. C. Roy National Award by Medical Council of India (2005), Lifetime Achievement in Oncology by Harvard Medical International (2005), Padma Shri by Government of India (2002)[, “Dhanvantari Award” for outstanding contributions to medicine (2002), National Academy of Medical Sciences (1996) and more. 

कौन कहता है ओंकोलॉजी के डॉक्टर बडविग प्रोटोकोल के खिलाफ हैं?

 कौन कहता है ओंकोलॉजी के डॉक्टर बडविग प्रोटोकोल के खिलाफ हैं?  



         आप सब अच्छी तरह जानते हैं कि डॉ. सुरेश एच. अडवानी भारत ही नहीं बल्कि एशिया के सबसे बड़े कैंसर विशेषज्ञ हैं। डॉ. सुरेश अडवानी भारत में स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन के जनक है। इन्हें कई अवार्ड्स से नवाज़ा गया है, जैसे राष्ट्रीय क्रांतिवीर अवार्ड, पद्मभूषण, डॉ. बी.सी.रॉय नेशनल अवार्ड, लाइफ टाइम अचीवमेंट इन ओंकोलॉजी, पद्मश्री, धनवंतरी अवार्ड इत्यादि। रायपुर छ.ग. के सतीश शर्मा अपनी पत्नी को दिखाने डॉ. सुरेश एच. अडवानr के पास गए। डॉ. अडवानी ने कहा कि इन्हें खूब पनीर खिलाइए। सतीश शर्मा ने उन्हे कहा कि मैं इन्हें पनीर में अलसी का तेल मिला कर देना चाहता हूँ, तो डॉ. अडवानी मुस्कुराकर बोले बड़े शौक से खिलाइए, लगता है आप बडविग प्रोटोकोल पढ़कर आए हैं। फिर महावीर मिशन हॉस्पीटल जयपुर के आँकोसर्जन डॉ नितिन खुंटेटा तो कई मरीजों को बडविग प्रोटोकोल लेने की सलाह देते हैं। और जल्दी ही मैं और डॉ नितिन जयपुर में बडविग वेलनेस शुरू करने जा रहे हैं।



रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (07-10-2016) के चर्चा मंच "जुनून के पीछे भी झांकें" (चर्चा अंक-2488) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
http://charchamanch.blogspot.in/

मैं गेहूं हूँ

लेखक डॉ. ओ.पी.वर्मा    मैं किसी पहचान का नहीं हूं मोहताज  मेरा नाम गेहूँ है, मैं भोजन का हूँ सरताज  अडानी, अंबानी को रखता हूँ मुट्ठी में  टा...