Sunday, July 29, 2012

शहदनामा और अलसी के चमत्कार

 Dear Sirs,


We are engaged in the testing/analysis of Honey from last 34 years since 1978 capturing to the needs of maximum number of satisfied customers in our region with great accuracy using most modern techniques of testing covering ISI specifications now (BSI) .  We are taking the services of highly qualified staff (Bsc.chem, Msc.chem.) for ensuring the reliability and accuracy of our results. It was a very hard time in 1978 about 34 years back ,when no one was aware of about the quality and genuineness of pure natural Honey and entire deals were made blindly  in good faith on approximation basis. That time we took the initiative here and availed the services of several senior scientists and lecturers of Chemistry and installed the present laboratory. Thereafter we inspired the people engaged in Honey trade to adopt proper testing procedures so as to ascertain and ensure the quality of their products for maintaining the uniformity and reliability of their commodities. No doubt you would have been taking the services of other laboratories as well but being pioneer in the testing/analysis field and the vast testing experience owned by us is sufficient enough and surely a guarantee of accuracy and reliability of our results which none of the laboratory perhaps can provide you except us. My age is 54 years as on 25.07.2012 out of which I have devoted 2/3rd of my life span i.e. 34 years in the testing/analysis of Honey. Thus we can definitely justify with the results. Luckily I got married in 1978 and my wife is Bsc.hons.in chem.Msc.organic chem. From DelhiUniversity presently working as senior lecturer and head of Chemistry department in a reputed institution of India fame namely Dyal Singh Public School,Karnal who equally assists me and both we discuss over the several aspects that how to give our best of services to the Honey industry. Also we have been appreciated by National Research Development Corporation Of India ( A GOVERNMENT OF INDIA ENTERPRICE) in 1992 for the research and development work carried by us and patenting grant to our new innovation and research work was also given free of cost by the Government of India. I came to know the beneficial and miraculous effects of Flax seeds when I studied an articlepublished in the magazine Aha Zindgi in the year 2009 given by Dr.O.P Verma. As my self was a chronic patient of Irritable Bowel Syndrome, Low appetite and poor digestion and I had lost around 17 kegs of weight in 2 years. Beforethat, I had adopted the entire available therapies like allopathic, homeopathy and Ayurveda etc..However, of no vein and none of the therapy has worked upon me. I was completely desperate because I had to use the antibiotics very frequently for regularising the proper functioning of my intestines. The antibiotics had killed the lacobassilous and other friendly bacteria’s in my gut. My overall body resistance and immunity were reduced sharply. Thereafter I included Flax seeds and natural Honey in my daily diet. It worked wonderfully and all my problems get completely eradicated very soon. Since then I am regularly using Flax seeds and Honey and enjoying a healthy life. I have again regained my weight and   the various ailments from whom I was suffering from have become the things of past. 

In July 2012  my father ageing about 80 years old developed multiple problems like Osteoarthritis, Hypertension (High blood pressure),got Diabetes and High Grade Papillary Urothelial Adenocarcinoma of Prostate Gleason’s grade 5+4=9 (acute cancer) .No  hope of his survival was left over, and at that time my only hope was hon”ble Dr. O.P.Verma .Under the guidelines of Dr. O.P.Verma, I started the treatment of myfather; miraculously he had relief in his overall symptoms of pain and frequent urination. I quite impressed by the methodology and line of treatment suggested by Dr.O.P.Verma. After few conversations he inspired me to arrange extraordinary pure natural and genuine Honey for their patients which is the only source of natural sweetener not only for cancer patients but other peoples as well suffering from different ailments and disabilities being readily digestible and an instant source of energy .The  Honey contains so many useful compounds and enzymes which the modern science and technology could not analyse completely so far in spite of having the most modern and sophisticated testing techniques developed here not only in India but even abroad as well in developed countries.As the resistance and auto immunity system of cancer patients falls considerably so it was necessary to make the Honey along with packing material free from all pathogenic bacteria’s, microbes, fungi etc. Here Ultra Violet Rays worked well. Thus, we treat both Honey and packing material with UV rays before packing. Before that, I had never thought on this idea and it is only the inspiration and persuasion of Dr. O.P.Verma that I became agreed to extend my full cooperation and contribution and promised my participation in his great mission of cancer eradication by supplying pure natural and well tested Honey to his patients at reasonable rates.

Purshotam Bansal,
ORGANO RESEARCH LABORATORY
2052 Sector 13, Urban Estate,
KARNAL-132001 (Haryana)
Phone Resi/lab. 0184-2204435, Mobile. 09355502052
E MAIL ID. organolab@gmail.com
Bank A/C No. ICICI. 661705111966 IFSC CODE   ICIC0006617

Friday, July 13, 2012

डॉ. बुडविग और उनके शिष्य लोथर हरनाइसे

डॉ. बुडविग और उनके शिष्य लोथर हरनाइसे

कई वर्षों पहले मैं पीपुल अगेन्स्ट कैंसर के अध्यक्ष श्री फ्रैंक व्हिवेल से साक्षात्कार करने अमेरिका गया था। उन्होंने मुझे पहली बार डॉ. बुडविग और उनके ऑयल-प्रोटीन आहार के बारे में बतलाया। उन्होंने कहा कि वह फ्रुडेनस्टेड में रहती है, जो मेरे शहर स्टुटगर्ट से मात्र 65 किलोमीटर दूर है, इसलिए मुझे उनसे मिलना चाहिये। बुडविग कई सालों से उनके सम्पर्क में थी और वे उनसे बहुत प्रभावित थे। उन्होंने बुडविग को फोन करके मुझसे मिलने के लिए समय भी तय कर लिया। यह अप्रेल 1998 की घटना थी। जर्मनी आते ही मैं बड़ा उत्साहित होकर क्लॉस पर्टल के साथ उनसे मिलने गया। उनके व्यक्तित्व में जादू जैसा सम्मोहन था। पहली ही मुलाकात में हमारे घनिष्ट सम्बन्ध बन गये। तीसरी मुलाकात में तो मैंने उन्हें फ्रैंकफर्ट और स्टुटगर्ट में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित कर दिया था। पहले तो उन्होंने तुरन्त मना कर दिया लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझे फोन करके अपनी स्वीकृति दे दी। और इस तरह कई दशकों के बाद 23 और 24 सितम्बर, 1998 को उन्होंने क्रमशः फ्रैंकफर्ट और स्टुटगर्ट में व्याख्यान दिये, जिनमें लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। इसके 6 महीने बाद उन्होंने फ्रुडेनस्टेड में मेरे जन्मदिन पर एक और व्याख्यान दिया, जिसमें फ्रैंक व्हिवेल भी मौजूद थे। उनके इस तोहफो को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा।  
मैं सचमुच बहुत भाग्यशाली था कि कई वर्षों तक ऐसी विदुषी महिला के सानिध्य में रहा। वे मुझे पोषण, कैंसर, आध्यात्मिकता और चिकित्सा शास्त्र के बारे में विस्तार से बतलाती थी। हां, वे दिन में एक घंटा जरूर आराम करती थी। कई बार हम साथ-साथ शैम्पेन पीते थे। वह साधारण महिला नहीं थी। कभी-कभी वे मुझे डांट भी देती थी, फिर दूसरे दिन सहजता से मुझे समझाती कि उन्होंने मुझे क्यों टोका था।
आपको बतला दूँ कि बुडविग ने कभी विवाह नहीं किया। उनका पूरा जीवन विज्ञान और मानवता को ही समर्पित रहा और उन्होंने सिर्फ वैज्ञानिकों और चिकित्सकों से ही सम्बन्ध रखे। रिश्तेदारों में किसी को उनके ऑयल-प्रोटीन आहार के बारे में सुनने का समय नहीं था। उनका जीवन सचमुच इतना नीरस था। बस वे कभी-कभी खुश होती थी कि उम्र के आखिरी पड़ाव में एक मैं तो हूँ, जो उनकी हर शोध हर तर्क को तल्लीनता से सुनता हूँ, समझता हूँ।
एक दिन उन्होंने अपनी शोध के बारे में एक संक्षिप्त पुस्तक लिखने की इच्छा जाहिर की और मुझे मदद करने को कहा। इस दौरान मैं रोज उनके घर जाता था। वे रोज वे ढेरों फाइलें निकल कर किसी एक मेज पर तैयार रखती थी और मझे बारीकी से हर बात समझाती थी। उनके कमरे में तीन मेजें रखी रहती थी। वे अपनी उम्र (90वर्ष) के हिसाब से मानसिक और शारीरिक तौर पर बहुत सक्षम थी। हमारे बीच वार्तालाप के मुख्य विषय फैट और इलेक्ट्रोन्स हुआ करते थे। और इस तरह कैंसर द प्रोब्लम एण्ड द सोल्यूशन पुस्तक लिखी गई।
इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद उन्होंने अपनी सर्वश्रेष्ठ पुस्तक ऑयल-प्रोटीन कुकबुक को नये सिरे से लिखने की इच्छा जाहिर की। हमने काम शुरू भी कर दिया था, लेकिन उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था। इसलिए उन्होंने कहा कि चलो पुस्तक के पुराने संस्करण में कुछ नये अध्याय जोड़ कर ही प्रकाशित कर देते हैं। लेकिन यह कार्य भी पूरा नहीं हो सका और वे ईश्वर को प्यारी हो गई। मेरे 3-ई कार्यक्रम का आधार भी यही महान पुस्तक है।
दुर्भाग्यवश उनका कोई वैज्ञानिक उत्तराधिकारी नहीं है। उन जैसी विद्वान का कोई विकल्प हो भी नहीं सकता है। मैं तो हमेशा उनका शिष्य ही रहूँगा और उनकी शोध और उपचार को लोगों तक मूल रूप में पहुँचाता रहूँगा। 
लोथर हरनाइसे का साक्षात्कार
(जो ऑनलाइन जर्मन पत्रिका कैंसर व्हिस्परर में प्रकाशित हुआ)

प्रश्न - श्री हरनाइसे आप ऑयल-प्रोटीन डाइट के बारे में कैसे जानते हैं?
उत्तर - यह एक मजेदार कहानी है, मैं हजारों मील दूर आयोवा, अमेरिका में पीपुल अगेन्स्ट कैंसर के अध्यक्ष श्री फ्रैंक व्हिवेल से मिलने गया था। उन्होंने मुझे डॉ. जौहाना बुडविग के बारे में बतलाया और मुझसे मिलने के लिए उन्हे फोन करके समय भी तय कर लिया। सबसे अजीब बात यह थी कि वे मेरे घर से कुछ ही मील दूर डाइटर्सव्हीलर में रहती थी।
प्रश्न - तब वे कितने वर्ष की थीं?
उत्तर - उस समय वे 89 वर्ष की थीं, नियमित रोगियों से मिलती थीं और शारीरिक तथा मानसिक रूप से बहुत ऊर्जावान और तेजस्वी लगती थी। वे बहुत मिलनसार थीं और उन्होंने मेरा बड़े प्यार से स्वागत किया। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं इस सदी की महान चिंतक, वैज्ञानिक और खोजकर्ता से साक्षात्कार कर रहा हूँ। आधे घन्टे तक बातचीत करने के बाद उन्होंने मुझे दोबारा मिलने के लिए कहा।  
अगली बार उन्होंने मुझे उनकी फाइलें, शोध-पत्र और मरीजों की रिपोर्ट्स पढ़ने के लिए दी। यह बहुत आश्चर्यजनक घटना थी, क्योंकि मैं जानता था कि वे अपनी फाइलें किसी को भी नहीं देती थी। यह मचमुच मेरे लिए बहुत सम्मान की बात थी। बाद में उन्होंने मुझे बताया था कि मेरी जिज्ञासा, तर्क-शक्ति और कैंसर उपचार में मेरी रुचि को वे पहली मुलाकात में ही भांप चुकी थी। मैंने उनके साथ कुछ वर्ष बिताये। मैं अक्सर उनके घर जाता। वे खाने के लिए बाहर जाना पसन्द नहीं करती थी। वे स्वयं ही खाना बनाती और मैं उनकी मदद करता था। वे मुझसे ढेरों बातें करती रहती थी। मैं उनका आज्ञाकारी शिष्य बन गया था। वे मेरे हर सबाल का जवाब देती थी। वे समझ चुकी थी कि मैं उनके उपचार को सामान्य लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि वे एक पुस्तक लिखना चाहती हैं और उनकी इच्छा थी कि इसमें मैं उनकी मदद करूँ।  
प्रश्न - उनकी कौन सी बात ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
उत्तर - ऐसी तो बहुत सारी बातें हैं। उन्होंने अपने जीवन के 70 वर्ष सिर्फ विज्ञान और मानवता के लिए समर्पित कर दिये थे। इसके अलावा इस अकेली महिला नें अपनी जान की परवाह न करते हुए शक्तिशाली और सम्पन्न मार्जरीन और फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री द्वारा की गई अनादर, अवमानना और उत्पीड़न का डट कर मुकाबला किया। वे बहुत बुद्धिमान और असाधारण प्रतिभा की धनी थी और उन्हें विज्ञान और चिकित्सा-शास्त्र की गहरी जानकारी थी। वे मेरे प्रश्नों के तुरन्त सटीक और स्पष्ट जवाब देती थी। 
प्रश्न - ऑयल-प्रोटीन डाइट में ऐसी क्या बात है कि आप इसे कैंसर की सबसे अच्छी आहार-चिकित्सा मानते हैं? 
उत्तर - आपके इस प्रश्न का जवाब देना मेरे लिए सबसे आसान है। मैंने डॉ. बुडविग की फाइलों में लगे उन रोगियों के अनगिनत पत्र पढ़े हैं, जो इस उपचार से ठीक हुए और उन्होंने बुडविग का धन्यवाद करने के लिए ये पत्र लिखे हैं । मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि मैं डॉ. बुडविग के इस आहार-चिकित्सा से ठीक हुए सैंकड़ों रोगियो से स्वयं मिला हूँ या उनसे पत्राचार कर चुका हूँ। फिर पिछले 14 वर्षों से मैं स्वयं कैंसर के रोगियों का उपचार कर रहा हूँ। ये सारे अनुभवों के आधार पर ही मैं ऑयल-प्रोटीन डाइट को संसार की श्रेष्ठतम आहार-चिकित्सा मानता हूँ।    
प्रश्न - आज विज्ञान में निरंतर प्रगति कर रहा है। क्या आज हम ऑयल-प्रोटीन आहार के गूढ़ विज्ञान को बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं?
उत्तर - मुझे नहीं लगता कि हम सचमुच सही दिशा में प्रगति कर रहे हैं। हां, यह तो सत्य है कि आज हम कोशिका-भित्ति, जीन्स या म्यूटेशन के बारे में पहले से ज्यादा जानते हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि हम ऐसी कोई नई बात जान पाये हैं कि हमें ऑयल-प्रोटीन आहार में कोई बदलाव लाने की जरूरत है। दूसरी तरफ ब्रूस लिपटन द्वारा जीन्स और कोशिका-भित्ति पर की गई शोध पी-53 ऐपोप्टोसिस जीन की कार्यप्रणाली और डॉ. बुडविग की शोध का सत्यापन करती है। पिछले कुछ वर्षों में मुझे कई सबूत मिले हैं जो ऑयल-प्रोटीन आहार के सिद्धांतों का सत्यापन करते हैं। मुझे बार-बार अचरज होता है डॉ. बुडविग कितनी बुधिमान थी जिन्होंने लगभग तीस वर्षों पहले ये सारी बातें लिखी, जिन्हें वे तब सिद्ध भी नहीं कर पाई थीं। परन्तु सच बताऊँ मुझे इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है, मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि ऑयल-प्रोटीन आहार कितनी सफलता से कार्य करता है। इसके अलावा मुझे कुछ जानने की आवश्यकता भी नहीं है। मैं आपके बतला दूँ कि मैं वैज्ञानिक नहीं हूँ और विज्ञान की गूढ़ बातें मेरे सर के ऊपर से ही निकल जाती हैं। मैं तो बस ही चाहता हूँ कि बुडविग का यह विज्ञान और उपचार अपने मूल प्रारूप में लोगों तक पहुँचता रहे।      
प्रश्न - बुडविग ने मृत्यु के बाद क्या अपना कोई उत्तराधिकारी नियुक्त किया है?
उत्तर - यदि आप सचमुच उनको जानती होती तो यह प्रश्न नहीं पूछती।
प्रश्न - आपका अभिप्राय क्या  है?
उत्तर - एक बार चाय पीते-पीते हुए उन्होंने कहा था कि उनकी मृत्यु के साथ ईमानदार, सत्यवादी और अडिग वैज्ञानिकों की वह पीढ़ी समाप्त हो जायेगी, जो सिर्फ विज्ञान और लोगों की भलाई के लिये कार्य करती थी, जिन्हें न कभी पैसे का लालच रहा और न जिन्हें बहुराष्ट्रीय संस्थान खरीद सके। वह बिलकुल सही थी। जीवन भर वह अकेली लड़ती रही, लेकिन कोई उसके पास तक फटक नहीं सका। शुरू में तो मुझे लगा कि शायद वृद्धावस्था के कारण वह इतनी तनहा है, लेकिन बाद में उनके रिश्तेदारों से भी मालूम हुआ कि उसकी प्रकृति शुरू से ही ऐसी रही थी। इसलिए ऐसा सम्भव ही नहीं था कि कोई उसका उत्तराधिकारी बन सके।   
प्रश्न - तो आपका तात्पर्य यह है कि उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था?
उत्तर - दुर्भाग्यवश मेरा जवाब हाँ है।
प्रश्न - तो क्या हम आपको उनका उत्तराधिकारी मान लें?  उनके रिश्तेदारों के बारे में आप क्या कहते हैं?
उत्तर - मैं तो आपको अपने बारे में बतला सकता हूँ। बुडविग कभी अपने रिश्तेदारों के बारे में बात नहीं करती थी। और मैं स्वयं को उनका उत्तराधिकारी नहीं मानता हूँ। जो कुछ मैंने सुना है उसके आधार पर आपको बतलाता हूँ कि उनके रिश्तेदारो के पास न कभी उनके लिए समय होता था और न कभी उनके लिए चिंतित रहे होंगे।
जब बुडविग जीवित थी तब उन्होंने न कभी अपने किसी रिश्तेदार के साथ कोई कोई सेमीनार किया और न ही किसी के साथ कोई पुस्तक लिखी। शायद मैं ही सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने उनकी आखिरी दो पुस्तकों के प्रकाशन में उनका पूरा सहयोग दिया और उनके कई व्याख्यान करवाये। उन्होंने अपना आखिरी व्याख्यान मेरे जन्म दिन पर उनके ही शहर फ्रुडेनस्टेड में दिया था। यह मेरे लिए उनका अमूल्य तोहफा था। जहाँ तक मैं जानता हूँ कि शायद मेरे सिवा किसी ने उनके मरीजों के दस्तावेजों को छुआ तक नहीं है।
प्रश्न - क्या आप उनके विज्ञान और उपचार को लोगों तक पहुँचा रहे हैं?  
उत्तर - मैं पिछले 14 वर्षों  से जर्मनी और पूरी दुनिया में भ्रमण कर रहा हूँ। मैं पूरे विश्व में व्याख्यान आयोजित करता  हूँ और लोगों को कैंसर के इस महान उपचार के बारे में जागरुक कर रहा हूँ। जर्मनी में हमने विश्वस्तरीय कैंसर उपचार केंन्द्र  (www.3e-zentrum.de) बनाया है, जहाँ कैंसर के रोगियों को बुडविग आहार दिया जाता है। मैं पिछले 15 वर्षों में 10,000 से अधिक कैंसर के रोगियों का साक्षात्कार कर चुका हूँ जो कैंसर पर विजय प्राप्त करके आज स्वस्थ जीवन बिता रहे हैं। अपने अनुभवों के आधार पर मैंने कैंसर उपचार के लिए 3-ई कार्यक्रम तैंयार किया है। बुडविग आहार इस 3-ई कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रश्न - क्या ऑयल-प्रोटीन आहार के कुछ ऐसे रहस्य भी हैं जो बुडविग के साथ ही चले गये?
उत्तर - दुर्भाग्यवश, हां। साइटक्रोम ऑक्सीडेज़ के निदान और लेज़र उपचार की कुछ अहम जानकारियां उनके साथ ही चली गई हैं। कई नये व्यंजन और एलडी तेल की नई विधियां भी वे किसी को नहीं बतला पाई।
प्रश्न - एलडी तेल के बारे में बहुत कम लिखा गया है?
उत्तर - यह सही है। डॉ. बुडविग और मैंने ऑयल-प्रोटीन कुकबुक के नये संस्करण में एलडी तेल के बारे में विस्तार से लिखने की योजना बनाई थी। लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी मृत्यु हो जाने के कारण यह पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हो सकी है। लेकिन नये व्यंजन और एलडी तेल की विधियां मेरे पास सुरक्षित हैं। ऑयल-प्रोटीन कुकबुक का नया संस्करण आपको जल्दी ही मिल जायेगा, जिसमें एलडी तेल के बारे में विस्तृत जानकारी भी होगी। 

Saturday, July 7, 2012

मीना सुमन का संबोधन

।। जय अलसी मां ।। 


लंबी है डगर   और  कठिन   है सफर, 
करना तो है मगर आप साथ दें अगर। 


भाइयों और बहनों, 

देश-विदेश में विख्यात हमारे पथ-प्रदर्शक और अलसी के स्टार-प्रचारक आदरणीय डॉ. ओ.पी.वर्मा ने अपने लेखों, टी.वी. कार्यक्रमों और चेतना-यात्राओं के माध्यम से जो पूरे देश में अलसी चेतना की ज्वाला जलाई है, अलसी की फसल बोई है, उसकी सुगंध अब सर्वत्र फैल गई है, हर तरफ अलसी के नीले फूलों की छटा छाई हुई है, जिधर देखो लोग अलसी से स्वास्थ्य लाभ उठा रहे हैं। पूरे देश से लोग हजारों इन्हें फोन करते है। लोगों की अच्छी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। हमारी संस्था फ्लेक्स अवेयरनेस सोसाइटी (अलसी चेतना यात्रा) के पिछले कई वर्षों से अलसी के बारे में जागरूकता लाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। संस्था के अन्य प्रमुख उद्देश्य हैं। 
  • लोगों को ट्रांसफैट युक्त वनस्पति घी और रिफाइन्ड तेल से स्वास्थ्य पर होने वाले घातक प्रभावों के बारे में लोगों को बताना और इनको प्रतिबंधित करवाने के लिए प्रयास करना। 
  • जैविक खाद्य पदार्थों के उत्पादन और प्रयोग को प्रोत्साहन देना, लोगों को जैविक खाद्य पदार्थों के लाभ समझाना। 
  • खाद्य पदार्थों में मिलावट, जो देश की सबसे गंभीर समस्या है, के बारे में लोगों को जानकारी देना। मिलावट रोकने के लिए संबंधित विभागों से सामंजस्य रखते हुए कार्यवाही करना। 
  • लोगों को स्वास्थ्य की संपूर्ण जानकारी देने के उद्देष्य से एक स्वास्थ्य-पत्रिका का प्रकाशन करना। 
  • कोटा में देश-विदेश के रोगियों को उच्चस्तरीय प्राकृतिक और आयुर्वेदिक चिकित्सा उपलब्ध कराने हेतु प्राकृतिक चिकित्सालय, रिसर्च लेब, गौ शाला, कृषि अनुसंधान कैंद्र और विशाल हर्बल पार्क विकसित करना। 
  • सब जानते हैं कि आजकल कैंसर उपचार के लिए दी जाने कीमोथैरेपी एवं रेडियोथैरेपी के लिए हॉस्पीटल भारी कीमत वसूलते हैं। फिर भी कुछ ही रोगियों को लाभ मिलता है। गाँवों के गरीब लोग जमीन बेचकर, कर्जा लेकर अपने परिजनों के कैंसर का उपचार कराने शहर आते हैं और अक्सर लाखों रूपये खर्च करने के बदले उन्हें अपने परिजनों की मौत के सिवा कुछ नहीं मिलता है। 
  • अलसी दुर्गा का पांचवां स्वरूप है, इसे पार्वती एवं उमा के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पूजा अर्चना करने से मनुष्य सीधे मोक्ष को प्राप्त करता है। अलसी के संबंध में शास्त्रों में कहा गया है- 

अलसी  नीलपुष्पी  पावर्तती  स्यादुमा  क्षुमा। 
अलसी  मधुरा  तिक्ता  स्त्रिग्धापाके  कदुर्गरुः। 
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी। 
          इसलिए हमें अलसी मां का एक विशाल संगमरमर का मंदिर भी बनवाना है। 
  • अभी तक संस्था का पूरा खर्चा डॉ. ओ.पी.वर्मा ने अपनी जेब से किया है और किसी से कोई अनुदान नहीं लिया हैं। लेकिन इतने बड़े कार्यक्रम को अंजाम देने के लिए बहुत बड़ी धन राशि की जरूरत है। यह कार्य आपके अनुदान के बिना संभव नहीं होगा। 

अतः मैं, मीना सुमन, आपसे गुज़ारिश करती हूँ कि आप हमारी संस्था को यथा संभव अपना आर्थिक सहयोग पूरी भावना और जोश के साथ दे कर संस्था को सशक्त बनाये ताकि अलसी-चेतना देश के हर घर में पहुँचे और डॉ. ओ.पी.वर्मा का भारत को स्वस्थ और सम्पन्न देश के रूप में विकसित करने का सपना पूरा हो सके। बड़ा अनुदान देने के लिए आप इस नंबर पर 9460816360 पर बात कर सकते हैं। आप अपनी धन राशि फ्लेक्स अवेयरनेस सोसाइटी के स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, तलवंडी, कोटा राजस्थान के खातासंख्या 65180192509 में भी जमा करवा सकते हैं। आपके द्वारा दी गई हर छोटी या बड़ी धनराशि हमारे लिए अनमोल है। 

मीना सुमन 
विशेष सचिव 
अलसी चेतना यात्रा 7-
वैभव हॉस्पिटल 
7-बी-43, महावीर नगर तृतीय, कोटा राज. 
http://flaxindia.blogspot.com 
+919460816360 
अलसी चेतना से बड़ा  कोई कर्म नहीं 
और दान   से  बड़ा   कोई  धर्म   नहीं 


Monday, July 2, 2012

कोलावेरी डी

सम्पूर्ण हैल्थ संदेश में प्रकाशित 


मैं गेहूं हूँ

लेखक डॉ. ओ.पी.वर्मा    मैं किसी पहचान का नहीं हूं मोहताज  मेरा नाम गेहूँ है, मैं भोजन का हूँ सरताज  अडानी, अंबानी को रखता हूँ मुट्ठी में  टा...