Friday, February 25, 2011

Neel Madhu





Maheshwari Mahila Mandal Workshop

माहेश्वरी महिला मंडल द्वारा आयोजित
सेमीनार – अलसी के चमत्कार

स्थान – माहेश्वरी भवन, विज्ञान नगर, कोटा समय – दिन के 2:30 बजे 9 फरवरी, 2011

           


Alsi Chetna Yatra Second

अलसी चेतना यात्रा द्वितीय



I have completed my second 9 days (1650 Km.) Flax Awareness Journey. Brief details are as follows:

Dec 14, 2011 Devas Seminar & Press Conference at English Tutorials.

Dec 15 & 16 at Bhopal. Attended Ayurved National Conference on Panchkarma. India’s Famous Ayueved Doctors, Natural Healers, Panchkarma Experts & students attended the Conference. I had a lecture there on Flaxseed & Dr. Budwigs Protocol. I distributed my booklet to everybody free of cost.

Dec 17 Lecture at Ayueced College, Bhopal.

Dec 18 Lecture at Yoga centre, Bhopal & Press Conference at Bhopal.

Dec 20 Lecture & Press Conference at Engineering College, Vidisha.

Dec 21 Lecture at Faculty of Management Studies at Sagar University.







Alsi Chetna Yatra First






हमारी पहली अलसी चेतना यात्रा कोटा से दिनांक 28 नवंबर, 2010 को प्रातः 5 शुरू होकर उदयपुर, सागवाड़ा, बांसवाड़ा, इन्दौर, माण्डू, उज्जैन, देवास, सीहोर, सागर और विदिशा होती हुई दिनांक 14 दिसंबर, 2010 को साय 5.30 बजे कोटा पहुँची है। इस यात्रा में हमने 2900 किमी. का सफर तय किया है। इस यात्रा में कोटा से मैं अकेला ही चला था। बस साथ में मेरा ड्राईवर रामप्रसाद था। इस यात्रा के लिये उषा ओम नोलेज कंसल्टेन्सी सर्विसेज प्रा.लि. कोटा के सीओओ श्री वैभव जी ने एक शानदार गाड़ी फोर्ड एन्डेवर भेंट की है तथा यात्रा का पूरा खर्च भी वहन किया है। इस वाहन को हमने विजय रथ नाम दिया है। अलसी चेतना यात्रा उनकी आभारी है। इस यात्रा की हमने कोई पूर्व योजना नहीं बनाई थी और न ही कोई विशेष तैयारी की थी। बस पत्नि से 550 अलसी भोग लड्डू और 5.5 किलो बिस्किट बनवाये और अकेला ही निकल पड़ा .............

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर।
लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया।।

28 दिसंबर, 2010
हमारी अलसी चेतना यात्रा का पहला पड़ाव – हिरन मगरी उदयपुर
हम प्रातः 11 बजे उदयपुर के सेल टेक्स कमिशनर श्री जयन्ती जैन साहब के घर पहुंचे। मैं उनसे पहली बार मख़ातिब हुआ था। कुछ क्षणों तक मेरी नजरें उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारती रही, उनमें एक सेल टेक्स अधिकारी को खोजती रही। परन्तु मुझे “वो” कहीं नहीं दिखाई दिया। मुझे तो वे प्रेम, सहानुभूति और सपने बेचने वाले सौदागर लग रहे थे। उनसे मिलकर ऐसा लगा जैसे उनसे कोई पुराना नाता था। वे सरल एवं खुशमिजाज प्रकृति के नेक इन्सान हैं। श्री जयन्ती जैन भारत के डेलकारनेगी है। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी है। उनकी “उठो जागो” बेस्ट सेलर रही है। उनकी आगामी पुस्तक “असाध्य रोगों का सामना कैसे करें?” बड़ी प्रभावशाली बन रही है। आदरणीया भाभी जी ने मेरी बहुत आवभगत की। फिर दिन भर उनके घर पर रोगियों और मिलने वालो के आने जाने का तांता लगा रहा। उनके घर पर सौभाग्यवश मुझे कुछ आर.ए.एस. अधिकारी और चिकित्सकों से भी उनसे मिलने का अवसर मिला। दिन भर अलसी और बुडविज प्रोटोकोल पर चर्चा चलती रही और अलसी भोग तथा अलसी के मेमबॉय-प्लस और डायबिटीज-फोरम बिस्किट्स के साथ हम चाय की चुस्कियाँ भी लेते रहे। कोटा से आये विज्ञान और तकनीकी विभाग के निर्देशक श्री गिरिधारी गर्ग ने मुझसे कहा कि आप यात्रा समाप्त करके पहुंचे तो मुझसे मिले मैं आपके सारे सपनों को साकार करने के लिये हर संभव प्रयत्न करूंगा।

29 दिसंबर, 2010 को हमने खड़गदा में मेरे अभिन्न मित्र डॉ. महेश दीक्षित की सुपुत्री अमी के विवाह मे शामिल हुए। विवाह समारोह में कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों से अलसी पर चर्चा होती रही


30 दिसंबर, 2010
 हमारी अलसी चेतना यात्रा का तीसरा पड़ाव – बांसवाड़ा
बांसवाड़ा पहुँचने से पहले ही डॉ. रजनीकान्त मालोत ने मुझे फोन करके आग्रह कर दिया था कि मैं बांसवाड़ा से 20 किमी. पहले तलवाड़ा में चमत्कारी मां त्रिपुरा सुन्दरी के दर्शन अवश्य करूं। मां का मन्दिर 13 वीं शताब्दी का है। इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिये पूर्व मुख्य मंत्री हरिदेव जोशी ने बहुत काम करवाया था। उसके बाद पूर्व  मुख्यमंत्री वसुंधरा ने भी यहां 2 करोड़ से ज्यादा रूपये का काम करवाया था। मां का चमत्कार इतना है कि यहां सबकी इच्छा पूर्ण होती है। इच्छा पूरी होने तक व्यक्ति मां के दर्शन नहीं कर सकता है। लेकिन इच्छा पूरी होने पर मां स्वयं उसे बुला लेती है। इस मंदिर में सवा पांच किलो सोने से बना हुआ मां का स्तम्भ है। नवरात्री में मां के दर्शन के लिये दो किमी लम्बी लाइन लगती है। नवरात्री में मां कभी-कभी आस-पास के क्षेत्रों में गरभा खेलने भी चली जाती है। प्राचीन काल में यहां जंगल था और किसी समय एक चरवाहे ने अपने लोहे के दरांते को मां की मूर्ति पर लगाया तो वह सोने का बन गया था। यहाँ मां के ऐसे कई चमत्कार सुनने को मिलते हैं।
डॉ. रजनीकांत बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं तथा डायबिटीज और कई अन्य विषयों पर काफी शोध कर रहे हैं। ये एक महान लेखक भी हैं और कई समाज सेवा के कार्यो से जुड़े हुए हैं। आदरणीया भाभी जी भी समाज सेवा का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं।

डॉ. मालोत के घर भी हमारी गोष्ठी 5-6 घंटे तक चली। इस गोष्ठी में पतंजली के जिला प्रमुख श्री पूर्णा शंकर आचार्य, डॉ. राजेश वसानियां, डॉ. युधिष्ठिर त्रिवेदी, श्री दिनेश चन्द्र शाह, श्री श्याम अश्याम साहित्यकार, श्री प्रकाश कोठारी, श्री शांति लाल शर्मा, श्रीमती हिना जोशी, श्रीमती संगीता गुप्ता, श्रीमती अर्चना तिवारी, श्रीमती मधुलिका गुप्ता, श्रीमती ज्योति गुप्ता, श्रीमती मोहिनी देवी तलरेजा, श्रीमती सरला देवी जैन, श्रीमती मंजुला जैन, श्रीमती पुष्पा जैन, श्रीमती साधना गुप्ता आदि प्रतिष्ठित लोग, अन्य मित्र और कई रोगी उपस्थित थे। इस गोष्ठी में अलसी के औषधीय प्रयोग और डॉ. बुडविज के कैंसर रोधी आहार विहार पर व्यापक चर्चा हुई।



1 दिसंबर, 2010
हमारी अलसी चेतना यात्रा का चौथा पड़ाव – इन्दौर
आठ दस महीने पहले नई दुनिया के वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेश ताम्रकर जी और इन्दौर मेडीकल कॉलेज में फिजियोलोजी के प्रोफेसर डॉ. मनोहर भंडारी ने मेरा अलसी पर लेख पढ़ा था और प्रभावित होकर अलसी की जागरूकता पर काम शुरू भी कर दिया था। इन्होंने मेरे कई लेख नई दुनिया, सेहत, नायिका, ब्रह्मात्मशक्ति, ज्ञानवीणा (ब्रह्माकुमारी की पत्रिका) आदि में छपवाये हैं, अलसी पर सेमीनार आयोजित किये हैं और अपने रोगियों को अलसी खिलाना भी शुरू कर दिया है।

जब मैं बांसवाड़ा से इन्दौर के लिये रवाना हुआ तो मुझे नई दुनिया के वरिष्ठ पत्रकार श्री सुरेश ताम्रकर जी ने बतला दिया था कि उन्होंने 1 दिसंबर को प्रात: 7 बजे साकेत क्लब में मेरा सेमीनार तय कर दिया है और इसकी सूचना कई समाचार पत्रों के माध्यम से आम जनता को दे दी गयी है। इस सेमीनार को सफल बनाने के लिये श्री ताम्रकर जी, डॉ. मनोहर भंड़ारी तथा प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. जगदीश जोशी ने 400 से ज्यादा एस.एम.एस. और फोन किये थे तथा 4 दिन से इस कार्यक्रम की तैयारी में जुटे थे। इस कार्यक्रम में 350 से ज्यादा प्रबुद्ध लोग मौजूद थे जिनमें मुख्य थे डॉ. राजेन्द्र पंजाबी यूरोलोजिस्ट, डॉ. वी.पी. बन्सल एम डी मेडीसिन, डॉ. पंकज गुप्ता योगाचार्य, इन्जिनियर हरि बल्लभ मेहता, डॉ. जगदीश जोशी, ब्रह्मात्मशक्ति के संपादक प्रोफेसर के.पी. जोशी आदि। इसी दिन शाम को 4 बजे नई दुनिया प्रेस में नई दुनिया के अधिकारियों और पत्रकारों से अलसी पर खुलकर चर्चा हुई। मैंने सभी को अलसी भोग लड्डू और मेमबॉय-प्लस बिस्किट्स भी खिलाये और सभी के प्रश्नों का विस्तार से उत्तर दिया। इस कार्यक्रम में श्री सुरेश ताम्रकर जी और ऊर्जावान श्री प्रदीप जैन संपादक, सेहत मेरे साथ थे।




हमारी रूकने की व्यवस्था मालवा मिल स्थित डॉ. सुभाष सिंघई के योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र में की गई थी। यहां मैंने देखा की डॉ. सुभाष सिंघई और उनका पूरा परिवार निस्वार्थ भाव से रोगियों की सेवा में लगा हुआ था। डॉ. सुभाष सिंघई और उनके पूरे परिवार ने हमारे ठहरने और भोजन की अति उत्तम व्यवस्था की थी। यहां हमें घर जैसा वातावरण और माहौल मिला। 2 दिसंबर को इन्हीं के संस्थान में अलसी के चमत्कारों और कैंसर रोधी बुडविज आहार-विहार पर एक कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में उपस्थित लगभग सवा सौ श्रोताओं ने तीन घंटे तक मन्त्रमुग्ध होकर मेरी बातों को सुना और ढ़ेरों प्रश्न पूछे। मैंने प्रश्नों का जवाब देकर उनकी जिज्ञासा को शांत किया।

इन्दौर में मैं निरोगधाम के कार्यालय में भी गया था। श्री अशोक कुमार पाण्डेय और डॉ. राजेश कुमार पाण्डेय ने बतलाया कि जिस अंक में अलसी पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ था उसकी सारी प्रतियाँ बिक चुकी हैं। लेकिन उसकी आज तक भारी डिमांड है तथा आज तक उस लेख के बारे में ढ़ेरों फोन आ रहे हैं और इस एक लेख ने ही मुझे बड़ी सेलिब्रिटी बना दिया है।



3 दिसंबर को पद्मश्री गोविंदम् मेमन साहब ने हमें नाश्ते पर बुलाया था। नाश्ते में उन्होंने हमें रसीले कमरख, संतरे की बर्फी आदि कई नये व्यंजन खिलाये और अपने संस्मरण सुनाये। उन्होंने अपने उद्यान में तीन हजार से ज्यादा किस्मों के फूलों और फलों के पौधे लगा रखे थे। 3 दिसंबर का लंच ताम्रकर साहब के घर पर था। ताम्रकर साहब बहुत ही सरल, शांत, अनुभवी और विद्वान पत्रकार हैं। वे सबकी मदद करने को तत्पर रहते है। मैं ताम्रकर साहब की शख़्सियत से बहुत प्रभावित हुआ। मुझे इनमें मेरे नानाश्री की छवि दिखाई देती थी। हमनें इस पूरी यात्रा में सबसे स्वादिष्ट भोजन ताम्रकर साहब के घर पर लिया। इस भोजन में राजस्थानी, मालवा और महाराष्ट्र तीनों राज्यों के व्यंजनों का स्वाद था।

4 दिसंबर, 2010
पांचवा पड़ाव – मांडू और मोहन खेड़ा
4 दिसंबर को हमने डॉ. मनोहर भंडारी के घर पर नाश्ता लिया। हमारी भाभी जी ने नाश्ता बहुत ही स्वादिष्ट बनाया था। डॉ. मनोहर भण्डारी बहुत ही संजीदा, परिश्रमी, प्रेम करने वाले, बुद्धिमान व्यक्तित्व के धनी हैं। वे मुझे अपने भाई की भांति दिखते थे। नाश्ता करने के बाद हम सभी मांडू और मोहन खेड़ा के भ्रमण पर निकले। मांडू मध्यप्रदेश का एक ऐसा पर्यटनस्थल है, जो अपनी सौंदर्य के लिए विख्यात रही रानी रूपमती और बादशाह बाज़ बहादुर के अमर प्रेम का साक्षी है। यहाँ के खंडहर व इमारतें हमें इतिहास के उस झरोखे के दर्शन कराते हैं, जिसमें हम मांडू के शासकों की विशाल समृद्ध विरासत व शानों-शौकत से रूबरू होते हैं।

कहने को लोग मांडू को खंडहरों का गाँव भी कहते हैं परंतु इन खंडहरों के पत्थर भी बोलते हैं और सुनाते हैं हमें इतिहास की अमर गाथा। हरियाली की खूबसूरत चादर ओढ़ा मांडू विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष तौर पर एक सुंदर पर्यटनस्थल रहा है। यहाँ के शानदार व विशाल दरवाजे मांडू प्रवेश के साथ ही इस तरह हमारा स्वागत करते हैं मानों हम किसी समृद्ध शासक के नगर में प्रवेश कर रहे हों।

मांडू में प्रवेश के घुमावदार रास्तों के साथ ही मांडू के बारे में जानने की तथा इसकी खूबसूरत इमारतों को देखने की हमारी जिज्ञासा चरम तक पहुँच जाती है। यहाँ के विशाल इमली व मीठे सीताफलों से लदे पेड़ों को देखकर हमारे मुँह में पानी आना स्वभाविक है।
मालवा का जैन महातीर्थ मोहनखेड़ा

इतिहास के लिए विख्यात रहे धार जिले की सरदारपुर तहसील के मोहनखेड़ा में श्वेतांबर जैन समाज का एक ऐसा महातीर्थ विकसित हुआ है, जो देश और दुनिया में विख्यात हो चुका है। परम पूज्य दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी महाराज साहब की तीर्थ नगरी मानवसेवा का भी तीर्थ बन चुकी है।

6 दिसंबर को सेवाधाम दिवा केन्द्र इन्दौर में सायं 4 बजे वरिष्ठ नागरिकों को वृद्धावस्था में होने वाले रोगों जैसे हृदय रोग, डायबिटीज, आर्थ्राइटिस, कैंसर, एल्जीमर, पार्किंसन्स रोग, डिप्रेशन, रजोनिवृत्ति जनित रोग, विवर्धित प्रोस्टेट, सेक्स विकार आदि के उपचार में अलसी के चमत्कारी गुणों पर चर्चा हुई। सभी ने अलसी भोग लड्डू और मेमबॉय-प्लस बिस्किट्स की बहुत प्रशंसा की और बनाने की विधि पूछी।


5 दिसंबर, 2010
छठा पड़ाव – उज्जैन


दिनांक 5 दिसंबर, 2010 को अलसी विजय रथ उज्जैन पहुंचा। शाम के पांच बजे उज्जैन के भारतीय ज्ञान पीठ में सेमीनार का आयोजन किया गया था। जिसे सचिव प्रदीप जैन और डॉ. विनोद बैरागी जिला आयुर्वेद अधिकारी ने आयोजित किया था। इस सेमिनार की अध्यक्षता कृष्ण मंगल सिंह कुलश्रेष्ठ ने की। अतिथि म.प्र. आयुर्वेदिक सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. एस.एन.पाण्डे, आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. यू.एस. निगम थे। संचालन डॉ. विनोद बैरागी ने किया था। इस सेमिनार में उज्जैन के लगभग 400 प्रबुद्ध व्यक्ति एवं महिलाएँ उपस्थित थे। इस सेमीनार के माध्यम से मैंने अलसी के चमत्कारी गुणों से आम नागरिकों को रूबरू करवाया। जिज्ञासु श्रोताओं ने ढ़ेरों प्रश्न पूछे जिनका उत्तर देकर मैंने उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया।
इस सेमिनार में उज्जैन के प्रतिष्ठित व्यक्ति अवन्तिलाल जैन, वरिष्ठ चार्टर्ड अकाउंटेन्ट अमृतलाल जैन, पेंशनर संघ अध्यक्ष राधेश्याम दुबे, प्रबुद्ध परिषद के अध्यक्ष एस.एन. कुलकर्णी, खादी ग्रामोद्योग विकास मण्डल के अध्यक्ष प्रदीप जैन, कायस्थ समाज के अध्यक्ष राजेन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. नरेन्द्र कपूर, आंतर भारती, अध्यक्ष पुष्पा चौरसिया, अग्रवाल महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती राजरानी सिंहल, श्रीमती सरोज अग्रवाल और श्रीमती नंदिनी जोशी आदि मौजूद थे।
इस सेमिनार के लिए डॉ. बैरागी ने काफी प्रयास किये थे और उन्होंने 300 से ज्यादा फोन और एस.एम.एस. भी किये थे। अगले दिन उज्जैन में मुझे प्रातः 4 बजे होने वाली महाकाल की भस्म आरती में शामिल होने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ जो अपने आप में दिव्य और अनूठा अनुभव था।

7 दिसंबर, 2010
सातवां पड़ाव – सीहोर
6 दिसंबर को रात को 9 बजे हमारा अलसी विजय रथ सीहोर पहुंच गया था। सीहोर के विख्यात ई.एन.टी. सर्जन डॉ. एल.एन. नामदेव ने मालाओं से हमारा स्वागत किया और हमारे रूकनें की बढ़िया व्यवस्था की। डॉ. नामदेव बहुत ही सरल मृदुभाषी एवं विद्वान व्यक्ति है। उनकी पत्नि श्रीमती सुषमा और बेटे बहुओं श्री गौरव एवं श्रीमती प्रिया तथा डॉ. गगन एवं डॉ. गरिमा ने हमारी बहुत आवभगत की और हमें बड़ा लज़ीज भोजन करवाया। 7 दिसंबर को प्रातः 10 बजे से 1.30 बजे तक उन्हीं के घर पर एक गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें अलसी के औषधीय गुणों पर व्यापक चर्चा हुई। इस गोष्ठी में सीहोर के कई चिकित्सक और प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे। इसी दिन 2.30 बजे ब्लू बर्ड स्कूल में एक प्रेस वार्ता को सम्बोधित किया और सभी ने अलसी भोग एवं मेमबॉय-प्लस बिस्किट्स के साथ गर्मागर्म चाय का आनन्द लिया।

8 दिसंबर, 2010
सागर हमारा आठवां पड़ाव था।


सागर में हमारे ठहरने और भोजन की उत्कृष्ट व्यवस्था वहाँ के सबसे बड़े व्यवसायी, समाजसेवक और दानवीर ठाकुर चन्द्रपाल और कृष्णपाल सिंह जी ने की थी। सागर के विख्यात योग निकेतन केन्द्र में 9 दिसंबर, 2010 को अलसी पर एक कार्यशाला आयोजित की गयी थी। इस कार्यशाला में तीन घंटे तक अलसी पर विस्तार से चर्चा हुई। श्रोताओं ने अपने प्रश्न पूछे जिनका मैंने सरल शब्दों से जवाब दिया। 10 दिसंबर को प्रातः 11 बजे सागर विश्वविद्यालय के एम बी ए कॉलेज में छात्रों को युवा बने रहने के गुर सिखाये। इसी दिन 3 बजे सागर में अलसी चेतना यात्रा की सक्रिय जिला मंत्री कु. शिखा जी   के विशेष आग्रह  पर  बी एम बी गर्ल्स  कॉलेज  में  छात्राओं  को अलसी  सेवन  से शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और सुन्दर बनने के टिप्स दिये तथा अलसी के व्यंजन और सौंदर्य प्रसाधन बनाना सिखाया। 11 दिसंबर को ठाकुर साहब के कार्यालय में पत्रकारों को संबोधित किया। इस पत्रकार वार्ता में सागर के सभी प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सभी पत्रकार उपस्थित थे।




20 दिसंबर, 2010
आखिरी पड़ाव- कोटा


कोटा आते ही हमने इस महान यात्रा की सफलता को उत्सव के रूप में मनाना शुरू कर दिया था। हम सबसे मिल रहे थे और यात्रा के फोटो व अखबारों की कटिंग्स दिखा रहे थे। सभी मित्र और रिश्तेदार हमें बधाई दे रहे थे। इस यात्रा को सफल बनाने के लिए मेरी पत्नि उषा, मेरे पुत्र वैभव व  समित, पुत्रियां ऐश्वर्य व स्नेहा ने बहुत मेहनत की थी। जागृति ने अलसी भोग लड्डू बनाने में मदद की थी। इस यात्रा को इतनी महान, सफलतम और स्मरणीय बनाने के लिए मैं श्री जयंती जैन, डॉ. रजनीकांत मालोत, श्री सुरेश ताम्रकर जी, डॉ. मनोहर भंडारी, डॉ. सुभाष सिंघई, डॉ. जगदीश जोशी, निरोगधाम, डॉ. एल.एन.नामदेव,  डॉ. विनोद बैरागी, ठाकुर चन्द्रपाल कृष्णपाल सिंह, प्रोफेसर यशवंत ठाकुर, कु. शिखा, निशु, उदय आदि का आजीवन आभारी रहूँगा। इस यात्रा का समापन हमने एक पत्रकार वार्ता में किया, जिसमें कोटा के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सभी पत्रकार उपस्थित थे। इस वार्ता को सफल बनाने में मेरे श्री चन्द्रशेखर चौधरी ने जी जान लगा दी।  




इस यात्रा में मिले कुछ नये अनुभव


• डॉ. मनोहर भंडारी की डायबिटीज में अलसी के सेवन लाभ मिल रहा है। दवाओं की मात्रा कम हो रही है। उनकी एक रिश्तेदार के चेहरे पर हुए ज़ेन्थोमा जिन्हें लेजर उपचार भी ठीक नहीं कर पाया था, अलसी से ठीक हो रहे हैं। उनके एक भतीजे को डिप्रेशन और ब्लड प्रेशर था, उसे मात्र 9 दिन अलसी के सेवन से ही दोनों रोगों में चमत्कारी लाभ हुआ है ।
• नई दुनिया की सहपत्रिका सेहत के संपादक श्री प्रदीप जैन की एक रिश्तेदार को कैंसर था, डॉ. ने कहा था कि वो मुश्किल से एक महीना जी पायेगी। तब श्री प्रदीप जैन ने मुझसे संपर्क कर उसे अलसी के तेल और पनीर पर आधारित बुडविज आहार विहार शुरू कर दिया था और छ महीने बाद भी वह जीवित है, अच्छी है और उसका कैंसर ठीक हो रहा है।
• एम पी की एक अधिकारी ने अलसी से अपना ब्लड प्रेशर, कॉलेस्ट्रॉल और मोटापा ठीक किया है और उनके पति के बाल काले हो गये हैं। उन्होंने मुझे बतलाया कि जब वे ट्रांसफर होकर आये तो साथ में एक क्विन्टल अलसी साथ लाये थे।
• सागर के श्री यशवंत ठाकुर ने मुझे बताया कि अलसी के सेवन से उनके सिर में नये काले बाल उगना शुरू हो गया है।
• कोटा आते ही डॉ. जेबा खान, जो स्वास्थ्य पर बहुत ही अच्छे लेख लिखती है, ने मुझे बताया कि अलसी के सेवन से जीवन नया और सुखमय लगने लगा है, उनकी एड़ियां अच्छी हो गयी है, त्वचा में निखार आया है और मात्र दस दिन अलसी के सेवन से उनकी सास के घुटनों का दर्द ठीक होने लगा है।

Dr. O.P.Verma

M +919460816360
Date Dec. 20, 2010

Sauerkraut


सॉवरक्रॉट 


बन्दगोभी ब्रेसीकेसिया परिवार का सदस्य है। ब्रॉकोली, फूलगोभी, ब्रूसल्स स्प्राउट्स, सरसों, केल, कोलार्ड, शलगम, बॉकचोइ आदि इस परिवार के अन्य सदस्य हैं। उपरोक्त सभी सब्जियों में कैंसर-रोधी तत्व होते हैं। अक्टूबर 2002 में कृषि और भोजन रसायनशास्त्र, फिनलैंड के जरनल में प्रकाशित प्रपत्र के अनुसार बन्दगोभी के खमीर करने पर उनके ग्लुकोसाइनोलेट आइसोथायोसायनेट में विघटित हो जाते हैं, जो शक्तिशाली कैंसर-रोधी हैं। प्रपत्र की लेखिका इवा लिज़ा रेहानेन के अनुसार अपक्व या पकी बन्दगोभी की अपेक्षा खमीर की हुई बन्दगोभी में ज्यादा कैंसर-रोधी गुण होते हैं।

अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट के जरनल की वेब साइट पर निम्न जानकारियां उपलब्ध हैं।

सॉवरक्रॉट में कैंसर-रोधी तत्व

फिनलैंड की अनुसंधानकर्ता इवा लिज़ा रेहानेन और साथियों ने सॉवरक्रॉट में कैंसर-रोधी तत्वों का पता लगाया है। इवा के अनुसार बन्दगोभी को खमीर करने पर कुछ किण्वक बनते हैं जो उनके ग्लुकोसाइनालेट को विघटित कर कैंसर-रोधी आइसोथायोसायनेट बनाते हैं। कुछ वर्षों पहले जानवरों पर हुए परीक्षणों से सिद्ध हुआ था कि आइसोथायोसायनेट स्तन, आंत, फेफडे और यकृत के कैंसर की संवृद्धि को शिथिल करते हैं। मनुष्य में आइसोथायोसायनेट के कैंसररोधी प्रभाव को सुनिश्चित करने के लिए और शोध होनी चाहिये। 

पाचनक्रिया में सहायक है सॉवरक्रॉट

कैंसर-रोधी होने के साथ साथ सॉवरक्रॉट पाचनक्रिया में बहुत सहायक हैं। इसे खमीर करने की प्रक्रिया में लेक्टोबेसीलस जीवाणु पैदा होते हैं जो पाचन में सहायक हैं, विटामिन की मात्रा बढ़ाते हैं, विभिन्न लाभदायक एंजाइम बनाते हैं और पाचन-पथ में मित्र जीवाणुओं की सेना में वृद्धि करते हैं। हर स्वास्थ्य समस्या या रोग में पाचन का बहुत महत्व है। खमीर की हुई बन्दगोभी में लेक्टिक एसिड, प्रोबायोटिक जीवाणु होते हैं जो पाचन में सहायक हैं और कीटाणुओं का सफाया करते हैं। लेक्टिक एसिड कीटाणु ई-कोलाई और फफूंद जैसे केनडिडा एल्बिकेन्स के विकास को बाधित करते हैं। हालांकि लेक्टिक एसिड प्रोबायोटिक जीवाणुओं के विकास को बाधित नहीं करते हैं। सॉवरक्रॉट सेवन करने से आहारपथ की लाभदायक जीवाणु सेना सशक्त और संतुलित रहती है। सॉवरक्रॉट में एक दुर्लभ जीवाणु लेक्टोबेसीलस प्लान्टेरम भी पाया जाता है जो पाचन के लिए बहुत ही अहम जीवाणु है। यह अन्य मित्र जीवाणुओं की सहायता से महान एन्टीऑक्सीडेन्ट ग्लुटाथायोन और सुपरऑक्साइड डिसम्युटेज बनाता है। ये दोनों कठिन दुग्ध शर्करा लेक्टोज को आसानी से पचा लेते हैं। यह अन्नों में पाये जाने वाले कुपोषक तत्व फाइटिक एसिड और सोयाबीन में मौजूद ट्रिप्सिन इन्हिबीटर्स को निष्क्रिय कर देते हैं। सॉवरक्रॉट प्रोटीन के विघटन और पाचन में भी सहायक हैं। यह मस्तिष्क को शांति देता है। सॉवरक्रॉट सदियों से कैंसर और अपच के उपचार में प्रयोग किया जाता रहा है।

सॉवरक्रॉट का विज्ञान 

सॉवरक्रॉट पत्ता गोभी के फर्मेंटेशन द्वारा तैयार होता है। फर्मेंटेशन एक जीवरसायन प्रक्रिया है जिसमें जीवाणुओं द्वारा कार्बोहाइड्रेट का अवायवीय अथवा आंशिक अवायवीय ऑक्सीकरण होता है, जो लेक्टोबेसीलाई (LABs) द्वारा सम्पन्न होती है। सॉवरक्रॉट में लेक्टिक एसिड बनाने वाले जीवाणु पत्तागोभी को जल्दी जल्दी फर्मेंट करना शुरू कर देते हैं। ये लेक्टोबेसीलाई (LABs) पीएच कम करते हैं, माध्यम को अम्लीय बनाते हैं और यह अम्लीय माध्यम अनावश्यक हानिकारक जीवाणुओं के लिए उपयुक्त नहीं होता है। सॉवरक्रॉट बनाते समय हमारा मुख्य उद्देश्य लेक्टोबेसीलाई के विकास हेतु उपयुक्त वातावरण बनाये रखना होता है। 

लेक्टोबेसीलाई जीवाणु कार्ब का अवायवीय विघटन करते हैं और लेक्टिक एसिड बनाते हैं। आमतौर पर ऑक्सीजन की उपस्थिति में इनको फलने-फूलने में बड़ी परेशानी होती है। इनकी कुछ प्रजातियां जैसे माइक्रोएरोफिल्स लेक्योबेसीलाई और ल्युकोनोस्टोक सॉवरक्रॉट के लिए बहुत अहम मानी जाती हैं। इन प्रजातियों को अपने जीवनयापन के लिए थोड़ी सी ऑक्सीजन की भी जरूरत होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमे सॉवरक्रॉट को ढकने की आवश्यकता नहीं होगी। जार में जो थाड़ी सी ऑक्सीजन बचती है वह इनके लिए पर्याप्त होती है। 

सॉवरक्रॉट की अवस्थाएं

सॉवरक्रॉट के फर्मेंट होने की पूरी प्रक्रिया को हम तीन अवस्थाओं में विभाजित कर सकते हैं। 

प्रथम अवस्था
फर्मेंटेशन की शुरुआत ल्युकोनोस्टोक मेजेंटरॉयड्स जीवाणु करते हैं। ये कार्बन डाईऑक्साइड बनाते हैं, और जार की ऑक्सीजन को बाहर निकाल देते हैं और अंदर ऑक्सीजन रहित वातावरण तैयार करते हैं। जैसे ही लेक्टिक एसिड का स्तर 0.25 और 0.3% के बीच पहुँचता है, ल्युकोनोस्टोक मेजेंटरॉयड्स निष्क्रिय हो जाते हैं और मरने लगते हैं। हालांकि इनसे बने एंजाइम्स कार्य करते रहते हैं। यह अवस्था तापक्रम के अनुसार एक से तीन दिन में पूरी होती है।

द्वितीय अवस्था
लेक्टोबेसीलस प्लांटेरम और क्युकमेरिस फर्मेंटेशन को आगे बढ़ाते हैं, जब तक लेक्टिक एसिड का स्तर 1.5-2% तक पहुँचता है। नमक की मात्रा का ज्यादा होना और तापक्रम ज्यादा ही कम हो तो इन जीवाणुओं की कार्य क्षमता बाधित होती है। यह अवस्था तापक्रम के अनुसार 10-30 दिन में पूरी होती है। 

तृतीय अवस्था
लेक्टोबेसीलस ब्रेविस (और कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार लेक्टोबेसीलस पेंटोएसिटिकस) फर्मेंटेशन की क्रिया को पूरा करते हैं। लेक्टिक एसिड का स्तर 2-2.5% पहुंचने पर जीवाणुओं का कार्य पूरा हो जाता है और फर्मेंटेशन बंद हो जाता है। यह अवस्था एक सप्ताह से कम में पूरी हो जाती है। जब जार में बुलबुले उठना बंद हो जाये तो आप समझ सकते हैं कि सॉवरक्रॉट बनने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। 

कुछ अहम पहलू

सॉवरक्रॉट बनाने का तरीका बहुत सरल है और यदि नमक की सही मात्रा प्रयोग की गई है तो अच्छा सॉवरक्रॉट तैयार हो जाता है। लेकिन कुछ पहलुओं पर चर्चा करना जरूरी है जो सॉवरक्रॉट की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। 

नमी 

यदि जार में ब्राइन या पानी की मात्रा कम हो तो सॉवरक्रॉट को खराब करने वाले जीवाणुओं के पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। ब्राइन कम होने की स्थिति में जार की सतह पर अनावश्यक वायवीय जीवाणु और यीस्ट पैदा हो जाते हैं। ये दुर्गंध भी पैदा कर सकते हैं और क्रॉट को बदरंगा बना सकते हैं। कुछ लोगों को इनसे ऐलर्जी भी हो सकती है। हालांकि यदि क्रॉट की सतह पर यीस्ट (“scum”) जम जाये तो उसे आराम से अलग किया जा सकता है और क्रॉट को कोई नुकसान भी नहीं होता है। लेकिन फफूंद या मोल्ड नहीं बनना चाहिये। मोल्ड को बढ़ने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है, इसलिए ध्यान रखे कि जार में ऑक्सीजन की मात्रा न्यूनतम बनी रहे। 
ऑक्सीजन 
द्वितीय अवस्था में लेक्टोबेसीलस प्लांटेरम मुख्यकर्ता है, जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ही अच्छी तरह काम कर पाता है। अवायवीय स्थिति में यह पत्तागोभी को बेहतरीन तरीके से फर्मेंट करता है और लेक्टिक एसिड बनाता है। लेकिन ऑक्सीजन की उपस्थिति में तो यह एसीटिक एसिड (विनेगार) बनाने लगेगा, मोल्ड बनने की पूरी संभावना बनी रहेगी और विटामिन-सी भी नहीं बनेगा। इसलिए ऑक्सीजन रहित वातावरण बनाये रखना जरूरी है। यदि क्रॉट की सतह पर बार बार मोल्ड बन रहा है तो समझ लीजिये कि जार में ऑक्सीजन की मात्रा ज्यादा है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में गुलाबी यीस्ट भी अधिक बनती है और क्रॉट भी नरम बनता है। आपको ब्राइन की भी ज्यादा छेड़ छाड़ नहीं करना चाहिये, क्योंकि इससे भी हवा अंदर जायेगी और फालतू जीवाणु पैदा होंगे। 

तापक्रम 

फर्मेंटेशन की पहली अवस्था में ल्युकोनोस्टोक मेजेंटरॉयड्स जीवाणु 65-72° F पर बढ़िया काम करता है, लेकिन थोड़ा ऊपर नीचे चल जाता है। दूसरी और तीसरी अवस्था में सभी जीवाणु 72°–90° F तापक्रम पर कार्य करते हैं। यह बात आपके जहन में रहना जरूरी है। इन जीवाणुओं को सही तापक्रम उपलब्ध करवाना आपका पहला दायित्व होना चाहिये। तापक्रम एंजाइम्स की गतिविधि को भी प्रभावित करता है। 115° F पर एंजाइम्स नष्ट हो जाते हैं।

पोषक तत्व

सॉवरक्रॉट में नमक की मात्रा 2-3% होनी चाहिये। यदि इससे ज्यादा नमक होगा तो लेक्टोबेसीलाई पनप नहीं पायेंगे। मोटा नाप याद रखिये कि एक किलो पत्तागोभी में एक टेबलस्पून नमक उपयुक्त रहता है। रिफाइंड नमक प्रयोग कभी नहीं करें, सैंधा नमक या शुद्ध समुद्री नमक ही प्रयोग करें। यह भी जरूरी है कि पत्तागोभी में नमक एकसा अच्छी तरह मिला लिया जाये।

पीएच 

किसी भी पदार्थ में हाइड्रोजन ऑयन के स्तर को पीएच कहते हैं। सॉवरक्रॉट का पीएच 4.6 या और कम होना चाहिये। यह अम्लीय व्यंजन है और इसीलिए खट्टा होता है। इस अम्लीय पीएच पर यह खराब नहीं होता है। लेक्टोबेसीलाई को अम्लीय माध्यम बहुत पसंद है। यीस्ट और मोल्ड भी अम्लीय माध्यम में ही पैदा होते हैं, लेकिन इन्हें ऑक्सीजन की जरूरत होती है। इसलिए याद रखें इनसे बचने का सबसे आसान तरीका यही है कि जार में ऑक्सीजन की मात्रा न्यूनतम रखनी चाहिये।

सॉवरक्रॉट बनाने की विधियां

पहली विधि - साधारण सॉवरक्रॉट

सामग्री -
  • खमीर करने के लिए उपयुक्त कांच या चीनी मिट्टी का बड़ा जार।
  • काटने के लिए चोपिंग बोर्ड और चाकू।
  • पत्तागोभी को दबाने के लिए कांच या चीनी का बाउल और कूटने के लिए लकड़ी का दस्ता या पॉटेटो मेशर।
  • प्लेट को दबाने के लिए वजन जैसे पानी से भरा कोई जार या पॉलीथीन की थैली।
  • तराजू और जार को ढकने के लिए तौलिया।
  • किलो बन्दगोभी (बाहर के कुछ पत्ते और अंदर का डंठल निकालने के बाद)। 
  • ग्राम सैंधा या प्राकृतिक समुद्री नमक।
विधि -
पहले तो बन्दगोभी के दो तीन बाहरी पत्ते निकाल कर डस्ट बिन में डाल दीजिये। फिर दो तीन पत्ते और निकाल कर अलग रख लीजिये। ये बाद में काम आयेंगे। अब बन्दगोभी के दो टुकड़े कीजिये। बन्दगोभी को बीच से थोड़ा हट कर काटिये, आसानी रहेगी। बस अब बन्दगोभी को बारीक बारीक काटते जाइये। बन्दगोभी को जितना बारीक काटेंगे उतना ही अच्छा है और यह पानी भी ज्यादा छोड़ेगी। इसी तरह सारी बंदगोभी को बारीक काट लीजिये। बीच के डंठल के भी बारीक टुकड़े कर लीजिये, इसमें भी बहुत पोषक तत्व होते हैं।

अब थोड़ी सी कटी हुई बन्दगोभी जार में डालिये और उस पर थोड़ा सा नमक छिड़किये। दोनों को अच्छी तरह मिला कर मुट्ठी या किसी लकड़ी के दस्ते से अच्छी तरह हल्के हाथ से दबाते या कूटते जाइये। दबाने के लिए आप पोटेटो मेशर का भी प्रयोग कर सकते हैं। नमक के
कारण बन्दगोभी पानी छोड़ने लगेगी। अब फिर से थोड़ी कटी हुई बन्दगोभी और नमक जार में डालिये और लकड़ी के दस्ते से कूटते जाइये। यह मेहनत का काम है। ऐसा तब तक करते रहिये जब तक पूरा बन्दगोभी खत्म नहीं हो जाये। ध्यान रहे जार में पानी (ब्राइन) का स्तर बन्दगोभी से एक या दो इंच ऊपर तक पहुँच जाना चाहिये। यदि ब्राइन कम हो तो आप जार में फिल्टर्ड पानी मिला सकते हैं ताकि बन्दगोभी अच्छी तरह ब्राइन में डूब जाये। अब क्रॉट के ऊपर बचे हुए बंदगोभी के पत्ते रख दीजिये। क्रॉट को दबाने के लिए जार में एक पॉलीथीन की थैली रखिये और उसमें साफ पानी भर कर बांध दीजिये। पानी से भरी पॉलीथीन की थैली क्रॉट को दबा कर रखेगी और जार में हवा भी बहुत कम बचेगी। क्रॉट को दबाने के लिए चीनी या कांच की प्लेट भी काम में ले सकते हैं। प्लेट जार के मुँह से थोड़ी सी ही छोटी हो ताकि वह बन्दगोभी को ढक भी दे और उसे निकालने में परेशानी भी न हो। अंत में जार को ढक्कन से बंद करके किसी ठंडी जगह पर एक थाली में रख दीजिये। जार को किसी साफ तौलिये से ढक देना चाहिये ताकि धूल आदि अंदर नहीं जा सके।

हर दो तीन दिन में इसे खोल कर देखते रहिये और यदि कोई गंदगी या झाग दिखाई दे तो अलग कर दीजिये। अच्छा
सॉवरक्रॉट बनने के लिए उपयुक्त तापमान 65-720 F (18-220 C) माना गया है। सॉवरक्रॉट 3-4 सप्ताह में तैयार हो जाता है। सॉवरक्रॉट तैयार होने का समय तापमान पर निर्भर करता है। यदि तापक्रम कम हो तो अच्छा सॉवरक्रॉट बनता है। यदि तापक्रम अदिक हो तो अच्छा सॉवरक्रॉट नहीं बन पाता है, क्योंकि कुछ तरह के लेक्टोबेसीलाई पनप ही नहीं पाते हैं और ठीक से फर्मेंटेशन नहीं हो पाता है। 

यदि बाहरी तापमान 90-96° F (32-36° C) हो तो सॉवरक्रॉट तैयार होने में 10 दिन लगेंगे।
यदि बाहरी तापमान 650 F (180 C) हो तो सॉवरक्रॉट तैयार होने में 20 दिन लगेंगे।
परंतु यदि बाहरी तापमान 550 F (130 C) से कम है तो सॉवरक्रॉट बनने में 6 महीने भी लग सकते हैं या शायद खमीर उठे ही नहीं।

याहू के flaxseedoil2 ग्रुप की संपादिका सांद्रा ऑलसन ने सॉवरक्रॉट तैयार होने का सही समय 5 सप्ताह माना है। हमें 7-10 दिन में संतोषजनक खमीर हो जाता है अतः 7-10 दिन बाद इसका सेवन शुरू कर देना चाहिये। हालांकि पूरा खमीर होने में 5 सप्ताह का समय लगता है और स्वाद भी उम्दा होने लगता है। सॉवरक्रॉट में नया स्वाद लाने के लिए आप कसी हुई गाजर, काला जीरा, लाल बन्दगोभी, लहसुन, सेब, अनन्नास आदि भी मिला सकते हैं। लेकिन आरंभ में आप सामान्य सॉवरक्रॉट ही बनायें।

दूसरी विधि आसान विधि - अन्नानास युक्त सॉवरक्रॉट

सामग्री - छः कप बारीक कटी हुई बन्दगोभी, चौथाई कप अनन्नास का रस या बारीक कटा अनन्नास (या सेब का रस) और 2% सैंधा नमक।

विधि –
ऊपर दी गई विधि के अनुसार उपरोक्त मिश्रण को अच्छी तरह मिला कर एक जार में खूब दबा दबा कर ऊपर तक भर दीजिये। ध्यान रहे क्रॉट में हवा नहीं रहे और बन्दगोभी अच्छी तरह ब्राइन में डूब जाये। यदि ब्राइन कम हो तो थोड़ा पानी डाल कर ढक्कन बन्द कर दीजिये। अब जार को छः दिन के किसी ठंडी जगह पर एक थाली में रख दीजिये (गर्मी में छः दिन से भी कम समय लगेगा)। इस विधि में क्रॉट के ऊपर गंदगी या फफूंद नहीं जमती है। इसलिए इसे बार बार देखने और गंदगी हटाने का झंझट नहीं है। बस तैयार होते ही ढक्कन खोलिये और लजीज़ सॉवरक्रॉट का लुफ्त लीजिये। स्वाद में बदलाव के लिए इसमें कसी हुई चुकंदर या गाजर
भी मिलाई जा सकती है।

मोनिका द्वारा विकसित सॉवरक्रॉट

1. 5 लीटर के बर्तन के लिए आपको 5.5 से 6 पौंड बन्दगोभी (आकार के अनुसार ढाई से तीन नग) चाहिये। हार्श पॉट और पत्थर को साफ कीजिये और उबलते पानी से धोकर सुखा लीजिये। थोड़ा उबला पानी अलग रख लीजिये, जो पांचवें चरण में काम आयेगा।

2. अब बन्दगोभी को चाकू से काट कर दो हिस्से कर लीजिये और बाहरी एक-दो पत्ते अलग कर लीजिये। बन्दगोभी को चाकू से बारीक-बारीक काटिये और एक बर्तन में रख लीजिये। आप इसे फूड प्रोसेसर से भी काट सकते हैं। 

3. कटी हुई बन्दगोभी को तोल कर उसमें एक किलो में एक टेबलस्पून के हिसाब से नमक ले लीजिये। 

4. अब धीरे-धीरे नमक और कटी हुई बंदगोभी ताकत लगा कर हाथ से या पोटेटो मेशर से अच्छी तरह दबाते जाइये।

इसके बाद बर्तन को साफ कपड़े से ढक कर आधे घंटे के लिए रख दीजिये, ताकि बन्दगोभी अच्छी तरह पानी छोड़ दे। 

5. इसके बाद कटी हुई बन्दगोभी को हार्श पॉट में किसी लकड़ी के दस्ते या पोटेटो मेशर से दबा-दबा कर भरते जाइये। जब हार्श पॉट बन्दगोभी से 80% भर जाये तो गोभी के ऊपर दोनों पत्थर रख दीजिये। उसमें बचा हुआ साफ पानी भर दीजिये ताकि पानी का लेवल पत्थर से एक इंच ऊपर रहे। 

6. अब हार्श पॉट का ढक्कन बन्द कर दीजिये। ढक्कन के चारों तरह नाली में साफ पानी भर दीजिये ताकि आधा ढक्कन पानी में डूब जाये। हार्श पॉट को चार सप्ताह के लिए एक ठंडी जगह पर रख दीजिये, इस बीच इसे कभी नहीं खोलें। यह सुनिश्चित करलें कि ढक्कन के चारों तरह बनी नाली में पानी का लेवल दिखता देता रहे। यदि पानी का लेवल कम होने लगे तो इसका मतलब यह है कि पॉट में निर्वात पैदा हो रहा है। अमूमन ऐसा तीन सप्ताह के बाद होता है और ऐसी स्थिति में आप ढक्कन को आहिस्ता से थोड़ा ऊपर उठा कर हवा अन्दर जाने दीजिये और पुनः ढक्कन को अपनी जगह रख दीजिये। 

7. जब पॉट का ढक्कन खोलना हो तो पहले ढक्कन के चारो तरह भरा पानी सावधानी से किसी वेक्यूम बल्ब से खाली करें और सॉवरक्रॉट को निकाल लीजिये। यदि पॉट में तरल का रंग हरा या काला पड़ जाये तो समझ लीजिये कोई गड़बड़ है अन्यथा सब ठीक है। क्रॉट में गंदे मौजे जैसी गन्ध आ सकती है, जो सामान्य है। यदि तेज सर्दी पड़ रही हो तो पॉट को छः सप्ताह तक रख सकते हैं। मोनिका के अनुसार पॉट को 3 से 4 महीने तक रख सकते हैं और समय के साथ स्वाद में भी सुधार आने लगता है।
 

8. अंत में हार्श पॉट और पत्थरों को गर्म पानी से अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर धो कर सूखा लीजिये। सूखने के बाद पत्थरों को टिश्यू में लपेट कर किसी दराज या अलमारी में रख दीजिये। इन्हें पॉट में नहीं रखें क्योंकि फफूंद लगने का खतरा रहता है। धोने के लिए साबुन का प्रयोग कभी नहीं करें। 

सॉवरक्रॉट का ज्यूस निकालना – 

फर्मेंट फर्मेंट आप मेस्टीकेटिंग ज्यूसर से सॉवरक्रॉट का ज्यूस निकाल कर शीशियों में भर कर फ्रीज़ में रख दीजिये। इसके लिए आप वही ज्यूसर काम में ले सकते हैं जिससे आप फल और सब्जियों का ज्यूस निकालते हैं। आप चाहें तो ज्यूस में बचा हुआ ब्राइन भी मिला सकते हैं, हालांकि इसमें ज्यादा पोषक तत्व नहीं होते हैं। यह फ्रीज़ में कई हफ्तों तक खराब नहीं होता है इसलिए आप एक महीने का सॉवरक्रॉट बना कर फ्रीज़ में सकते हैं।

Female Sexual Dysfunction



प्रस्तावना


यदि नारियां ऐसा सोचती हैं कि आधुनिक चिकित्सकों ने उनकी लैंगिक समस्याओं को अनदेखा किया है, उनके लैंगिक कष्टों के निवारण हेतु समुचित अनुसंधान नहीं किये हैं तो वे सही हैं। सचमुच हमें स्त्रियों के लैंगिक विकारों की बहुत ही सतही और ऊपरी जानकारी है। हम उनकी अधिकतर समस्याओं को कभी भूत प्रेत की छाया तो कभी उसकी बदचलनी का लक्षण या कभी मनोवैज्ञानिक मान कर उन्हें ज़हरीली दवायें खिलाते रहे, झाड़ फूँक करते रहे, प्रताड़ित करते रहे, जलील करते रहे, त्यागते रहे और वो अबला जलती रही, कुढ़ती रही, घुटती रही, रोती रही, सुलगती रही, सिसकती रही, सहती रही..............

लेकिन अब समय बदल रहा है। यह सदी नारियों की है। अब जहाँ नारियाँ स्वस्थ, सुखी और स्वतंत्र रहेंगी, वही समाज सभ्य माना जायेगा। अब शोधकर्ताओं ने उनकी¬ समस्याओं पर संजीदगी से शोध शुरू कर दी है। देर से ही सही आखिरकार चिकित्सकों ने नारियों की समस्याओं के महत्व को समझा तो है। ये स्त्रियों के लिये आशा की किरण है। 1999 में अमेरिकन मेडीकल एसोसियेशन के जर्नल (JAMA) में प्रकाशित लेख के अनुसार 18 से 59 वर्ष के पुरुषों और स्त्रियों पर सर्वेक्षण किये गये और 43% स्त्रियों और 31% पुरुषों में कोई न कोई लैंगिक विकार पाये गये। 43% का आंकड़ा बहुत बड़ा है जो दर्शाता है कि समस्या कितनी गंभीर है।

यौन उत्तेजना चक्र (Female Sexual Response Cycle)

स्त्रियों के यौन रोगों को भली-भांति समझने के लिए हमें स्त्रियों के प्रजनन तंत्र की संरचना और यौन उत्तेजना चक्र को ठीक से समझना होगा। यौन उत्तेजना चक्र को हम चार अवस्थाओं में बांट सकते हैं।

उत्तेजना (Excitement) पहली अवस्था है जो स्पर्श, दर्शन, श्रवण, आलिंगन, चुंबन या अन्य अनुभूति से शुरू होती है। इस अवस्था में कई भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तन जैसे योनि स्नेहन या Lubrication (योनि का बर्थोलिन तथा अन्य ग्रंथियों के स्राव से नहा जाना), जननेन्द्रियों में रक्त-संचार बड़ी तेजी से बढ़ता है। संभोग भी शरीर पर एक प्रकार का भौतिक और भावनात्मक आघात ही है और इसके प्रत्युत्तर में रक्तचाप व हृदयगति बढ़ जाती है और सांस तेज चलने लगती है। साथ ही भगशिश्न या Clitoris (यह स्त्रियों में शिश्न का प्रतिरूप माना जाता है ) में रक्त का संचय बढ़ जाने से यह बड़ा दिखाई देने लगता है, योनि सूजन तथा फैलाव के कारण बड़ी और लंबी हो जाती है। स्तन बड़े हो जाते हैं और स्तनाग्र तन कर कड़े हो जाते हैं। उपरोक्त में से कई परिवर्तन अतिशीघ्रता से होते हैं जैसे यौनउत्तेजना के 15 सेकण्ड बाद ही रक्त संचय बढ़ने से योनि में पर्याप्त गीलापन आ जाता है और गर्भाशय थोड़ा बड़ा हो कर अपनी स्थिति बदल लेता है। रक्त के संचय से भगोष्ठ, भगशिश्न, योनिमुख आदि की त्वचा में लालिमा आ जाती है।

दूसरी अवस्था उत्तेजना की पराकाष्ठा (Plateau) है । यह उत्तेजना की ही अगली स्थिति है जिसमें योनि (Vagina), भगशिश्न (Clitoris), भगोष्ठ (Labia) आदि में रक्त का संचय अधिकतम सीमा पर पहुँच जाता है, जैसे जैसे उत्तेजना बढ़ती जाती है योनि की सूजन तथा फैलाव, हृदयगति, पेशियों का तनाव बढ़ता जाता है। स्तन और बड़े हो जाते हैं, स्तनाग्रों (Nipples) का कड़ापन तनिक और बढ़ जाता है और गर्भाशय ज्यादा अंदर धंस जाता है। लेकिन ये परिवर्तन अपेक्षाकृत धीमी गति से होते हैं।

तीसरी अवस्था चरम-आनंद (Orgasm) की है जिसमें योनि, उदर और गुदा की पेशियों का क्रमबद्ध लहर की लय में संकुचन होता है और प्रचंड आनंद की अनुभूति होती है। यह अवस्था अतितीव्र पर क्षणिक होती है। कई बार स्त्री को चरम-आनंद की अनुभूति भगशिश्न के उकसाव से होती है। कई स्त्रियों को बिना भगशिश्न को सहलाये चरम-आनंद की अनुभूति होती ही नहीं है। कुछ स्त्रियों को संभोग में गर्भाशय की ग्रीवा (Cervix) पर आघात होने पर गहरे चरम-आनंद की अनुभूति होती है। दूसरी ओर कुछ स्त्रियों को गर्भाशय की ग्रीवा पर आघात अप्रिय लगता है और संभोग के बाद भी एंठन रहती है। पुरुषों की भांति स्त्रियां चरम-आनंद के बाद भी पूर्णतः शिथिल नहीं पड़ती, और यदि उत्तेजना या संभोग जारी रहे तो स्त्रियां एक के बाद दूसरा फिर तीसरा इस तरह कई बार चरम-आनंद प्राप्त करती हैं। पहले चरम-आनंद के बाद अक्सर भगशिश्न की संवेदना और बढ़ जाती है और दबाव या घर्षण से दर्द भी होता है।

चरम-आनंद के पश्चात अंतिम अवस्था समापन (Resolution) है जिसमें योनि, भगशिश्न, भगोष्ट आदि में एकत्रित रक्त वापस लौट जाता है, स्तन व स्तनाग्र सामान्य अवस्था में आ जाते हैं और हृदयगति, रक्तचाप और श्वसन सामान्य हो जाता है। यानी सब कुछ पूर्व अवस्था में आ जाता है।

सभी स्त्रियों में उत्तेजना चक्र का अनुभव अलग-अलग तरीके से होता है, जैसे कुछ स्त्रियां उत्तेजना की अवस्था से बहुत जल्दी चरम-आनंद प्राप्त कर लेती हैं। दूसरी ओर कई स्त्रियां सामान्य अवस्था में आने के पहले कई बार उत्तेजना की पराकाष्ठा और चरम-आनंद की अवस्था में आगे-पीछे होती रहती हैं और कई बार चरम-आनंद प्राप्त करती हैं।

विभिन्न लैंगिक विकार

सन् 1999 में अमेरिकन फाउन्डेशन ऑफ यूरोलोजीकल डिजीज़ ने स्त्रियों के सेक्स रोगों का नये सिरे से वर्गीकरण किया है, इस प्रकार है।

महिला अधःसक्रियता यौन इच्छा विकार (Hypoactive Sexual Desire Disorder)

इस विकार में स्त्री को अक्सर यौन विचार नहीं आते और संभोग की इच्छा भी कभी नहीं होती या कभी कभार ही होती है। इस रोग में स्त्री दुखी या कुंठित रहती ही है और अपने साथी से संबन्ध भी प्रभावित होते हैं। कुछ स्त्रियों में यह विकार अस्थाई होता है और कुछ समय बाद ठीक हो जाता है। इसकी व्यापकता दर 10% से 41% आंकी गई है।

महिला यौन घ्रणा विकार (Sexual Adversion Disorder)

इस विकार में स्त्री को यौन-संबन्ध तनिक भी रुचिकर नहीं लगता है। महिला संभोग से बचने के लिए हर संभव प्रयत्न करती है। यदि उसका साथी शारीरिक संबन्ध बनाने की कौशिश करता है तो वह तनाव में आ जाती है, डर जाती है, उसका जी घबराने लगता है, दिल धड़कने लगता है, यहाँ तक कि वह बेहोश भी हो जाती है। साथी से सामना न हो इसलिए वह जल्दी सो जाती है, स्वयं को सामाजिक या अन्य कार्यों में व्यस्त रखती है या फिर किसी भी ऊंच-नीच की परवाह किये बिना घर तक छोड़ देती है।

यौन उत्तेजना चक्र में विभिन्न हार्मोन्स और नाड़ी संदेशवाहकों की भूमिका
सेक्स हार्मोन / नाड़ी संदेशवाहक
लैंगिक कार्य
घनात्मक /ऋणात्मक
विवरण
डोपामीन
कामेच्छा, कामोत्तेजना
घनात्मक
लैंगिक संसर्ग की शुरुआत को पूरा करने की लालसा
­­­­­ईस्ट्रोजन
कामोत्तेजना, कामेच्छा
घनात्मक
ईस्ट्रोजन की कमी होने पर योनि का अपक्षय, स्नेहन, संवेदना और रक्त-संकुलन  कम होना
नाइट्रिक ऑक्साइड
भगशिश्न में रक्त का भराव
घनात्मक
नाइट्रिक ऑक्साइड द्वारा रक्त-संग्रह (Vasocongestion) के लिए ईस्ट्रोजन और टेस्टोस्टिरोन की पर्याप्त मात्रा आवश्यक  होती है।
नोरइपिनेफ्रीन
कामोत्तेजना
घनात्मक
ऑक्सिटोसिन
संवेदना, चरमानंद
घनात्मक
चरमानंद में मूलाधार की पेशियों के क्रमबद्ध संकुचन में सहायक
प्रोजेस्ट्रोन
संवेदना
घनात्मक
संभवतः ईस्ट्रोजनरोधी
प्रोलेक्टिन
कामोत्तेजना
ऋणात्मक
सीरोटोनिन
कामोत्तेजना, कामेच्छा
घनात्मक/ ऋणात्मक
नोरइपिनेफ्रीन और डोपामीन के स्राव पर ऋणात्मक प्रभाव, चरमानंद में गर्भाशय के संकुचन में सहायक लेकिन अन्य तरीकों से चरमानंद में अवरोध 
टेस्टोस्टिरोन
कामेच्छा, लैंगिक संसर्ग
घनात्मक


महिला कामोत्तेजना विकार (Sexual Arousal Disorder)

इस स्थिति में स्त्री को वांछित यौन उत्तेजना नहीं होती है या उत्तेजना पर्याप्त अवधि तक नहीं बनी रहती है। फलस्वरूप न योनि, भगशिश्न, भगोष्ठ आदि में पर्याप्त रक्त का संचय होता है और न ही योनि में रसों का पर्याप्त स्राव तथा सूजन होता है या अन्य शारीरिक परिवर्तन होता हैं। इससे स्त्री को ग्लानि होती है, साथी से मधुरता कम होती है। इसका कारण कोई मानसिक रोग या दवा नहीं है। इस रोग में स्त्रियां संभोग का पूरा आनंद तो लेती हैं पर वे दुखी रहती हैं कि उन्हें यौन उत्तेजना नहीं हुई और योनि में संभोग के लिए आवश्यक रसों का स्राव नहीं हो सका। इस विकार की व्यापकता दर भी 6% से 21% है।
महिला चरम-आनंद विकार (Orgasmic Disorder)

यदि स्त्री को संभोग करने पर यौन उत्तेजना के बाद चरम-आनंद की प्राप्ति कभी भी या अक्सर न होती हो या बड़ी कठिनाई और बड़े विलंब से होती हो तो उसे महिला चरम-आनंद विकार कहते हैं। ऐसा किसी मानसिक रोग या दवा के कारण नहीं होता है। चरम-आनंद न मिलने से स्त्री को सदमा होता है। इसकी दर 5% से 42% है। लगभग 5% स्त्रियों को जीवन में कभी चरम-आनंद मिलता ही नहीं है।

लैंगिक दर्द विकार (Sexual Pain Disorders)

कष्टप्रद संभोग (Dysperunia) में संभोग करते समय कभी कभी या निरंतर दर्द होता है।
योनि आकर्ष (Vaginismus) में हमेशा या कभी कभार जैसे ही योनि में शिश्न का प्रवेश होता है योनि के अग्र भाग में अचानक संकुचन होने के कारण शिश्न का प्रवेश कष्टप्रद हो जाता है, जिससे स्त्री को भी काफी शारीरिक और मानसिक वेदना होती है। इसकी दर भी 3% से 46% है।

कष्टप्रद संभोग भौतिक विकारों जैसे योनि-प्रघाण शोथ (Vestibulitis), योनि क्षय (Vaginal Atrophy) या संक्रमण या मनोवैज्ञानिक कारणों से भी हो सकता है। योनि आकर्ष योनि में शिश्न के कष्टदायक प्रवेश की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप या मनोवैज्ञानिक कारणों से हो सकता है।

महिला सेक्स विकार के कारण


स्त्री यौन विकार के कारण और लक्षण
कारण
विवरण
लक्षण
हार्मोन संबन्धी
हाइपोथेलेमिक पिट्युइटरी एक्सिस दोष, औषधि या शल्यक्रिया द्वारा वंध्यकरण,   रजोनिवृत्ति, लंबे समय तक गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन, प्रिमेच्यौर ओवेरियन फेल्यर
कामेच्छा विकार, शुष्क योनि, कामोत्तेजना दोष
मांसपेशीजनित 
श्रोणि की मांसपेशियों की अति-तनावता या अल्प-तनावता
अति-तनावता: लैंगिक दर्द-विकार, योनि आकर्ष


अल्प-तनावता: योनि अल्पसम्वेदिता, चरमानंद विकार, संभोग में मूत्र-असंयमता
नाड़ीजनित
सुषुम्ना नाड़ी आघात; केन्द्रीय नाड़ी तंत्र या परिधीय नाड़ी तंत्र संबन्धी रोग जैसे डायबिटीज,  उच्च प्रेरक नाड़ी रोग
चरमानंद विकार
मनोवैज्ञानिक
आपसी मतभेद, शारीरिक दोष, आत्म स्वाभिमान में कमी, मनोदशा दोष, मनोरोग की औषधियों के कुप्रभाव
कामेच्छा विकार, कामोत्तेजना दोष, अल्पसम्वेदिता, चरमानंद विकार
वाहिकीय
ऐथेरोस्क्लिरोसिस के कारण रक्त प्रवाह में कमी, हार्मोन स्राव में कमी , आघात
शुष्क योनि , कष्टप्रद संसर्ग


रक्त संचार संबन्धी रोग

उच्च रक्तचाप, कॉलेस्ट्रोल ज्यादा होना, डॉयबिटीज, धूम्रपान और हृदयरोग में स्त्रियों को सेक्स संबन्धी विकार होते ही हैं। पेल्विस या जनन्न्द्रियों में चोट लगना, पेल्विस की हड्डी टूट जाना, जननेन्द्रियों में कोई शल्यक्रिया या अधिक सायकिल चलाने से योनि तथा भगशिश्न में रक्त प्रवाह कम हो सकता है जिससे सेक्स विकार हो सकते हैं।

नाड़ी रोग

जो नाड़ी रोग पुरूषों में स्तंभन दोष पैदा करते हैं वे स्त्रियों में भी सेक्स विकार पैदा करते हैं। मेरुरज्जु आघात (Spinal cord Injury) या डायबिटीज समेत नाड़ी रोग स्त्रियों में सेक्स संबंधी दोष पैदा कर सकते हैं। उन स्त्रियों को चरम-आनंद की प्राप्ति बहुत मुश्किल होती है जिन्हें मेरुरज्जु में चोट लगी हो।

हार्मोन
हाइपोथेलेमिक पिट्युइटरी एक्सिस दोष, औषधि या शल्यक्रिया द्वारा वंध्यकरण (Castration), रजोनिवृत्ति, प्रिमेच्योर ओवेरियन फेल्यर और गर्भ-निरोधक गोलियां स्त्री सेक्स विकार के हार्मोन संबन्धी कारण हैं, जिनमें मुख्य लक्षण शुष्क योनि (Dry Vagina), यौन-इच्छा विकार और कामोत्तेजना विकार हैं।

औषधियां

कई तरह की औषधियां विशेषतौर पर मनोरोग में दी जाने वाली सीरोटोनिन रिअपटेक इन्हिबिटर्स (SSRI) स्त्रियों में सेक्स संबन्धी विकार का महत्वपूर्ण कारण है।

रजोनिवृत्ति (Menopause)

रजोनिवृत्ति में स्त्री के अंडाशय ईस्ट्रोजन हार्मोन बनाना बंद कर देते हैं जिसके फलस्वरूप शरीर में कई परिवर्तन होते हैं, जो उसके लैंगिक संसर्ग को भी प्रभावित करते हैं। एक मुख्य परिवर्तन योनि का शुष्क होना है। योनि में चिकने स्राव न होने से संभोग कष्टप्रद हो जाता है। ईस्ट्रोजन कम होने से योनि की पेशियां सिकुड़ जाती हैं और जख्म लगने की संभावना ज्यादा रहती है। इसके उपचार हेतु ईस्ट्रोजन की गोलियां या क्रीम दी जाती हैं।

सामान्यतः रजोनिवृत्ति में स्त्रियों की काम-इच्छा प्रभावित नहीं होती है और वे जीवन के आखिरी पड़ाव में भी लंबे समय तक लैंगिक संसर्ग का आनंद लेती रहती हैं, बशर्ते स्वास्थ्य अच्छा बना रहे और अपने जीवनसाथी से संबन्धों में मधुरता बनी रहे।

फिर भी उम्र ढलने के साथ साथ स्त्री के लैंगिक व्यवहार में फर्क तो आता है, जैसे उसे उत्तेजित होने में ज्यादा समय लगता है और चरम-आनंद की प्राप्ति भी थोड़ी कठिनाई तथा विलंब से होती है। कई स्त्रियों को चरम-आनंद की स्थिति में योनि की पेशियों के संकुचन भी अपेक्षाकृत कम होते हैं। दूसरी ओर इस उम्र तक आते आते उनके साथी भी स्तंभनदोष के शिकार हो ही जाते हैं और कई बार ऐसे दम्पत्ति लैंगिक संसर्ग के स्थान पर हाथों या मुख से एक दूसरे की जननेन्द्रियों को उत्तेजित करके या अपने यौनांगों को साथी के यौनांगों से रगड़ कर ही अपनी पिपासा शांत कर लेते हैं। इस तरह इस उम्र में भी कई दम्पत्ति नियमित यौन क्रिड़ाएं करते हैं और संतुष्ट होते हैं।
रजोनिवृत्ति में शारीरिक परिवर्तन
त्वचा
स्वेदन और सेबेशियस ग्रंथियों का स्राव कम होना, स्पर्श से कामोत्तेजना कम होना।
स्तन
स्तन में फैट की मात्रा कम होना, यौन-उत्तेजना होने पर स्तनों में फुलाव और स्तनाग्रों में संकुचन कम होना।
योनि
योनि के मांसल खोल की लंबाई और लचीलापन कम होना, योनि के गीलेपन में कमी, योनि का पीएच जो सामान्यतः 3.5 से 4.5 के बीच रहता है बढ़ कर 5 या ज्यादा हो जाना और योनि की आंतरिक झिल्ली का पतला हो जाना।
आंतरिक जननेन्द्रियां
डिम्बाशय (Ovary) और डिम्बवाही नलियों (Fallopian tubes) का छोटा होना, डिम्बाशय कूप अविवरता (Ovarian Follicular Atresia), गर्भाशय का वजन 30% से 50% कम होना, गर्भाशय की ग्रीवा का आकर्ष और श्लेष्मा (Mucous) का स्राव कम होना।
मूत्राशय
मूत्र नलिका (Ureter) और मूत्राशय त्रिकोण (Trigone of bladder) का अविवरता।
कैंसर
कैंसर का तो आगमन ही स्त्री को आतंकित, आशंकित और आहत कर देता है। उसे अपना लैंगिक आनंद तो अंधकारमय दिखाई देता ही है साथ में अपना आत्म-स्वाभिमान, सौंदर्य, आकर्षण या शरीर काई अंग खो जाने की कल्पना भी भयभीत करती रहती है। एक ओर मृत्यु और पति के बेवफा हो जाने खौफ़ बना रहता है तो दूसरी ओर सर्जरी, कीमो और रेडियो की त्रिधारी तलवार चौबीसों घंटे सिर पर लटकी रहती है। दुख की इस घड़ी में पति के प्यार की एक झप्पी जादू के समान काम करती है।
महिला सेक्स विकार के मनोवैज्ञानिक पहलू

स्त्री लैंगिक विकार के कारणों में भौतिक पहलुओं के साथ साथ मनोवैज्ञानिक पहलू भी बहुत महत्व रखते हैं।

व्यक्तिगत

धार्मिक वर्जना, सामाजिक प्रतिबंध, अहंकार, हीन भावना।

पुराने कटु अनुभव

पूर्व लैंगिक, शाब्दिक या शारीरिक प्रताड़ना, बलात्कार, सेक्स संबन्धी अज्ञानता।

साथी से मतभेद

संबन्धों में कटुता, विवाहेतर लैंगिक संबन्ध, वर्तमान लैंगिक, शाब्दिक या शारीरिक प्रताड़ना, कामेचछा मतभेद , वैचारिक मतभेद, संवादहीनता।

दुनियादारी

आर्थिक, काम-काज या पारिवारिक समस्याएं, परिवार में किसी की बीमारी या मृत्यु, अवसाद (Depression)।

निदान
स्त्रियों के सेक्स विकारों के कारण और उपचार के मामले में चिकित्सक दो खेमों में बंट गये हैं। हमें दोनों पर ध्यान देना है और दोनों के हिसाब से ही उपचार करना है।


पहला खेमा वाहिकीय परिकल्पना को महत्व देता है और मानता है कि किसी बीमारी (जैसे डायबिटीज और एथरोस्क्किरोसिस), प्रौढ़ता या तनाव की वजह से जननेन्द्रियों में रक्तप्रवाह कम होने से योनि में सूखापन आता है तथा भगशिश्न की संवेदना कम होती है जिससे यौन उत्तेजना प्रभावित होती है। ये लोग ऐसी औषधियों और मरहम प्रयोग करने की सलाह देते हैं जो जननेन्द्रियों में रक्तप्रवाह बढ़ाती हैं।


दूसरा खेमा हार्मोन की थ्योरी पर ज्यादा विश्वास रखता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ स्त्रियों के शरीर में स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन और पुरूष हार्मोन टेस्टोस्टीरोन का स्राव कम होने लगता है। ईस्ट्रोजन के कारण ही स्त्रियों में यौन-इच्छा पैदा होती है। टेस्टोस्टिरोन पुरुष हार्मोन है लेकिन यह स्त्रियों में भी कई महत्वपूर्ण कार्य करता है। स्त्रियों में इसका स्राव पुरूषों के मुकाबले 5% ही होता है। यह यौवन के आगमन के लिए उत्तरदायी है जिसमें किशोर लड़कियों के जननेन्द्रियों और बगल में बाल आने शुरू हो जाते हैं। स्तन और जननेन्द्रियाँ संवेदनशील हो जाती हैं और इनमें काम-उत्तेजना होने लगती है।


पुरुष हार्मोन्स को एन्ड्रोजन के नाम से भी जाना जाता है। ये स्त्रियों में कामोत्तेजना के लिए प्रमुख हार्मोन हैं। साथ ही यह स्त्रियों में हड्डियों के विकास और घनत्व बनाये रखने के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं।


स्त्री यौन विकार के निदान हेतु सामान्य शारीरिक और प्रजनन तंत्र का परीक्षण
परीक्षण
रोग
बाह्य प्रजनन अंग  
योनि की पेशियों का तनाव देखिये
योनि आकर्ष
त्वचा का रंग और
योनि दुर्विकास, त्वचा शोथ
त्वचा की मोटाई देंखे
क्षय
योनि पर बालों का घनत्व और विन्यास देखें
क्षय
भगशिश्न को देखें
योनि चिपकाव
पिछले फोरचेट और हाइमन रिंग की जांच
योनि छेदन, आकुंचन
फोड़ों की उपस्थिति
हरपीज सिम्पलेक्स वायरस
वेस्टिब्युल का रुई के फाहे द्वारा परीक्षण
योनि प्रघाण-शोथ (Vestibulitis)
बर्थोलिन ग्रंथि का परिस्पर्शन
बर्थोलिनाइटिस
एक हाथ से परिस्पर्शन (Palpation)
योनि के पिछले भाग का परिस्पर्शन
गुदा रोग
लेवटर एनाई का परिस्पर्शन
लेवेटर ऐनाइ पेशी, योनि आकर्ष
मूत्राशय और मूत्रनलिका का परिस्पर्शन
मूत्रनलिका-शोथ, मूत्राशयशोथ, मूत्रपथ संक्रमण
सर्विक्स को हिलाने डुलाने पर दर्द का अहसास
संक्रमण, उदरावरणशोथ
योनि की गहराई की अनुभूति करें।
शल्यकर्मोत्तर परिवर्तन, रेडियोथैरेपी से हुए परिवर्तन, आकुंचन
दो हाथ से परिस्पर्शन
गर्भाशय का परिस्पर्शन
गर्भाशय का प्रतिगमन, तंतुअर्बुद, अंतःगर्भाशय शोथ
एडीनेक्सा का परिस्पर्शन
अर्बुद, पुटिका, ऐन्डोमेट्रियोसिस, दाबवेदना
योनि के पिछले भाग की जांच
एंडोमेट्रियोसिस
ग्वायक परीक्षण
आँत्र रोग
योनि-दर्शनयंत्र द्वारा परीक्षण
योनि स्राव,  पीएच
योनि शोथ, क्षय
योनि की आंतरिक श्लेष्मिक झिल्ली का परीक्षण
क्षय
पेप स्मियर परीक्षण
पेपीलोमा वायरस संक्रमण, कैंसर
जरायुभ्रंश या प्रोलेप्स की उपस्थिति का आंकलन
सिस्टोसील, रेक्टोसील, जरायुभ्रंश



स्त्रियों के शरीर में सबसे ज्यादा टेस्टोस्टिरोन का स्राव प्रजनन काल में होता है। इस हार्मोन की अधिकतर मात्रा एक विशिष्ट बंधनकारी ग्लोब्युलिन से जुड़ी रहती है। इसका मतलब उपरोक्त महत्वपूर्ण कार्यों के लिए इसकी एक सिमित मात्रा ही रक्त में विद्यमान रहती है। रक्त के परीक्षण द्वारा हम रक्त में मुक्त और बंधित टेस्टोस्टिरोन का स्तर जान सकते हैं और सही निदान कर सकते हैं।


रजोनिवृत्ति में स्त्रियों के अंडाशय ईस्ट्रोजन और टेस्टोस्टिरोन दोनों का ही स्राव कम कर देते हैं। टेस्टोस्टिरोन की कमी के मुख्य लक्षण यौन इच्छा कम होना, लैंगिक कल्पनाएं, स्वप्न और विचार कम आना, स्तनाग्र, योनि और भगशिश्न की स्पर्श संवेदना कम होना है। स्वाभाविक है कि काम-उत्तेजना और चरम-आनंद की अनुभूति भी प्रभावित होगी।


साथ ही शरीर की मांस-पेशियां भी पतली होने लगती हैं, जननेन्द्रियों के बाल कम होने लगते हैं और प्रजनन अंग सिकुड़ने शुरू हो जाते हैं। योनि और आसपास के ऊतक घटने लगते हैं। संभोग में दर्द होने लगता है और सिर के बाल भी पुरुषों की भांति कम होने लगते हैं।


एक तीसरा सिद्धांत और सामने आया है जिसे अतृप्ति या असंतोष परिकल्पना कहते हैं, इसे भी ठीक से समझना जरूरी है। कई स्त्रियों में लैंगिक समस्याओं का कारण हार्मोन्स की कमी या जननेन्द्रियों में रक्त का कम प्रवाह न होना होकर संभोग के समय भगशिश्न और योनि का पर्याप्त घर्षण नहीं होना है। युवा स्त्रियों में यह बहुत महत्वपूर्ण है। कई बार स्त्री और पुरूष सेक्स के मामले में खुलकर वार्तालाप नहीं करते हैं। जिससे वे एक दूसरे की इच्छाओं, पसंद नापसंद, वरीयताओं से अनभिज्ञ रहते हैं। पुरूष को मालूम नहीं हो पाता कि वह स्त्री को किस तरह कामोत्तेजित करे, स्त्री को कौनसी यौन-क्रिड़ाएं ज्यादा भड़काती हैं, उसके शरीर के कौन से क्षेत्र वासनोत्तेजक (Erogenous) हैं और कौनसी लैंगिक मुद्राएं उसे जल्दी चरम-आनंद देती हैं। इस तरह स्त्री को मिलती है सेक्स में असंतुष्टि, आत्मग्लानि, अवसाद और लैंगिक संसर्ग से विरक्ति। यदि समय रहते समस्या का निदान और उपचार न हो पाये तो पहले आपस में तकरार, फिर संबंधों में दरार, आगे चल कर विवाहेतर सम्बंध और तलाक होने में भी देर नहीं लगती।


कुछ ही वर्षों पहले तक माना जाता था कि अधिकतर (90% से ज्यादा) स्त्री लैंगिक रोग मनोवैज्ञानिक कारणों से होते हैं। लेकिन आज धारणायें बदल गयी हैं। अंततः चिकित्सक और शोधकर्ता इसके निदान और उपचार के नये-नये आयाम ढ़ूंढ रहे हैं। आजकल देखा जा रहा है कि स्त्री लैंगिक रोग के ज्यादातर मामले किसी न किसी शारीरिक रोग के कारण हो रहे हैं, न कि मनोवैज्ञानिक कारणों से। इसलिए उपचार भी संभव हो सका है।


चिकित्सक को चाहिये कि वह एकांत और शांत परामर्श कक्ष में स्त्री को अपने पूरे विश्वास में लेकर सहज भाव से विस्तार में पूछताछ करे। रोगी से उसकी माहवारी, लैंगिक संसर्ग, व्यक्तिगत या पारिवारिक सूचनाएं, वर्तमान या अतीत में हुई कोई लैंगिक या अन्य प्रताड़ना आदि के बारे में बारीकी से पूछा जाना चाहिये। रोगी के साथी से भी अच्छी तरह पूछताछ की जानी चाहिये। एक ही प्रश्न कई तरीके से पूछना चाहिये ताकि रोगी की समस्या को समझने में कोई गलती न हो। बातचीत के दौरान उसे बीच-बीच में रोगी की आँखों में आँखे डाल कर बात करनी चाहिये और शारीरिक मुद्राओं पर भी पूरा ध्यान रखना चाहिये। स्त्री को भी बिना कुछ छुपाये अपनी समस्या स्पष्ट तरीके से चिकित्सक को बता देनी चाहिये। चिकित्सक को उन सारी औषधियों के बारे में भी बता देना चाहिये जिनका वह सेवन कर रही है। हो सकता है उसकी सारी तकलीफ कोई दवा कर रही हो और मात्र एक दवा बदलने से ही उसकी सारी तकलीफ मिट जाये।


उपचार

कई बार स्त्रियों की सेक्स समस्याओं के उपचार की आवश्यकता ही नहीं होती है। बस आप अपनी समस्या खुल कर साथी को बताते रहें, आपके साथी से तालमेल अच्छा हो तो छोटी मोटी समस्याएं आप मिल कर ही हल कर लेंगे। जरूरत सिर्फ अपनी नीरस और बोरिंग हो चले सेक्स रूटीन में जोश और रोमांस का तड़का लगाने और छोटी छोटी बुनियादी बातों को व्यवहार में लाने की है।

बुनियादी उपचार सूत्र
शिक्षा

जननेन्द्रियों की संरचना और कार्यप्रणाली, माहवारी, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति, प्रौढ़ता आदि के बारे में स्त्रियों को किताबों, प्रदर्शनियों और टीवी के जरिये पूरी जानकारी दी जानी चाहिये। जब भी रोगी को कोई नई बीमारी का निदान हो या नई दवा दी जाये या कोई शल्यक्रिया हो तो उसे संबन्धित लैंगिक मुद्दों के बारे चर्चा की जानी चाहिये।

तौरतरीकों में बदलाव

लैंगिक संसर्ग के समय बातचीत करें, एकदूसरे की पसंद नापसंद, वरीयताएं जानें और एकदूसरे की उत्तेजना भड़काने वाली यौन-क्रियाएं मालूम करें। लैंगिक संसर्ग की मुद्राएं, समय और स्थान बदल कर जीवन में नयापन लायें। कभी कभी रोमांस के लिए एक दिन निश्चित करें, शहर से बाहर निकलें, सैर-सपाटा मौज मस्ती करें और किसी रोमांटिक रिसोर्ट में रात की पारी खेलें।

इन्हें भी आजमायें

कभी-कभी सप्ताहांत में दोनों साथी रूमानी हो जाये, अगरबत्ती जला कर फिजा को महकाये, शमां जला कर दिव्य माहौल बनाये, सपनों की दुनिया सजायें, बारी-बारी से एक दूसरे का प्यार से किसी अच्छे हर्बल तेल द्वारा मसाज करें, गुफ्तगू करें। एक दूसरे को बतायें कि उन्हें कहाँ और कैसा स्पर्श अच्छा लगता है। ऐसा मसाज से दम्पत्तियों के ऊर्जा चक्र खुल जाते हैं और वे एक दूजे में खो जाते हैं।

कीगल व्यायाम
लाभ

• मूलाधार की पेशियां मजबूत होती हैं।

• चरम-आनंद की तीवृता बढ़ती है।

• चरम-आनंद के समय मूत्र निकल जाने की समस्या ठीक होती है।

• संभोग के समय ध्यान का विकर्षण (Distraction) होता है।

• संभोग के आनंद की अनुभूति बढ़ती है।

विधि

विधि सरल है स्त्री योनि में अपनी अंगुली डाल कर मूलाधार (Perineum) की मांसपेशियों को उसी तरह धीरे धीरे दस तक गिनते हुए सिकोड़ें मानो मूत्र-त्याग की क्रिया को रोकना हो, फिर तीन गिनने तक मांसपेशियों को सिकोड़ें रहें और उसी तरह धीरे धीरे दस तक गिनते हुए मांसपेशियों को ढीला छोड़ें। इसे दस से पंद्रह बार रोज करें। बाद में इसे किसी भी समय, कहीं भी, किसी भी मुद्रा में किया जा सकता है।

यौन-इच्छा विकार

यौन-उच्छा विकार का उपचार आसान नहीं है। रजोनिवृत्ति-पूर्व यौन-इच्छा विकार कई बार आधुनिक जीवनशैली के घटकों जैसे बच्चों की पढ़ाई या जिम्मेदारियों का बोझ, ऑफिस के कामों का मनोवैज्ञानिक दबाव, दवाइयां या अन्य सेक्स विकार आदि के कारण भी होता है। कई बार लैंगिक संसर्ग में आई उकताहट से भी यौन-इच्छा कम हो जाती है। रजोनिवृत्ति के दौरान यौन-इच्छा विकार के उपचार हेतु ईस्ट्रोजन का प्रयोग किया जाता है।

कामोत्तेजना विकार
कामोत्तेजना विकार के उपचार में अच्छे स्नेहन द्रव्य प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। ज्यादा उम्र की स्त्रियों में कई बार अपर्याप्त घर्षण के कारण उत्तेजना नहीं होती है। तब चिकित्सक उन्हें मैथुनपूर्व गर्म शावर लेने, मैथुनपूर्व कामक्रिड़ाएं बढ़ाने आदि की सलाह देते हैं।

चरम-आनंद विकार (Anorgasmia)

ऐनोर्गेज्मिया का उपचार संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा और सेन्सेट फोकस द्वारा किया जाता है। इसके औषधीय उपचार में सिलडेनाफिल और बूप्रोपियोन का प्रयोग किया जाता है। लेकिन इनके नतीजे बहुत अच्छे नहीं हैं और ये एफ.डी.ए. द्वारा प्रमाणित भी नहीं है।

कष्टप्रद संभोग

के कई भौतिक कारण हो सकते हैं और उनका समाधान उपचार का पहला कदम होना चाहिये। यदि कारण मालूम न हो सके या अस्पष्ट हो तो उपचार बहु-आयामी और बहु-विषयक होना चाहिये। आवश्यकतानुसार मनोचिकित्सा भी देनी चाहिये जिसमें पुरुष को भी साथ रखना चाहिये और शारीरिक, भावनात्मक और आपसी तालमेल संबन्धी सभी मुद्दों के समाधान हो जाने चाहिये।

लैंगिक दर्द विकार के कुछ कारणों जैसे वलवर वेस्टिब्युलाइटिस और वेजीनिसमस के उपचार में फिजियोथैरेपी (आपसी प्रतिक्रिया, श्रोणि की पेशियों का विद्युत उत्तेजन, श्रोणि का सोनोग्राम, वेजाइनल डाइलेटर्स) काफी लाभदायक है।

योनि आकर्ष के उपचार में मनोचिकित्सक धीरे धीरे रोगी को विश्वास में लेता है। योनि का परीक्षण यह कह कर करता है कि दर्द होने पर परीक्षण रोक देगा और आहिस्ता आहिस्ता योनि को फैला देता है। इस तरह रोगी का डर निकाल देता है।

वेजीनिसमस के औषधीय उपचार हेतु वेजाइनल एट्रोफी में ईस्ट्रोजन, वल्वोवेजाइनल केन्डायसिस में फंगसरोधी और वलवर वेस्टिब्युलाइटिस में एन्टीडिप्रेसेन्ट आदि प्रयोग करते हैं।

औषधियां

यदि आपकी समस्या किसी भौतिक कारण से है तो चिकित्सक आपके उपचार की योजना बतला देगा। योजना में दवाइयां, जीवनशैली में छोटा-मोटा बदलाव या शल्यक्रिया का सुझाव भी हो सकता है। हो सकता है वह आपको मनोचिकित्सक से भी संपर्क करने को कहे। कुछ प्रभावशाली उपचार इस तरह हैं।

योनि स्नेहन द्रव्य

शुष्क योनि के उपचार हेतु बाजार में विभिन्न स्नेहन क्रीम, जेल या सपोजीटरी मिलते है। ये बिना चिकित्सक प्रपत्र के भी खरीदे जा सकते हैं। पानी में घुलनशील क्रीम या जेल अच्छे रहते है। लेटेक्स रबर के बने कंडोम तेल में घुलनशील स्लेहन द्रव्य जैसे पेट्रोलियम जैली, मिनरल तेल या बेबी ऑयल से क्रिया कर फट सकते हैं।

ईस्ट्रोजन क्रीम

रजोनिवृत्ति के बाद होने वाली शुष्क योनि तथा योनि क्षय में ईस्ट्रोजन क्रीम का प्रयोग काफी लाभप्रद रहता है।

सिलडेनाफिल

सिलडेनाफिल पुरुषों के स्तंभनदोष में काफी प्रयोग की जाती है। स्त्रियों में काम-उत्तेजना पैदा करने के लिए एलोपैथी के पास अभी कोई दवा नहीं है। इसलिए सिलडेनाफिल को स्त्रियों में भी जुगाड़ के रूप में प्रयोग किया गया है, पर नतीजे ज्यादा अच्छे नहीं हैं। कुछ ही स्त्रियों की काम-उत्तेजना में लाभ देखा गया है। एफ.डी.ए. ने भी इसे स्त्रियों में प्रयोग करने के लिए प्रमाणित नहीं किया है। इसके पार्श्वप्रभाव सिरदर्द, जुकाम, चेहरे पर लालिमा, असामान्य दृष्टि, अपच आदि हैं। कभी-कभी उसके प्रयोग से रक्तचाप इतना कम हो सकता है कि घातक दिल का दौरा पड़ सकता है। नाइट्रेट सेवन करने वालों को सिलडेनाफिल लेना जानलेवा साबित हो सकता है। ।

होर्मोन प्रतिस्थापना उपचार (Hormone Replacement Therapy)

रजोनिवृत्ति से होने वाले विकारों के उपचार हेतु होर्मोन्स का प्रयोग किया जाता है। अकेला ईस्ट्रोजन उन स्त्रियों को दिया जाता है जिनका गर्भाशय शल्यक्रिया द्वारा निकाल दिया गया है जबकि गर्भाशय को साथ लिए जी रही स्त्रियों को ईस्ट्रोजन-प्रोजेस्टिन (कृत्रिम प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन) दिया जाता है क्योंकि प्रोजेस्टिन ईस्ट्रोजन की अधिकता के दुष्प्रभाव (गर्भाशय कैंसर) से गर्भाशय की सुरक्षा करते हैं। वर्षों तक यह समझा जाता रहा कि रजोनिवृत्ति में ईस्ट्रोजन-प्रोजेस्टिन उपचार स्त्रियों को हृदयरोग, उच्च-कॉलेस्टेरोल, कैंसर आंत, एल्झाइमर रोग और अस्थिक्षय (Osteoporosis) से बचाता है। परंतु 2002 में हुई खोज के अनुसार रजोनिवृत्ति में ईस्ट्रोजन या इस्ट्रोजन-प्रोजेस्टिन उपचार से स्तन कैंसर, हृदयाघात, स्ट्रोक और अंडाशय कैंसर का जोखिम बहुत बढ़ जाता है। होर्मोन उपचार उन स्त्रियों को बहुत राहत देता है जिनको रजोनिवृत्ति के कारण शुष्क योनि या संभोग में दर्द होता है साथ में हॉट फ्लशेज और अनिद्रा में भी लाभ मिलता है। अनुसंधानकर्ता छोटे अंतराल के लिए दिये गये होर्मोन उपचार को तो सुरक्षित मानते हैं लेकिन लंबे समय तक होर्मोन उपचार देने के पक्ष में नहीं हैं। पांच वर्ष के बाद होर्मोन उपचार बंद कर दिया जाना चाहिये। स्त्रियों में होर्मोन उपचार शुरू करने का निर्णय सोच समझ कर लिया जाना चाहिये और रोगी को इसके फायदे नुकसान अच्छी तरह समझा देने चाहिये।

टेस्टोस्टिरोन

वैज्ञानिकों के पास पर्याप्त सबूत हैं कि स्त्रियों में काम-इच्छा, काम-ज्वाला और लैंगिक संसर्ग के स्वप्न और विचारों को भड़काने में टेस्टोस्टिरोन बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसीलिए इसे स्त्रियों के लिए हार्मोन ऑफ डिजायर कहा जाता है । अब प्रश्न यह है कि इसे कब देना चाहिये। अनुभवी चिकित्सक कहते हैं कि रजोनिवृत्ति में यदि काम-इच्छा का अभाव हो और रक्त में टेस्टोस्टिरोन का स्तर भी कम हो तो इसे अवश्य देना चाहिये।

इसके लिए त्वचा पर चिपकाने वाले टेस्टोस्टीरोन के पेच मिलते हैं। इसकी मात्रा 300 माइक्रोग्राम प्रति दिन है और इसे तीन महीनें तक आजमाना चाहिए। यदि तीन महीनें में फायदा न हो तो बन्द कर दें। इसके पार्श्व प्रभाव जैसे सिर के बाल उड़ना, दाड़ी मूँछ उग आना, मर्दों जैसी आवाज हो जाना आदि जैसे ही दिखे, इसका सेवन बन्द कर देना चाहिए। वैसे मैं आपको टेस्टोस्टीरोन लेने की सलाह नहीं दूंगा, क्योंकि लाभ की संभावना कम और पार्श्व प्रभावों की संभावना ज्यादा रहती है। वैसे भी यह स्त्रियों में एफ.डी.ए. द्वारा प्रमाणित नहीं है।

पीटी-141 नेजल स्प्रे

फीमेल वियाग्रा के नाम से चर्चित पीटी-141 नेजल स्प्रे पेलेटिन टेक्नोलोजीज जोर शोर से बाजार में उतारने की तैयारी कर रही थी और कहा जा रहा था कि जैसे ही स्रियां अपने नाक में इसका स्प्रे लेंगी, 15 मिनट में उनकी कामेच्छा एकदम भड़क उठेगी। लेकिन हृदय पर इसके इतने घातक कुप्रभाव देखे गये कि इसकी शोध पर तुरंत रोक लगानी पड़ी। फिर भी कुछ लोग इसे बेच रहे हैं अतः आप इसे भूल कर भी नहीं खरीदें।

वैकल्पिक चिकित्सा

आपने ऊपर पढ़ा है कि ऐलोपैथी में स्त्री यौन विकारों का उपचार पूर्णतया विकसित नहीं हुआ है और अभी प्रयोगात्मक अवस्था में ही है। लेकिन आयुर्वेद यौन रोगों में 5000 वर्ष पूर्व से शतावरी, शिलाजीत, अश्वगंधा, जटामानसी, सफेदमूसली जैसी महान औषधियाँ प्रयोग कर रहा है। ये पूर्णतः निरापद और सुरक्षित हैं और जादू की तरह कार्य करती हैं।

संभोग से समाधि की ओर ले जाये अलसी

अलसी आधुनिक युग में स्त्रियों की यौन-इच्छा, कामोत्तेजना, चरम-आनंद विकार, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की महान औषधि है। स्त्रियों की सभी लैंगिक समस्याओं के सारे उपचारों से सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है अलसी। “व्हाई वी लव” और “ऐनाटॉमी ऑफ लव” की महान लेखिका, शोधकर्ता और चिंतक हेलन फिशर भी ओमेगा-3 फैट (जिसका महान स्रोत अलसी है) को प्रेम, काम-पिपासा और लैंगिक संसर्ग के लिए आवश्यक सभी रसायनों जैसे डोपामीन, नाइट्रिक ऑक्साइड, नोरइपिनेफ्रीन, ऑक्सिटोसिन, सीरोटोनिन, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स का प्रमुख घटक मानती है।



सबसे पहले तो अलसी आप और आपके जीवनसाथी की त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनायेगी। आपके केश काले, घने, मजबूत, चमकदार और रेशमी हो जायेंगे।
• अलसी आपकी देह को ऊर्जावान और मांसल बना देगी। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी गहेगी, न क्रोध आयेगा और न कभी थकावट होगी। मन शांत, सकारात्मक और दिव्य हो जायेगा।
• अलसी में ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन, लिगनेन, सेलेनियम, जिंक और मेगनीशियम होते हैं जो स्त्री हार्मोन्स, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स ( आकर्षण के हार्मोन) के निर्माण के मूलभूत घटक हैं। टेस्टोस्टिरोन आपकी कामेच्छा को चरम स्तर पर रखता है।
• अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट और लिगनेन जननेन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं, जिससे कामोत्तेजना बढ़ती है।
• इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करती हैं जिससे मस्तिष्क और जननेन्द्रियों के बीच सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है। नाड़ियों को स्वस्थ रखने में अलसी में विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इस तरह आपने देखा कि अलसी के सेवन से कैसे प्रेम और यौवन की रासलीला सजती है, दिव्य सम्भोग का दौर चलता है, देह के सारे चक्र खुल जाते हैं, पूरे शरीर में दैविक ऊर्जा का प्रवाह होता है और सम्भोग एक यांत्रिक क्रीड़ा न रह कर शिव और उमा की रति-क्रीड़ा का उत्सव बन जाता है, समाधि का रूप बन जाता है।
Dr. O.P.Verma

President, Flax Awareness Society
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अल्फा लिनोलेनिक एसिड (ALA) की क्वांटम साइंस

अल्फा लिनोलेनिक एसिड ( ALA ) की क्वांटम साइंस  यह एक ओमेगा-3 फैट है क्योंकि इसमें पहला डबल बांड ओमेगा कार्बन से तीसरे कार्बन के ब...