Saturday, February 25, 2012

Hodgkin's lymphoma


होजकिन्स लिन्फोमा (Hodgkin's lymphoma)
होजकिन्स लिम्फोमा या HL (जिसे पहले होजकिन्स रोग के नाम से जाना जाता था) श्वेतरक्त-कोशिकाओं का कैंसर (lymphoid malignancy) है, इस कैंसर की संरचना और लक्षण विशिष्ट हैं और इसका पूर्णतः उपचार संभव है। सबसे पहले सन् 1832 में थॉमस हॉजकिन्स ने इस रोग का विस्तार से अध्ययन किया  और इसे होजकिन्स रोग नाम से परिभाषित किया था। एक लाख लोगों में 2-3 इस रोग के शिकार बनते हैं।
बायोप्सी द्वारा लसिका-ग्रंथि को निकाल कर (excisional lymph node biopsy) उसकी सूक्ष्म-संरचना को देख कर ही इसका निदान किया जाता है। सी.टी.स्केन, एम.आर.आई.तथा अन्य जांच के आधार पर इसे विभिन्न चरणों में वर्गीकृत किया जाता है।

सूक्ष्म-संरचना के आधार पर डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा इसकी पांच सामान्य (classic) किस्में उल्लेखित की गई हैं।  पहली चार किस्में
1-   नोड्यूलर  स्क्लीरोसिस NS (80%)
2-   मिक्स्ड सेल्यूलरिटी MS (15%
3-   लिम्फोसाइट डिप्लीटेड LD (02%)
4-   लिम्फोसाइट रिच (03%) LR सामान्य हैं।         
                                                                                                                                                    
लेकिन पांचवीं अनूठी किस्म के लक्षण भी विशिष्ट हैं और उपचार भी अलग है।  इसकी व्यापकता 5% है। इसमें  विशिष्ट रीड-स्टर्नबर्ग कोशिकाएं नहीं होती हैं या बहुत ही कम होती हैं। इनकी जगह प्रदाह कोशिकाओं के बीच लिम्फोसाइट या हिस्टियोसाइट सेल्स या ''पॉपकॉर्न कोशिका'' जिसका दानेदार न्यूक्लियस मक्का के सिके भुट्टे की तरह दिखाई देता है। ये बी-सेल एन्टीजन जैसे CD19 और CD20 के लिए घनात्मक और  CD15 और CD30 के लिए ऋणात्मक होते हैं।  
5-   नोड्यूलर लिम्फोसाइट प्रिडोमिनेन्ट होजकिन्स  (NLPHD)  
सामान्य होजकिन्स लिम्फोमा में विशिष्ट प्रकार की बड़ी (20-50 नेनोमीटर) तथा बहुनाभिकीय (multinucleated ) ''रीड-स्टर्नबर्ग कोशिका'' होती है, हालांकि इनकी तादाद 1-2% ही होती है, शेष सक्रिय व मिश्रित प्रदाह कोशिकाएं लिम्फोसाइट, प्लाज्मा सेल्स, न्यूट्रोफिल, इओसिनोफिल और हिस्टियोसाइट्स होती हैं। रीड-स्टर्नबर्ग सेल्स का कोशिका द्रव्य (cytoplasm) प्रचुर, समरूप, द्विरंगी, महीन दानेदार (abundant, homogeneous, amphophilic, finely granular ) होता है और नाभिक ''उल्लू की आंखो'' जैसा (अर्थात इसमें दो एक जैसे एसिडोफिलिक न्यूक्लियाई होते हैं) और मोटी भित्ति वाला होता है।
अधिकांश रीड-स्टर्नबर्ग कोशिकाओं की उत्पत्ति बी-कोशिका से होती हैं, ये लसिका-पर्व (lymph node) के गर्भ से निकलती हैं पर ये एंटीबॉडीज नहीं बनाती हैं। कुछ विरले प्रकार के होजकिन्स लिम्फोमा में इन रीड-स्टर्नबर्ग सेल्स का उद्भव टी-कोशिका से भी होता है।
रीड-स्टर्नबर्ग सेल्स CD30 (Ki-1) और CD15 एंटीजन से सम्बंधित है। CD30 रीड-स्टर्नबर्ग सेल्स की सतह में स्थित लिम्फोसाइट की सक्रियता का मार्कर है, जो कैंसर लिम्फोयड कोशिकाओं की सक्रियता को प्रदर्शित करता है। CD15 परिपक्व ग्रेन्यूलोसाइट, मोनोसाइट और सक्रिय टी-सेल्स का मार्कर है। 
                                                                                          कारण
होजकिन्स लिम्फोमा के स्पष्ट कारण हमें मालूम नहीं हैं। एप्स्टीन-बार वायरस (EBV) की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई है। 50% तक रोगियों के कैंसर सेल्स  EBV-positive हो सकते हैं। लगभग 100% एच.आई.वी. के रोगी EBV-positive होते हैं।
होजकिन्स लिम्फोमा में रक्षा-विभाग की बी-कोशिका के डी.एन.ए. में विकृत-विभाजन (mutation) शुरू होता है। विकृत-विभाजन (mutation) कोशिकाओं को तेजी से विभाजित होते रहने और लम्बे समय तक जीवित रहने के आदेश देता है। और परिणाम स्वरूप बड़ी, असाधारण बी-कोशिकाएं भारी तादाद में जमा हो जाती हैं जो स्वस्थ कोशिकाओं का तिरस्कार और उपहास करती हैं।
जोखिम घटक
·        लिंग – पुरुष
·        उम्र – 15-40 और 55 से ऊपर
·        पारिवारिक
·        इन्फेक्शल मोनोन्यूक्लिएसिस  (कारक वाइरस – एप्स्टीन-बार वाइरस Epstein-Barr virus)
·        कमजोर रक्षा-प्रणाली – HIV, AIDS
·        ग्रोथ हार्मोन का लम्बे समय तक प्रयोग

लक्षण और संकेत (Symptoms & Signs )
 होजकिन्स लिम्फोमा में निम्न लक्षण होते हैं।
·        सबसे मुख्य लक्षण कांख (Axilla), गर्दन या वंक्षण (groin) की एक या अधिक लसिका-ग्रंथियों की दर्दहीन संवृद्धि  (Lymphnode Enlargement) होना अर्थात शरीर में गांठें बन जाना है। स्पर्श करने पर ये ग्रंथियां बढ़ी हुई और रबर जैसी महसूस होती हैं।
·        वैल्डेयर रिंग (गले के पिछले हिस्से, टॉंसिल), सिर का पिछला और निचला भाग (occipital) या कोहनी के समीप बांह के अंदर का भाग (epitrochlear) की लसिका-ग्रंथिया बढ़ सकती हैं।  
·        सामान्य लक्षण जैसे सर्दी लग कर बुखार आना, भूख न लगना, कमजोरी, वजन कम होना, रात में पसीना आना, खुजली आदि।
·        10% रोगियों में विशेष तरह का मियादी बुखार (Pel-Ebstein fever) होता है। 1-2 सप्ताह तक तेज बुखार आता है फिर 1-2 सप्ताह रोगी का तापमान सामान्य रहता है और यह चक्र चलता रहता है।
·        छाती या फेफडों में विवर्धित लसिका-ग्रंथियां हों तो छाती में दर्द, खांसी, स्वासकष्ट या खांसी के साथ खून आना (hemoptysis) जैसे लक्षण हो सकते हैं।
·        10% रोगियों की गांठों में दर्द हो सकता है। कई बार मदिरापान के बाद ग्रंथियों में दर्द होता है।
·        बिंबाणु कम हो जाने से त्वचा में रक्तस्राव के कारण लाल दाने या चकत्ते हो सकते हैं।
·        पीठ या हड्डियों में भी दर्द हो सकता है।  
·        प्लीहा (30% रोगियों में) और/या यकृत (5% रोगियों में) बढ़ जाता है।
·        रोग का प्रभाव छाती में हो तो उर्ध्व महाशिरा सिंड्रोम (Superior vena cava syndrome)।   
·        कैंद्रीय तंत्रिका तंत्र रोग – सेरीबेलर डीजनरेशन, न्यूरोपैथी, गुलियन बैरी सिंड्रोम या मल्टीफोकल ल्यूकोएन्केफेलोपैथी।
निदान

छायांकन (Imaging)

सी.टी.स्केन – पेट, छाती और श्रोणि (Pelvis) के स्केन द्वारा लसिकापर्व, यकृत व प्लीहा की संवृद्धि और फेपड़ों का गांठों तथा प्लूरल इफ्यूजन की जानकारी मिल जाती है।
पी.ई.टी.स्केन – रोग के चरण निर्धारण हेतु  जरूरी जांच है। छाती में गांठ (mediastinal mass) का भी पता चल जाता है। 
एम.आर.आई. – यदि कैंद्रीय तंत्रिका तंत्र के विकार की संभावना हो तो  एम.आर.आई. और लम्बर पंक्चर किया जाता है।

सूक्ष्मदर्शन  (Microscopy)

FNAC -रोग का अन्तिम निदान सूक्ष्मदर्शन द्वारा ही किया जाता है। पहले सुई द्वारा गांठ का पानी निकाल कर स्लाइड बनाई जाती है, फिर उसे रंग कर सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखा जाता है।
Biopsy FNAC के बाद लिम्फनोड का आंशिक या पूर्ण उच्छेदन (Excision) करके बायोप्सी की जाती है।
Bone marrow Biopsy  वृद्ध या अन्तिम अवस्था के रोगियों में की जाती है। दोनों तरफ की बायोप्सी करना उचित रहता है। पहले और दूसरे चरण के रोगियों में इसे टाला जा सकता है यदि रक्त के परीक्षण ठीक आये हों।
रक्त परीक्षण
सी.बी.सी. और रक्त की रसायनिक जांच – होजकिन्स लिम्फोमा में रक्त-अल्पता (anemia), लिम्फोसाइट घटना (lymphopenia), न्यूट्रोफिल्स या इयोसिनोफिल्स बढ़ना आदि सामान्य हैं।
ई.एस.आर. -  ई.एस.आर. शरीर में प्रदाह का मोटा पैमाना है। इसका बढ़ना बुरे फलानुमान (worse prognosis) का संकेत है। हालांकि यह कई रोगों में बढ़ सकता है और इसका कोई नैदानिक महत्व नहीं है।
एल.डी.एच. – सामान्यतः बढ़ा रहता है। यह भी रोग फलानुमान में महत्वपूर्ण है।
एच.आई.वी.
यदि होजकिन्स लिम्फोमा के साथ नेफ्रोटिक सिंड्रोम भी है (जिसकी संभावना बहुत ही कम रहती है) तो क्रियेटिनीन बढ़ सकता है। यदि रोग हड्डी और यकृत तक पहुँच चुका है तो एल्केलाइन फोस्फेटेज (ALP) भी बढ़ सकता है।  अन्य विकृतियों में कैल्शियम और सोडियम का बढ़ना और अल्प-रक्तशर्करा आदि मुख्य हैं।
साइटोकाइन्स इन्टरल्यूकिन IL-6, IL-10 और घुलनशील CD25 (IL-2 रिसेप्टर) रोग की गम्भीरता से सम्बंधित है।
स्टेजिंग लेप्रोटोमी  

चरण (Stages)

रोग के चरण का निर्धारण चिकित्सकीय इतिहास, शारीरिक परीक्षण, छायांकन,  सूक्ष्मदर्शन तथा अन्य जांचों के आधार पर किया जाता है। एन आर्बर वर्गीकरण (1971) की मदद से इसको चार चरणों में वर्गीकृत किया गया है।

चरण I  -  में एक लिम्फनोड या अन्य क्षेत्र प्रभावित होता है।

चरण II में डायफ्राम के एक ही तरफ के दो या अधिक लिम्फनोड या क्षेत्र प्रभावित होते हैं।

चरण III -  में डायफ्राम के दोनों ही तरफ के लिम्फनोड या क्षेत्र प्रभावित होते हैं।

चरण IV -   दो में कई जगह के लिम्फनोड या क्षेत्र प्रभावित होते हैं। यकृत या अस्थि-मज्जा (bone marrow)  का रोगग्रस्त होना भी इसी चरण को दर्शाता है।

चरण निर्धारण में प्लीहा (spleen) को लिम्फनोड माना जाता है।

उपचार

शल्य – इसके उपचार में शल्य-क्रिया तभी की जाती है जब कोई लिम्फनोड कोई बड़ी शारीरिक समस्या का कारण बन रहा हो।

अस्थि-मज्जा  या स्टेमसेल प्रत्यारोपण –

इस उपचार में रोगी के अस्थि-मज्जा/ स्टेमसेल निकाल लिए जाते हैं। कीमोथैरेपी (cyclophosphamide, melphalan, BCNU, Ara-C, methotrexate und etoposide) अस्थि-मज्जा/ स्टेमसेल पुनः प्रत्यारोपण कर दिये जाते हैं। यह उपचार युवा रोगियों को दिया जाता है, क्योंकि यह मंहगा भी है,  वृद्ध रोगियों में जोखिम भी रहता है।  
रेडियोथैरेपी –

होजकिन्स लिम्फोमा के उपचार के लिए रेडियोथैरेपी और सामान्यतः कीमोथैरेपी दी जाती है। गंभीर रोगियों में रेडियोथैरेपी की मात्रा 30-36 Gy रखी जाती है। सामान्य रोगियों के लिए 20-30 Gy रखी जाती है। यदि सिर्फ रेडियो ही दी जाती है तो मात्रा 30-44 Gy रखी जाती है।

कामोथैरपी –
प्रारंभिक उपचार में निम्न कीमो निम्न सूत्रानुसार दी जाती है।
·     MOPP (mechlorethamine, vincristine, procarbazine, prednisone) 
·     ABVD (Adriamycin [doxorubicin], bleomycin, vinblastine, dacarbazine)
·     Stanford V (doxorubicin, vinblastine, mustard, bleomycin, vincristine, etoposide, prednisone)
·     BEACOPP (bleomycin, etoposide, doxorubicin, cyclophosphamide, vincristine, procarbazine, prednisone)
प्रेडनिसोलोन और प्रोकार्बेजीन को छोड़ कर उपरोक्त सारी दवाइयां शिरा में दी जाती हैं। MOPP पहला उपचार था जो विन्सेंट डिविटा और साथियों द्वारा विकसित किया गया था। ABVD बेहतर है और नपुंसकता और द्वितीयक ल्यूकीमिया की संभावना कम रहती है। Stanford V में 12 सप्ताह तक दवाएं दी जाती हैं।
 MOPP हर 28 दिन में दिया जाता है। कुल 6 चक्र इस प्रकार दिये जाते हैं। 
·     Mechlorethamine: 6 mg/m2, days 1 and 8
·     Vincristine: 1.4 mg/m2, days 1 and 8
·     Procarbazine: 100 mg/m2, days 1-14
·     Prednisone: 40 mg/m2, days 1-14, cycles 1 and 4 only
ABVD 28 दिन में दिया जाता है। कुल 6 चक्र इस प्रकार दिये जाते हैं। 
·     Adriamycin: 25 mg/m2, days 1, 15
·     Bleomycin: 10 mg/m2, days 1, 15
·     Vinblastine: 6 mg/m2, days 1, 15
·     Dacarbazine: 375 mg/m2, days 1, 15
  The Stanford V इस प्रकार दी जाती है।
·     Vinblastine: 6 mg/m2, weeks 1, 3, 5, 7, 9, 11
·     Doxorubicin: 25 mg/m2, weeks 1, 3, 5, 9, 11
·     Vincristine: 1.4 mg/m2, weeks 2, 4, 6, 8, 10, 12
·     Bleomycin: 5 units/m2, weeks 2, 4, 8, 10, 12
·     Mechlorethamine: 6 mg/m2, weeks 1, 5, 9
·     Etoposide: 60 mg/mtwice daily, weeks 3, 7, 11
·     Prednisone: 40 mg/m2, every other day, weeks 1-10, tapered weeks 11, 12
·     XRT to bulky sites 2-4 weeks following the end of chemotherapy
BEACOPPपर तीन सप्ताह दी जाती है, कुल 8  चक्र दिये जाते हैं।
·     Bleomycin: 10 mg/m2, day 8
·     Etoposide: 200 mg/m2, days 1-3
·     Doxorubicin: 35 mg/m2, day 1
·     Cyclophosphamide: 1,250 mg/m2, day 1
·     Vincristine: 1.4 mg/m2, day 8
·     Procarbazine: 100 mg/m2, days 1-7
·     Prednisone: 40 mg/m2, days 1-14

सालवेज कीमोथैरेपी
यदि प्रारंभिक कीमो उपचार काम न करे तो सालवेज कीमोथैरेपी दी जाती है। इनमें  तीन  मुख्य हैं। 
·        ICE (ifosfamide, carboplatin, etoposide)
·        DHAP (cisplatin, cytarabine, prednisone)
·        ESHAP (etoposide, methylprednisolone, cytarabine, cisplatin)

सालवेज कीमोथैरेपी विस्तार में
 ICE इस तरह दी जाती है।
·        Ifosfamide: 5 g/m2, day 2
·        Mesna: g/m2, day 2
·        Carboplatin: AUC 5, day 2
·        Etoposide: 100 mg/m2, days 1-3
 DHAP इस तरह दी जाती है।
·        Cisplatin: 100 mg/m2, day 1
·        Cytarabine: 2 g/m2, given twice on day 2
·        Dexamethasone: 40 mg, days 1-4
EPOCH  में etoposide, vincristine, and doxorubicin एक साथ 96 घन्टे तक निरन्तर शिरा मार्ग से दी जाती है। 
·        Etoposide: 50 mg/m2, days 1-4
·        Vincristine: 0.4 mg/m2, days 1-4
·        Doxorubicin: 10 mg/m2, days 1-4
·        Cyclophosphamide: 750 mg/m2, day 5
·        Prednisone: 60 mg/m2, days 1-6
फलानुमान (Prognosis)
आज कल इसके उपचार में बहुत प्रगति हुई है और पांच वर्षीय जीवनदर 85% से 98% है। निम्न घटक बुरे संकेत देते हैं।
·        उम्र > 45 वर्ष
·        चरण IV
·        हीमोग्लोबिन < 10.5 g/dl
·        लिम्फोसाइट काउंट < 600/ µL or <8%
·        पुरुष
·        एलब्यूमिन < 4.0 g/dl
·        लिम्फोसाइट गणनांक >15000/ µL
वैकल्पिक उपचार
·        बुडविग प्रोटकोल
·        एक्यूपंक्चर
·        एरोमाथैरेपी
·        मालिश
·        ध्यान
·        शान्ति  

Gall Bladder Cancer

 पित्ताशय कैंसर

यह कैंसर पित्ताशय एक दुर्लभ प्रजाति का कपटी और कष्टप्रद कर्क रोग है जो इसकी श्लेष्मकला (Mucosal Layer) में होता है और बाहर की तरफ बढ़ता है। पित्ताशय एक नाशपाती के आकार की एक थैली है जिसमें यकृत से आकर पित्त इकट्ठा होता रहता है। यह रोग स्त्रियों को अधिक होता है।   इसकी भित्तियों में तीन निम्न परतें होती हैं।
1-   सबसे अन्दर की  श्लेष्मकला (Mucosal Layer), 
2-   बीच की स्निग्ध-पेशी परत और
3-   बाहर की सीरमीकला (Serosa) परत।
इन तीनों  परतों को संयोजी ऊतक (Connective Tissue) चिपका कर रखता है।
लक्षण
·        पीलिया,
·        ज्वर,
·        पेट में दर्द,
·        पेट में फुलाव,
·        मिचली और उलटी,
·        पेट में गांठ आदि।

निदान
प्रारंभिक अवस्था में बीमारी का पता नहीं चल पाता है, क्योंकि शुरू में इस रोग के लक्षण बड़े सामान्य होते हैं और फिर यह यकृत के पीछे भी छुपा रहता है। अक्सर जब पित्ताशय को पथरी रोग के कारण निकाला जाता है, तब बायोप्सी करने पर रोग का पता चलता है। इसके निदान के लिए निम्न परीक्षण किये जाते हैं।
·        भौतिक परीक्षण
·        सोनोग्राफी
·        यकृत कार्य परीक्षण
·        कारसिनोऐम्ब्रोयनिक एन्टीजन CEA
सामान्यतः 5 ng/ml या कम
·        CA 19-9 ट्यूमर मार्कर सामान्यतः 40 40 U/ml या कम
·        रक्त की रसायनिक जांच
·        CT स्केन
·        M R I
·        ERCP
·        बायोप्सी
·        लेपरोस्कोपी

चरण (Stages)

चरण 0  स्वस्थानी कैंसर  (Carcinoma in Situ) में सबसे अन्दर की की श्लेष्मकला (Mucosal Layer),  में असामान्य कोशिकाएं जो कैंसर कोशिकाओं में परिवर्तित और फैल सकती हैं।

चरण I       के दो उपचरण होते हैं।

चरण I A - में कैंसर संयोजी ऊतक या मांसल परत तक फैल चुका होता है।

चरण I B -  में कैंसर मांसल परत के बाहर की संयोजी ऊतक तक फैल चुका होता है।

चरण II      के दो उपचरण होते हैं।

चरण II A - में कैंसर  अंतरांगी उदरावरण (Visceral Peritoneum) को पार कर चुका या/और यकृत या/और पास के किसी अन्य अंग (आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, अग्न्याशय या पित्त वाहिकाएं) तक फैल चुका होता है।

चरण II B -  कैंसर निम्न संरचनाओं तक फैल चुका होता है।

·        आंतरिक श्लेष्मकला (Mucosal Layer) से संयोजी ऊतक (Connective Tissue) और पास के लसिकापर्व (Lymph node) तक।

·        मांसल परत और पास के लसिकापर्व (Lymph node) तक।

·        मांसल परत से संयोजी ऊतक और पास के लसिकापर्व तक।

·        अंतरांगी उदरावरण को पार कर और/या यकृत और/या पास को कसी अंग (आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, अग्न्याशय या पित्त वाहिकाएं) और लसिकापर्व तक।

चरण III  में कैंसर रक्त-वाहिकाओं द्वारा यकृत या पास के किसी अंग और लसिकापर्व तक फैल चुका होता है।

चरण IV में कैंसर के पास के लसिकापर्व और/या दूर के किसी अंग तक फैल चुका होता है।

 

उपचार की दृष्टि से इस कैंसर को निम्न चरणों में बांटा गया है।

स्थानीय (चरण I) कैंसर पित्ताशय से बाहर नहीं फैला है। इसे शल्य द्वारा निकाला जा सकता है।

अशल्य योग्य (चरण II, चरण III और चरण IV) आसपास की संरचनाओं, अंगों या पूरे पेट में फैल चुका हो। जो कैंसर सिर्फ लसिकापर्व तक फैला हो उसको छोड़ कर बाकी सभी  शल्य योग्य नहीं हैं अर्थात उन्हें शल्य द्वारा पूरी तरह निकालना संभव नहीं है। 

आवर्ती (Recurrent) पित्ताशय कैंसर   

उपचार

उपचार के पहले रोगी की स्वीकृति ली जाती है, इसका मतलब उपचार में खतरा है या प्रयोगात्मक उपचार दिया जा रहा है।

शल्य

पित्ताशय कैंसर में पित्ताशय-उच्छेदन उपचारात्मक शल्य-क्रिया है।

चरण 0  (Carcinoma in Situ), चरण I A और चरण I B में तो यह बहुत जरूरी उपचार है।
चरण II में पित्ताशय के साथ उसका बेड (3 से.मी. चौड़ी पट्टी), यकृत का कुछ हिस्सा (removal of segments IVb and V) और लसिकापर्व (Lymph node) निकाले जाते हैं। चरण III में  पित्ताशय के साथ पित्ताशय वाहिनी (Bile Duct) भी निकाली जाती है। बड़ी शल्य-क्रिया में ड्यूओडिनम और प्लीहा भी निकाल लिया जाते है, हालांकि इसके बाद जीवन कष्टमय हो जाता है।
अशल्ययोग्य कैंसर में निम्न उपशामक (palliative) उपचार दिये जाते हैं।
·        पित्त उपमार्ग शल्य -  यदि कैंसर आंत या पित्त-पथ पर दबाव डाल रहा हो तो शल्य द्वारा पित्ताशय या पित्त-वाहिका को काट कर आंत से जोड़ दिया जाता है।
·        दूरदर्शी द्वारा रुकावट की जगह कृत्रिम प्लास्टिक नलिका (Stent) डाल कर पित्त को शरीर से बाहर या आंत डाल कर वैकल्पिक पित्त-निकास व्यवस्था बना दी जाती है।
·        यदि दूरदर्शी द्वारा कृत्रिम प्लास्टिक नलिका डालना संभव नहीं हो तो त्वचा द्वारा नलिका डाल कर पित्त को शरीर से बाहर या आंत डाल कर  पित्त-निकास व्यवस्था बना दी जाती है। ऐसा सामान्यतः शल्य पूर्व किया जाता है।
रसायन उपचार (Chemotherapy)  
अभी तक कोई शोध यह साबित नहीं कर सकी कि इस कैंसर में कीमो से रोगी का कुछ भला हो सकता है। फिर भी यह उपचार दिया जा रहा है। आज यह साबित हो चुका है कि 5-FU और ल्यूकोवोरिन से रोगी की मृत्यु जल्दी होती है। दूसरा विकल्प स्थानीय कीमोथैरेपी है।  यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि निदान के समय अधिकतर कैंसर फैल कर पित्ताशय को पार कर चुके होते हैं। इस कैंसर में निम्न दवाएं दी जाती हैं।
·        जेम्सीटेबीन,
·        सिसप्लेटिन,
·        5-फ्लूरोयूरेसिल,
·        केपीलिटेबीन और
·        ऑग्जालिप्लेटिन।
पार्ष्व-प्रभाव - इनके पार्ष्व-प्रभाव निम्न हैं।
·        गंजापन
·        मुंह में छाले और फोड़े
·        भूख न लगना
·        मिचली और उलटी
·        दस्त
·        संक्रमण (श्वेत रक्तकण WBC कम हो जाने के कारण)
·        रक्त स्राव (बिंबाणु Platelets कम हो जाने के कारण)
·        रक्त-अल्पता और कमजोरी (लाल रक्तकण RBC कम हो जाने के कारण)
·        सिसप्लेटिन और ऑग्जालिप्लेटिन नाड़ियों को क्षतिग्रस्त करती हैं और हाथों और पैरों में कमजोरी, दर्द, स्पर्श या तापमान की अनुभूति न होना या अतिसंवेदनशीलता या सुन्न हो जाना आदि की शिकायत हो सकती है। 
रेडियोसेंसिटाइजर्स – रेडियोथैरेपी के साथ दिये जाते हैं, ये रेडियोथैरेपी के लिए कैंसर कोशिकाओं की संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। और अभी प्रयोगात्मक दौर में ही हैं।  
रेडियोथैरेपी  
सामाय और स्थानीय रेडियो भी कीमोथैरेपी की तरह यह भी प्रभावशाली साबित नहीं हुई है और प्रयोगात्मक (Trials) तौर पर ही दी जाती है।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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