Friday, July 23, 2010

Wheat Grass


प्रकृति ने हमें स्वस्थ, ऊर्जावान, निरोगी और आयुष्मान रहने के लिए हमें अनेक प्रकार के पौष्टिक फल, फूल, मेवे, तरकारियां, जड़ी-बूटियां, मसाले, शहद और अन्य खाद्यान्न दिये हैं। ऐसा ही एक संजीवनी का बूटा है गेहूँ का ज्वारा। इसका वानस्पतिक नाम “ट्रिटिकम वेस्टिकम” है। डॉ. एन विग्मोर ज्वारे के रस को “हरित रक्त” कहती है। इसे गेहूँ का ज्वारा या घास कहना ठीक नहीं होगा। यह वास्तव में अंकुरित गेहूँ है। 

गेहूँ का ज्वारा एक सजीव, सुपाच्य, पौष्टिक और संपूर्ण आहार है। इसमें भरपूर क्लोरोफिल, किण्वक (एंजाइम्स), अमाइनो एसिड्स, शर्करा, वसा, विटामिन और खनिज होते हैं। क्लोरोफिल सूर्यप्रकाश का पहला उत्पाद है अतः इसमें सबसे ज्यादा सूर्य की ऊर्जा होती है और भरपूर ऑक्सीजन भी।


गेहूँ के ज्वारों में पोषक तत्वों की टकसाल


गेहूँ के ज्वारे क्लोरोफिल का सर्वश्रेष्ठ स्रोत हैं। इसमें सभी विटामिन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं जैसे विटामिन ए, बी1, 2, 3, 5, 6, 8, 12 और 17 (लेट्रियल); सी, ई तथा के। इसमें केल्शियम, मेग्नीशियम, आयोडीन, सेलेनियम, लौह, जिंक और अन्य कई खनिज होते हैं।


लेट्रियल या विटामिन बी-17 बलवान कैंसररोधी है और मेक्सिको के ओएसिस ऑफ होप चिकित्सालय में पिछले पचास वर्ष से लेट्रियल के इंजेक्शन, गोलियों और आहार चिकित्सा से कैंसर के रोगियों का उपचार होता आ रहा है। 
इतिहास


प्राचीन काल से ही हिन्दुस्तान के चिकित्सक गेहूँ के ज्वारों को विभिन्न रोगों जैसे अस्थि-संध शोथ, कैंसर, त्वचा रोग, मोटापा, डायबिटीज आदि के उपचार में प्रयोग कर रहे हैं। हमारे कई त्योहारों पर गेहूँ के ज्वारों को उगाने, पूजा करने के रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं। 

जैसे गणगौर हिन्दुस्तान के कई राज्यों जैसे राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में कुँवारी कन्याओं व सुहागिनों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है, जो बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।



पहले दिन चैत्र कृष्ण ग्यारस को माताजी की 'मूठ' रखी जाती है। बाँस की छोटी-छोटी टोकरियों में गेहूँ के ज्वारे बोए जाते हैं। ज्वारे वाली परंपरागत जगह को माताजी की'बाड़ी' कहते हैं। पूरे सप्ताह से बाड़ी की पूजा-अर्चना कर ज्वारों में पानी दिया जाता है और आरती भी की जाती है। ज्वारे लहराने के साथ ग्राम लक्ष्मी गाने लगती है- 'म्यारा हरिया जवारा हो कि गेहूँआ लहलहे... 



...और फिर चैत्र शुक्ल चतुर्थी को गणगौर माता बिदा होती है। सजी-धजी शोभायात्रा के साथ तालाब-बावड़ी पर श्रद्धा के साथ ज्वारे विसर्जित किए जाते हैं। 



पश्चिमी देशों में गेहूँ के ज्वारों से उपचार की पद्धति डॉ. एन. विग्मोर ने प्रारम्भ की थी। बचपन में उनकी दादी प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए जवानों का उपचार जड़ी-बूटियों, पैड़-पौधों और विभिन्न प्रकार की घासों से किया करती थी। तभी से उन्होंने जड़ी-बूटियों और विभिन्न घास के रस द्वारा बीमारियों के उपचार और अनुसंधान करना अपना शौक बना लिया। 50 वर्ष की उम्र में डॉ. एन. विग्मोर को आंत में कैंसर हो गया था। जिसके लिए उन्होंने गेहूँ के ज्वारों का रस और अपक्व आहार लिया और प्रसन्नता की बात थी कि एक वर्ष में वे कैंसर मुक्त हो गई। उन्होंने बोस्टन में एन विगमोर इन्स्टिट्यूट खोला जो आज भी काम कर रहा है। तब से लेकर अपनी मृत्यु तक वह गेहूँ के ज्वारे और अपक्व आहार द्वारा रोगियों का उपचार करती रही। उन्होंने इस विषय पर 35 पुस्तकें भी लिखी हैं। 

गेहूँ के ज्वारो में विद्यमान अमाइनो एसिड और उनके कार्य


इसमें 8 आवशयक और बचे हुए 16 मेंसे 13 अमाइनो एसिड्स होते हैं। इनके कार्य संलग्न सारिणी में दर्शाये हैं।


अमाइनो एसिड कार्य


अमाइनो एसिड

कार्य
लाईसिन

आयुवर्धक
ल्यूसिन

ऊर्जा और नाड़ी तंत्र को संवेदनशील बनाये रखना
ट्रिप्टोफेन

त्वचा और केश का विकास
फिनाइलएलेनीन

थायरॉइड हार्मोन के निर्माण में सहायक
थ्रियोनीन

पाचन
वेलीन

मस्तिष्क और मांसपेशियों में परस्पर सहयोग और सामंजस्य बनाये रखना
मीथियोनीन

यकृत और वृक्क का शोधन
एलेनीन

रक्त के निर्माण में सहायक
आरजिनीन

वीर्यवर्धक
ग्लूटेमिक एसिड

मस्तिष्क को जागरुक रखना
एस्पार्टिक एसिड

ऊर्जा का उत्पादन
ग्लाइसीन

ऊर्जा का उत्पादन
प्रोलीन ग्लूटेमिक एसिड

अवशोषण
सेरीन

मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाये रखना
आइसोल्यूसीन

भ्रूण का विकास
हिस्टीडीन

श्रवण और नाड़ी तंत्र की विभिन्न क्रियाओं में सहायक

गेहूँ का ज्वारा शक्तिशाली प्रति-ऑक्सीकारक


क्या होते हैं मुक्त कण या फ्री रेडिकल्स ?


शरीर में होने वाली विभिन्न चयापचय क्रियाओं में कुछ व्यर्थ और हानिकारक अणु भी बन जाते हैं। इन अणुओं में इलेक्ट्रोन्स की संख्या प्रोटोन्स की अपेक्षा कम होती है जिससे ये अति सक्रिय तथा अस्थिर होते हैं। इन्हें हम “मुक्त कण” कहते हैं और ये मौका मिलते ही हमारे स्वस्थ अणुओं से इलेक्ट्रोन चुरा लेते हैं, इस क्रिया को ऑक्सीडेशन कहते हैं। इलेक्ट्रोन खो कर हमारे स्वस्थ अणु भी मुक्त कणों की भांति व्यवहार करने लगते हैं। और अपने अंतःकरण में बैठे प्रोटोन्स की इलेक्ट्रोन-पिपासा शांत करने हेतु अपना मुख्य काम छोड़ कर इलेक्ट्रोन्स का जुगाड़ करने निकल पड़ते हैं। इस तरह निरंतर इलेक्ट्रोन चुराने का एक श्रंखला-बद्ध सिलसिला शुरू हो जाता है, जिससे हमारी आयुवृद्धि की गति तेज हो जाती है, त्वचा में झुर्रियां बनने लगती हैं और हम विभिन्न बीमारियों जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अस्थि-संध शोथ, पार्किंसन्स, कैंसर आदि का शिकार हो जाते हैं। मुक्त कण हमारे बाह्य वातावरण और भोजन द्वारा भी शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। 


प्रति-ऑक्सिकारक या एंटीऑक्सीडेंट


मुक्त कणों से रक्षा करने के लिए हमारे शरीर में अनेक अणु जैसे विटामिन-ई, विटामिन-सी, बीटा-केरोटीन, किण्वक आदि होते हैं, जिनमें कई अतिरिक्त इलेक्ट्रोन्स होते हैं और जो बिना अस्थिर हुए मुक्त कणों को इलेक्ट्रोन्स दान देकर उन्हें निष्क्रिय कर देते हैं। इन्हें हम “प्रति-ऑक्सीकारक” या एंटीऑक्सीडेंट कहते हैं। हमें फलों, सब्जियों युक्त अच्छे आहार से प्रति-ऑक्सिकारक प्राप्त होते हैं तथा हमारे शरीर में भी कई प्रति-ऑक्सीकारक निरंतर बनते रहते हैं। एंटीऑक्सीडेंट आयुवर्धक और आरोग्यवर्धक होते हैं। ये डीएनए की संरचना में विकृति नहीं होने देते हैं, रक्त वाहिकाओं को स्वस्थ रखते हैं और त्वचा को युवा बनाये रखते हैं। गेहूँ के ज्वारे में कई शक्तिशाली प्रति-ऑक्सीकारक होते हैं, परंतु यहां हम चार विशिष्ट प्रति-ऑक्सिकारकों का वर्णन करेंगे।


1-सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज
2- पी4डी1
3- म्यूको-पॉलीसेकराइड्स
4- क्लोरोफिल


सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज


सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज (एस ओ डी) एक किण्वक है जो कोशिकाओं का जीर्णोद्धार करता है और कोशिकाओं की सुपरऑक्साइड से होने वाली क्षति को कम करता है। सुपरऑक्साइड बहुत ही आम मुक्त कण है। यह त्वचा की दोनों परतों में पाया जाता है और स्वस्थ फाइब्रोब्लास्ट (जो त्वचा बनाने वाली कोशिकाए हैं) के निर्माण में सहायक हैं। एस ओ डी शरीर में जिंक, तांबा और मेंगनीज की उपयोगिता बढ़ाते हैं। 

एस ओ डी उत्कृष्ट प्रति-ऑक्सीकारक और शोथ निवारक है, और मुक्त कणों के प्रभाव से बनने वाली झुर्रियों और त्वचा की जीर्णता को कम करता है। अनुसंधानकर्ता कहते हैं कि जैसे जैसे हम प्रौढ़ता की ओर अग्रसर होते हैं शरीर में एस ओ डी की मात्रा कम होती जाती है। 


सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज उनमें विद्यमान धातुओं के आधार पर तीन वर्गों में बांटे गये हैं।


1- तांबा जिंक एस ओ डी जो कोशिका के साइटोप्लाज्म की सुरक्षा करते हैं।
2- मेंगनीज एस ओ डी जो माइटोकोन्ड्रिया की सुरक्षा करते हैं।
3- निकल एस ओ डी जो कोशिकाओं के बाहर रहते हैं।


एस ओ डी आर्थ्राइटिस, पुरुष ग्रंथि रोग, कैंसर, कोर्नियल अल्सर, जलने से हुए घावों, आइ बी एस और धूम्रपान, विकिरण और कैंसररोधी दवाओं के दुष्प्रभाओं के उपचार में सहायक हैं। इसकी क्रीम चेहरे की झुर्रियों, जलने से हुए घावों , त्वचा के घावों व गहरे दाग धब्बों आदि में बहुत उपयोगी है। यह हानिकारक यू वी किरणों से त्वचा की रक्षा करता हैं। 

गेहूँ के ज्वारे, ब्रोकॉली, पत्तागोभी, जौ की घास और हरे पत्तेवाली तरकारियां इसके प्रमुख स्रोत हैं। इसके इंजेक्शन, जीभ के नीचे रखने वाली तथा एंटेरिक कोटेड गोलियां और क्रीम उपलब्ध हैं। आमाशय में बनने वाले अम्ल इसे निष्क्रिय कर देते हैं, इसलिए इसे जीभ के नीचे रखने वाली या एंटेरिक कोटेड गोलियों के रूप में ही दिया जाता है।


म्यूको-पॉलीसेकराइड्स


म्यूको-पॉलीसेकराइड्स सामान्य और जटिल शर्कराओं का मिश्रण होता है जो शरीर के रख-रखाव के लिए महत्वपूर्ण है। शरीर की कोशिकाएं निरंतर क्षतिग्रस्त और नष्ट होती रहती हैं। कोशिकाओं के जीर्णोद्धार तथा नई कोशिकाओं के निर्माण कार्य भी साथ साथ चलता रहता है, जो जितना सुचारु और स्निग्धता से होता रहेगा हम उतना ही युवा व स्वस्थ बने रहेंगे। म्यूको-पॉलीसेकराइड्स खासतौर से हृदय और रक्त वाहिकाओं की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के रख-रखाव के काम को प्राथमिकता से करते हैं।


पी4डी1


P4D1 एक ग्लूको-प्रोटीन है। यह प्रति-ऑक्सीकारक की भांति कार्य करता है। इसके तीन मुख्य कार्य हैं।


क- यह डी एन ए और आर एन ए, जो शरीर निर्माण का मुख्य आधार हैं, के जीर्णोद्धार तथा नवीनीकरण को प्रोत्साहित करते है। ये कोशिकाओं की आयुवृद्धि और असामान्य विभाजन में अवरोध पैदा करते हैं। और इस तरह हमें अपकर्षक (डीजनरेटिव) बीमारियों से बचाते हैं। 



ख- यह शरीर में शोथ को कम करता है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह कोर्टिजोन से भी ज्यादा शक्तिशाली शोथ निवारक है। कई इन्फ्लेमेट्री रोगों जैसे आर्थ्राइटिस आदि के उपचार में गेहूँ के ज्वारे का रस अत्यंत प्रभावशाली है।


ग- यह कैंसर कोशिकाओं की भित्तियों को कमजोर बनाते हैं, ताकि रक्त के श्वेत कण कैंसर कोशिकाओं में सहजता से प्रवेश कर उन्हें नष्ट कर सकें।


क्लोरोफिल


गेहूँ के ज्वारे का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है क्लोरोफिल। यह क्लोरोप्लास्ट नामक विशेष प्रकार के कोषों में होता है। क्लोरोप्लास्ट सूर्यकिरणों की सहायता से पोषक तत्वों का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक डॉ. बर्शर क्लोरोफिल को “संकेन्द्रित सूर्यशक्ति” कहते हैं। वैसे तो हरे रंग की सभी वनस्पतियों में क्लोरोफिल होता है, किंतु गेहूँ के ज्वारे का क्लोरोफिल श्रेष्ट है, क्योंकि क्लोरोफिल के अलावा इनमें 100 अन्य पौष्टिक तत्व भी होते हैं। 


सभी जानते हैं कि मानव रक्त में हीमोग्लोबिन होता है। इस हीमोग्लोबिन में एक लाल रंग का द्रव्य होता है जिसे हीम कहते हैं। हीम और क्लोरोफिल की रासायनिक संरचना में बहुत समानता होती है। दोनों में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणुओं की संख्या तथा उनका विन्यास लगभग एक जैसा होता है। हीम और क्लोरोफिल की संरचना में केवल एक ही अंतर है, क्लोरोफिल के केन्द्र स्थान में मेग्नीशियम होता है, जबकि हीमोग्लोबिन के केन्द्र स्थान में लौहा होता है।



हमारा रक्त हल्का क्षारीय है और उसका हाइड्रोजन अणु गुणांक pH 7.4 है। ज्वारे का रस भी हल्का क्षारीय है और उसका pH भी 7.4 है। इसलिए ज्वारे का रस शीघ्रता से रक्त में अवशोषित हो जाता है और शरीर के उपयोग में आने लगता है।



गेहूँ के ज्वारे से मानव को संपूर्ण पोषण मिल जाता है। सावधानी पूर्वक चुनी हुई 23 किलो तरकारियों जितना पोषण 1 किलो गेहूँ के ज्वारे के रस से प्राप्त हो जाता है। सिर्फ ज्वारे का रस पीकर मानव पूरा जीवन बिता सकता है। 100 ग्राम ताजा रस में 90-100 मि.ग्राम क्लोरोफिल प्राप्त हो जाता है। 


क्लोरोफिल से हमें मेग्नीशियम प्राप्त होता है। हमारी प्रत्येक कोशिका में मेग्नीशियम सूक्ष्म मात्रा में होता है। परंतु यह शरीर के लिए है बहुत महत्वपूर्ण। संपूर्ण शरीर में लगभग 50 ग्राम मेग्नीशियम होता है। मेग्नीशियम हमारी अस्थियों के निर्माण के लिए आवश्यक खनिज है। यह नाड़ियों और मांसपेशियों को तनाव रहित अवस्था में रखता है। शरीर में कैल्शियम और विटामिन सी का संचालन, नाड़ियों और मांसपेशियों की उपयुक्त कार्यशीलता के लिये मैग्नेशियम आवश्यक है। कैल्शियम-मैग्नेशियम सन्तुलन में गड़बड़ी आने से स्नायु-तंत्र दुर्बल हो सकता है। मैग्नेशियम शरीर के भीतर लगभग तीन सौ ऍन्जाइम्स की सक्रियता के लिए आवश्यक है। मैग्नेशियम के निम्न स्तरों और उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह में स्पष्ट अंतर्संबंध स्थापित हो चुका है। व्यायाम एवं शारीरिक मेहनत करने वाले लोगों को मैग्नेशियम सम्पूरकों की आवश्यकता है। मैग्नेशियम की कमी से महिलाओं में कई समस्याएं दिखाई देती हैं, जैसे पाँवों की मांसपेशियाँ कमजोर होना (जिससे रेस्टलेस लेग सिंड्रोम होता है), पाँवों में बिवाइयां फटना, पेट की गड़बड़ी, एकाग्रता में कमी,


रजोनिवृत्ति संबंधी समस्याओं का बढ़ना, मासिक-धर्म पूर्व के तनाव में वृद्धि आदि।


क्लोरोफिल से लाभ


क्लोरोफिल हमें तीन प्रकार से लाभ देता है।


1- शोधन – घावों के लिए क्लोरोफिल अत्यंत प्रबल कीटाणुनाशक है। यह फंगसरोधी भी है और शरीर से टॉक्सिन्स को विसर्जन करता है। । यह कई रोग पैदा करने वाले जीवाणु को नष्ट करता है और उनके विकास को बाधित करता है। यकृत का शोधन करता है।


2- एंटी-इन्फ्लेमेट्री – यह शरीर में इन्फ्लेमेशन को कम करता हैं। अतः आर्थ्राइटिस, आमाशय शोथ, आंत्र शोथ, गले की ख़राश आदि में अत्यंत लाभदायक हैं।


3- पोषण – यह रक्त बनाता है, आंतों के लाभप्रद कीटाणुओं को भी पोषण देते हैं।


गेहूँ के ज्वारों के रस के औषधीय उपयोग


1- कैंसर गेहूँ के ज्वारे कैंसर पर कैसे असर दिखाते है???


ऑक्सीजन को अनुसंधानकर्ता कैंसर कोशिकाओं को नेस्तनाबूत करने वाली 7.62x39 मि.मी. केलीबर की वो गोली मानते हैं, जो गेहूँ के ज्वारे रूपी ए.के. 47 बंदूक से निकल कर कैंसर कोशिकाओं को चुन-चुन कर मारती है। सर्व प्रथम तो इसमें भरपूर क्लोरोफिल होता है, जो शरीर को ऑक्सीजन से सराबोर कर देता है। क्लोरोफिल शरीर में हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है, मतलब कैंसर कोशिकाओं को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है और ऑक्सीजन की उपस्थिति में कैंसर का दम घुटने कगता है।


गेहूँ का ज्वारों में विटामिन बी-17 या लेट्रियल और सेलेनियम दोनों होते हैं। ये दोनों ही शक्तिशाली कैंसररोधी है। क्लोरोफिल और सेलेनियम शरीर की रक्षा प्रणाली को शक्तिशाली बनाते हैं। गेहूँ का ज्वारा भी रक्त के समान हल्का क्षारीय द्रव्य है। कैंसर अम्लीय माध्यम में ही फलता फूलता है।



गेहूँ का ज्वारा में विटा-12 को मिला कर 13 विटामिन, कई खनिज जैसे सेलेनियम और 20 अमाइनो एसिड्स होते है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट किण्वक सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज और अन्य 30 किण्वक भी होते हैं। एस ओ डी सबसे खतरनाक फ्री-रेडिकल रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पिसीज को हाइड्रोजन परऑक्साइड (जिसमें कैंसर कोशिका का सफाया करने के लिए एक अतिरिक्त ऑक्सीजन का अणु होता है) और ऑक्सीजन के अणु में बदल देता है। 



सन् 1938 में महान अनुसंधानकर्ता डॉ. पॉल गेरहार्ड सीजर, एम.डी. ने बताया था कि कैंसर का वास्तविक कारण श्वसन क्रिया में सहायक एंजाइम साइटोक्रोम ऑक्सीडेज का नष्ट होना है। सरल शब्दों में जब कोशिका में ऑक्सीजन उपलब्ध न हो या सामान्य श्वसन क्रिया बाधित हो जाये तभी कैंसर जन्म लेता है।



ज्वारों में एक हार्मोन एब्सीसिक एसिड (ए बी ए) होता है जो हमें अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। डॉ. लिविंग्स्टन व्हीलर के अनुसार एब्सीसिक एसिड कोरियोनिक गोनेडोट्रोपिन हार्मोन को निष्क्रिय करता है और वे ए बी ए को कैंसर उपचार का महत्वपूर्ण पूरक तत्व मानती थी। डॉ. लिविंग्स्टन ने पता लगाया था कि कैंसर कोशिका कोरियोनिक गोनेडोट्रोपिन से मिलता जुलता हार्मोन बनाती हैं। उन्होंने यह भी पता लगाया था कि गेहूँ के ज्वारे को काटने के 4 घंटे बाद उसमें ए बी ए की मात्रा 40 गुना ज्यादा होती है। अतः उनके मतानुसार ज्वारे के रस को थोड़ा सा तुरंत और बचा हुआ 4 घंटे बाद पीना चाहिये। 

2- गेहूँ के ज्वारे में अन्य हरी तरकारियों की तरह भरपूर ऑक्सीजन होती है। मस्तिष्क और संपूर्ण शरीर ऊर्जावान तथा स्वस्थ रखने के लिए भरपूर ऑक्सीजन आवश्यक है।


3- डॉ. बरनार्ड जेन्सन के अनुसार गेहूँ के ज्वारे का रस कुछ ही मिनटों में पच जाता है और इसके पाचन में बहुत कम ऊर्जा खर्च होती है।


4- यह कीटाणुरोधी हैं, उन्हें नष्ट करता है और उनके विकास को बाधित करता है।


5- यह शरीर से हानिकारक पदार्थों (टॉक्सिन्स), भारी धातुओं और शरीर में जमा दवाओं के अवशेष का विसर्जन करता है।


6- यदि इसका सेवन 7-8 महीने तक किया जाये तो यह मुहाँसों और उनसे बने दाग, धब्बे और झाइयां सब साफ हो जाते हैं।


7- यह त्वचा के लिए प्राकृतिक साबुन का कार्य करता हैं और शरीर को दुर्गंध रहित रखता है।


8- यह दांतों को सड़न से बचाते है।


9- यदि 5 मिनिट तक गेहूँ के ज्वारे का रस मुंह में तो दांत का दर्द ठीक करता है।


10- इसके गरारे करने से गले की खारिश ठीक हो जाती है।


11- गेहूँ के ज्वारे का रस नियमित पीने से एग्जीमा और सोरायसिस भी ठीक हो जाते हैं।


12- ज्वारे का रस पीने से बाल समय से पहले सफेद नहीं होते हैं।


13- ज्वारे का रस पीने से शरीर स्वस्थ, ऊर्जावान, सहनशील, आध्यात्मिक और प्रसन्नचित्त बना रहता है।


14- यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है।


15- यह समस्त रक्त संबन्धी रोगों के लिए रामबाण औषधि है।


16- ज्वारे का रस का एनीमा लेने से आंतों और पेट के अंगों का शोधन होता है।


17- यह कब्जी ठीक करता है।


18- यह उच्च रक्तचाप कम करता है और केशिकाओं ( Fine blood vessels or capillaries) का विस्तारण करता है।


19- यह स्थूलता या मोटापा कम करता है क्यों कि यह भूख कम करता है, बुनियादी चयापचय दर और शरीर में रक्त के संचार को बढ़ाता है।


घर पर गेहूँ के ज्वारे उगाने की विधि


घर पर गेहूँ के ज्वारे बनाना के लिए इन चीजों की आवश्यकता होगी।


आवश्यक सामान


1-अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के बीज।


2-अच्छी उपजाऊ मिट्टी और उम्दा जैविक या गोबर की खाद।


3-मिट्टी के 10-12” व्यास के 3-4” गहरे सात गोलाकार गमले जिसमें भी नीचे छेद हों। आप अच्छे प्लास्टिक की 20”x10”x2” नाप की गार्डनिंग ट्रे, जिसमें नीचे कुछ छेद हो, भी ले सकते है। गेहूँ भिगोने के लिए कोई पात्र या जग।


4-मिक्सी या ज्यूसर।


5-पानी देने के लिए स्प्रे-बोटल या पौधों को पानी पिलाने वाला झारा व कैंची।


विधि


1- हमेशा जैविक बीज ही काम में लें, ताकि आपको हमेशा मधुर व उत्कृष्ट रस प्राप्त हो जो विटामिन और खनिज से भरपूर हो । रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक जग में भिगो कर रख दें।


2- सभी गमलों के छेद को एक पतले पत्थर के टुकड़े से ढक दें। अब मिट्टी और खाद को अच्छी तरह मिलाएं। गमलों में मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और पानी छिड़क दें। ध्यान रहे मिट्टी में रासायनिक खाद या कीटनाषक के अवशेष न हों और हमेशा जैविक खाद का ही उपयोग करें। पहले गमले पर रविवार, दूसरे गमले पर सोमवार, इस प्रकार सातों गमलो पर सातों दिनों के नाम लिख दें। 



3- अगले दिन गेहुंओं को धोकर निथार लें। मानलो आज रविवार है तो उस गमले में, जिस पर आपने रविवार लिखा था, गेहूँ एक परत के रूप में बिछा दें। गेहुंओं के ऊपर थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से सींच दें। गमले को किसी छायादार स्थान जैसे बरामदे या खिड़की के पास रख दें, जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता हो पर धूप की सीधी किरणे गमलों पर नहीं पड़ती हो। अगले दिन सोमवार वाले गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज एक गमले में गेहूँ बोते रहें। 



4- गमलों में रोजाना कम से कम दो बार पानी दें ताकि मिट्टी नम और हल्की गीली बनी रहे। शुरू के दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से भी ढक सकते हैं। जब गैहूँ के ज्वारे एक इंच से बड़े हो जाये तो एक बार ही पानी देना प्रयाप्त रहता है। पानी देने के लिए स्प्रे बोटल का प्रयोग करे। गर्मी के मौसम में ज्यादा पानी की आवश्यकता रहती है। पर हमेशा ध्यान रखे कि मिट्टी नम और गीली बनी रहे और पानी की मात्रा ज्यादा भी न हो। 



5- सात दिन बाद 5-6 पत्तियों वाला 6-8 इन्च लम्बा ज्वारा निकल आयेगा। इस ज्वारे को जड़ सहित उखाड़ ले और पानी से अच्छी तरह धो लीजिए। इस तरह आप रोज एक गमले से ज्वारे तोड़ते जाइये और रोज एक गमले में ज्वारे बोते भी जाइये ताकि आपको निरन्तर ज्वारे मिलते रहे। 




6- अब धुले हुए ज्वारों की जड़ काट कर अलग कर दें तथा मिक्सी के छोटे जार में थोड़ा पानी डालकर पीस लें और चलनी से गिलास में छानकर प्रयोग करे। ज्वारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा पर निखार लाने के लिए मल सकते हैं। आप हाथ से घुमाने वाले ज्यूसर से भी ज्यूस निकाल सकते हैं।

सेवन का तरीका


ज्वारे का रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन या प्रति दूसरे दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये। यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं। इसे आप सप्ताह में 5 दिन सेवन करें। कुछ लोगों को शुरू में रस पीने से उबकाई सी आती है, तो कम मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें। ज्वारे के रस में फलों और सब्जियों के रस जैसे सेब फल, अन्नानास आदि के रस को मिलाया जा सकता है। हां इसे कभी भी खट्टे रसों जैसे नीबू, संतरा आदि के रस में नहीं मिलाएं क्योंकि खटाई ज्वारे के रस में विद्यमान एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी या कोई अन्य मसाला भी नहीं मिलाना चाहिये। ज्वारे के रस की 120 एम एल मात्रा बड़ी उपयुक्त मात्रा है और एक सप्ताह में इसके परिणाम दिखने लगते हैं। डॉ. एन विग्मोर ज्वारे के रस के साथ अपक्व आहार लेने की सलाह भी देती थी।


गेहूँ के ज्वारे चबाने से गले की खारिश और मुंह की दुर्गंध दूर होती है। इसके रस के गरारे करने से दांत और मसूड़ों के इन्फेक्शन में लाभ मिलता है। स्त्रियों को ज्वारे के रस का डूश लेने से मूत्राशय और योनि के इन्फेक्शन, दुर्गंध और खुजली में भी आराम मिलता है। त्वचा पर ज्वारे का रस लगाने से त्वचा का ढीलापन कम होता है और त्वचा में चमक आती है। 

सारांश
अन्त में मैं यही कहना चाहूँगा कि गेहूँ के ज्वारे में सूर्य की असीम ऊर्जा समायी हुई है, कई लोग इसे “तरल सूर्यप्रकाश” भी कहते हैं। यह ईश्वर की दी हुई एक विशेष नियामत है, उत्कृष्ट रक्त-शोधक है और कैंसर जैसी जान लेवा बीमारी के उपचार में बहुत ही महत्वपूर्ण है।

Modern Ice Cream is a Chemical Bomb???



क्री शब्द सुनते ही सबके मुंह में पानी आ जाता है। पल भर में विद्युत धारा की तरह एक ठंडा मीठा अहसास पूरे शरीर में प्रवाहित हो जाता है और मन प्रसन्न हो जाता है। शादी हो या जन्म दिन का समारोह हो,  आइसक्रीम के बिना सब अधूरा ही माना जाता है। ऐसे प्रीतिभोजों में सबसे ज्यादा भीड़ आइसक्रीम की स्टॉल्स पर ही दिखाई देती है। आइसक्रीम विटामिन व केलशियम से भरपूर सबका पसंदीदा, शीतल और स्वास्थ्यप्रद व्यंजन है जो ताजा दूध, मक्खन, अंडे, फलों और सूखे मेवों तैयार किया जाता है।  आइसक्रीम बनाने वाले बड़े-बड़े संस्थान भिन्न भिन्न रंगों और फ्लेवर में अनेक प्रकार की आइसक्रीम बनाते हैं, लुभावनी पैकिंग में बेचते हैं और विज्ञापनों पर खूब पैसा बहाते हैं ।  परंतु क्या ये लोग सचमुच ताज़ा दूध, मक्खन, फलों,  आदि से ही आइसक्रीम बनाते हैं??? कदापि नहीं । कदापि नहीं ? यथार्थ आप सुन नहीं पायेंगे।  

सभी बड़ी ब्रांड्स आइसक्रीम बनाने के लिए शरीर के लिए घातक ट्रांसफैट युक्त हाइड्रोजिनेटेड वनस्पति घी (साधारण भाषा में कहें तो डालडा), मक्खन रहित दूध का पाऊडर, हाई फ्रक्टोज कोर्न सिरप, कृत्रिम मिठास या एस्पार्टेम और विषैले एडीटिव्ज जैसे कार्बोक्सीमिथाइल सेल्यूलोज, ब्यूटिरेल्डीहाइड, एमाइल एसीटेट आदि को इस्तेमाल करते हैं। अंडे की जगह सस्ता रसायन डाईइथाइल ग्लाइकोल प्रयोग किया जाता है, जिसका प्रमुख उपयोग रंग रोगन साफ करना हैं। आइसक्रीम का आकार बड़ा करने और ज्यादा मुनाफा कमाने हेतु हवा भी मिला दी जाती है, हालांकि यह हवा हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाती है।

चैरी आइसक्रीम बनाने के लिए एल्डीहाइड सी-17 नामक खतरनाक विष का इस्तेमाल किया जाता है,  जो एक ज्वलनशील रसायन है और रंग रोगन, प्लास्टिक तथा रबड़ बनाने के काम में आता है। आपकी सबसे पसंदीदा वनीला आइसक्रीम पिपरोनाल नामक जुएं मारने की दवा से तैयार होती है।

चमड़ा और कपड़ा साफ करने का रसायन इथाइल एसीटेट आपकी आइसक्रीम को अन्नानास का फ्लेवर देता है। इथाइल एसीटेट हृदय, यकृत और फैफड़े के लिए बहुत हानिकारक है। 
यह सब जानने के बाद भी  क्या आप विभिन्न रसायनो से तैयार हुए इस व्यंजन को आइसक्रीम कहेंगे??? इसे तो केमीकल ट्रीट, केमीकल शॉप, आइसकेम, आइसस्केम या केमीकल बम कहना ही उचित होगा। गृहणियों क्या यह सब जानने के बाद भी आप  अपने प्राणों से प्यारे पति और बच्चों को  बाजार की आइसक्रीम खिलाना पसंद करोगी??? कभी नहीं ना।  क्या इसका कोई समाधान है??? जी हां बिलकुल है और वह है कि पूरा भारत बाजार की आइसक्रीम का पुरजोर तरीके से बहिष्कार करे। और आप ओमेगा-3 से भरपूर और बनाने में आसान अलसी की अच्छी और स्वास्थ्यप्रद फ्लेक्सक्रीम घर पर बनाएं। देखियेगा आपके बच्चे और पतिदेव भी फ्लेक्सक्रीम बनाने में आपकी मदद करेंगे। मेरा दावा है यह इतनी क्रीमी और स्वादिष्ट बनेगी कि आप बाहर की आइसक्रीम हमेशा के लिए भूल जायेगे। 

तो आइये डॉ. उषा वर्मा द्वारा तैयार की हुई विधि से फ्लेक्सक्रीम  घर पर  बनाइये  और  इस तपती गरमी में अपने बच्चों तथा पति को स्वास्थ्यप्रद और स्वादिष्ट फ्लेक्सक्रीम से ठंडक पहुंचाइये।
Coco flaxcream
सामग्री:-
1. कंडेंस्ड मिल्क एक टिन 400 ग्राम 2. ताजा बारीक पिसी अलसी 100 ग्राम 3. दूध 1 लीटर  4. अलसी के अंकुरित या किशमिश चौथाई कप 5. बारीक कटी बादाम 25 ग्राम 6. वनीला एक छोटी चम्मच 7. चीनी स्वादानुसार 8. कोको पावडर 50 ग्राम

आइसक्रीम बनाने कीविधिः-
सबसे पहले दूध गर्म कीजिये। थोड़े से दूध (लगभग 100-50 ग्राम) में अलसी के पावडर को अच्छी तरह मिला कर एक तरफ रख दें। फिर दूध को धीमी-धीमी आंच पर 15-20 मिनट तक उबाल कर ठंडा होने के लिए रख दें। ठंडा होने पर दूध, चीनी, कंडेंस्ड मिल्क और अलसी के मिश्रण को बिजली से चलने वाले हैंड ब्लेंडर से अच्छी तरह फैंटे। मेवे, वनीला मिला कर फ्रीजिंग ट्रे में रख कर जमने के लिए डीप फ्रीजर में रख दें। चाहें तो आधी जमने पर फ्रीजिंग ट्रे को बाहर निकाल कर एक बार और अच्छी तरह फैंट कर डीप फ्रीजर रख दें। अगले दिन सुबह आपकी स्वास्थ्यप्रद, प्रिजर्वेटिव, रंगों व घातक रसायन मुक्त आइसक्रीम तैयार है।

Mango flaxcream
सामग्रीः- 1. कडेंस्ड मिल्क एक टिन 400 ग्राम 2. ताजा बारीक पिसी अलसी 50 ग्राम 3. दूध एक लीटर        4. आम दो किलो  5.  मेवे आधा कप  6. अलसी का तेल 100 ग्राम (अलसी का तेल न मिले तो बटर का प्रयोग कर लें)  7. चीनी स्वादानुसार।

विधिः- पहले थोड़े से दूध में अलसी के पाउडर को मिला कर एक ओर रख दें। फिर बचे हुए दूध को धीमी ऑच पर 15-20 मिनट तक ओंटा कर ठंड़ा होने रख दें। आम काट कर छिलका तथा गुठली अलग करलें और आम के टुकड़े  एक प्लेट में रख लें। अब सारी सामग्री बिजली से चलने वाले हैंड ब्लैडर से अच्छी तरह फेंट लें। मिश्रण को फ्रीजिंग ट्रे में रख कर फ्रिज में जमने के लिए रखदें। अगले दिन आम के कटे हुए टुकड़ो से सजाकर आम की फ्लेक्सक्रीम सर्व करें।
Rose flaxcream
सामग्रीः- 1. कंडेंस्ड मिल्क 1 टिन       2. ताजा बारीक पिसी अलसी 100 ग्राम         3. दूध एक लीटर        4. गुलाब का गुलकन्द – 2 बड़े चम्मच             5. मेवे आधा कप  6. रूह आफजा आधा ग्लास         7. चीनी स्वादानुसार.

विधिः- पहले थोड़े से दूध में अलसी के पाउडर को मिला कर एक ओर रख दें। फिर बचे हुए दूध को धीमी ऑच पर 15-20 मिनट तक ओटा कर ठंड़ा होने रख दें। अब सारी सामग्री बिजली से चलने वाले हैंड ब्लैडर से अच्छी तरह फेंट लें। मिश्रण को फ्रीजिंग ट्रे में रख कर फ्रिज में जमने के लिए रख दें। जमने पर ऊपर से थोड़ा रूह आफजा डालकर सर्व करें।

Thursday, July 22, 2010

Samit Personal Trainer in Bangalore




Samit Consults in Bangalore and is an expert in Budwigs diet. He focuses on Budwigs Protocol clubbed with spiritual awareness and uses techniques of yoga and mediation. Blending of Budwig diet, yoga and mediations has given excellent results for treatment of complex diseases like autoimmune and cancer and provide a balance of body, mind and soul.



His number is + 919886155404
    

Friday, July 16, 2010

Flax Key of Diabetes Management



पिछले कुछ दशकों में भारत समेत पूरे विश्व में डायबिटीज टाइप-2 के रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है व अब तो यह किशोरों और बच्चों को भी अपना शिकार बना रही है। डायबिटीज एक महामारी का रुप ले चुकी है। आइये हम जानने की कोशिश करते हैं कि पिछले कुछ दशकों में हमारे खान-पान, जीवनचर्या या वातावरण में ऐसा क्या बदलाव आया है। शोधकर्ताओं के अनुसार जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं।



पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।

अलसी के तेल का अदभुत संरचना और  ॐ खंड  की क्वांटम भौतिकीः

अलसी के तेल में अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ए.एल.ए.) नामक ओमेगा-3 वसा अम्ल होता है। डा. बुडविज ने ए.एल.ए. और एल.ए. वसा अम्लों की अदभुत



संरचना का गूढ़ अध्ययन किया था। ए.एल.ए. में 18 कार्बन के परमाणुओं की लड़ी या श्रृंखला होती है जिसके एक सिरे से , जिसे ओमेगा एण्ड कहते हैं, मिथाइल (CH3) ग्रुप जुड़ा रहता है और दूसरे से जिसे डेल्टा एण्ड कहते हैं, कार्बोक्सिल (COOH) ग्रुप जुड़ा रहता है। ए.एल.ए. में तीन द्वि बंध क्रमशः तीसरे, छठे और नवें कार्बन परमाणु के बाद होते हैं। चुंकि ए.एल.ए. में पहला द्वि बंध तीसरे और एल.ए. में पहला द्वि बंध छठे कार्बन के बाद होता है इसीलिए इनको क्रमशः ओमेगा-3 और ओमेगा-6 वसा अम्ल कहते हैं। ए.एल.ए. और एल.ए. हमारे शरीर में नहीं बनते, इसलिए इनको “आवश्यक वसा अम्ल” कहते हैं तथा इनको भोजन के माध्यम से लेना आवश्यक है। आवश्यक वसा अम्लों की कार्बन लड़ी में जहां द्वि-बंध बनता है और दो हाइड्रोजन अलग होते हैं, उस स्थान पर इलेक्ट्रोनों का बादलनुमा समुह, जिसे पाई-इलेक्ट्रोन भी कहते हैं, बन जाता हैं और इस जगह ए.एल.ए. की लड़ मुड़ जाती है।

इलेक्ट्रोन के इस बादल में अपार विद्युत आवेश रहता है जो सूर्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड से आने वाले प्रकाश की किरणों के सबसे छोटे घटक फोटोन (जो असिमित, गतिशील, अनंत, जीवन शक्ति से भरपूर व ऊर्जावान हैं और अपना रंग, प्रकृति और आवृत्ति बदल सकते हैं) को आकर्षित करते हैं। ये फोटोन सूर्य से निकल कर, जो 9.3 अरब मील दूर हैं, असीम ऊर्जा लेकर, जीवन की आस लेकर, प्यार की बहार लेकर, खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, अपनी लय, ताल व आवृत्ति बदल कर इलेक्ट्रोन, जो अपने कक्ष में निश्चत आवृत्ति पर सदैव गतिशील रहते हैं, की ओर आकर्षित होते हैं, साथ मिल कर नृत्य करते हैं और तब पूरा कक्ष समान आवृत्ति में दिव्य गुंजन करता है और असीम सौर ऊर्जा का प्रवाह होता है। यही है जीवन का अलसी फलसफा, प्रेम का उत्सव, यही है प्रकृति का संगीत। यही है फोटोन रूपी सूर्य और इलेक्ट्रोन रूपी चंद्र का परलौकिक गंधर्व विवाह, यही है शिव और पार्वती का तांण्डव नृत्य, यही है विष्णु और लक्ष्मी की रति क्रीड़ा, यही है कृष्ण और राधा का अंनत, असीम प्रेम।

पाई-इलेक्ट्रोन कोशिकाओं में भरपूर ऑक्सीजन को भी आकर्षित करते हैं। ए.एल.ए कोशिकाओं की भित्तियों को लचीला बनाते हैं जिससे इन्सुलिन का बड़ा अणु आसानी से कोशिका में प्रवेश कर जाता है। ये पाई-इलेक्ट्रोन ऊर्जा का संग्रहण करते हैं और एक केपेसिटर की तरह काम करते हैं। यही जीवन शक्ति है जो हमारे पूरे शरीर विशेष तौर पर मस्तिष्क, आँखों, मांसपेशियों और स्नायु तंत्र की कोशिकाओं में भरपूर ऊर्जा भरती है। डायबिटीज के रोगी को ऐसे ऊर्जावान इलेक्ट्रोन युक्त अलसी के 30 एम.एल. तेल और 80-100 एम.एल. दही या पनीर को विद्युत चालित हाथ से पकड़ने वाली मथनी द्वारा अच्छी तरह फेंट कर फलों और मेवों से सजा कर नाश्ते में लेना चाहिये। इसे एक बार लंच में भी ले सकते हैं। जिस तरह ॐ में सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है ठीक उसी प्रकार अलसी के तेल में संम्पूर्ण ब्रह्मांड की जीवन शक्ति समायी हुई है। इसीलिए अलसी और दही, पनीर के इस व्यंजन को हम “ॐ खंड” कहते हैं। अलसी का तेल शीतल विधि द्वारा निकाला हुआ फ्रीज में संरक्षित किया हुआ ही काम में लेना चाहिए। इसे गर्म नहीं करना चाहिये और हवा व प्रकाश से बचाना चाहिये ताकि यह खराब न हो। 42 डिग्री सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है।

अलसी की फाइबर युक्त स्वास्थयप्रद रोटीः

अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है व डायबिटीज से शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती है। डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो) 50 प्रतिशत कार्ब, 16 प्रतिशत प्रोटीन व 20 प्रतिशत फाइबर होते हैं यानी इसका ग्लायसीमिक इन्डेक्स गैहूं के आटे से काफी कम होता है। जबकी गैहूं के आटे में 72 प्रतिशत कार्ब, 12.5 प्रतिशत प्रोटीन व 12 प्रतिशत फाइबर होते हैं। डायबिटीज पीडित के लिए इस मिश्रित आटे की रोटी सर्वोत्तम मानी गई है।



डायबिटीज के रोगी को रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स जैसे आलू, सफेद चावल, मेदा, चीनी और खुले हुए या पैकेट बंद सभी खाद्य पदार्थ, जंक फूड, फास्ट फूड, सोफ्ट ड्रिंक आदि का सेवन कतई नहीं करना चाहिये। रोज 4 से 6 बार परन्तु थोड़ा-थोड़ा भोजन करना चाहिये। सांयकालीन भोजन सोने के 4-5 घण्टे पहले ग्रहण करना चाहिये। प्याज, लहसुन, गोभी, टमाटर, पत्तागोभी, मेथी, भिण्डी, पालक, बैंगन, लौकी, ऑवला, गाजर, नीबू आदि हरी सब्जीयां भरपूर खानी चाहिये। फलों में जामुन, सेब, संतरा, अंगूर, पपीता, आम, केला आदि सभी फल खाने चाहिये। खाद्यान्न व दालें भी छिलके समेत खाएं। छिलकों में फाइबर व महत्वपूर्ण विटामिन होते हैं। अंकुरित दालों का सेवन अवश्य करें। रोज सुबह एक घण्टा व शांम को आधा घण्टा पैदल चलना चाहिये। सुबह कुछ समय प्राणायाम, योग व व्यायाम करना चाहिये। रोजाना चुटकी भर पिसी हुई दालचीनी सब्जी या चाय में मिला कर लेना चाहिये।

सर्व विदित है कि क्रोमियम और अल्फा-लाइपोइक एसिड शर्करा के चयापचय में सहायक हैं अतः डाटबिटीज के रोगी को रोज 200 माइक्रोग्राम क्रोमियम और 100 माइक्रोग्राम अल्फा-लाइपोइक एसिड लेना ही चाहिये। अधिकतर एंटीऑक्सीडेंट केप्स्यूल में ये दोनो तत्व होते हैं। मेथीदाना, करेला, जामुन के बीज, आंवला, नीम के पत्ते, घृतकुमारी (गंवार पाठा) आदि का सेवन करें। एक कप कलौंजी के बीज, एक कप राई, आधा कप अनार के छिलके और आधा कप पितपाप्र को पीस कर चूर्ण बना लें। आधी छोटी चम्मच कलौंजी के तेल के साथ रोज नाश्ते के पहले एक महीने तक लें।

डायबिटीज के दुष्प्रभावों में अलसी का महत्वः-

हृदय रोग एवं उच्च रक्तचापः-



डायबिटीज के रोगी को उच्च रक्तचाप, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हार्ट अटेक आदि की प्रबल संभावना रहती हैं। अलसी हमारे रक्तचाप को संतुलित रखती हैं। अलसी हमारे रक्त में अच्छे कॉलेस्ट्राल (HDL Cholesterol) की मात्रा को बढ़ाती है और ट्राइग्लीसराइड्स व खराब कोलेस्ट्रोल (LDL Cholesterol) की मात्रा को कम करती है। अलसी दिल की धमनियों में खून के थक्के बनने से रोकती है और हृदयाघात से बचाव करती हैं। हृदय की गति को नियंत्रित कर वेन्ट्रीकुलर एरिद्मिया से होने वाली मृत्यु दर को बहुत कम करती है।

नैत्र रोगः-

डायबिटीज के दुष्प्रभावों के कारण आँखों के दृष्टि पटल की रक्त वाहिनियों में कहीं-कहीं हल्का रक्त स्राव और रुई जैसे सफेद धब्बे बन जाते हैं। इसे रेटीनोपेथी कहते हैं जिसके कारण आँखों की ज्योति धीरे-धीरे कम होने लगती है। दृष्टि में धुंधलापन आ जाता है। अंतिम अवस्था में रोगी अंधा तक हो जाता है। अलसी इसके बचाव में बहुत लाभकारी पाई गई है। डायबिटीज के रोगी को मोतियाबिन्द और काला पानी होने की संभावना ज्यादा रहती है। ऑखों में रोजाना एक बूंद अलसी का तेल डालने से हम इन तकलीफों से बच सकते हैं। इससे नजर अच्छी हो जाती हैं, रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं तथा धीरे-धीरे चश्मे का नम्बर भी कम हो सकता है।

वृक्क रोगः-



डायबिटीज का बुरा असर गुर्दों पर भी पड़ता है। गुर्दों में डायबीटिक नेफ्रोपेथी नामक रोग हो जाता है, जिसकी आरंम्भिक अवस्था में प्रोटीन युक्त मूत्र आने लगता है, बाद में गुर्दे कमजोर होने लगते हैं और अंत में गुर्दे नाकाम हो जाते हैं। फिर जीने के लिए डायलेसिस व गुर्दा प्रत्यारोपण के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता हैं। अलसी गुर्दे के उत्तकों को नयी ऊर्जा देती है। शिलाजीत भी गुर्दे का कायाकल्प करती है, डायबिटीज के दुष्प्रभावों से गुर्दे की रक्षा करती है व रक्त में शर्करा की मात्रा कम करती है। डायबिटीज के रोगी को शिलाजीत भी लेना ही चाहिये।

पैरः-

डायबिटीज के कारण पैरों में रक्त का संचार कम हो जाता है व पैरों में एसे घाव हो जाते हैं जो आसानी से ठीक नहीं होते। इससे कई बार गेंग्रीन बन जाती है और इलाज हेतु पैर कटवानाक पड़ जाता हैं। इसी लिए डायबिटीज पीड़ितों को चेहरे से ज्यादा अपने पैरों की देखभाल करने की सलाह दी जाती है। पैरों की नियमित देखभाल, अलसी के तेल की मालिश व अलसी खाने से पैरों में रक्त का प्रवाह बढ़ता हैं, पैर के घाव व फोड़े आदि ठीक होते हैं। पैर व नाखुन नम, मुलायम व सुन्दर हो जाते हैं।


अंतिम दो शब्दः-


डायबिटीज में कोशिका स्तर पर मुख्य विकृति इन्फ्लेमेशन या शोथ हैं। जब हम स्वस्थ आहार-विहार अपना लेते हैं और अलसी सेवन करते हैं तो हमें पर्याप्त ओमेगा-3 ए.एल.ए. मिलता हैं और हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल का अनुपात सामान्य हो जाता है व डायबिटीज का नियंत्रण आसान हो जाता है और इंसुलिन या दवाओं की मात्रा कम होने लगती है।

अंत में डायबिटीज़ के रोगी के लिए मुख्य निर्देशों को क्रमबद्ध कर देता हूँ।


1) आपको परिष्कृत शर्करा जैसे आलू, सफेद चावल, मेदा, चीनी और खुले हुए या पेकेट बंद खाद्य पदार्थ जैसे ब्रेड, केक, पास्ता, मेगी, नूडल्स, बिस्कुट, अकंलचिप्स, कुरकुरे, पेप्सी, लिमका, कोकाकोला, फैंटा, फ्रूटी, पिज्जा, बर्गर, पेटीज, समोसा, कचोरी, भटूरा, नमकीन, सेव आदि का सेवन नहीं करना है। उपरोक्त सभी खाद्य पदार्थ मैदा व ट्रांसफैट युक्त खराब रिफाइंड तेलों से बनते हैं। तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म किया जाता हैं जिससे उसमें अत्यंत हानिकारक कैंसर पैदा करने वाले रसायन जैसे एच.एन.ई. बन जाते हैं।

2) आपको खराब फैट जैसे परिष्कृत या रिफाइंड तेल जिसे बनाते वक्त 400 सेल्सियम तक गर्म किया जाता है व अत्यंत हानिकारक रसायन पदार्थ जैसे हैक्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि-आदि मिलाये जाते हैं, का सेवन कतई नहीं करना है। आपको अच्छे वसा जैसे घाणी का निकला नारियल (हालांकि अमरीकी संस्था FDA ने अभी तक नारियल के तेल को सर्वश्रेष्ठ खाद्य तेल का दर्जा नहीं दिया है) , तिल या सरसों का तेल ही काम में लेना है। नारियल का तेल खाने के लिये सर्वोत्तम होता है, यह आपको दिल की बीमारियों से बचायेगा व आपके वज़न को भी कम करेगा।

3) यदि ठंडी विधि से निकला, फ्रीज में संरक्षित किया हुआ अलसी का तेल उपलब्ध हो जाये तो रोजाना दो चम्मच तेल को चार चम्मच दही या पनीर में हेंड ब्लेंडर से अच्छी तरह मिश्रण बना कर फलों या सलाद के साथ लें। अलसी का तेल हमेशा फ्रीज में रखें। 42 सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है। यदि शुद्ध मिल सकता है तो आप थोड़ा घी या बटर भी काम में ले सकते हैं। हो सके तो आप सब्जियों को पानी में पकाये व बाद में तेल डालें। तली हुई चीजें कम से कम खायें।

4) रोजाना 30-60 ग्राम अलसी का सेवन करें। इसे ताज़ा पीस कर ही काम में लें। अलसी पीस कर रखने से खराब हो जाती है। डायबिटीज़ के रोगी को दोनों समय की रोटी के आटे में अलसी मिलानी चाहिए। आटा मिश्रित अन्नों जैसे गेहूँ, बाजरा, जौ, ज्वार, चना और कूटू को बराबर मात्रा में मिलाकर पिसवायें।

5) आप रोज 4 से 6 बार भोजन ले परंतु बहुत थोड़ा-थोड़ा। रात को सोने के 4-5 घण्टे पहले हल्का डिनर ले लें। आपको भोजन में सभी फल व सब्जियों का समावेश होना चाहिये। प्याज, लहसुन, गोभी, टमाटर, गोभी, पत्तागोभी, मेथी, भिण्डी, मूली, पालक, बैंगन, लौकी, ऑवला, गाजर, चुकंदर, नींबू आदि सभी हरी सब्जियां खूब खाएं। फलों में जामुन, सेब, संतरा, अंगूर, पपीता, चीकू, आम, केला आदि सभी फल खाएं। फलों का रस निकालकर नहीं बल्कि पूरा छिलके समेत फल खूब चबाकर खाए। अधिकतर कैंसर के रोगी यह समझते हैं कि उन्हें मीठे फल नहीं खाने चाहिये। जबकि दुनिया की कोई भी चिकित्सा पद्धति नहीं कहती है कि डायबिटीज के रोगी को मीठे फल और सूखे मेवे नहीं खाने चाहिये। फलों में पर्याप्त रेशे या फाइबर जटिल शर्करायें होती है जिनका ग्लाइसीमिक इन्डेक्स कम होता है अत: ये रक्त शर्करा की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाती है। दालें भी छिलके समेत खाएं। छिलकों में फाइबर व महत्वपूर्ण विटामिन होते हैं। अंकुरित अन्न का सेवन अवश्य करें।

6) रोज सुबह एक घण्टा व शाम को आधा घण्टा घूमना है। सुबह आधे घण्टे से पौन घंटे, प्राणायाम, योग व व्यायाम करना है।

7) रोजाना आधा चम्मच पिसी हुई दालचीनी सब्जी या चाय में डालकर लें। रोज एक क्रोमियम व एल्फालाइपोइक एसिड युक्त (ये दोनों मधुमेह उपचार में बहुत लाभ दायक है) एन्टीऑक्सीडेंट का केप्सूल जैसे Cap. Ebiza-L और Shilajit Dabur के दो केप्सूल सुबह शाम लेना है। मेथीं दाना, करेला, जामुन, आंवला, नीम के पत्ते आदि का सेवन करें। आजकल रोगी को अपनी रक्त शर्करा की नियमित जांच ग्लूकोमीटर द्वारा घर पर ही करने की सलाह दी जाती है।

8) हर तीन महीनों में HbA1C टेस्ट भी करवाये। इससे पिछले तीन महीने में आपकी बल्ड शुगर नियंत्रण की स्थिति मालूम हो जाती है। साल में एक बार आंखो की जांच (फन्डोस्कोपी), गुर्दे व यकृत के रक्त परिक्षण, ई.सी.जी. व हृदय की विस्तृत जांच अवश्य करवाये।

9) डायबिटीज के रोगी को हमेशा अपने पास एक कार्ड रखना चाहिए जिसमें इस बात का वर्णन हो की वह डायबिटीज से पिड़ित है डायबिटीज के रोगी को स्वास्थ्य बीमा भी करवाना चाहिये।

10) डायबिटीज के रोगी की कभी-कभी रक्त शर्करा बहुत कम हो जाती है जिसे हाइपो-ग्लाइसीमिया या शर्कराल्पता कहते हैं, जिसके लक्षण है – भूख लगना, घबराहट, पसीना आना, चक्कर आना, आवाज लड़खड़ाना, कमजोरी, अस्त-व्यस्तता, बेहोशी आदि हैं। ये बड़ी भयावह स्थिति होती है। इसमे तुरन्त चीनी, कोई मीठी वस्तु जैसे बिस्किट या मिठाई खा लेना चाहिए और तुरन्त किसी चिकित्सालय में जाकर जाँच करवाना चाहिये।

मैं गेहूं हूँ

लेखक डॉ. ओ.पी.वर्मा    मैं किसी पहचान का नहीं हूं मोहताज  मेरा नाम गेहूँ है, मैं भोजन का हूँ सरताज  अडानी, अंबानी को रखता हूँ मुट्ठी में  टा...