Tuesday, July 12, 2011

Research of Dr. Budwig


बुडविज की खोज

डॉ. यॉबाना बुडविज महान वैज्ञानिक थी जो हेजेलस्ट्रेस 3, 7290 फ्रुडेनस्टेड-डाइटर्सवीलर, जर्मनी में रहती थी और उनका फोन नंबर 07441-7667 था। अमरीका में प्रकाशित “द हैन्ड बुक ऑफ नेचुरल हैल्थ” में डॉ. बुडविज ने लिखा है कि कृत्रिम हाइड्रोजिनेटेज फैट स्वास्थ्य के लिए एक विष के सिवा कुछ नहीं है तथा स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए आवश्यक वसा अम्ल बहुत जरूरी है। साठ वर्ष पहले डॉ. यॉहाना ने वसा पर वॉन लाइबिग (1842), फ्लुजर (1875), होप सेलर (1876) और लेबेडो (1888) द्वारा किये गये शोध कार्य को जारी रखा। 1920 में मेयरहोफ (जिन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला) ने बतलाया था कि लिनोलेनिक अम्ल और सल्फर युक्त प्रोटीन शरीर के लिए बहुत लाभदायक है। 1931 में वारबर्ग ने सिद्ध किया था कि आवश्यक वसा अम्ल (EFA) शरीर में फैटी डिजनरेशन को ठीक करते हैं। 1937 में सैंट गायोर्जी ने लिनोलेनिक एसिड और सल्फर युक्त प्रोटीन शरीर में ऑक्सीकरण की क्रिया को बढ़ाते हैं और जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला। लेकिन इन सभी शोध कार्यों से कोई स्पष्ट नतीजे नहीं निकल पा रहे थे और सारे शोध कार्य प्रयोगशालाओं की फाइलों में दब कर रह गये थे।

तभी डॉ. बुडविज में प्रकाश का दीप जलाया। ज्ञान की रोशनी से पूरे विश्व को जगमगा दिया। उन्होंने पिछले कई वर्षों में विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा जानवरों किये गये प्रयोगों को न दोहरा कर सीधे हजारों स्वस्थ, रुग्ण और कैंसर तथा अन्य रोगों की आखिरी अवस्था से लड़ते हुए लोगों के रक्त के नमूने लिये। इन प्रयोगों से कई क्रांतिकारी और आश्चर्यजनक नतीजे सामने आये। बुडविज ने पाया कि सभी अस्वस्थ और बीमार लोगों में लिनोलेनिक एसिड की मात्रा बहुत ही कम थी। उन्होंने यह भी देखा कि सभी अस्वस्थ और बीमार लोगों में फोस्फेटाइड भी बहुत कम मात्रा में था, जो कोशिकाओं के विभाजन के लिए बहुत आवश्यक तत्व है। चूंकि कैंसर में भी असामान्य कोशिकाओं का त्वरित और अनियंत्रित विभाजन होता है और यह विभाजन एक गांठ की शक्ल लेता है, इसलिए कैंसर के उपचार के परिपेक्ष में ये नतीजे और भी महत्वपूर्ण हो गये थे। डॉ. बुडविज ने यह भी पाया कि सभी बीमार लोगों खून में एक विशेष तरह का लाइपोप्रोटीन भी बहुत कम था, जो लिनोलेनिक एसिड और सल्फर-युक्त प्रोटीन के प्रणय बंधन से बनता है। इस रक्त में लाल और स्वस्थ हीमोग्लोबिन के स्थान पर एक हरा पीला अस्वस्थ पदार्थ देखा गया। बिना लिनोलेनिक एसिड के हीमोग्लोबिन नहीं बनता है और शरीर की कोशिकाएं और ऊतक ऑक्सीजन के लिए तड़पती हैं।

इस पूरी शोध में मुख्य बात यह सामने आई कि लिनोलेनिक एसिड और सल्फर-युक्त प्रोटीन का मिश्रण अच्छे स्वास्थ्य के लिए पहली आवश्यकता है। क्या यह सब इतना सरल था? यह जानने के लिए उन्होंने नये प्रयोग करने का निश्चय किया। उन्होंने इसके लिए अलसी के कोल्ड-प्रेस्ड तेल को चुना। उन्होने बीमार लोगों पर परीक्षण शुरू किये और उनको अलसी का तेल और पनीर (जिसमें काफी सल्फर-युक्त प्रोटीन होते हैं) मिला कर देना शुरू कर दिया। तीन महीने बाद फिर उनके रक्त के नमूने लिये। नतीजे चौंका देने वाले थे। डॉ. बुडविज द्वारा एक महान खोज हो चुकी थी। कैंसर के इलाज में सफलता की पहली पताका लहराई जा चुकी था। लोगों के रक्त में फोस्फेटाइड और लाइपोप्रोटीन की मात्रा काफी बढ़ गई थी और अस्वस्थ हरे पीले पदार्थ की जगह लाल हीमोग्लोबिन ने ले ली थी। कैंसर के रोगी ऊर्जावान और स्वस्थ दिख रहे थे, उनकी गांठे छोटी हो गई थी, वे कैंसर को परास्त कर रहे थे। उन्होने अलसी के तेल और पनीर के जादुई और आश्चर्यजनक प्रभाव दुनिया के सामने सिद्ध कर दिये थे।

वे विभिन्न रसायनों की मदद से तैयार किये गये ट्रांसफैट युक्त कृत्रिम हाइड्रोजेनेट फैट के दुष्प्रभावों को सिद्ध कर चुकी थी। पूर्ण व आंशिक हाइड्रोजिनेटेड तेल (जो मार्जरिन, वेजिटेबल शोर्टनिंग और रिफाइंड तेलों में होते हैं) हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही घातक हैं। बाजार में उपलब्ध सभी खुले और पैकेटबंद खाद्य पदार्थ इन्हीं घातक फैट्स में बनाये जाते हैं।

जैसे ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों को डॉ. बुडविज की इस महान खोज के बारे में मालूम हुआ तो सब अलसी के पीले तेल पर शोध करने में जुट गये। अलसी का तेल लिनोलेनिक और लिनोलिक एसिड का सर्वोत्तम स्रोत है। वे पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो चुकी था। उन्हें जगह जगह व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया जाने लगा। पोलेन्ड के वैज्ञानिकों ने अपनी शोध में पाया कि लोगों को आहार में संत्रप्त वसा की जगह अलसी का तेल देने से उनमें हृदयाघात की दर काफी कम हो जाती थी और अलसी के तेल में खून को पतला रखने, कॉलेस्ट्रोल कम करने और कैंसररोधी गुण पाये गये। पटना, बिहार में शोधकर्ताओं ने गायों पर किये अपने परीक्षणों में पाया कि जिन गायों को अलसी का तेल दिया गया, उनमें कॉलेस्ट्रोल की मात्रा कम हुई और एथेरोस्क्लिरोटिक प्लॉक नहीं देखा गया। ऑस्ट्रेलिया के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि जानवरों को अलसी का तेल पिलाने से रक्तचाप कम होता है। सबसे अच्छी खबर यह थी कि अलसी का तेल कैंसर ठीक करता है। ऑस्ट्रिया में हुई तीन वर्ष की शोध से यह निष्कर्ष निकला कि अलसी का तेल कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि कम करता है। एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि उपरोक्त सारे परीक्षणों में जैविक अलसी के कोल्ड-प्रेस्ड एक्स्ट्रा वर्जिन तेल का प्रयोग किया गया। अलसी का तेल प्रकाश, तापमान और हवा के प्रति बहुत संवेदनशील है।

डॉ. यॉहाना बुडविज ने प्रमाणित किया था कि बीमार व्यक्ति में लिनोलेनिक एसिड की मात्रा बहुत ही कम पाई जाती है। जब कि स्वस्थ व्यक्ति में लिनोलेनिक एसिड और बढ़िया सल्फरयुक्त प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में होता है, जिनके बिना हीमोग्लाबिन का निर्माण संभव नहीं है। फलस्वरूप व्यक्ति में ऑक्सीजन की अल्पता होती है। उन्होंने दस वर्ष तक कैंसर और अन्य गंभीर रोगियों का ओम खंड (अलसी के तेल, पनीर, फल और मेवों का मिश्रण) द्वारा सफलतापूर्वक उपचार किया, जिसमें उन्हें 90% सफलता मिली। इन सफलताओं ने उन्हें विश्व की महान चिकित्सक बना दिया।

पिछले पच्चीस वर्षों में दुर्भाग्यवश हमारे भोजन में ओमेगा-6 श्रेणी के फैट की मात्रा नाटकीय अनुपात में बढ़ी है। इस बढ़त में हाइड्रोजिनेटेड फैट और आंशिक हाइड्रोजिनेटेड फैट की मात्रा बहुत ज्यादा रही हैं। ये प्लास्टिक तथा मृत फैट हैं, शरीर के लिए जानलेवा विष के सिवा कुछ नहीं हैं और शरीर के चयापचय में इनकी कोई जीवरसायनिक भूमिका नहीं है। इनमें घातक, कठोर और चिपचिपे ट्रांस फैट की काफी मात्रा होती है।

हमारा शरीर आवश्यक वसाअम्ल की कमी की क्षति-पूर्ति करने की कौशिश करता है। लेकिन यदि लंबे समय तक फैटी एसिड की कमी हो तो शरीर में फैटी डिजनरेशन (कैंसर और हृदयरोग) हो जाता है। शरीर में आवश्यक वसा अम्लों की क्षति-पूर्ति के लिए अलसी का तेल प्रयोग करते हैं क्योंकि यह पृथ्वी पर लिनोलेनिक और लिनोलिक एसिड का सर्वोत्तम स्रोत है। शोधकर्ता अलसी के तेल को बचाव और उपचार दोनों के लिए आदर्श मानते हैं। आवश्यक वसा अम्ल प्रकाश, तापमान और हवा के संपर्क में आने पर जल्दी ही खराब हो जाते हैं। अतः इनके निर्माण, पैकिंग और भंडारण में सावधानी आवश्यक है। गति और लय को सही रखते हैं।

अल्फा-लिनोलेनिक अम्ल (ALA) शरीर में अंततः 1 और 3 श्रंखला के कोशिकीय हार्मोन प्रोस्टाग्लेन्डिन में परिवर्तित हो जाते हैं जो शरीर में विभिन्न कार्यों को अंजाम देते हैं।

अल्फा-लिनोलेनिक अम्ल Alpha Linolenic Acid के प्रमुख कार्य

ऊर्जा- आवश्यक वसा अम्ल शरीर को ऊर्जा, शक्ति और उत्साह से भर देते है। ये शारीरिक और मानसिक विकास और चेतन्यता के लिए आवश्यक हैं।

हृदय रोग- यह थक्का-रोधी है, धमनियों को स्वीपर की तरह साफ रखता है और हृदयाघात, स्ट्रोक से बचाव करता है। 1 और 3 श्रंखला के प्रोस्टाग्लेन्डिन स्रावित होने के कारण रक्तचाप कम करता है, प्रदाह कम करता है, बिंबाणुओं का चिपचिपापन कम करता है और घातक एरिद्मिया से बचाव करता है। यह ट्राइग्लासराइड तथा LDL कॉलेस्ट्रोल कम और HDL कॉलेस्ट्रोल को बढ़ाता है। यह हृदय की पेशियों के लिये ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है।

यह स्टीरोयड और अन्य हार्मोन्स का निर्माण तथा उन्हें अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंचाने में सहायक हैं।

त्वचा- यह त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। यह बालों की जड़ों को भरपूर पोषण दे कर बालों को स्वस्थ, चमकदार व मजबूत बनाती हैं। अलसी एक उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। अलसी त्वचा की बीमारियों जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, सूखी त्वचा, खुजली, छाल रोग (सोरायसिस), ल्यूपस, बालों का सूखा व पतला होना, रूसी, बाल झड़ना आदि में काफी असरकारक है। यह त्वचा के दाग, धब्बे, झाइयां व झुर्रियां दूर होती हैं। अलसी आपको युवा बनाये रखती है।

प्रजनन तंत्र- यह विवर्धित प्रोस्टेट ग्रंथि, बांझपन, अभ्यस्त गर्भपात, नामर्दी, शीघ्रपतन, नपुंसकता आदि के उपचार में महत्वपूर्ण योगदान देती है। यह दुग्धवर्धक है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में ईस्ट्रोजन का स्त्राव कम हो जाता है और महिलाओं को कई परेशानियां जैसे रजोनिवृत्ति जनित तमतमाहट (Hot flashes), ओस्टियोपोरोसिस आदि होती हैं। ओमेगा-3 इन सबमें बहुत राहत देता है और मासिक धर्म संबंधी अनियमितताएं ठीक करता है।

प्रदाह-रोधी- यह आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि में गुणकारी है।

मधुमेह- यह शर्करा नियंत्रित रखता है और मधुमेह के दुष्प्रभावों का जोखिम कम करते हैं। यह भूरी वसा कोशिकाओं को उत्तेजित करते हैं, बुनियादी चयापच दर (BMR) बढ़ाता है और वजन कम करने में सहायता देता है।

मस्तिष्क- मस्तिष्क और नाड़ियों के लिए आवश्यक फोस्फोलिपिड ओमेगा-3 से बनता है। यह मस्तिष्क की संरचना और विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यक है और संज्ञानात्मकता, स्मृति, मनोदशा और एकाग्रता में वृद्धि करता है। यह मन को शांत रखता है, चित्त प्रसन्न रखता है, विचार अच्छे आते हैं, तनाव दूर होता है तथा क्रोध नहीं आता है। इसके सेवन से मन और शरीर में एक दैविक शक्ति और ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह नाड़ियों में संदेशों का प्रवाह तेज करता है। इसलिये शिजोफ्रेनिया, पार्किंसन्स, एल्जाइमर रोग, डायबीटिक न्युरोपैथी और मल्टीपल स्क्लिरोसिस के उपचार में बहुत लाभ दायक है। यह मस्तिष्क को ऊर्जा देते हैं। अलसी से नज़र अच्छी हो जाती है, रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं और धीरे-धीरे ऐनक के नम्बर भी कम हो सकते हैं। यह व्यायाम के बाद पेशियों की थकावट चुटकियों में दूर कर देता है।

स्टेफ संक्रमण- अलसी का तेल कठिन स्टेफ संक्रमण के रोगी में कीटाणुओं का सफाया करता है।

कैंसर- यह बिना रक्षाप्रणाली को नुकसान पहुंचाये कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है। यह कैंसर की गांठो को छोटा करता है।

रक्षा प्रणाली- आवश्यक वसा अम्ल शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करता हैं। सारांश में आवश्यक वसा अम्लों के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है और इनकी कमी होने पर शरीर कई बीमारियों की चपेट में आ जाता है।

ये गुर्दे और पित्त की थैली की पथरियों को घोल देते है।

कोशिका की स्वस्थ झिल्लियों का आधार-ये कोशिका की झिल्लियों को आकार प्रदान करती हैं, अपेक्षित तरलता बनाये रखती है और उत्तेजित होने पर जीव विद्युतधारा प्रवाहित कर विभिन्न संदेश संचारित करते हैं।

विभिन्न कोशिकीय क्रियाओं में सहायक- ये विभिन्न प्रोस्टाग्लेन्डिन बनाते हैं जो स्थानीय हार्मोन की तरह कोशिका और उत्तकों के विभिन्न कार्यों जैसे रक्तचाप, बिम्बाणु के चिपचिपापन और पेशियों के संकुचन को नियंत्रित करते हैं। ये हृदय की क्रोमोजोम और जैनेटिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। ये कोशिका विभाजन में क्रोमोजोम की गति को नियंत्रण में रखते है और कोशिका विभाजन के बाद नवजात कोशिकाओं की भित्तियों का निर्माण करता है।

ट्रांसफैट

प्राकृतिक आवश्यक वसा अम्लों का आणविक विन्यास सिस cis-configuration होता है। जिसमें द्वि-बन्ध पर दोनों हाइड्रोजन लड़ के एक ही ओर जुड़े रहते हैं जिससे कार्बन की लड़ मुड़ जाती है और लड़ के अन्दर इलेक्ट्रॉन का एक बादल सा बन जाता है। उच्च तापमान पर गर्म करने या हाइड्रोजनिकरण की प्रक्रिया में हाइड्रोजन का विन्यास उल्टा यानी ट्रांस Trans-configuration हो जाता है। यानी दोनों हाइड्रोजन विपरीत दिशा में जुड़ते हैं, कार्बन की लड़ सीधी रहती है जिससे यह सामान्य तापमान पर चिपचिपा, सख्त और ठोस रहता है। ये ट्रांसफैट शरीर के लिए पूर्णतः असामान्य, अप्राकृतिक और बेकार होते हैं। ये शरीर के लिए एक जानलेवा विष के सिवा कुछ नहीं है। ये रक्त वाहिकाओं, यकृत और अन्य स्थानों पर फैट का जमाव बढ़ाते हैं, प्लेटलेट को ज्यादा चिपचिपा बनाते हैं और हृदयाघात तथा स्ट्रोक जैसी विषम रोग उत्पन्न करते हैं। ये कोशिका की झिल्लियों की पारगम्यता को प्रभावित कर देते हैं। जिससे कोशिकाओं में विभिन्न अणुओं की आवाजाही बिगड़ जाती है। ट्रांसफैट आवश्यक वसा अम्लों की सामान्य क्रियाप्रणाली को अवरूद्ध करते हैं, एन्जाइम्स को निष्क्रिय कर प्रोस्टाग्लेन्डिन के निर्माण को बाधित करते हैं जिससे शरीर में आवश्यक वसा अम्लों की कमी पैदा कर देते हैं। ट्रांसफैट इन्सेक्टिसाइड्स को शरीर से विसर्जित करने वाले एन्जाइम्स को निष्क्रिय करते हैं और कैंसर के विकास को गति देते हैं। शरीर को 95% ट्रांसफैट हाइड्रोजिनेटेड फैट (रिफाइन्ड तेल, मार्जरिन, शोर्टनिंग आदि) द्वारा तैयार किये हुए व्यंजनों, फास्ट फूड, जंक फूड, मांसाहारी व्यंजनों, मक्खन आदि से मिलते हैं। बाजार में उपलब्ध सभी परिष्कृत खाद्य पदार्थ जैसे ब्रेड, क्रेकर, पाइज़, कुकिज, डोनट्स, मफिन्स, बिस्किट्स, पिज्ज़ा, कचौड़ी-समोसे, भटूरा, बर्गर, अंकल चिप्स, सलाद ड्रेसिंग, पीनट बटर आदि ट्रांसफैट से भरपूर होते हैं।

डॉ. बुडविज से लोथर हरनीस की बातचीत

लोथरः क्या आप अपने बारे में कुछ बतायेंगी?

डॉ. यॉहाना बुडविजः यह 1951 की बात है जब मैं फेडरल हेल्थ ऑफिस के फार्मास्युटिकल और फैट्स विभाग में वरिष्ट विशेषज्ञ थी। यह देश का सबसे बड़ा पद था जो नई दवाओं को जारी करने की स्वीकृति देता था। उन दिनों मेरे पास सल्फहाइड्रिल (सल्फर युक्त प्रोटीन यौगिक) श्रेणी की कैंसररोधी दवाओं के कई आवेदन आये थे। उन दिनों कैंसर के उपचार में फैट्स की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही थी। तत्कालीन विख्यात प्राध्यापक नोनेनब्रुच की रिसर्च रिपोर्ट से भी यही संकेत मिल रहे थे।

1951 में ही मैं और प्रोफेसर कॉफमेन ने मिल कर फैट की रासायनिक रचना को पहचानने की तकनीक विकसित की थी। कॉफमेन जनरल फेडरल इन्स्टिट्यूट में अनाज, आलू और फैट अनुसंधान कैंद्र के निर्देशक थे।

मैने पहली बार पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की थी, जिससे हम 0.1 ग्राम फैट का भी विश्लेषण करके बता सकते थे कि फैट संतृप्त है या असंतृप्त। इस तकनीक से लिनोलेनिक और लिनोनिक वसा अम्ल को पहचानना भी संभव था। यह खोज बहुत अहम थी। सरकार ने हमारी सहायता के लिए 16 पीएच.डी. प्रवेशार्थी नियुक्त कर दिये थे। हमारी खोज के प्रतिवेदन “फैट अनुसंधान में नई दिशा” में प्रकाशित हुए थे। हमने उन्हें सभी को बताये और कई जरनल्स में प्रकाशित किया।

तब तक यह तो सब जान गये थे कि सल्फहाइड्रिल ग्रुप (सल्फर युक्त प्रोटीन्स) श्वसन क्रिया कर रही कोशिकाओं में पाया जाता था। लेकिन हमें लगता था कि सल्फहाइड्रिल ग्रुप के अलावा भी कोई तत्व है जो श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक है। संभवतः यह कोई अज्ञात फैट होना चाहिये जिसे हम पहचानने में असमर्थ थे। यही फैट वारबर्ग श्वसन एंजाइम पथ में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है।

वारबर्ग यह तो जानते थे कि श्वसन एंजाइम या साइटोक्रोम ऑक्सीडेज के अलावा कोई अज्ञात तत्व जो संभवतः कोई फैटी एसिड है जो कोशिकाओं की श्वसन क्रिया के लिए जरूरी है और जिसका सम्बंध कोशिकाओं में ऑक्सीजन की आपूर्ति के अवरुद्ध होने से है। उन्होंने ब्युटिरिक एसिड द्वारा कोशिकाओं में ऑक्सीजन को आकर्षित करने हेतु प्रयोग किये जिसमें वे असफल रहे।

लोथरः क्या इसका मतलब यह है कि वारबर्ग पहले व्यक्ति थे जो ब्युटिरिक एसिड द्वारा कोशिकाओं में ऑक्सीजन को खींचना चाहते थे?

डॉ. यॉहाना बुडविजः नहीं सबसे पहले वॉन हेलमोल्ज ने कोशिकाओं में ऑक्सीजन पहुंचाने की कौशिश की थी। उन्होंने कुछ बतकों को ब्लीच्ड चावल खिला कर उनकी श्वसन क्रिया को बाधित किया जिसके कारण वे उनका दम घुटने लगा और वे छटपटाने लगी। उन्हें ऑक्सीजन दी गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और वे जल्दी मर गयी। यह बात आज भी सही है। यदि किसी अस्पताल में ऑक्सीजन का बम रख दिया जाये तब भी ऑक्सीजन की कमी से जूझते रोगी को कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि वह जल्दी मरेगा। किसी पौधे की पत्ती टूटती है तो उस जगह त्वचा की नई परत चढ़ जाती है, यह क्षमता, जो कोशिका विकास के लिए आवश्यक है, इलेक्ट्रोन युक्त फैटी एसिड्स के अभाव में बाधित हो जाती है। क्योंकि यह नई परत फैटी एसिड्स से बनती है।

लोथरः क्या आपके मतानुसार कैंसर की बड़ी गांठे ऑपरेशन द्वारा निकाल देनी चाहिये?

डॉ. यॉहानाः इस बारे में मेरा कोई स्पष्ट मत नहीं है। हां मैं कीमो और रेडियो के सख्त विरुद्ध हूं। उदर में होने वाले कैंसर के रोगी को हार्मोन उपचार नहीं देना चाहिये। मेरे खयाल से सर्जरी के बारे में निर्णय रोगी की स्थितियों के अनुसार काफी सोच समझ कर लेना चाहिये।

लोथरः आपने प्राकृतिक चिकित्सा का लाइसेन्स कैसे प्राप्त क्या?

डॉ. यॉहानाः फैट्स और फार्मास्युटिकल की विशेषज्ञ होने के नाते मैंने प्राकृतिक चिकित्सा का गहन अध्ययन किया। मैंने अत्यंत असंतृप्त फैट के महत्व और विकृत हाइड्रोजनीकृत फैट के घातक प्रभावों को दुनिया के सामने रखा। काफी बीमार मुझसे मिलते थे, और परामर्श लेते थे। डॉक्टर्स की बिरादरी के लगने लगा था कि मैं उनके कार्यक्षेत्र में दखल दे रही हूं। मैं रोगियों का उपचार रूबी लेजर से भी करती थी।

तभी मैंने विभिन्न तेलों में प्रकाश के अवशोषण की सही सही स्पेक्ट्रोस्कोपिक गणना करके ELDI (इलेक्ट्रोन डिफ्रेन्शियल तेल) भी विकसित किया था। इनकी मालिश करने और रूबी लेजर की मदद से गंभीर रोगी के चयापचय में अभूतपूर्व सुधार होता है। इस सफलता से मैं स्वयं भी आश्चर्यचकित थी। कैंसर के रोगियों को एलडी तेल के प्रयोग से जादुई लाभ मिल रहे थे। तभी मुझे लगा कि अब मेरे दुष्मनों की परेशानी बढ़ने वाली है। इसलिए मैंने प्राकृतिक चिकित्सा का लाइसेन्स ले लिया और लेजर द्वारा रोगियों का उपचार करने के लिए विशेष अनुमति भी ले ली।

लोथरः फिर आपने मेडीकल का अध्ययन भी किया?

डॉ. बुडविजः लोथर तुम सच कह रहे हो। गोटिंजन में मैं कैंसर और अन्य बीमारियों के रोगियों का उपचार किया करती थी। मेरे कुछ विरोधियों ने कहा कि बुडविज जब डॉक्टर नहीं है तो वह मरीजों का इलाज क्यों करती है। मुझे यह बुरा लगा और 1955 में मैंने मेडीकल स्कूल में प्रवेश लिया और नियम पूर्वक मेडीकल की पूरी पढ़ाई की। एक घटना मुझे याद आ रही है। एक रात को एक महिला अपने बच्चे को लेकर रोती हुई मेरे पास आई और बताया कि उसके बच्चे के पैर में सारकोमा नामक कैंसर हो गया है और डॉक्टर उसका पैर काटना चाहते हैं। मैंने उसे सांत्वना दी, उसको सही उपचार बताया और उसका बच्चा जल्दी ठीक हो गया और पैर भी नहीं काटना पड़ा। चूंकि तब मैं मेडीकल स्टूडेन्ट थी। इसलिये मेरे विरोधियों ने मुझ पर केस कर दिया कि मैं अस्पताल के सर्जरी वार्ड से मरीजों को बहला फुसला कर अपने घर ले जाती हूँ, उनका गलत तरीके से इलाज करती हूँ और मुझे मेडीकल स्कूल से निकाल देना चाहिए। म्युनिसिपल कोर्ट ने मुझे पूछताछ के लिये बुलाया। मैंने जज को कहाः “मैं कभी सर्जरी वार्ड में नहीं गई। मुझे तो मालूम भी नहीं वो कहां है। वह महिला स्वयं मेरे पास आई थी। मैं उसके पास नहीं गई। मैंने उसके बच्चे का सफलतापूर्वक इलाज किया और पैर भी नहीं कटने दिया। (इसका उल्लेख मैंने अपनी पुस्तक “डैथ ऑफ ए ट्यूमर वोल्यूम 2” में किया है)” कोर्ट के जज और हमारी यूनिवर्सिटी के काउन्सलर डॉ. हेन्ज दोनों ने कहाः “बुडविज, तुमने बहुत अच्छा काम किया है। यहां कोई तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता है। यदि कोई तुम्हें परेशान करेगा तो स्कैन्डल खड़ा हो जायेगी।”

इसके बाद मेडीकल स्कूल के प्रशासन ने मेरी कैंसर उपचार पद्धति का ध्यान से अवलोकन किया और वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे कहा कि मैं उनके कैंसर विभाग में रेडियाथैरेपी और कीमोथैरेपी ले रहे कैंसर रोगियों का उपचार करूँ, जो मुझे मंजूर नहीं था। मेरे उपचार में रेडियाथैरेपी और कीमोथैरेपी की कोई जगह नहीं है। फिर वहाँ और भी कई पंगे हुए और अंततः मैंने अपनी मेडीकल पढ़ाई अधूरी ही छोड़ कर गोटिंगन को विदा कह दिया।

लोथरः यदि रोगी को कॉटेज चीज़ से एलर्जी है या वह इसे नहीं लेना चाहता है तो आप उसे क्या सलाह देती है?

डॉ. बुडविजः बायोलोजिकल थेरेपीज सेनेटोरियम, स्वीडन के विख्यात निर्देशक मुझे जानते थे और मेरे उपचार को प्रयोग करते थे। एक बार उन्होंने मुझे फोन किया कि उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का उपचार करना है और वे पनीर खाना पसंद नहीं करते हैं। मैंने उन्हें यही कहा कि आज तक मुझे कोई रोगी नहीं मिला जिसे अलसी के तेल और पनीर का मिश्रण लेने में कोई परेशानी आई हो।

लोथरः आप कैंसर से बचाव के लिये लोगों को क्या सलाह देती हैं?

डॉ. बुडविजः सिर्फ अलसी का तेल। मैं फ्रोजन मीट के प्रयोग के लिये हमेशा मना करती हूँ। ताजा मांस खाया जा सकता है। फूड स्टोर्स के फ्रोजन सेक्शन से तो कुछ भी नहीं खरीदे। अपनी ब्रेड खुद बेक करें। ऑलियोलक्स अलसी के तेल की अपेक्षा ज्यादा दिन तक खराब नहीं होता है। इसे ब्रेड, सलाद या सब्ज़ियों पर डाल सकते हैं। बाजार में मिलने वाले डिब्बा बन्द फलों के रस की जगह घर पर फलों का रस निकाल कर पियें। आलू और पनीर का प्रयोग कर सकते हैं।

हमारे चारों ओर का विद्युत चुम्बकीय वातावरण भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। सिन्थेटिक कपड़े शरीर से इलेक्ट्रोन चुराते है। इनके स्थान पर सूती, रेशमी या ऊनी कपड़े पहनें। फोम के गद्दे रात भर में आपकी काफी ऊर्जा ले लेते हैं। जूट या रूई के गद्दे प्रयोग करना चाहिए। घर के निर्माण में लकड़ी का प्रयोग ज्यादा होना चाहिये। लकड़ी और कालीन बाहरी रेडियेशन को घर के अन्दर नहीं आने देते हैं। अपनी राशि के अनुसार रत्नों को धारण करने से अनावश्यक हानिकारक किरणें दूर रहती हैं। नियमित समय पर सोना और जागना अति आवश्यक है।

हेलसिंकी के सर्जरी क्लिनिक प्रोफेसर हाल्मे मेरे द्वारा ठीक किये हुए रोगियों का पूरा लेखा जोखा रखते हैं। उनके अनुसार मुझे 90% से ज्यादा सफलता मिलती है, वह भी उन रोगियो के उपचार में जहां ऐलोपैथी जवाब दे चुकी थी।

लोथरः आप अपने रोगियों का उपचार कैसे शुरू करती हैं?

डॉ. बुडविजः जब पहली बार रोगी परामर्श के लिए आता है तो मैं बड़ी शांति से रोगी को सुनती हूँ। उसे अपनी तकलीफों, चिकित्सा इतिहास (व्यक्तिगत, भूतकाल तथा पारिवारिक), उसके निदान, उपचार आदि के बारे में विस्तार से बताने देती हूं। मैं उसके व्यवसाय, शौक, आहार, घर के वातावरण आदि की पूरी जानकारी ले लेती हूं।

प्रकाश

प्रकाश ऊर्जा का आधारभूत स्रोत है जिससे हमारी उत्पत्ति हुई है और जिसके चारों ओर हमारा जीवन चक्र घूमता है। प्रकाश और जीवन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आधुनिक युग की इस कृत्रिम दुनिया में हमनें बनावटी लाइट्स, धूप के चश्मों, गहरे रंग के शीशों, कान्टेक्ट लेंसेस, इनडोर जीवनशैली, टेनिंग लोशन, परिष्कृत भोजन, मांसाहार और यहां तक कि पक्व आहार का प्रयोग इतना ज्यादा बढ़ा दिया है कि हम “प्रकाशहीनता” या “माल-इल्युमिनेशन” के शिकार हो गये हैं। माल-न्युट्रिशन की तरह ही “माल-इल्युमिनेशन” के कारण हमें कई बीमारियां हो रही है।

नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. सेन्ट गियोर्जी जीवन की व्याख्या करते हुये कहते हैं कि जीवन सूर्य द्वारा दिया गया एक वरदान हैं जो हमें एक थोड़े से विद्युत प्रवाह के रूप में मिलता है। प्रकाश के बिना जीवन अकल्पनीय है। भोजन और अन्य कई तरीकों से हम सूर्य ऊर्जा को ग्रहण करते हैं। हम मानव एक तरह के फोटो सेल हैं जिनका मुख्य भोजन प्रकाश है। क्वांटम भौतिकी के अनुसार वानस्पतिक भोजन प्रकाशीय ऊर्जा का संकेन्द्रित रूप है, जिसके खाने से हमें यह ऊर्जा प्राप्त होती है। यदि यह वनस्पति हमें परोक्ष रूप से मांस खाने से प्राप्त होती है तब तक इसका विद्युत प्रवाह और गुंजन नष्ट हो जाता है। वनस्पति भोजन का यह विद्युत प्रवाह भोजन को पकाने या परिष्कृत (Processing) करने से भी थोड़ा नष्ट होता है।

डॉ. हेन्स एपिन्जर के अनुसार भी शरीर की कोशिकाएं बैटरी की तरह कार्य करती है। स्वस्थ लोगों में ये बैटरियां पूरी तरह चार्ज रहती है लेकिन बीमार व्यक्तियों में डिस्चार्ज्ड अवस्था में रहती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपक्व या कच्चा भोजन खाने से ही ये बेटरियां चार्ज होती है।

डॉ. सेन्ट गियोर्जी के अनुसार हमारी कोशिकाएं एक बैट्री की तरह कार्य करती है। इसके घनात्मक ध्रुव को आवेश ऑक्सीजन देती है। ऋणात्मक ध्रुव को सूर्य जैसे इलेक्ट्रोन ऊर्जा देते हैं, यह ऊर्जा परोक्ष रूप से सूर्य से आने वाले फोटोन्स के वनस्पतियों में अवशोषण से प्राप्त होती है। इन वनस्पतियों में विद्यमान इलेक्ट्रोन फोटोन युक्त फैटी एसिड्स की इलेक्ट्रोन ऊर्जा को साइटोक्रोम ऑक्सीडेज सिस्टम जैविक ऊर्जा के स्रोत ATP में बदल देती है। यह ए.टी.पी. एक विशेष अणु है जिसमें हमारी कोशिकाओं और ऊतकों में होने वाली समस्त जीवरसायन क्रियाओं के लिये ऊर्जा संचित रहती है। इस तरह साइटोक्रोम ऑक्सीडेज सिस्टम स्टेप डाउन ट्रांसफॉर्मर का कार्य करता है।

ऑक्सीजन साइटोक्रोम ऑक्सीडेज सिस्टम में इलेक्ट्रोन को घनात्मक ध्रुव की ओर आकर्षित करती है। ऑक्सीजन ज्यादा होगी तो यह आकर्षण भी ज्यादा होगा। प्राणायाम, ज्यादा ऑक्सीजन वाला भोजन करने और निर्मल ऑक्सीजन से भरपूर वातावरण में रहने से कोशिकाओं को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हर कोशिका में साइटोक्रोम ऑक्सीडेज सिस्टम होता है और उसे भली भांति कार्य करने के इलेक्ट्रोन ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह इलेक्ट्रोन ऊर्जा हमें वनस्पतिक भोजन करने से मिलती है, कुछ ऊर्जा हम सीधे भी ग्रहण करते हैं। भोजन को पकाने से उसकी इलेक्ट्रोन ऊर्जा के गुंजन का स्वरूप आंशिक रूप में नष्ट हो ही जाता है। इसलिए हमें इलेक्ट्रोन से भरपूर भोजन जैसे फल, सब्जियाँ, कच्चे मेवे और अंकुरित खाद्यान्न भरपूर खाना चाहिये।

जर्मनी की डॉ. योहाना बुडविज पहली वैज्ञानिक थी जिन्होंने क्वांटम भौतिकी और जीवरसायन शास्त्र का सघन अध्ययन किया और इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके अनुसार इलेक्ट्रोन से भरपूर सजीव भोजन शक्तिशाली इलेक्ट्रोन के दानी ही नहीं बल्कि सूर्य की ऊर्जा को आकर्षित, संचय और प्रवाह करने हेतु सूर्य की ही लय और आवृत्ति में गुंजन क्षेत्र तैयार करते हैं। वे कहती हैं कि हमारे शरीर में द्वि-बन्ध वाले फैटी एसिड के सूर्य जैसे इलेक्ट्रोन के बादल फोटोन को आकर्षित करते हैं। इन सूर्य जैसे इलेक्ट्रोन को पाई-इलेक्ट्रोन कहते हैं। वे मानती हैं कि सूर्य के फोटोन से हमें प्राप्त होने वाली ऊर्जा “anti-entropy factor” या आयुवर्धक घटक का कार्य करती है। यहां एन्ट्रोपी का मतलब एजिंग या जीर्णता है। यह आयुवर्धक घटक या सूर्य ऊर्जा हमें चिरयौवन प्रदान करता है। फोटोन कभी वृद्ध नहीं होते, उनकी गति कभी कम नहीं होती वे अनन्त हैं। हमारा शरीर जितना ज्यादा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण करेगा हमें उतनी ही ज्यादा आयुवर्धक और आरोग्यवर्धक शक्तियां प्राप्त होंगी।

जो लोग रिफाइन्ड, पका हुआ और परिष्कृत भोजन लेते हैं, उनके शरीर में सूर्य जैसे इलेक्ट्रोन्स कम होते हं और वे सूर्य के फोटोन को आकर्षित करने हेतु इलेक्ट्रोन्स का गुंजन क्षेत्र नहीं बना पाते हैं। डॉ. बुडविज कहती है कि परिष्कृत या प्रोसेस्ड फूड स्वस्थ सजीव विद्युत प्रवाह में इन्सुलेटर की तरह कार्य करते हैं। हम जितने ज्यादा सूर्य जैसे इलेक्ट्रोन्स का अवशोषण करेंगे, उतने ही अच्छे तरीके से हम सूर्य, अन्य ग्रह और सितारों की लय में गुंजन करते हुए फोटोन को आकर्षित और अवशोषण करेंगे।

सबसे प्रमुख सूर्य जैसे इलेक्ट्रोन से भरपूर भोजन अलसी और स्पिरूलिना है। डॉ. बुडविज के अनुसार अलसी के तेल (जिसमें तीन द्वि-बन्ध वाले इलेक्ट्रोन के बादल होते हैं) और पनीर को मिलाने पर वह द्वि-ध्रुविय संग्राहक (bi-polar capacitor grid) की तरह कार्य करते हैं तथा ज्यादा अच्छी तरह से फोटोन को आकर्षित अवशोषित और गुंजन करते हैं। इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा सूर्य के इलेक्ट्रोन मानव में ही होते हैं। सूर्य की लय सबसे ज्यादा मानव से ही मिलती है। प्रकाश एक तरह से हमारी नाभि-रज्जु umbilical link है जिसके द्वारा हम पूरे ब्रह्माण्ड से ऊर्जा प्राप्त करते हैं।


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