Friday, July 1, 2011

Dr. Budwig Autobiography


डॉ. जोहाना बुडविग की अमर जीवनगाथा खुशियों में बीता बचपन हरमन और एलिजाबेथ जर्मनी में रुहर नदी के तट पर बसे एसन शहर में रहते थे। 30 सितम्बर, 1908 की खुशनुमा रात को उनके आँगन में एक नन्हा सा फूल खिला था। पूरे घर में उत्सव का सा माहौल था। उन्होंने ईश्वर के दिये हुए इस तोहफे का नाम जोहाना रखा था। जर्मन भाषा में ईश्वर की दी हुई सौगात को जोहाना ही कहते हैं। पूरे बुडविग परिवार और पड़ोस में यही चर्चा हो रही थी कि जोहाना बहुत खुशकिस्मत है, होनहार है, युनिवर्सिटी में पढ़ने जायेगी और परिवार का नाम रौशन करेगी। 1908 का यह साल सचमुच जर्मन स्त्रियों के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया था। जी हाँ, इसी वर्ष की 8 अप्रेल को जर्मन सरकार ने वहाँ के इतिहास में पहली बार महिलाओं को कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करने तथा राजनैतिक दलों और अन्य क्लबों की सक्रिय सदस्यता लेने की अनुमति दे दी थी। स्त्रियों को स्वतंत्रता और नये अधिकार दिये जा रहे थे परन्तु यह सारी प्रक्रिया बहुत धीमी थी। जर्मनी तब संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। 

अनाथालय पहुँची मासूम जोहाना 

माता-पिता के प्यार और दुलार भरे संरक्षण में जोहाना का बचपन तो हँसी-खुशी में बीत रहा था, लेकिन तभी 1920 में अचानक उसकी माँ एलिजाबेथ की मृत्यु हो गई। नन्हीं सी जोहाना के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। उसके पिता मामूली मिस्त्री थे और शायद उसका लालन-पालन ठीक तरह नहीं कर पाते, इसलिए उसके परिजनों ने निर्णय लिया कि जोहाना को अनाथालय भेज दिया जाये। 12 वर्ष की उम्र में अचानक लावारिस हो जाना जोहाना के लिए दूसरा बड़ा झटका था। अनाथालय में बस एक अच्छी बात जरूर थी कि वहाँ रहने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी। इस घटना के बाद उसके पिता का इतिहास में कहीं जिक्र नहीं मिलता है, शायद वो किसी अन्य स्त्री से शादी करके कहीं बस गये थे। 

डाइकोनेसेस इन्स्टिट्यूट में हुआ जोहाना का भाग्योदय 

1926 आते-आते जर्मनी प्रथम विश्व युद्ध की बरबादी से लगभग उबर चुका था। आर्थिक हालात ठीक हो रहे थे, देश प्रगति कर रहा था और वहाँ के वैज्ञानिक नये-नये आविष्कार कर रहे थे। उन दिनों लगभग एक तिहाई नोबेल पुरस्कार जर्मनी के खाते में जा रहे थे। लिखाई-पढ़ाई में तेज-तर्रार जोहाना को लगा कि उज्वल भविष्य के लिए उसे काइजर्सवर्थ के मशहूर डाइकोनेसेस इन्स्टिट्यूट में प्रवेश लेना चाहिये। इसाई धर्म से प्रेरित यह संस्थान 1836 में पेस्टर थियोडोर और उनकी पत्नि फ्रायडनेरा ने कुंवारी माताओं, कैदियों, रोगियों, अनाथ बच्चों और गरीबों को आश्रय देने के लिए बनवाया था। प्रारंभ में यहाँ एक चिकित्सालय और परिचारिकाओं के लिए एक ट्रेनिंग स्कूल बनवाया गया था। उस समय इस संस्थान का नर्सिंग स्कूल उत्कृष्ट और आधुनिक माना जाता था। फ्लोरेन्स नाइटेंगल, जो मदर ऑफ मॉडर्न नर्सिंग के नाम से विख्यात है, भी इसी इन्स्टिट्यूट में पढ़ी थी। बुद्धिमान और मेघावी जोहाना को बिना किसी विशेष परेशानी के डाइकोनेसेस इन्स्टिट्यूट में प्रवेश मिल गया और सात महीने में ही उसे डायकोनेस बना दिया गया। यह जोहाना के लिए उपयुक्त जगह थी। यहाँ 1000 बेड का एक विशाल सैनिक अस्पताल, बड़ा फार्मेसी इन्स्टिट्यूट और बोर्डिंग स्कूल था। जोहाना ने फार्मेसी को अपना विषय चुना। 

म्युंस्टर विश्वविद्यालय में हुई उच्च शिक्षा 
प्रारंभिक शिक्षा काइजर्सवर्थ में लेने के बाद जोहाना नें अपनी शिक्षा म्युंस्टर विश्वविद्यालय में पूरी की। वहाँ सही और स्पष्ट सोच रखने वाली बुद्धिमान जोहाना की प्रतिभा को उसके प्रोफेसर डॉ. हंस पॉल कॉफमेन ने पहचान लिया था और उसे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। उस वक्त डॉ. कॉफमेन जर्मनी और विश्व के विख्यात फैट और तेलों के विशेषज्ञ थे। यहाँ उन्होंने फार्मेसी की स्टेट परीक्षा फर्स्ट डिविजन में उत्तीर्ण की और विशेष योग्यता से केमिस्ट्री में डिग्री हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने अपने प्रिय विषय भौतिकशास्त्र में शिक्षा जारी रखी और 1938 में भौतिकशास्त्र में भी डॉक्ट्रेट की डिग्री प्राप्त की। 1 अगस्त, 1939 को उन्हें काइजर्सवर्थ के सैनिक अस्पताल की फार्मेसी का प्रभारी बना दिया गया। इसके एक महीने बाद ही जर्मनी के तानाशाह शासक हिटलर ने पोलेन्ड पर आक्रमण कर द्वितीय विश्व युद्ध का बिगुल बजा दिया था। उस समय काइजर्सवर्थ में दो हजार लोग रहते थे। दवाइयों की किल्लत और काला-बाजारी की उस कठिन घड़ी में भी जोहाना ने सूझ-बूझ से जुगाड़-तुगाड़ करके अपनी फार्मेसी में दवाइयों का पर्याप्त भन्डारण कर रखा था और युद्ध की उस घड़ी में किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए वह तैयार थी। उसके बढ़ते कद और प्रगति को देख कर कई लोग उससे जलने लगे थे और कई बार उसे पर्याप्त सहयोग भी नहीं करते थे। 

डॉ. जोहाना बुडविग बनी महान वैज्ञानिक 

द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद 1949 में उन्होंने काइजर्सवर्थ छोड़ दिया था। इन दिनों भी प्रोफेसर कॉफमेन जो म्युन्स्टर विश्वविद्यालय में फार्मेसी के प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। जब उन्हें पता चला कि जोहाना ने भी काइजर्सवर्थ छोड़ दिया है तो उन्होंने जोहाना को म्युन्स्टर विश्वविद्यालय में अपने साथ काम करने के लिए राजी कर लिया, क्योंकि वे तो प्रारंभ से ही जोहाना से बड़े प्रभावित थे। उन्होंने डॉ. जोहाना के लिए अपने घर के बेसमेंट में लेब बनवाई और अनुसंधान हेतु सारी सुविधायें मुहैया करवाई। उन दिनों डॉ. कॉफमेन जर्मनी और पूरे विश्व में फैट पोप के नाम से विख्यात थे। 1951 में जोहाना को ससम्मान फैडरल इंस्टिट्यूट पॉर हैल्थ रिसर्च के फार्मास्युटिकल और फैट्स विभाग में वरिष्ट विशेषज्ञ पद दिया गया। यह देश का सबसे बड़ा पद था जो नई दवाओं को जारी करने की स्वीकृति देता था। उन दिनों उनके पास सल्फहाइड्रिल (सल्फर युक्त प्रोटीन यौगिक) श्रेणी की कैंसररोधी दवाओं के कई आवेदन स्वीकृति के लिए विचाराधीन थे। उन दिनों कैंसर के उपचार में फैट्स की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही थी। 

जोहाना फिजिक्स और केमिस्ट्री में बहुत पारंगत थी और यह ज्ञान उनके यहाँ बहुत काम आया। उन्होंने फैट्स पर शोध-कार्य शुरू कर दिया था। जोहाना ने पहली बार वसा या फैट्स को पृथक कर उसमें विद्यमान फैटी-एसिड्स को पहचानने के लिए पेपरक्रोमेटोग्राफी की तकनीक विकसित की थी। यह एक क्रान्तिकारी आविष्कार था, जिससे कई रोगों के उपचार की शोध के द्वार खुल सकते थे और चिकित्साशास्त्र के अनेक रहस्यों को जानना संभव हो चला था। बुडविग ने इस चमत्कारी खोज की विस्तृत रिपोर्ट फैट विश्लेषण के नये तरीके के नाम से फैट और साबुन के जरनल तथा अन्य कई पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाये। 

बुडविग ने खोले कोशिकीय श्वसन के सारे रहस्य 

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। नॉबेल पुरस्कार विजेता ऑटो वारबर्ग ने 1928 में सिद्ध कर दिया था कि कैंसर का मुख्य कारण कोशिकीय श्वसन-क्रिया की आखिरी कड़ी साइटोक्रोम-ऑक्सीडेज एंजाइम (जिसे वारबर्ग एंजाइम भी कहते हैं) का बाधित होना है और कैंसर कोशिका ऑक्सीजन के अभाव में ग्लूकोज को खमीर करके ऊर्जा प्राप्त करती है। 1911 में स्वीडन के टोर्स्टन थनबर्ग की खोज से यह बात सिद्ध हुई थी कि सल्फर हाइड्रोजन ग्रुप या थायोल (एल-सिस्टीन अमाइनो एसिड), जो दही और पनीर में बहुतायत से पाया जाया है, साइटोक्रोम-ऑक्सीडेज एंजाइम को उत्प्रेरित करता है। थनबर्ग ने यह भी बतलाया था कि थायोल अकेला श्वसन-क्रिया को उत्प्रेरित करने में सक्षम नहीं है बल्कि अपने एक जोड़ीदार साथी के साथ मिल कर यह कार्य करता है और यह रहस्यमय जोड़ीदार साथी संभवतः कोई फैटी एसिड होना चाहिये। वारबर्ग भी यही संभावना जता रहे थे। लगभग आधी सदी गुजर गई पर कोई भी शोधकर्ता इस रहस्यमय तत्व को नहीं ढूँढ पाया। आखिरकार 1949 में बुडविग ने ज्ञान का दीपक जलाया और उनके द्वारा विकसित की गई पेपर क्रोमेटोग्राफी द्वारा इन रहस्यमय तत्वों लिनोलिक और अल्फा-लिनोलेनिक अम्ल को पहचाना। उन्होंने यह भी पता लगाया कि ऊर्जावान पाई-इलेक्ट्रोन्स के बादलों से युक्त ये वसा-अम्ल ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल में आदर्श अनुपात और प्रचुरता में पाये जाते हैं। बुडविग ने इन वसा-अम्लों को गुड-फैट्स या कारक-वसा का नाम दिया। 

डॉ. जोहाना बुडविग ने खोजा कैंसर का उपचार 

इसके बाद उन्होंने म्युन्स्टर के चार बड़े अस्पतालों में जाकर हजारों रोगियों के रक्त के नमूने लिए और पाया कि कैंसर और अन्य गंभीर रोगों से पीड़ित लोगों के रक्त में इन दोनों वसा-अम्लों की मात्रा बहुत कम पाई गई थी। कैंसर के जिन रोगियों की हालत बहुत गंभीर थी और कैंसर बहुत तेजी से फैल रहा था उनमें ये ओमेगा-3 वसा-अम्ल बहुत ही कम मात्रा में थे। जैसे ही बुडविग ने इन रोगियों को अलसी के तेल और पनीर का मिश्रण (लिनोलिक, अल्फा-लिनोलेनिक अम्ल और एल-सिस्टीन का मिश्रण) पिलाना शुरू किया, इनकी हालत सुधरने लगी और कैंसर की गाँठें छोटी होने लगी। जब इन वसा-अम्लों और एल-सिस्टीन या सल्फर हाइड्रोजन ग्रुप (थायोल) को मिलाया जाता है तो एल-सिस्टीन वसा-अम्ल पर गुंजन करते पाई-इलेक्ट्रोन्स चिपक कर हाइड्रोजन-सेतु या ब्रिज बनाते हैं, पानी में घुलनशील लाइपोप्रोटीन का निर्माण होता है। ये लाइपोप्रोटीन्स स्वस्थ कोशिका और माइटोकोन्ड्रिया की भित्तियों की संरचना का मुख्य घटक बनते हैं। 

सक्रिय, शास्वत और ऊर्जावान इलेक्ट्रोन अपने गुंजन और नृत्य से प्राणवायु (ऑक्सीजन) को मोहित करते हैं, प्रणय निवेदन करते हैं, चुम्बक की भांति आकर्षित करते हैं। प्रेम विभोर हुई सुंदर और सलोनी प्राणवायु (ऑक्सीजन) बाँहें फैलाये हाइड्रोजन-सेतु (जो सल्फर हाइड्रोजन ग्रुप और अल्फा-लिनोलेनिक एसिड के बीच का बंधन है) पर मटकती, इठलाती, केटवॉक करती इलेक्ट्रोन के पास पहुँचती है। जैसे ही ऑक्सीजन इलेक्ट्रोन को आलिंगन में भरती है, प्रणय चुम्बन लेती है, प्यार में संत्रप्त हो जाती है और अपनी सारी जीवन शक्ति इलेक्ट्रोन के कदमों में समर्पित करके प्राण त्याग देती है और उसकी बाँहों में पिघल कर पानी-पानी हो जाती है। यही सच्चे प्रेम का फलसफा है। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन का एक अणु चार इलेक्ट्रोन्स और आठ प्रोटोन्स से मिल कर पानी के दो अणु बनाता है। ये आठ प्रोटोन्स मेट्रिक्स से लिए जाते हैं, चार तो पानी बनाने में खप जाते हैं और बाकी चार ऊर्जा पैदा करने वाले जनरेटर (एटीपी सिंथेज एंजाइम) को घुमाते हैं। संक्षेप में इस क्रिया को इस समीकरण द्वारा व्यक्त करते हैं। 

8 H+in + O2 → 2 H2O + 4 H+out 

इस तरह बुडविग ने अलसी के तेल व पनीर के मिश्रण, फलों व सब्जियों और स्वस्थ आहार-विहार के समन्वय से कैंसर और अन्य गंभीर रोगों के उपचार का तरीका विकसित किया था, जिसे बुडविग प्रोटोकोल के नाम से जाना जाता है। 

तेलों का हाइड्रोजनीकरण मानव के लिए घातक विष के समान 

उन दिनों फैट्स की शैल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े संस्थान तेलों का हाइड्रोजनेट (उच्च तापमान पर निकल धातु की उपस्थिति में तेलों में से हाइड्रोजन गैस प्रवाहित करने की प्रक्रिया को हाइड्रोजनीकरण कहते हैं) और परिष्कृत Refine (जो परिष्कृत जैसे सुसंस्कृत नाम से दुष्प्रचारित प्रक्रिया है जिसमें तेलों में कई घातक रसायन मिलाये जाते हैं और तेलों को कई बार उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है) करके मार्जरीन, शॉर्टनिंग या वनस्पति घी बना कर मक्खन के विकल्प के रूप में धड़ल्ले से बेच रहे थे। पूर्ण हाइड्रोजनीकरण करने पर फैट सामान्य तापमान पर ठोस रहता है, जो देखने में सफेद, ठोस और मक्खन जैसा लगता है, जिसका प्रयोग बिस्किट, ब्रेड, कुकीज़, पास्ता, नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, आइसक्रीम, चॉकलेट और तमाम पैकेट बंद खाने की चीज़े बनाने के लिए किया जाने लगा था। आंशिक हाइड्रोजनीकरण करने पर फैट सामान्य तापमान पर तरल ही रहता है, जिसका प्रयोग तलने के लिए किया जाने लगा था। तेलों का हाइड्रोजनीकरण करने, परिष्कृत करने या उच्च तापमान पर गर्म करने से उसमें घातक ट्रांसफैट बन जाते हैं, जो हमारे शरीर को विभिन्न रोगों का शिकार बनाते हैं। पेपरक्रोमेटोग्राफी तकनीक द्वारा ये सारे रहस्य परत दर परत खुलते चले गये। डॉ. बुडविग इन फैट्स को हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक मानती थी और इन्हें स्यूडो फैट या प्लास्टिक या मारक फैट कहती थी। उच्च तापमान और विभिन्न रसायन इन फैट्स की शैल्फ लाइफ तो बढ़ा देते हैं, लेकिन साथ में सजीव और प्राकृतिक फैट्स में विद्यमान इलेक्ट्रोन्स के बादलों को भी नष्ट कर देते हैं। इलेक्ट्रोन्स निकल जाने से ये फैट्स ऑक्सीजन को आकर्षित करने की क्षमता भी खो बैठते हैं तथा कोशिकाओं को ऑक्सीजन न मिलने के कारण कोशिकाओं का दम घुटने लगता है, कोशिकाएँ शर्करा को खमीर करके ऊर्जा प्राप्त करने लगती है, कोशिकाएं रुग्ण होने लगती हैं और कैंसर तथा अन्य रोगों से ग्रस्त होने लगती हैं। ये ट्रांसफैट कोशिकीय श्वसन-क्रिया को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। डॉ. बुडविग ने इस विषय पर अपने शोध-पत्र सभी मेडीकल जरनल्स में प्रकाशित करवाये और उन्होंने मार्जरीन का प्रयोग बंद करने के लिए सबूतों के साथ खुल कर बोलना शुरू कर दिया। बस यही बात मार्जरीन बनाने वाले बहुराष्ट्रीय-संस्थानों को पसंद नहीं आई और उनका विरोध करना शुरू कर दिया। वे करोड़ों अरबों के वारे-न्यारे करने वाला यह फलता-फूलता व्यवसाय कैसे बंद कर सकते थे। प्रोफेसर कॉफमेन भी समय की नज़ाकत को देखते हुए पीछे हट गये थे। मार्जरीन बनाने वाले संस्थानों ने चाँदी के सिक्कों से राजनेताओं और कॉफमेन का मुँह बंद कर दिया था। सब मिल कर जोहाना के विरुद्ध खड़े हो गये थे। कॉफमेन ने जोहाना को पहले प्रेम से समझाया, फिर एक मेडीकल स्टोर और ढेर सा पैसा रिश्वत में देने की कौशिश की। मार्जरीन बनाने वाले बहुराष्ट्रीय-संस्थानों ने भ्रष्ट राजनेताओं और कॉफमेन के साथ मिल कर जोहाना को हर तरह से प्रताड़ित करने की योजना बनाने लगे। सरकारी प्रयोगशाला में उनके प्रवेश पर रोक लगा दी, उनसे सरकारी पद छीन लिया गया और उन पर कई झूँठे लगभग 30 मकदमे मामले दायर कर दिये। लेकिन निडर, अडिग और सच्चाई की प्रतिमा जोहाना नहीं झुकी। काश कॉफमेन ने उनकी मदद की होती तो शायद आज इस धरती का स्वरूप कुछ और होता। पता नहीं कब तक इन पापियों के दुष्कर्मों की सजा दुनिया के निर्दोष लोगों को भुगतनी पड़ेगी। इसके बाद जोहाना का मन म्युन्स्टर से उचट गया और वो 1955 में विधिवत मेडीकल की शिक्षा लेने के उद्देश्य से गोटिंजन चली गई थी। 

गोटिंगन मेडीकल यूनिवर्सिटी में मेडिकल छात्रा बनी जोहाना 

गोटिंगन में भी उन्होंने अपने शोध-कार्य को जारी रखा और अपनी मेडीकल शिक्षा भी लेती रही। मेडीकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्टियस की पत्नि स्तन कैंसर से पीड़ित थी जिसका बुडविग ने सफलतापूर्वक उपचार किया। तभी स्विट्ज़रलैंड से एक आँत के कैंसर की रोगी गोटिंगन की क्लिनिक में उनके पास आई थी। उसका कैंसर यकृत, आमाशय और पेट में फैल गया था। उसे वहाँ के कई विशेषज्ञों ने देख लिया था, गाँठ के दबाव से उसके मल-मार्ग के पूर्णतः अवरुद्ध होने का खतरा था और क्रिसमस के दिन उसका ऑपरेशन होने वाला था। उसने तुरंत बुडविग का उपचार शुरू किया। उसे चमत्कारी लाभ हुआ और ऑपरेशन भी नहीं करना पड़ा। सात सप्ताह बाद उसकी गाँठे ठीक हो चुकी थी। उसकी हालत और शक्ल में बहुत सुधार आ चुका था और वह कॉफी युवा दिख रही थी। घर लौटते समय स्विट्ज़रलैंड के कस्टम ऑफीसर्स भी यकीन नहीं कर पा रहे थे कि यह वही महिला है जिसका पासपोर्ट उन्हें दिखाया जा रहा है। इस रोगी के बारे में डॉ. बुडविग ने अपनी पुस्तक डैथ ऑफ ए ट्यूमर द्वितीय (1977, पृष्ठ 74) में लिखा है और तब तक वह स्वस्थ और जीवित थी। इसके बाद मेडीकल यूनिवर्सिटी की रजामंदी से वे बुडविग प्रोटोकोल से कैंसर के रोगियों का उपचार करने लगी और इसमें उन्हें चमत्कारी परिणाम मिलने लगे। यह देख कर यूनिवर्सिटी ने उन्हें कहा कि वे रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी को अपने उपचार में शामिल कर उपचार करें और विधिवत शोध करें। उनके मतानुसार ये दोनों उपचार एक दूसरे के विपरीत थे। इसलिए वे रेडियो और कीमो को अपने उपचार में कैसे शामिल कर सकती थी। बस यहीं से मतभेद तथा टकराव शुरू हो गये और इतने बढ़ गये कि उन्होंने अपनी शिक्षा को भी अधूरा ही छोड़ा और वे डाइटर्सवीलर फ्रुडेनस्टेड में बस गई और जीवन के अंतिम दिनों तक वहीं रही। 

डॉ. बुडविग का आखिरी पड़ाव - फ्रुडेनस्टेड 

बुडविग ने फ्रुडेनस्टेड में कैंसर के रोगियों का उपचार करना जारी रखा। यहाँ उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा में डिग्री हासिल की और उपचार हेतु लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया था ताकि उस कैंसर के रोगियों का उपचार करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं आये। 1968 में डॉ. बुडविग ने कैंसर के उपचार के लिए ओम खंड के साथ साथ एक विशेष तरह का इलेक्ट्रोन डिफ्रेन्शियल तेल भी विकसित किया था, जिसे अंग्रेजी में वे ELDI Oil या एलडी तेल कहती थी। उनके उपचार से लोग ठीक हो रहे थे और सब अचंभित थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि उनसे उपचार लेने वालों में डॉक्टर और उनके परिवार के सदस्य भी बहुत होते थे। उनके उपचार से ठीक हुए कम से कम 2500 रोगियों के विवरण जग जाहिर हैं जिन्हें आप इंटरनेट की अनेकों वेबसाइट्स पर पढ़ सकते हैं। कई विख्यात डॉक्टर्स और अनुसंधानकर्ता उनके ठीक हुए रोगियों से मिले हैं, पूछताछ की हैं और उन्हें लिपिबद्ध किया है। सारे विवरण इन्टरनेट पर बिखरे पड़े हैं। गूगल पर मात्र बुडविग लिखने पर 15 लाख वेब साइटें खुलती हैं। उनके सफल उपचार को देखते हुए उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए सात बार नामांकित किया गया था। पहला नामांकन 1979 में हुआ था। परन्तु सशर्त नोबेल पुरस्कार लेना उन्हें कभी मंजूर नहीं था। 

स्टुटगर्ट रेडियो पर डॉ. बुडविग का साक्षात्कार 

एकबार स्टुटगर्ट के साउथ जर्मन रेडियो स्टेशन पर 9 नवम्बर, 1967 (सोमवार) को रात्रि के पौने नौ बजे प्रसारित साक्षात्कार में डॉ. बुडविग ने सिर उठा कर गर्व से कहा था और जिसे पूरी दुनिया ने सुना था कि यह अचरज की बात है थी मेरे उपचार द्वारा कैंसर कितनी जल्दी ठीक होता है। एक 84 वर्ष की महिला को आँत का कैंसर था, जिसके कारण आंत में रुकावट आ गई थी और आपातकालीन शल्यक्रिया होनी थी। मैंने उसका उपचार किया जिससे कुछ ही दिनों में उसके कैंसर की गाँठ पूरी तरह खत्म हो गई, ऑपरेशन भी नहीं करना पड़ा और वह पूरी तरह ठीक हो गई। इसका जिक्र मैंने मेरी पुस्तक द डैथ ऑफ ए ट्यूमर की पृष्ठ संख्या 193-194 में किया है। कैंसर के वे रोगी जिन्हें रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी से कोई लाभ नहीं होता है और जिन्हें अस्पताल से यह कर छुट्टी दे दी जाती है कि अब उनका कोई इलाज संभव नहीं है, भी मेरे उपचार से ठीक हो जाते हैं और इन रोगियों में भी मेरी सफलता दर 90% है। 

जोहाना और भतीजा आर्मिन 

उनके परिवार में कोई नहीं था। न उन्हें कभी किसी से प्यार हुआ और न ही उन्होंने कभी विवाह किया। हाँ अपने अनाथ भतीजे आर्मिन को उसने हमेशा अपने साथ रखा और बेटे की तरह उसका पालन-पालन किया। स्वयं तो कभी मेडीकल की शिक्षा पूरी नहीं कर सकी पर उन्होंने आर्मिन की पढ़ाई पर शुरू से ध्यान दिया और उसे डॉक्टर बनाया। आर्मिन ने भी अंत तक उन्हें मां की तरह समझा और उनकी हर तरह से सेवा और सहायता की। डॉ. आर्मिन ने बुडविग फाउन्डेशन नामक संस्था बनाई और डॉ. बुडविग की शोध को आगे जारी बढ़ाया। अंत तक वह जगह-जगह व्याख्यान देती रही, यात्राएं करती रही और लोगों को अपने चमत्कारी उपचार के बारे में बताती रही। उनके व्याख्यानों को सुनने के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। उनकी 3-4 पुस्तकें अंग्रेजी में अनुवादित हुई हैं, जिनकी ढाई लाख प्रतियाँ अकेले अमेरिका में बिकी हैं। वे आजीवन शाकाहारी रहीं। जीवन के अंतिम दिनों में भी वे ऊर्जावान, सुंदर, स्वस्थ रही और अपनी आयु से काफी युवा दिखती थी। 

28 नवंबर, 2002 को वे घर में अकेली थी और स्नानागार जाते समय उन्हें हल्के से चक्कर आये और वे गिर गई जिससे उनकी दांई फीमर का ऊपरी सिरा टूट गया। उनके चिल्लाने की आवाज सुन कर एक रोगी और पड़ौसी दौड़ कर आये और उन्हें एक नर्सिंग होम में ले गये। इस घटना के बाद उनकी तबियत ज्यादा ठीक नहीं रही और वे फिर शैया से नहीं उठ पाई। आखिरी दिनों में असहाय और बीमार बुडविग नर्सिंग होम के चिकित्सा कर्मियों से गुहार लगाती रही कि उसे अलसी के तेल और पनीर से बना ओमखंड दिया जाये परन्तु किसी ने उसकी नहीं सुनी। अन्ततः कुछ महीनों बाद 19 मई, 2003 को वे परलोक सिधार गई। 

पूरे विश्व के मुख्य चिकित्सा जगत द्वारा अपनी इस महान खोज को सर्व सम्मति से मान्यता मिलते देखना शायद उस महान देवी के नसीब में नहीं था। इतनी महान वैज्ञानिक और इतनी बड़ी खोज का ऐसा अपमान और तिरस्कार मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ। एक तरफ तो कैंसर का ऐसा सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान लोगों तक पहुँच नहीं पाया और दूसरी तरफ हमारे कैंसर के रोगी रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी के लिए मौत के सौदागरों को ढ़ेर सारा पैसा देकर मौत खरीद रहे हैं। आखिर हम कब जागेंगे???

2 comments:

sureshTamrakar said...

डा.योहाना का फोटो भी लगाते तो और अच्छा रहता। वैसे आपने परिचय बहुत बढ़िया लिखा है।

uthojago said...

Dr budwig 's life is inspiring. she was a great Oncologist