Thursday, January 19, 2012

मुन्नाभाई की आत्मकथा


Cell Phone - Friendly pigeon or Brain Bug ???


सेलफोन  
फ्रैंडली पिजन 
   या      
ब्रेन बग





डॉ. ओ.पी.वर्मा
अध्यक्ष, अलसी चेतना यात्रा
7-बी-43, महावीर नगर तृतीय
कोटा, राज. http://flaxindia.blogspot.com
+919460816360


आज सेलफोन हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है। आज  बिना सेलफोन के जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है। जिधर देखो उधर आपको लोग हाथ में सेलफोन थामें दिखाई देंगे, ठीक वैसे ही जैसे द्वापर युग में श्री कृष्ण अपनी अंगुली में सुदर्शन चक्र धारण करके घूमा करते थे।   देखते ही देखते पिछले 15 वर्षों में  सेलफोन के जाल ने पूरे विश्व को जकड़  लिया है।  किशोर लड़के और लड़कियाँ तो सेलफोन के दीवाने हो चुके हैं, सुबह  से लेकर रात  तक सेलफोन से ही चिपके रहते हैं। भारत में सेलफोन की क्रांति लाने में अंबानी बंधुओं  का भी बहुत बड़ा हाथ है। "कर लो दुनिया मुट्ठी में" के नारे का सहारा लेकर इन्होंने खूब मोबाइल रूपी मौत का कारोबार किया। लोग तो दुनिया को शायद अपनी मुट्ठी में नहीं कर सके लेकिन अंबानी बन्धु जरूर टाटा, बिरला आदि सभी अमीरों को पीछे छोड़ कर भारत के सबसे अमीर आदमी बन बैठे।


बाजार में शौकीन लोगों के लिए कई कम्पनियाँ हीरे-जवाहरात जड़े नित नये मंहगे और नायाब सेलफोन भी बेचने लगी हैं। 2009 में स्टुअर्ट ह्यूजेस कम्पनी ने दुनिया का सबसे मंहगा गोल्डस्ट्राइकर आईफोन बाजार में उतारा था। इस फोन को बनाने में 271 ग्राम सोना और 200 हीरे काम में लिए गये हैं। 53 खूबसूरत रत्नों से ऐपल का लोगो बनाया है और होम बटन पर 7.1 केरेट का बड़ा हीरा जड़ा गया है। इसकी कीमत 3.2 मिलियन डॉलर (लगभग 15 करोड़ रुपये) रखी गई है। लेकिन इतना मंहगा होने पर भी यह है तो मौत का ही सामान।


आज पूरे विश्व में 5.6 बिलियन सेलफोन उपभोक्ता हैं। भारत विश्व में दूसरे नम्बर पर आता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार नवम्बर, 2011 में हमारे यहाँ 881,400,578 सेलफोन उपभोक्ता थे। यानि हमारे 73.27%  लोग सेलफोन रखते हैं। एक अनुमान के अनुसार 2014 तक यह संख्या एक अरब हो जायेगी। लेकिन मुद्दे की बात यह है कि सरकारी संस्थाओं नें बिना सोचे-समझे आम लोगों को सेलफोन बेचने की स्वीकृति दे दी, यह नहीं सोचा कि इससे निकलने वाली इलेक्ट्रोमागनेटिक तरंगे हमारे स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा तो नहीं बन जायेंगी। अफसोस इस बात का है कि इसकी सुरक्षा को लेकर कोई शोध नहीं की गई और हर आदमी को यह खतरे का झुनझुना पकड़ा दिया। चलिये आज मैं आपको  संक्षेप में सेलफोन के खतरों से रूबरू करवाता हूँ और उनसे बचने के तरीकों पर स्पष्ट और निष्पक्ष चर्चा भी करता हूँ। 

इतिहास
चल दूरभाष यानि तारयुक्त टेलीफोन

मैं आपको फोन और सेलफोन के इतिहास के बारे में भी बतलाता हूँ। सचमुच सन् 1876 विश्व के इतिहास में बहुत अहम था। क्योंकि इसी वर्ष एडिनबर्ग, स्कॉटलैंड, ब्रिटेन के एलेक्जेंडर ग्राहम बेल (3 मार्च, 1847 – 2 अगस्त, 1922) ने टेलीफोन का आविष्कार किया था। यह एक महान आविष्कार था। एक साल बाद ही सन् 1877 में उन्होंने बेल टेलीफोन कम्पनी बना ली थी  और उनके इस क्रांतिकारी आविष्कार ने पूरे विश्व को समेट कर एक वैश्विक गांव बना दिया था। इसी वर्ष उन्होंने मबेल गार्डिनर हबर्ड से विवाह रचाया और एक साल की लम्बी हनीमून यात्रा पर यूरोप निकल पड़ेकालान्तर में उनके दो पुत्रियां एल्सी और मैरिएन पैदा हुई।  28 जनवरी, 1882 का दिन भारत के इतिहास में रेड लेटर डे के नाम से अंकित है, इस दिन भारत में पहली बार टेलीफोन सेवाएं जो शुरू हुई थी। कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में टेलीफोन एक्सचेंज बनाये गये  और 93 उपभोक्ताओं को टेलीफोन कनेक्शन दिये गये।

अचल दूरभाष यानि सेलफोन
लगभग आधी सदी तक जिन तारों ने हमारे टेलीफोन्स ही नहीं बल्कि हमारे दिलों को भी जोड़ कर रखा था,  उन्हें  मार्टिन कूपर (जन्म - 26 दिसंबर, 1928  शिकागो, इलिनोइस, अमरीका) ने सन् 1973 में  कुतर डाला और इलेक्ट्रोमागनेटिक तरंगो पर आधारित दूरसंचार की नई टेक्नोलोजी विकसित की। इस तरह उन्होंने सेलफोन का आविष्कार किया। तब ये मोटोरोला कम्पनी के उपाध्यक्ष थे। बाद में इन्होंने ऐरे कोम नामक कम्पनी बनाई। इन्हें मोबाइल फोन का पिता कहा जाता है। लेकिन 1983 में जाकर मोटोरोला कम्पनी ने अमेरिका में पहली बार सेलफोन सेवाएं शुरू की थी। भारत में पहली मोबाइल फोन सेवाएं पश्चिमी बंगाल में मोदी टेलस्ट्रा मोबाइलनेट कम्पनी ने 31 जुलाई, 1995 के शुरू की थी और इसका विधिवत उद्घाटन वहाँ के मुख्य मंत्री ने किया था। 
सेलफोन के खतरे
सेलफोन या मोबाइल फोन एक माइक्रोवेव ट्रांसमीटर है। माइक्रोवेव तरंगें रेडियो वेव या विद्युत-चुम्बकीय तरंगे होती हैं, जो प्रकाश की गति (186,282 मील प्रति सैकण्ड की) से चलती है। इन तरंगों की आवृत्ति (Frequency) सामान्यतः 800, 900 और 1900 Mega Hertz (MHz) होती है अर्थात ये एक सैकण्ड में लाखो करोड़ों बार कंपन्न करती हैं। नई 3-जी तकनीक से लेस मोबाइल 1900-2200 MHz की आवृत्ति पर काम करते हैं और वाई-फाई सिस्टम लगभग 2450 MHz की आवृत्ति पर काम करते हैं। जब हम सेलफोन का प्रयोग नहीं कर रहे होते हैं तब भी वह  रेडियेशन छोड़ता रहता है, क्योकि इसे हर मिनट टॉवर को अपनी स्थिति की सूचना देनी होती है। सेलफोन हमारी आवाज की तरंगों के छोटे-छोटे पुलिंदे (Packets) बना कर रेडियो तरंगों पर लाद कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजता है, यानि रेडियो तरंगें वाहन के रूप में कार्य करती हैं। आधुनिक युग में टेलीविजन, इंटरनेट, सेलफोन या टेलीफोन संदेशों के प्रसारण  में माइक्रोवेव तरंगों की मदद ली जाती है। सेल्यूलर बायोकेमिस्ट्री के जरनल के अनुसार ये तरंगे हमारे डी.एन.ए. तथा उसका जीर्णोद्धार करने वाले तंत्र को क्षतिग्रस्त करती हैं और हृदय के पेसमेकर की कार्यप्रणाली को बाधित कर सकते हैं। माइक्रोवेव के कुप्रभाव से हमारी कोशिकाएं जल्दी जीर्णता को प्राप्त होती है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रध्यापक डॉ. हेनरी लाइ ने स्पष्ट कहा है कि माइक्रोवेव तरंगे अमेरिकन सरकार द्वारा तय मानक के काफी कम मात्रा में भी मस्तिष्क को क्षति पहुँचाती हैं। 
दशकों पहले कई वैज्ञानिकों ने बतला दिया था कि माइक्रोवेव से कैंसर होने की संभावना रहती है। शायद आपको याद होगा कि शीत युद्ध के समय रूस ने मास्को स्थित अमेरिकन दूतावास में गुप्त रूप से माइक्रोवेव ट्रांसमीटर लगा दिया था, जिससे अमेरीका के दो राजदूत ल्यूकीमिया के शिकार बने और कई अन्य  कर्मचारी भी कैंसर से पीड़ित हुए।
सामान्य विकार
शरीर के पास मोबाइल रखने से विकिरण के ताप संबंधी प्रभाव हो सकते हैं, जिसके कारण थकावट, मोतियाबिंद, और एकाग्रता में कमी आदि लक्षण हो सकते हैं। इसके कुछ अन्य गैर ऊष्मीय प्रभाव जैसे सिर की त्वचा पर जलन, सिहरन या चकत्ते बन जाना, थकान, निद्रा, चक्कर आना, कानों में घंटियां बजना, प्रतिक्रिया देने में वक्त लगना,  एकाग्रता में कमी,  सिरदर्द, सूंघने की शक्ति कम होती है, पाचन तंत्र में गड़बड़ी, दिल की धड़कन बढ़ना, जोड़ों में दर्द, मांस-पेशियों में जकड़न और हाथ पैर में कंपकंपी इत्यादि भी संभव हैं। श्वेत रक्त-कणों की संख्या, कार्यक्षमता कम हो जाती है। मास्ट कोशिकाएँ ज्यादा हिस्टेमीन बनाने लगती हैं जिससे श्वासकष्ट या अस्थमा हो जाता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि सेलफोन गर्भवती स्त्रियों के पेट में पल रहे भ्रूण को नुकसान पहुँचा सकता है, इसलिए वे सावधान रहें और सेलफोन का प्रयोग नहीं करें। 
नैत्र विकार
आँखों में मोतियाबिंद, आँखों में कैंसर और दृष्टि-पटल क्षतिग्रस्त होता है।
मस्तिष्क और कैंसर
सेलफोन खोपड़ी की नाड़ियों को क्षति पहुँचाते हैं। मस्तिष्क को रक्त पहुँचाने वाले रक्त-मार्ग की बाधायें खोल देते हैं जिससे विषाणु और दूषित तत्व मस्तिष्क में घुस जाते हैं। सेलफोन से निकलने वाली ई.एम. तरंगे मेलाटोनिन का स्तर भी कम करती हैं। यह मेलाटोनिन एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेन्ट, एंटीडिप्रेसेन्ट तथा रक्षाप्रणाली संवर्धक है और हमारे शरीर की जीवन-घड़ी (Circadian Rhythm) को भी नियंत्रित करता है।  एल्झाइमर, पार्किंसन्स रोग और कैंसर से बचाता है। इसका स्तर कम होने से कैंसर, एल्झाइमर, पार्किन्सन रोग, कई निद्रा-विकार और अवसाद होने का जोखिम बढ़ जाता है।
डॉ. कोर्लो के अनुसार जीवित ऊतक को रेडियो या विद्युत-चुम्बकीय तरंगों से इतना खतरा नहीं हैं। असली दुष्मन तो ध्वनि या डाटा से बनी द्वितीयक तरंगे हैं, जिनकी आवृत्ति Hertz में होती है और जिसे हमारी कोशिकायें पहचानने में सक्षम हैं। हमारे ऊतक इन तरंगों को आतंकवादी हमले के रूप में लेते हैं और सुरक्षा हेतु समुचित जीवरसायनिक कदम उठाते हैं।  जैसे कोशिकायें ऊर्जा को चयापचय के लिए खर्च न करके सुरक्षा पर खर्च करने लगती हैं। भित्तियां कड़ी हो जाती हैं, जिससे पोषक तत्व कोशिका के बाहर ही और अपशिष्ट उत्पाद अंदर ही बने रहते हैं। जिससे कोशिका में मुक्त-कण बनने लगते हैं और डी.एन.ए. का जीर्णोद्धार-तंत्र तथा कोशिकीय क्रियाएं बाधित होने लगती हैं। फलस्वरूप कोशिकाएं मरना शुरू हो जाती हैं, टूटे हुए डी.एन.ए. से माइक्रोन्यूक्लियाई (Micronuclei ) बाहर निकल जाते हैं और उन्मुक्त होकर विभाजित और नई कोशिकाएं बनाने लगते हैं। कोर्लो इसी प्रक्रिया को कैंसर का कारक मानते हैं। साथ ही कोशिकाओं में प्रोटीन क्षतिग्रस्त हो जाता है जिससे अन्तरकोशिकीय संवाद बंद हो जाता है, फलस्वरूप शरीर के कई कार्य बाधित हो जाते हैं।
मस्तिष्क में कई तरह के कैंसर जैसे ऐकॉस्टिक न्यूरोमा, ग्लायोमा, मेनिनजियोमा, ब्रेन लिम्फोमा, न्यूरोईपिथीलियल ट्यूमर आदि सबसे बड़ा खतरा है।  1975 के बाद अमेरिका में मस्तिष्क के कैंसर की दर में 25%  का इजाफा हुआ है। अमेरिका में सन् 2001 में 185,000 लोगों को किसी न किसी तरह का मस्तिष्क कैंसर हुआ। मस्तिष्क में अंगूर के दाने बराबर कैंसर की गाँठ मात्र चार महीने में बढ़ कर टेनिस की गैंद के बराबर हो जाती है। मस्तिष्क कैंसर सामान्यतः बहुत घातक होता है, तेजी से बढ़ता है और रोगी की 6-12 महीने में मृत्यु हो जाती है।
अग्न्याशय, थायरॉयड, अण्डाशय और वृषण (Testes) आदि  ग्रंथियों संबन्धी विकार हो जाते हैं। पैंट की जेब में मोबाइल रखने से शुक्राणु की गणना और गतिशीलता 30%  तक कम हो जाती है और सेलफोन प्रयोक्ता स्थाई नपुंसकता को प्राप्त हो जाता है। 
 डी-कम्पनी के नये मोबाइल
बच्चे और किशोर ज्यादा संवेदनशील  
बच्चों और किशोरों के लिए सेलफोन का प्रयोग बेहद खतरनाक हो सकता है। कुछ यूरोप के देशों ने अभिभावकों को कड़े निर्देश जारी दिये हैं कि वे अपने बच्चो को सेलफोन से दूर रखें। यूटा विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ता मानते हैं कि बच्चा जितना छोटा होगा, उतना ही ज्यादा विकिरण का अवशोषण होगा, क्योंकि उनकी खोपड़ी की हड्डियां पतली होती है, मस्तिष्क छोटा, कोमल तथा विकासशील होता हैं और माइलिन खोल बन रहा होता है। स्पेन के अनुसंधानकर्ता बतलाते हैं कि सेलफोन बच्चों के मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को कुप्रभावित करते हैं, जिससे उनमें मनोदशा (Mood) तथा व्यवहार संबन्धी विकार होते हैं, चिढ़चिढ़ापन आता है और स्मरणशक्ति कमजोर होती है। बच्चों में ब्रेन कैंसर का खतरा बहुत अधिक रहता है।   
कार में खतरा ज्यादा 
बंद कार में सेलफोन को टावर से समुचित संपर्क बनाये रखने के लिए सेलफोन को बहुत तेज रेडियो तरंगे छोड़नी पड़ती है। इसलिए कार में माइक्रोवेव रेडियेशन की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसीलिए यूरोप का मशहूर और जिम्मेदार कार निर्माता वोल्कसवेगन अपने खरीदारों को स्पष्ट निर्देश देता है कि कार में सेलफोन का प्रयोग बहुत घातक साबित हो सकता है क्योंकि सेलफोन कार में बेहद खतरनाक मात्रा में इलेक्ट्रोमेगनेटिक रेडियेशन निकालते हैं। 


भारत में ई.एम. रेडियेशन की स्थिति चिंताजनक
भारत की स्थिति और भी  गंभीर है। जयपुर को ही लीजिये, यहाँ आदिनाथ मार्ग निवासी जैम पैलेस के संचालक दो भाइयों को तीन माह के अंतराल में ही ब्रेन कैंसर हो गया। बड़े भाई 55 वर्षीय संजय कासलीवाल लाखों रुपए खर्च कर आठ माह बाद अमेरिका से लौटे ही थे कि इसी बीच उनके 52 वर्षीय छोटे भाई प्रमोद कासलीवाल को ब्रेन कैंसर होने का पता चला। तीन महीने पहले उनके  पालतू कुत्ते के पेट में कैंसर की गांठ हो गई थी। इसका कारण मोबाइल फोन का प्रयोग और इलाके में लगी तीन सेलफोन टावर थीं जो भारी मात्रा में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे चौबीसों घंटे उगल रही हैं।


प्रोफेसर गिरीश कुमार,  विद्युत अभियांत्रिकी विभाग, आई.आई.टी. पवई, मुम्बई
प्रोफेसर गिरीश कुमार, विद्युत अभियांत्रिकी विभाग, आई.आई.टी. पवई, मुम्बई तीन दशकों से एंटीना के क्षेत्र में शोध कर रहे हैं।   इन्होंने "ब्रॉडबैंड माइक्रोचिप एंटीनाज" नामक पुस्तक लिखी है और 150 शोधपत्र विभिन्न राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय जरनल्स में प्रकाशित किये हैं। इन्होंने 1000 तरह के एंटीना विकसित किये हैं। ये सेलफोन और सेलफोन टॉवर्स के खतरों पर भी दस वर्ष से शोध कर रहे हैं। इन्होंने एक प्रतिवेदन भी जारी किया है, जिसे बनाने में इनकी अपनी पुत्री नेहा कुमार बी.टेक. बायॉटेक्नोलोजी ने भी मदद की है। इन्होंने लिखा है कि सेलफोन टॉवर के 300 मीटर के दायरे में रहने वाले लोगों को थकावट महसूस होती है। 200 मीटर के दायरे में सिरदर्द,  निद्रा-विकार, बेचैनी आदि रहती है और 100 मीटर के दायरे में लोगों को चिढ़चिढ़ापन, अवसाद, स्मृति-ह्रास, उबकाई, चक्कर, कामेच्छा में कमी आदि तकलीफ रहती है। स्त्रियों को तकलीफ ज्यादा होती है।

इन्होंने बतलाया है कि मुम्बई के आवासीय इलाकों में सेलफोन टॉवर्स से निकलने वाला ई.एम.रेडियेशन सुरक्षित सीमा से बहुत ज्यादा है। ई.एम.रेडियेशन की मात्रा 100 माइक्रव्हाट प्रति वर्गमीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिये, जबकि कई जगह यह 1000 माइक्रव्हाट से भी ज्यादा है और लोगों के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बना हुआ है। इन इलाकों में लोगों को चिढ़चिढ़ापन, थकावट, सिरदर्द, दृष्टि-दोष, नपुंसकता, एकाग्रता में कमी, शिशु में पैदायशी दोष  आदि तकलीफें हो रही हैं। प्रोफेसर गिरीश इसे "धीमा और अदृश्य कातिल" की संज्ञा देते हैं।

प्रो. कुमार ने बतलाया है कि हमारे यहां कंपनियों के दबाव में रेडिएशन मानक रूस से 460 गुना और आस्ट्रिया से 10 लाख गुना ज्यादा रखा है। जबकि 100 माइक्रो वाट प्रति वर्ग मीटर से ज्यादा रेडिएशन खतरनाक है। सरकार ने इंटरनेशनल कमीशन फॉर नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन प्रोटेक्शन के मानकों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर रेडिएशन मानक 92 लाख माइक्रोवाट प्रति वर्ग मी. कर दिया है। ऐसे में दूर संचार विभाग की मोबाइल कंपनियों पर मेहरबानी पर सवाल उठने लगे हैं कि इस नीति के पीछे भी कहीं 2-जी स्पेक्ट्रम जैसी कोई साजिश तो नहीं छिपी है।
डॉ.  कार्लो  महान अनुसंधानकर्ता










डॉ. जॉर्ज कार्लो पीएच.डी., एम.एस., जे.डी.
वैज्ञानिक, सलाहकार, अभिवक्ता, अनुसंधान और विकास निर्देशक,
संस्थापक, साइंस एण्ड पब्लिक पॉलिसी इंस्टिट्यूट
पूर्व अध्यक्ष,  सेल्यूलर टेलीफोन इंडस्ट्री ऐसोसियेशन (CTIA)
अध्यक्ष, वायरलेस टेक्नोलोजी रिसर्च प्रोग्राम (WTR)
टी.वी. कार्यक्रम - सी.बी.एस. न्यूज, सी.एन.एन., फोक्स न्यूज,
वर्ल्ड न्यूज टूनाइट, एम.एस.एन.बी.सी.  

1992 में फ्लोरिडा के उद्योगपति डेविड रेनार्ड की 33 वर्षीय पत्नि सुज़ान ऐलेन की एस्ट्रोसाइटोमा नामक मस्तिष्क कैंसर से मृत्यु हो गई थी और उन्होंने सेलफोन निर्माता एन.ई.सी. और जी.टी.ए. मोबाइलनेट के विरूद्ध अदालत में दावा ठोक दिया था। 21 जनवरी, 1993 को डेविड ने लैरी किंग लाइव शो नामक टी.वी. कार्यक्रम में आकर सेलफोन कम्पनी को जम कर कोसा और लोगों को सुजान के एक्सरे दिखाये जिसमें कान के पास कैंसर की गांठ साफ दिखाई दे रही थी, जहाँ फोन लगा कर सुजान रोजाना घन्टों बातें किया करती थी। दूसरे दिन इस केस को लेकर मीडिया में काफी हल्ला हुआ और सेलफोन कम्पनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई। बेहताश सेल्यूलर टेलीफोन इंडस्ट्री ऐसोसियेशन (CTIA) ने आनन-फानन में अपने बचाव में झूंठा बयान जारी कर दिया कि सेलफोन के खतरों पर काफी शोध हुई है और सेलफोन पूरी तरह सुरक्षित माने गये हैं तभी सरकार ने सेल फोन को मंजूरी दी है। उस समय अमेरिका में सेलफोन के डेढ़ करोड़ उपभोक्ता थे और मीडिया शोध की रिपोर्ट सार्वजिक करने की मांग उठा रहा था, लेकिन कोई शोध हुई ही नहीं थी। आखिरकार मीडिया के भारी दबाव के कारण सी.टी.आई.ए. (CTIA) को सेलफोन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खतरों और उनसे बचने के उपायों को खोजने हेतु वायरलेस टेक्नोलोजी रिसर्च प्रोग्राम (WTR) गठित करना पड़ा और इसके लिए सेलफोन कम्पनियों ने 2.85 करोड़ डॉलर की धनराशि देने की बात कही। बहुचर्चित डॉ. जॉर्ज कार्लो को इस परियोजना का अध्यक्ष बनाया गया।

डॉ. कार्लो स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा की जा रही शोध पर भी नजर बनाये हुए थे। शुरू में तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब उन्हें ऐसे संकेत मिले कि सेलफोन से ब्रेन कैंसर का खतरा बहुत है तो उन्होंने कई सेलफोन कम्पनियों को पत्र लिखे और बातचीत की, लेकिन कम्पनियां ये सब बातें दबा देना चाहती थी। कोई उनके सुझावों को मानना ही नहीं चाहता था और धीरे-धीरे कम्पनियों से उनके रिश्ते भी खराब होने लगे। एक बार सेलफोन कम्पनियों ने उन्हे कई महीनों तक पैसा ही नहीं दिया और उलटा उन्हें बदनाम करना शुरू कर दिया कि उनके मन में कुछ पाप है तथा वे शोध को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं।  इस तरह कई पंगे हुए और उनके खिलाफ कई षड़यंत्र रचे गये। आखिरकार फरवरी 1999 में  कार्लो FDA और CTIA के अधिकारियों से मिले, उन्हें CTIA द्वारा की गई निष्पक्ष शोध  के बारे में बतलाया और CTIA के वार्षिक सम्मेलन में सेलफोन से होने वाले मस्तिष्क कैंसर और अन्य खतरों के बारे में अपना प्रतिवेदन पढ़ कर सबकों चौंका दिया। कार्लो ने निम्न बिन्दुओं पर  सबका ध्यान आकर्षित किया। 

·       सेलफोन को कान से लगा कर बात करने वालों में मस्तिष्क कैंसर के कारण मृत्युदर उन प्रयोक्ताओं से अधिक पाई गई थी जो सेलफोन को सिर से दूर रख कर बात करते थे यानि हेडसेट या स्पीकर फोन से बात करते थे।
·       सेलफोन के एंटीना के चारों तरफ 7-8 इंच के दायरे में तीव्र विद्युत चुम्बकीय तरंगें कोमल और संवेदनशील मस्तिष्क में टॉक्सिन, मुक्त कण, घातक रसायन, जीवाणु, विषाणु आदि की घुसपेठ को रोकने के बने चुंगी नाके (Blood Brain Barrier) को खोल देती हैं, और टॉक्सिन और घातक मुक्त-कण (Free Radicals) मस्तिष्क में प्रवेश करने लगते हैं।
·       6 वर्ष या ज्यादा समय तक सेलफोन का उपभोग करने वाले व्यक्तियों में एकॉस्टिक न्यूरोमा (श्रवण नाड़ी की गांठ) का जोखिम 50% से अधिक पाया गया है।
·       सेलफोन प्रयोक्ताओं में मस्तिष्क के बाहरी हिस्से में दुर्लभ न्यूरोइपीथीलियोमा ट्यूमर का जोखिम 50% अधिक पाया गया है।

डॉ. कोर्लो ने इस बात जोर देकर कहा कि सेलफोन कम्पनियों ने आरंभ से ही उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए समुचित कदम नहीं उठाये। कोर्लो ने बतलाया कि कम्पनियों को सेलफोन के संभावित खतरों के बारे में बार-बार आगाह करने पर भी वे उन्हें अनदेखा करती रही, राजनीति करती रही, लोगों के गुमराह करती रही, झूंटे दावे करती रही कि सेलफोन बच्चों समेत सभी उपभोक्ताओं के लिए पूर्णतया सुरक्षित है और यह कहती रही कि फिर भी लोगों की सुरक्षा हेतु वे अनुसंधान जारी रखेंगे। 

कार्लो ने मानवता के लिए अपना फर्ज पूरा करते हुए निर्भीकतापूर्वक सच्चाई दुनिया के सामने रखी, लेकिन इसके बदले में सेलफोन कम्पनियों ने उन्हें धमकाया गया, उन पर गुंडों द्वारा हमला करवाया, उन्हें बदनाम किया गया और रहस्यमय ढंग से उनका एक घर फायर-ब्रिगेड द्वारा जला कर खाक कर दिया गया। ये घटनाएं उस देश में घटी जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश बतलाता है और अपने माथे पर स्टेचू ऑफ लिबर्टी का टेटू चिपका कर घूमता है। मुझ पर विश्वास न हो तो गूगल के गलियारों में झांक लीजिये आपको सारे साक्ष्य मिल जायेंगे। 

इसके बाद कोर्लो ने सेलफोन्स इनविजिबल हेजार्ड्स ऑफ द वायरलेस ऐज नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होने अपने कटु अनुभवों और सेलफोन के खतरों के बारे में लिखा है। कार्लो ने अमरीकी सरकार को अपनी रिपोर्ट भी पेश की थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि 2010 में सेलफोन के कारण 500,000 अमरीकी मस्तिष्क कैंसर से पीड़ित होंगे और 2014 में 25% आबादी कैंसर की गिरफ्त में होगी। यूरोप के कई अनुसंधानकर्ता भी कार्लो से सहमत थे। 

एल. लॉयड मोरगन

एल. लॉयड मोरगन अमेरिका की बायोइलेक्ट्रोमेग्नेटिक्स सोसाइटी के सेवानिवृत्त इलेक्ट्रोनिक इंजिनियर हैं। 1995 में इन्हें इलेक्ट्रोमेगनेटिक रेडियेशन के कारण ब्रेन ट्यूमर हो गया था। इलाज पूरा होते ही जिज्ञासा वश इन्होंने इ.एम. रेडियेशन पर इलेक्ट्रिक पावर रिसर्च इन्स्टिट्यूट द्वारा की गई शोध का ध्यान से अध्ययन किया और जाना कि इससे मस्तिष्क कैंसर और ल्यूकीमिया का जोखिम बहुत रहता है। इसके बाद सेलफोन के खतरों पर अनुसंधान करना ही जीवन की ध्येय बना लिया और न्यूरो ओंकोलोजी सोसाइटी, अमेरिकन ऐकेडेमी ऑफ एनवायरमेंटल मेडीसिन और ब्रेन ट्यूमर इपीडेमियोलोजी कन्सोर्टियम संस्थाओं से जुड़े रहे।  

इन्टरफोन स्टडी - पूरी दाल ही काली है

इन्टरफोन स्टडी मस्तिष्क कैंसर और सेलफोन के बारे में दुनिया का सबसे बड़ा अध्ययन है, जिसमें 1999 से 2004 तक सेलफोन  से ब्रेन ट्यूमर के खतरों पर शोध  हुई है। इसमें सेलफोन कम्पनियों द्वारा 3 करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च हुआ है और 48 वैज्ञानिकों ने 13 देशों के 14,000 व्यक्तियों पर शोध की है। आँकड़े एकत्रित करने का काम तो 2004 में पूरा हो गया था लेकिन इसकी रिपोर्ट जारी करने में जानबूझ कर देरी की जा रही थी। जब यूरोप के देशों को लगा कि विलम्ब के पीछे कोई बड़ी साजिश या गड़बड़ है और उनके   द्वारा भारी दबाव डालने पर बड़ी मुश्किल से कुछ समय पहले ही 2010 में इसकी रिपोर्ट जारी की है।
रिपोर्ट के नतीजों में मुख्य बात यह है कि सेलफोन हमें मस्तिष्क कैंसर से बचाता है। लेकिन यह बात किसी के भी गले नहीं उतर रही है। सेलफोन कम्पनियों द्वारा डेनमार्क में करवाई गई हुई एक इन्टरफोन स्टडी के नतीजे भी यही कह रहे थे कि सेलफोन का प्रयोग हमें ब्रेन कैंसर से बचाता है। इनके अलावा अन्य जितने भी अध्ययन सेलफोन कम्पनियों द्वारा करवाये गये, उन सभी के नतीजे यही कह रहे थे कि सेलफोन से ब्रेन कैंसर का कोई खतरा नहीं है। क्या यह मात्र संयोग है??? यदि यह सत्य है कि सेलफोन हमें ब्रेन कैंसर से बचाता है तो नोकिया, मोटोरोला और ब्लेकबैरी जैसी कम्पनियां अपने मेनुअल में यह क्यों लिखती हैं कि सेलफोन से बात करते समय उसे सिर से 1.5 से 2.5 सैं.मी. दूर रखें।
 
इसलिए एल. लॉयड मोरगन ने अपने सहयोगी अनुसंधानकर्ताओं के साथ मिल कर जब इन्टरफोन स्टडी द्वारा जारी रिपोर्ट का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया तो उन्हें लगा कि जरूर इस शोध में जरूर कोई भारी गड़बड़ है। इन्होंने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिल कर पूरा अनुसंधान करके सेलफोन और मस्तिष्क कैंसर के संबन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रतिवेदन जारी किया है। इसमें इन्होंने 15 अहम चिंताजनक पहलुओं को उजागर किया है, जिन्हें सरकार, मीडिया तथा आम जनता को समझना चाहिये और समुचित कदम उठाने चाहिये। इसमें इन्होंने दूरसंचार उद्योग और स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा की गई शोध के परिणामों की भी व्याख्या की है।  इस प्रतिवेदन का मुख्य उद्देश्य पत्रकारों और सरकार को स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा की गई शोध से सामने आये सेलफोन के खतरों और इन्टरफोन स्टडी के प्रारूप में स्वार्थवश जानबूझ कर रखी गई खामियों के बारे में आगाह करना है, जिससे मस्तिष्क कैंसर के जोखिम का सही आंकलन नहीं हो सका। 
स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा की गई शोध
दूसरी तरफ स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थाओं द्वारा जितनी भी शोध हुई है सबके नतीजे कुछ और कहानी कह रहे हैं। जैसे कि  
·       सेलफोन का कुल प्रयोग जितने अधिक घन्टे किया जाता है कैंसर का खतरा उतना ही अधिक रहता है।
·       सेलफोन जितने ज्यादा वर्षों तक प्रयोग में लिया जाता है खतरा उतना ही ज्यादा होता है।
·       सेलफोन से निकलने वाले विकिरण की मात्रा जितनी अधिक होती है खतरा उतना ही ज्यादा होता है।
·       सेलफोन का प्रयोग जितनी कम उम्र में शुरू होगा खतरा उतना ही ज्यादा होता है। जो किशोरावस्था या उससे पहले ही सेलफोन प्रयोग करना शुरू कर देते हैं उन्हें कैंसर का खतरा 420% तक बढ़ जाता है।

इन्टरफोन स्टडी के मूल प्रारूप में ही थी अनेक कमियां

आखिर कुछ सोच-समझ कर ही सेलफोन कम्पनियों ने इन्टरफोन स्टडी के लिए इतनी अपार धन-राशि उपलब्ध करवाई थी। वे चाहती थी कि शोध के नतीजे ऐसे हों कि उनके दाग भी धुल जायें और उनके व्यवसाय पर कोई बुरा प्रभाव भी नहीं पड़े। उन्होंने शोध का मूल प्रारूप (Protocol) में जान बूझ कर बड़ी चतुराई से ऐसी खामियां रखी कि शोध के नतीजे वैसे ही हो जैसे वे चाहते हैं। कुछ मुख्य खामियां निम्न हैं।
·       लॉयड मोरगन ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट लिखा है कि इन्टरफोन स्टडी में सिर्फ तीन तरह के ब्रेन कैंसर ऐकॉस्टिक न्यूरोमा, ग्लायोमा और मेनिन्जियोमा शामिल किये गये जबकि अन्य कैंसर जैसे ब्रेन लिम्फोमा, न्यूरोईपिथीलियल ट्यूमर आदि को शोध के दायरे से बाहर रखा गया।
·       वे लोग भी अध्ययन से बाहर रखे गये जो ब्रेन कैंसर से मर गये थे या बहुत बीमार होने के कारण साक्षातकार में शामिल नहीं हो सकते  थे। बच्चों, किशोरों और बूढ़ों को इस शोध से बाहर रखा गया था जब कि इन्हें कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
·       इस अध्ययन में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को भी शामिल नहीं किया गया जबकि कमजोर सिगनल होने के कारण वहाँ मोबाइल ज्यादा तेज रेडियेशन छोड़ते हैं।
·       जो लोग 6 महीने या ज्यादा अवधि तक सप्ताह में सिर्फ एक बार सेलफोन सेलफोन करते हैं उन्हे सेलफोन प्रयोक्ता के रूप में परिभाषित किया गया जबकि सेलफोन प्रयोग नहीं करने वाले व्यक्ति अनएक्सपोज्ड माने गये भले वे कोर्डलेस फोन प्रयोग खूब करते हों, जब कि कोर्डलेस भी सेलफोन की तरह ही इ.एम. रेडियेशन के द्वारा  कार्य करता है।
·       शोध में रेडियेशन एक्सपोजर की अधिकतम अवधि 10 वर्ष रखी गई है जब कि ब्रेन कैंसर होने में अक्सर इससे भी अधिक समय लगता है।
शोध के प्रारूप में रखी गई कमियों को पढ़ कर आप कम्पनियों की नीयत समझ गये होंगे।   मोबाइल का यह मैला व्यवयाय आखिर चालीस खरब डॉलर (4 Trillion Dollars) का है। गंदा है पर धंधा है ये। 

सेलफोन के खतरों से बचने के उपाय

यहाँ मैं आपको सेलफोन रेडियेशन से बचने के कुछ उपाय बतलाता हूँ।
·       जब आप सेलफोन पर बात करें तो तारयुक्त हैडसेट का प्रयोग करें या स्पीकर-फोन मोड पर बात करें। जहाँ संभव हो लघु संदेश सेवा (SMS) से काम चलायें। बेतार हैडसेट जैसे ब्लू-टूथ भी खतरे से भरा है। कई अनुसंधानकर्ता तो तार-युक्त हैडसेट को भी सही महीं मानते हैं। वे कहते हैं कि एयरट्यूब वाला हैडसेट प्रयोग करें, इसमें तारयुक्त हैडफोन से स्टेथोस्कोप जैसी ट्यूब्स जुड़ी रहती हैं और रेडियेशन का खतरा बहुत कम हो जाता है। 
·       जब काम में नहीं आ रहा हो तो सेलफोन को शरीर से दूर रखें जैसे शर्ट की जेब, पर्स में या बैल्ट में लगा कर रखें। पैंट की जेब में कभी नहीं रखें, शरीर का निचले हिस्सा ज्यादा संवेदनशील होता है, और अण्डकोष क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।  
·    कार, बस, ट्रेन, बड़ी इमारतों या ग्रामीण क्षेत्र में जहाँ सिगनल कमजोर हों सेलफोन का प्रयोग नहीं करें क्योंकि इस परिस्थितियों में सेलफोन बहुत तेज रेडियेशन छोड़ता है।
·     जब भी संभव हो या आप घर पर हों तो लैंडलाइन फोन का प्रयोग करें। अपने कम्प्यूटर या लेपटॉप में इन्टरनेट के लिए वाई-फाई की जगह तारयुक्त ब्रॉडबैंड कनेक्शन लें। कोर्डलेस फोन भी प्रयोग नहीं करें। वाई-फाई और कोर्डलेस फोन भी रेडियो तरंगो द्वारा ही काम करता है।  व्यवसाय  या प्यार की लम्बी बातें तो लैंडलाइन फोन पर करने का आनंद ही कुछ और है। आपको टेलीफोन पर गाये गये मेरे पिया गये रंगून किया है वहाँ से टेलीफोन तुम्हारी याद सताती है जिया में आग लगाती हैया दिलीप कुमार और वैजंती माला पर फिल्माया गया आजकल शौक-ए-दीदार है क्या करूँ आपसे प्यार है मधुर गीत को सुनने में आज भी आनंद आता है।

·     बच्चो और किशोरों को तकिये के नीचे या बिस्तर में सेलफोन रख कर सोने से मना करें। वर्ना रात भर सेलफोन उन्हें विद्युत-प्रदूषण (Electro-Polution) देता रहेगा। सेलफोन का प्रयोग गाने सुनने, मूवी देखने या गेम्स खेलने के लिए नहीं करना चाहिये।   
·       18 वर्ष से छोटे लड़कों को सिर्फ आपातकालीन परिस्थितियों में ही सेलफोन प्रयोग करने दें।
·       मोबाइल में रेडिएशन रोधी कवर लगवाएं।
·      मोबाइल खरीदते समय इस बात का विशेष ख्याल रखें कि उसमें S.A.R. (स्पेसिफिक एब्सॉप्शन रेट) कम हो ताकि आपका मोबाइल आपको कम रेडियेशन छोड़े। एस.ए.आर. ऊतक (एक किलो) द्वारा अवशोषित की जाने वाले रेडियेश की मात्रा है।  इसकी इकाई व्हाट प्रति किलो (ऊतक) है। भारत में एस.ए.आर. की अधिकतम सीमा 1.6 वाट/किलो रखी गई है, बशर्ते  व्यक्ति सेलफोन का प्रयोग दिन में सिर्फ 6 मिनट करे।

सरकार के लिए लॉयड मोरगन और सहयोगियों द्वारा जारी दिशानिर्देश

·       सेलफोन निर्माताओं को कड़े निर्देश देना चाहिये कि वे सेलफोन में स्पीकर और माइक  लगायें ही नहीं और उपभोक्ताओं  को एक बढ़िया और सुरक्षित हैडसेट (संभवतः एयर ट्यूब वाला) दे दें। इससे सेलफोन कीमत पर भी विशेष फर्क नहीं पड़ेगा।
·       लोगो को सेलफोन के रेडियेशन से बचने हेतु जागरुकता अभियान कार्यक्रमों के लिए धन मुहैया करना चाहिये।
·       सेलफोन कम्पनियों को सेलफोन बेचने की अनुमति देने के पहले उपभाक्ताओं की सुरक्षा हेतु बीमा करवाना और उसके साक्ष्य प्रस्तुत  करना  अनिवार्य होना चाहिये।
·       सेलफोन पर संवैधानिक चेतावनी लिखी होनी चाहिये कि इसके प्रयोग से ब्रेन कैंसर हो सकता है।

·       रेडियेशन मानक नये सिरे से निर्धारित करने चाहिये। 
·     सेलफोन रेडियेशन के दूरगामी खतरों पर अनुसंधान हेतु निष्पक्ष और स्वतंत्र संस्थाएं गठित करना चाहिये और पर्याप्त धन उपलब्ध करवाना चाहिये।
·     सरकार को विद्युत चुम्बकीय विकिरण की मात्रा और स्थिति की हर साल प्रतिवेदन जारी करना चाहिये।
·       प्रदेश में उच्च वोल्टेज बिजली की लाइंस, सेलफोन टॉवर, टेलीफोन और रेडियो के एंटीना से निकलने वाले रेडियेशन को दर्शाने वाले नक्शे जारी करने चाहिये। ।
·      बच्चों को सेलफोन बेचने हेतु बने लुभावने विज्ञापन तुरन्त प्रतिबंधित करने चाहिये।
·     स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को सेलफोन के खतरों से बचाने हेतु कड़ें निर्देश जारी करने चाहिये कि बच्चे स्कूल में सेलफोन लेकर नहीं आयें, सेलफोन, वाई-फाई, माइक्रोवेव ओवन आदि के खतरों के बारे में उन्हें पढ़ाया जाना चाहिये और जागरुकता हेतु स्कूल में बेनर लगावाने  चाहिये। सेलफोन टॉवर भी स्कूल से दूर लगाये जाने के निर्देश दियें जायें।
·       वायरलेस टेक्नोलोजी रिसर्च प्रोग्राम (WTR) को निर्देश देना चाहिये कि वे इंटरसेलफोन स्टडी में रही कमियों को दूर करें,  एकत्रित आंकड़ों का नये सिरे से विश्लेषण करें और निष्पक्ष प्रतिवेदन जारी करें। 


मैं गेहूं हूँ

लेखक डॉ. ओ.पी.वर्मा    मैं किसी पहचान का नहीं हूं मोहताज  मेरा नाम गेहूँ है, मैं भोजन का हूँ सरताज  अडानी, अंबानी को रखता हूँ मुट्ठी में  टा...