Friday, February 17, 2012

ऊर्जा-विज्ञान (Aura Healing)

 ऊर्जा-विज्ञान (Aura Healing)
कैंसर सहित सभी रोग शरीर में ऊर्जा के उन्मुक्त प्रवाह में आई रुकावट के कारण होते हैं।

शरीर क्या है? मनुष्य क्या है? प्राचीन काल से भौतिकशास्त्री यह कहते आये हैं कि बुनियादी स्तर से देखें तो हमारा यह  शरीर शुद्ध रूप से सिर्फ एक ऊर्जा है।  भौकिशास्त्री बारबरा ब्रेनान ने शरीर के बहुस्तरीय ऊर्जा क्षेत्र के अस्तित्व को सिद्ध किया है। इसे  प्रभा-मण्डल, आभा-मण्डल या ओरा कहते हैं। इन्होंने वर्षों तक शोध करके इस ऊर्जा-चिकित्सा (Aura Healing)  से दैहिक और भावनात्मक विकारों के उपचार की कला को विकसित किया है।


ऊर्जा-चिकित्सा - जीवन शक्ति ऊर्जा
भारत में इस ऊर्जा को ' प्राण '  तो चीन में इसे 'ची' कहते हैं। भले इसकी सत्यता को वैज्ञानिक सिद्ध नहीं कर सके हों लेकिन चीन में एक ऐसा चिकित्सालय है जहा ऊर्जा-चिकित्सा विधाओं  से हजारों रोगियों का उपचार होता है। यहां कई चमत्कार होते हैं। यहां पर उपचार इतना प्रभावशाली है कि एक रोगी के कैंसर की गांठ देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में गायब हो गई और यह नजारा सोनोग्राफी मशीन के पटल पर स्पष्ट देखा व अंकित किया गया था। ऐसा लगता है कि भविष्य में रोगों के उपचार में ऊर्जा-चिकित्सा विधाओं जैसे एक्यूपंचर, एक्यूप्रेशर, ई.एफ.टी., प्रकाश, ध्वनि, रंग या रैकी का  महत्व बहुत अधिक होगा। भौतिक-विज्ञान में कोई कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं, जिसे हम देख और नाप सकते हैं। लेकिन ऊर्जा चिकित्सक इस सर्वव्यापी  जीवन शक्ति को ऊर्जा की संज्ञा देते हैं।
बारबरा ब्रेनान ने बड़े विवेकपूर्ण ढंग से आध्यात्मिकता और विज्ञान के समन्वय की कौशिश की है। ये अंतरिक्ष वैज्ञानिक हैं और नासा में शोध-वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुकी हैं। ये भौतिकशास्त्री और मनोचिकित्सक हैं और  20 वर्षों से प्रभा-मण्डल  और  ऊर्जा-चिकित्सा पर अध्ययन और शोध कर रही हैं। इन्होंने  हैन्ड्स ऑफ लाइट: ए गाइड टू हीलिंग थ्रूद ह्यूमन ऐनर्जी फील्ड लिखी है। इन्होंने प्राचीन परम्परा और आधुनिक विज्ञान के आधार पर ओरा या बहुस्तरीय ऊर्जा क्षेत्र की अदभुत् व्याख्या की है तथा  मनुष्य के सुख व स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों  का गहन अध्ययन किया है। इसी ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करके इन्होंने दैहिक और भावनात्मक विकारों के उपचार में महारथ हासिल की है।  
ये कहती हैं कि  हमारा शरीर एक बड़े ऊर्जा पिण्ड  या ओरा में स्थित रहता है, इसी ऊर्जा पिण्ड द्वारा हम स्वास्थ्य, रोग आदि समेत जीवन की यथार्थता का अनुभव करते हैं।  इसी ऊर्जा से हमें स्वचिकित्सा या निरामय रहने का सामर्थ्य मिलता है। समस्त रोगों की उत्पत्ति इसी ऊर्जा पिण्ड से होती है।  प्राचीन काल से आधायात्मिक चिकित्साविद् और आयुर्वेदाचार्य  इस के बारे चर्चा करते आये हैं, परन्तु इसका वैज्ञानिक दृष्टि से सत्यापन हाल ही के वर्षों में हुआ है।
इस आभा-मण्डल में सात चक्र समेत कई परतें होती हैं। इसकी किसी भी परत या चक्र में कोई गड़बड़, असंतुलन या अवरोध आने से वह भौतिक देह में प्रतिबिम्बित और एकत्रित हो जाती है, जिससे भावनात्मक या दैहिक रोग हो जाता है। ये कहती हैं कि हर व्यक्ति चाहे तो अपने देखने और सुनने की क्षमता और सीमा को बढ़ा सकता है।  इन्होंने ऐसी तकनीक और व्यायाम विकसिक किये हैं, जिससे व्यक्ति अपना आभामण्डल देख सकता है, अर्थात वह अपने ग्रहणबोध का विस्तार करके  आध्यात्मिक चिकित्सा को समझ सकता है।  ।    
मनुष्य का ऊर्जाक्षेत्र
मनुष्य का ऊर्जाक्षेत्र हमेशा ब्रह्माण्ड से ऊर्जा ग्रहण करता है।  हमारी देह, मन और भावना का अस्तित्व इसी ऊर्जा के कारण है। प्रभा-मण्डल हमारा आवरण है जो हमारे आंतरिक ऊर्जा पिण्ड और बाहरी देह को लपेट कर रखता है।  हमारे चक्र इस ऊर्जा आवरण के छिद्र हैं जो शरीर में बाहर से अन्दर और अन्दर से बाहर इस अनंत ऊर्जा के प्रवाह और परिवहन को संतुलित रखते हैं। 
यही ऊर्जाक्षेत्र आरोग्य और रोग के कारक हैं। ब्रेनान कहती हैं, यह जरूरी है कि हम रोग को गहराई से समझें।  हमें विश्लेषण करें कि  इस रोग का क्या अभिप्राय है? यह क्या कहना चाह रहा है? रोग हमारे शरीर की तरफ से एक सन्देश हो सकता है, 'देखो शरीर में कुछ गलत चल रहा है। तुम अपने ही अन्तरमन को सुन नहीं पा रहे हो, कुछ बहुत ही जरूरी बात को अनदेखा कर रहे हो।'  कई बार आरोग्यप्राप्ति के लिए चिकित्सक की औषधि लेने से ज्यादा इसी बात को समझने और बदलने की जरूरत होती है। इसके बिना कई बार कोई दूसरा विकार हो जाता है, जिसका उदगम् और संकेत भी उसी बात की तरफ होता है।
मनुष्य का ओरा या ऊर्जाक्षेत्र – आन्तरिक ऊर्जा पिण्ड का आवरण
·        मनुष्य एक स्पन्दन ऊर्जा है जो प्रकाश और ध्वनि ऊर्जा से बनी है।
·        मनुष्य की बाहरी देह चारो तरफ ऊर्जाक्षेत्र या ओरा से घिरी रहती है।
·        यह अन्दर और बाहर सभी तरफ फैली है।
·        यह मनुष्य के हर चीज से सरोकार रखती है।  
·        यह उसके हर विचार, शब्द, अहसास, पसन्द और कर्म से समन्वय करती है। 
·        यह विद्युत-चुम्बकीय है और मनुष्य के दैहिक पिण्ड में अनुप्रवेश करती है।
·        ऊर्जाक्षेत्र मनुष्य की भौतिक देह का प्रतिबिम्ब और आकृति है।
 ओरा या ऊर्जाक्षेत्र की प्रकृति
·        ब्रह्माण्ड का प्रवाह ऊर्जा से वस्तु की तरफ होता है अर्थात ऊर्जा मनुष्य की आन्तरिक सूक्ष्म देह से निकल कर  भौतिक देह का सृजन करती है।
·        मनुष्य  का समस्त शरीर एक जीवन-ऊर्जा से बनता है जिसे प्राण (भारत), ची (चीन), की (जापान) और मन (हवाई) कहते हैं।
·        मनुष्य के इस ऊर्जाक्षेत्र की किरलिन कैमरा से तस्वीरें ली जा सकती हैं।
·        इसी ऊर्जाक्षेत्र के कारण मनुष्य जीवित महसूस करता है तथा अन्य मनुष्यों, जीवों, पेड़-पौधों और जड़-चेतन वस्तुओं से
संपर्क स्थापित करता है।

आभा-मण्डल की सात परतें या शरीर (Seven Layers or Bodies of Aura)
आकाश शरीर (Etheric Body)
यह आभा-मण्डल की पहली शरीर या परत है। यह प्रकाश की छोटी-छोटी झिलमिलाती रेखाओं से बना होता है। इसमें स्थूल शरीर के सारे अंगों और संरचनाओं का हूबहू प्रतिबिंब बना होता है अर्थात यह स्थूल शरीर की कार्बन कॉपी की तरह है। इसमें प्रकाश की रेखाएं निरंतर गतिशील रहती हैं। अतीन्द्रियदर्शी आंखों से यह हल्का नीला दिखाई देता है। यह पूरे स्थूल शरीर में पारगमन करता रहता है। यह स्थूल शरीर से 1-2 इंच बाहर तक फैला होता है और 15-20 चक्र प्रति मिनट की आवृत्ति पर स्पन्दन करता रहता है। इसका रंग स्लेटी से नीले के बीच होता है। इससे सम्बंधित सात चक्र भी इसी रंग के होते हैं।  कंधों के आसपास का हिस्सा आसानी से दिखाई दे जाता है।

भावना शरीर (Spiritual Body)
यह दूसरा शरीर है जो भावनाओं से सम्बंधित है। इसका आकार स्थूल शरीर जैसा ही है लेकिन यह उसका प्रतिबिम्ब नहीं है। इसकी निश्चित संरचना नहीं है, इसमें कोई अंग दिखाई नहीं देता है, बल्कि यह तरल है और निरन्तर गतिशील रहता है।  यह स्थूल और आकाश शरीर में फैला रहता है और स्थूल शरीर से 1-3 इंच बाहर तक फैला होता है। इसका रंग गहरे मटमैले से निर्मल और स्पष्ट के बीच होता है। इसमें इंद्रधनुश के सारे रंग  देखे जा सकते हैं। इसका पहला चक्र लाल, दूसरा नारंगी, तीसरा पीला, चौथा हरा, पांचवां नीला, छठा गहरा नीला और सातवां सफेद दिखता है।   प्यार, खुशी या क्रोध का अहसास इसकी छवि निर्मल और भ्रम तथा अवसाद का अहसास यह गहरा मटमैला दिखाई पड़ता है। पूरे भावना शरीर में रंग-बिरंगे धब्बे दिखाई देते हैं, जो स्थूल शरीर के बाहर तक फैले होते हैं।

मानस शरीर (Mental Body)
यह बौद्धिक और मानसिक गतिविधि से सम्बंधित है। यह भावना शरीर से अधिक तेजी से स्पंदन करता है और स्थूल शरीर से 3-8 इंच बाहर तक फैला रहता है। यह उजले पीले रंग का होता है लेकिन जब व्यक्ति बहुत सोच-विचार करता है तब यह बड़ा और ज्यादा उजला और पीला दिखाई देता है। यह शरीर संरचना प्रधान है इसमें विचार रंग बिरंगे भावनात्मक रंगों में उजले धब्बों की  तरह दिखाई देते हैं।

सूक्ष्म शरीर (Astral Body) –  
यह चौथा शरीर है जो प्रेम से सम्बंधित है। इसका रंग भी भावना शरीर जैसा ही होता है लेकिन गुलाबी रंग का प्रभाव ज्यादा होता है जो प्रेम का रंग है। इसके चक्र भी भावना शरीर के जैसे ही रंग के होते हैं, लेकिन इनमें भी गुलाबी रंग अधिक होता है। यह स्थूल शरीर से एक फुट बाहर तक फैला होता है। जब आप इस स्थिति तक पहुंचते हो तो आप ब्रह्मलोक के करीब होते हो, जहां आपको अन्य सूक्ष्म शरीर  घूमते हुए दिखाई देते हैं। सामान्यतः ऐसा सोते  या ध्यान करते समय होता है, लेकिन जब आप जागते हो या ध्यान से बाहर आते हो तो आपको कुछ याद नहीं रहता।

आकाश प्रतिकृति शरीर (Etheric Template Body)
यह पांचवा शरीर है, इसमें स्थूल शरीर के सारे अंगों की हूबहू प्रतिकृति सांचे या ब्लू प्रिंट के रूप में होती है। तात्पर्य यह है कि यह आपके स्थूल शरीर का नेगेटिव है और स्थूल शरीर में कोई विकार या गड़बड़  आ जाने पर पुनः स्वस्थ स्थूल शरीर बनाया जा सकता है। इस स्थिति में ध्वनि द्वारा उपचार बहुत असरदार होता है। यह स्थूल शरीर से 1 से 2 फुट बाहर तक फैला होता है। यह नीले रंग का होता है जिसमें खाली रेखाएं दिखाई देती हैं। ये खाली रेखाएं  या स्थान शरीर के सारे अंग, चक्र और अन्य संरचनाओं को प्रदर्शित करती हैं। इसके साथ अन्य व्यक्तियों के सूक्ष्म शरीर भी दिखाई दे सकते हैं।  

ब्रह्म शरीर (Celestial Body) -  
यह छठा शरीर है जो ब्रह्म लोक के भावनात्मक स्तर को दर्शाता है। यह स्थूल शरीर से 2 से 2.5 फुट बाहर तक फैला होता है। हम यहां सिर्फ ध्यान द्वारा ही पहुंच सकते हैं। यह समाधि की स्थिति है, जहां दिव्य प्रकाश और परमानन्द फैला है। यहां आत्मा और परमात्मा मिल जाते हैं तथा आप ईश्वर से एकाकार हो जाते हो। पूरे ब्रह्म लोक से जुड़ जाते हो। यहां आप किसी अन्य सूक्ष्म शरीर से सम्पर्क भी कर सकते हो, उसे आनन्द और आरोग्य दे सकते हो। इस शरीर में रजत और स्वर्ण के झिलमिलाते जगमगाते रंग दिखाई देते हैं, मानो आप तेज प्रकाश के स्रोत से निकलते हुए प्रकाश को देख रहे हो।

कारक शरीर (Casual Body - Ketheric Template) -
यह सातवां शरीर है जो ब्रह्म लोक के मानसिक स्तर को दर्शाता है। यह स्थूल शरीर से 2 से 3 फुट बाहर तक फैला होता है। यहां आकर मनुष्य और ईश्वर एक हो जाता है। यह शरीर संरचना प्रधान है और सोने के तारों और चांदी की रोशनी से बनता है। यह अंडाकार होता है जिसमें सारे अन्य शरीर और चक्र समाये रहते हैं।  यह झिलमिलाते सोने के अंडे जैसा दिखता है। इसका खोल  बाहरी  आक्रमण से शरीर की रक्षा करता है। इसमें मुख्य प्राण ऊर्जा होती है जो मेरुदण्ड में ऊपर नीचे बहती रहती है। यह समस्त चक्रों द्वारा शरीर का पोषण करता है।  आपके पिछले जन्म के कर्म इसके सिर में रंगीन पट्टियों रूप में दिखाई देते हैं। इसमें कुछ पट्टियां यह भी दर्शाती हैं कि आपने क्या योजना लेकर इस लोक में जन्म लिया है। इसमें आपके पिछले जन्म के कर्मों का लेखा-जोखा भी अंकित रहता है। इसे कारक शरीर इसलिए कहते हैं कि यही आपका वास्तविक शरीर है। यही शरीर जन्म-जन्मान्तर तक आपके साथ चलता है, बाकी सारे शरीर नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ हमारे कर्म और संस्कार भी साथ चलते हैं  इसीलिए हमारा अंतर्ज्ञान, अंतर्दृष्टि और स्वज्ञान पिछले जन्म पर आधारित होता है। बुरे कर्म और पाप भी साथ चलते हैं। जैसे-जैसे हम आध्यात्मिकता की तरफ बढ़ते हैं, आत्मज्ञान बढ़ता है और महसूस होता है कि हम ईश्वर के ही रूप हैं, तभी हम प्रेम, दया, ज्ञान और सेवा भावना  से इस लोक में जीवन व्यतीत करते हैं, जो (लोक) हमारा नहीं है।

ऊर्जा उपचार में रोगी की भूमिका क्या है?
सबसे पहले तो रोगी में ठीक होने की जबर्दस्त इच्छा होनी होनी चाहिये। यदि आप वास्तव में रोगमुक्त होना चाहते हो तो चिकित्सक के लिए आपका उपचार करना सरल हो जाता है। कुछ लोगों को रोग होता ही इसीलिए है कि वे अपना जीवन त्यागने के लिए ईश्वर से नियमित विनती करते रहते हैं कि वे जीवन के झमेलों से बहुत आहत हो चुके होते हैं और जीना दुश्वार हो चला है। यदि आप ठीक होना ही नहीं चाहते तो ऊर्जा-उपचार में व्यर्थ पैसा और समय मत गंवाइये, शरीर व मन इस उपचार को ग्रहण नहीं करेगा। जब आप ठीक होना चाहते हो, जब आप अपने रोग के प्रत्यक्ष होना चाहते हो और ऊर्जा ग्रहण करने के लिए अपने शरीर के पट खोल देते हो, तभी चिकित्सक आपका रोग दूर कर पाता है। आपको अपने उपचार का साक्षी और सहयोगी बनना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह है कि आप चिकित्सक की सलाह को आंख बन्द करके मानने की जगह अपने विवेक से हर बात का मूल्यांकन करते हैं और अपने उपचार में आप उसकी हर संभव मदद भी करते हैं। तभी आपका शरीर, मन और भावना उपचार को सहज ग्रहण करता है।   
यदि आपने अपने रोग और उसके जनन में अपनी भागीदारी को स्वीकार कर लिया है तो समझ लीजिये कि रोग निवारण की दिशा में आप अपना पहला कदम बढ़ा चुकें हैं। रोग के उपचार के लिए यह बहुत जरूरी है कि आप यह मान जायें कि इसके लिए आप कितने जिम्मेदार थे। जब  आप समझ जाते हैं कि आपकी बीमारी आपको क्या सन्देश देना चाहती है तो उससे मुक्त होना आसान हो जाता है। जब तक आप यह समझते रहते हैं कि यह रोग आपको ऐसे ही अकस्मात हो गया है तब तक इलाज मुश्किल होता है।
यह ऊर्जा चक्र-तंत्र कैसे कार्य करता है?
मनुष्य का आभा-मण्डल उसके स्थूल शरीर में फैला और समाया रहता है तथा शरीर, मन और आत्मा को एकाकार करके रखता है। यह हमेशा गतिशील रहता है आभा-मण्डल के छिद्रों (चक्र) द्वारा स्पन्दन ऊर्जा का आवागमन निरन्तर चलता रहता है। उसके कर्म, विचार तथा भावना और साथ में वातावरण तथा जीवनशैली (व्यायाम भोजन, निद्रा आदि) के आधार पर शरीर में ऊर्जा का प्रवाह होता है। यदि जीवन प्रेम और आनन्द से परिपूर्ण है तो अपार ऊर्जा का प्रवाह होता है तथा जीवन निरामय हो जाता है। यह प्रेम की शक्ति है जो चक्रों को खोल देती है और ऊर्जा का बहाव उन्मुक्त होता है। तथा जब वह भय, अहंकार, नकारात्मकता या स्वार्थ के वश में  हो जाता है तो ऊर्जा का बहाव थम जाता है। तब ऊर्जा प्रवाह में असन्तुलन और रुकावट के कारण शरीर तथा मन में रोग जन्म लेता है। इस रुकावट से शरीर के कुछ हिस्सों को ऊर्जा प्रवाह रुक जाता है। लेकिन क्योंकि शरीर में कई चक्र होते हैं इसलिए रुकावट होने के बाद भी तन और मन को कुछ ऊर्जा तो मिलती रहती है। लेकिन रुकावट की जगह शरीर में गड़बड़ हो जाती है। ऊर्जा के प्रवाह में लम्बे समय तक रुकावट होने से छोटा या बड़ा रोग जैसे कैंसर तक हो जाता है। इस स्थिति में उसे अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने और अच्छे विशेषज्ञ से ऊर्जा चिकित्सा लेना चाहिये। 

Tuesday, February 14, 2012

सात ऊर्जा चक्र


 ऊर्जा चक्र
मनुष्य के शरीर  में सात चक्राकार घूमने वाले ऊर्जा केन्द्र होते  हैं, जो मेरूदंड में अवस्थित होते है और मेरूदंड (Spinal Column) के आधार से ऊपर उठकर खोपड़ी तक फैले होते हैं । इन्हें चक्र कहते हैं, क्योंकि संस्कृत में चक्र का मतलब वृत्त, पहिया या गोल वस्तु होता है। इनका वर्णन हमारे उपनिषदों में मिलता है। प्रत्येक चक्र को एक विशेष रंग में प्रदर्शित किया जाता है एवं उसमे कमल की एक निश्चित संख्या में पंखुड़ियां होती हैं। हर पंखुड़ी में संस्कृत का एक अक्षर लिखा होता है। इन अक्षरों में से एक अक्षर उस चक्र की मुख्य ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है।
ये चक्र प्राण ऊर्जा के कैंद्र हैं। यह प्राण ऊर्जा कुछ वाहिकाओं में बहती है, जिनको नाड़ियां कहते हैं। सुषुम्ना एक मुख्य नाड़ी है जो मेरुदन्ड में अवस्थित रहती है, दो पतली इड़ा और पिंगला नाम की नाड़ियां हैं जो मेरुदन्ड के समानान्तर क्रमशः बाई और दाहिनी तरफ अपस्थित रहती हैं।  इड़ा और पिंगला मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों से संबन्ध बनाये रखती हैं। पिंगला बहिर्मुखी सूर्य नाड़ी है जो बाएं गोलार्ध से संबन्ध रखती है। इड़ा अन्तर्मुखी चंद्र नाड़ी है जो बाहिने गोलार्ध से संबन्ध रखती है। 
प्रत्येक चक्र भौतिक देह के विशिष्ट हिस्से और अंग से संबन्ध रखता है और उसे सुचारु रूप से कार्य करने हेतु आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध करवाता है। साथ में हर चक्र एक निश्चित स्तर तक के ऊर्जा कंपन को वर्णित करता है एवं विभिन्न चक्रों में मानव के शारीरिक एवं भावनात्मक पहलू भी प्रतिबिम्बित होते  हैं। नीचे के चक्र शरीर के बुनियादी व्यवहार और आवश्यकता से संबन्धित हैं, सघन होते हैं और कम आवृत्ति पर कम्पन करते हैं। जबकि ऊपर के  चक्र उच्च मानसिक और आध्यात्मिक संकायों से संबन्धित हैं। चक्रों में ऊर्जा का उन्मुक्त प्रवाह हमारे स्वास्थ्य और शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को सुनिश्चित करता है।
आपकी सूक्ष्म देह, आपका ऊर्जा क्षेत्र और संपूर्ण चक्र-तंत्र का आधार प्राण है, जो कि ब्रह्मांड में जीवन और ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। ये चक्र  प्राण ऊर्जा का संचय, रूपान्तर और प्रवाह करते हैं और भौतिक देह के लिए प्राण ऊर्जा के प्रवेश-द्वार कहे जाते हैं। इस प्राण ऊर्जा के बिना भौतिक देह का अस्तित्व और जीवन संभव नहीं है।
सात सामान्य प्राथमिक चक्र इस प्रकार बताये गए हैं।
  1. मूलाधार, (संस्कृत: मूलाधार, Muladhara) आधार चक्र  
  2. स्वाधिष्ठान, (संस्कृत: स्वाधिष्ठान, Svadhisthana) त्रिक चक्र  
  3. मणिपुर, (संस्कृत: मणिपुर, Mauipura) नाभि चक्र  
  4. अनाहत, (संस्कृत: अनाहत, Anahata) हृदय चक्र  
  5. विशुद्ध, (संस्कृत: विशुद्ध, Visuddha) कंठ चक्र  
  6. अजन, (संस्कृत: आज्ञा, Ajna) ललाट या तृतीय नेत्र  
  7. सहस्रार, (संस्कृत: सहस्रार, Sahasrara) शीर्ष चक्र 
     मूलाधार या मूल चक्र
    यह पहला चक्र है और यह  जननेन्द्रिय और मलद्वार के बीच स्थित होता है। स्त्रियों में यह गर्भाशय-ग्रीवा के पीछे स्थित होता है, जहां योनि गर्भाशय से मिलती है। इस स्थान पर एक ब्रह्म ग्रंथि स्थित होती है जो ब्रह्मा की द्योतक है। इसका रंग लाल होता है, द्वितीयक रंग काला होता है। लाल रंग जीवन और भौतिक ऊर्जा का द्योतक है। मूलाधार चक्र चार पंखुड़ियों वाले कमल के फूल के समान दिखाई देता है।  यह चतुर्भुज के आकार का है, जिसके अन्दर एक त्रिकोण (योनि का प्रतिरूप) होता है। त्रिकोण में एक शिवलिंग अवस्थित रहता है जिस पर सर्प के आकार की कुण्डलिनी लिपटी रहती है। मूलाधार चक्र में चार नाड़ियां मिलती हैं। इसमें चार ध्वनियां – वं, शं, षं, सं होती हैं और यह ध्वनि मस्तिष्क और हृदय के भागों को कंपित करती हैं। शरीर का स्वास्थ्य इन्हीं ध्वनियों पर निर्भर करता है। यह एडरीनल ग्रंथि को नियंत्रित रखता है।
    मूलाधार चक्र पृथ्वी, मातृभूमि, संस्कृति, जीवन से सम्बंधित है। यह ऊर्जा और जीवन का केन्द्र है। मूलाधार चक्र रस, रूप, गंध, स्पर्श, भावों व शब्दों का मेल है. यह अपान वायु का स्थान है तथा मल, मूत्र, वीर्य, प्रसव आदि इसी के अधिकार में हैं।  इसको योग में विश्व निर्माण का मूल माना गया है। यही चक्र हमारी दिव्य शक्ति का विकास, मानसिक विकास, और चैतन्यता का मूल स्थान भी है। मूलाधार को स्वस्थ रखने के लिए सांसारिक व आध्यात्मिक शक्ति के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिये। शारीरिक रूप से मूलाधार काम-वासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है। यह  प्रवृत्ति, रक्षा, अस्तित्व और मानव की मौलिक क्षमता से संबंधित है। जिनका यह चक्र विकसित व सक्रिय होता है वे जिंदादिल होते हैं और अस्तित्व जब खतरे में होता है  तो मरने मारने का दायित्व इसी का होता है। यह चक्र भय, क्रोध, संताप, लालसा और अपराध-बोध से भी सम्बंधित है। यह स्वर्ग और नर्क दोनों का द्वार है।
    मूलाधार चक्र कुण्डलिनी शक्ति, मानव जीवन की परमचैतन्य शक्ति मानी गई है।  ब्रह्माण्ड के निर्माण में आवश्यक सभी तत्व मनुष्य के अन्दर कुण्डलिनी शक्ति के रूप में मौजूद होते हैं। योग क्रिया द्वारा इस शक्ति को जागृत कर अपने अन्दर अदभुत शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव किया जा सकता है।  इस चक्र के देवता गणेश और बीज मंत्र ' लं ' है।
    इसका संतुलन बिगड़ने पर रक्त-अल्पता, थकावट, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, शियेटिका, अवसाद, सर्दी, हाथ-पैर ठंडे रहना आदि रोग होते हैं।
    स्वाधिष्ठान का मतलब स्व (स्वयं) + धिष्ठान (स्थापित होना) है, तात्पर्य यह है कि मनुष्य के सभी संस्कार इसी चक्र में स्थित रहते हैं। मस्तिष्क में इनका प्रतिरूप अवचेतन मन है।  स्वाधिष्ठान चक्र त्रिकास्थि (Sacrum) के निचले हिस्से में मूलाधार से दो अंगुल ऊपर अवस्थित रहती है। इसमें 6 पंखुड़ियों वाला कमल होता है। इस चक्र में 6 नाड़ियां आपस में मिल कर 6 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की रचना करती हैं, जो दल का द्योतक है। फूल के भीतर अलग-अलग आकार के दो वृत्तों से बना सफेद अर्द्ध चन्द्र स्थित होता है। इसका आकार गोल और रंग नारंगी होता है। अर्द्ध चन्द्र इसका यंत्र है।   इस चक्र में ध्वनियां – बं, भं, मं, यं, रं, लं आती रहती हैं।
    स्वाधिष्ठान चक्र अवचेतना और भावना से सम्बंधित है। यह मूलाधार चक्र से सम्पर्क रखता है। स्वाधिष्ठान चक्र में संस्कार सुषुप्त रहते हैं और मूलाधार में वे अभिव्यक्त होते हैं। विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क हमारे सारे अनुभव और संवेदनओं का विश्लेषण किये बिना अवचेतन प्रकोष्ठों में संचित करता रहता है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में यह चक्र एक बड़ी बाधा बनता है  क्योंकि अवचेतन मन में पड़ी ये संवेदनाएं और कर्म कुण्डलिनी को जागृत नहीं होने देते और वह बार-बार मूलाधार में जाकर सुषुप्त हो जाती है।   
    इस चक्र का संबन्ध स्वाद, जन्म, परिवार और भावना से है और यह जल तत्व प्रधान है।  इसलिए यह रक्त, मूत्र, वीर्य, योनि स्राव, और लसिका से सरोकार रखता है। यह चक्र जिव्हा, जननेन्द्रियों, अंडकोष, वृषण, वृक्क और मूत्राशय का नियंत्रण करता है। इस चक्र से ही प्रजनन क्रिया सम्पन्न होती है तथा इसका संबन्ध सीधे चन्द्रमा से है। इसी चक्र के कारण मन की भावनाएं प्रभावित होती हैं, स्त्रियों में मासिकधर्म चन्द्रमा से सम्बंधित है और इनका नियंत्रण स्वाधिष्ठान चक्र से होता है। इसी के द्वारा मनुष्य के आंतरिक और बाहरी संसार में समानता स्थापित करने का कौशिश करता है तथा व्यक्तित्व का विकास होता है। इस चक्र का ध्यान करने से मन शान्त, निर्मल व शुद्ध होने लगता है, आन्तरिक शत्रु जैसे वासना, क्रोध, लालच आदि का नाश हो जाता है तथा धारणा और ध्यान की शक्ति प्राप्त होती है। इसके देवता श्री ब्रह्मा और सरस्वती हैं। इसका बीज मंत्र ' वं ' है।
    इसका संतुलन बिगड़ने पर मदिरा और नशीले पदार्थों का व्यसन, अवसाद, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, अस्थमा या ऐलर्जी, फंगस का संक्रमण, मूत्र विकार, कामुकता विकार, नपुंसकता और कामशीतलता आदि रोग होते हैं।
    मणिपुर चक्र
    मणिपुर चक्र नाभि में स्थित होता है। इसमें 10 पंखुड़ियों वाला कमल होता है और इसका रंग पीला होता है। इस चक्र में 10 नाड़ियां आपस में मिल कर 10 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की रचना करती हैं। इसका चिन्ह नीचे की ओर इंगित करता त्रिकोण है, जिसमें तीनो तरफ स्वास्तिक बना होता है। इस चक्र में ध्वनियां – डं, ढं, तं, थं, धं, नं, पं, फं, बं निकलती हैं। यह अग्नि तत्व प्रधान है और सूर्य तथा अहंकार का द्योतक है। यह चक्र सूर्य की भांति पूरे शरीर में प्राण ऊर्जा का संचार करता है तथा पोषण करता है। यह आमाशय, यकृत, पित्ताशय, अग्न्याशय और अधिवृक्क से सम्बंधित है। इस चक्र संबन्ध जन्म, परिवार और भावना से है और समान वायु का स्थान है। समान वायु का कार्य पाचन संस्थान द्वारा उत्पन्न स्राव को पूरे शरीर के अंग-अंग में समान रूप से पहुंचाना है। समान वायु का स्थान शरीर में नाभि से हृदय तक मौजूद है तथा पाचन संस्थान इसी के द्वारा नियंत्रित होता है। चयापचय और पाचन संस्थान का स्वस्थ या खराब होना वायु पर निर्भर करता है। इस चक्र पर ध्यान करने से व्यक्ति को अपने शरीर का भौतिक ज्ञान होता है और भावनाएं शांत होती हैं। मणीपुर चक्र ऊर्जा शक्ति और गर्मी से सम्बधित होता है। इसका जागरण जिस व्यक्ति के अन्दर होता है, वह निरंतर अपने जीवन में शक्ति और आविष्कार की तलाश में रहता है। इसके देवता श्री विष्णु लक्ष्मी हैं और बीज मंत्र ' रं ' है।
    इसका संतुलन बिगड़ने पर पाचन सम्बंधी रोग, पेप्टिक अल्सर, मधुमेह, रक्तशर्करा-अल्पता, कब्जी, आँत्र-कृमि, आँत्र-शोथ, स्मृतिदोष, घबराहट आदि रोग होते हैं।
    अनाहत चक्र
    यह अनाहत नाद का स्थल है। अनाहत का अभिप्राय है जिसे घायल नहीं किया जा सके। अनाहत नाद वह सूक्ष्म आकाशीय स्वर है जिसे एक अनुभवी साधक तभी सुन पाता है जब वह ध्यान में विशिष्ट ऊंचाई पर पहुंचता है। अनाहत चक्र उरोस्थि (sternum bone) के पीछे हृदय के पास स्थित होता है। इस चक्र में 12 पंखुड़ियां वाला कमल होता हैं। इस स्थान पर 12 नाड़ियां मिल कर 12 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की आकृति बनाती हैं। इसका चिन्ह दो त्रिकोण हैं, एक नीचे इंगित करता है तो दूसरा ऊपर इंगित करता है। यह मध्य चक्र है अर्थात तीन चक्र इसके ऊपर और तीन चक्र इसके नीचे होते हैं। इसका रंग हरा होता है, द्वितीयक रंग गुलाबी है। इसका व्यास छः सेंटीमीटर होता है। इस चक्र से ध्वनियां – कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं निकलती हैं। यह थाइमस अंतःस्रावी ग्रंथि से सम्बंधित है और हृदय, फेफड़े, रक्त, वेगस नाड़ी और परिवहन तंत्र को नियंत्रण करता है। यदि यह निर्मल और नियमित लय में है तो व्यक्ति का हृदय स्वस्थ रहता है। शरीर की रक्षाप्रणाली भी इसी के अधीन रहती है। यह चक्र प्राणवायु  का स्थान है और यहीं से वायु नासिका द्वारा अन्दर व बाहर होती रहती है। प्राणवायु शरीर की कई मुख्य क्रियाओं का संपादन करती है जैसे वायु को सभी अंगों तक पहुंचाना, अन्न-जल को पचाना, उसके रस बना कर सभी अंगों में प्रवाहित करना, वीर्य बनाना, पसीने और मूत्र के द्वारा उत्सर्जी तत्वों को बाहर निकालना आदि। इस चक्र में वायु प्रधान है। अनाहत चक्र पर ध्यान करने से मनुष्य, समाज और स्वयं के वातावरण में सुसंगति एवं संतुलन स्थापित करता है। इस पर ध्यान करने से मनुष्य को सभी शास्त्रों का ज्ञान होता है तथा वाकपटु, संसार के जन्म-मरण के विषय में ज्ञान होता है, ऐसे मनुष्य ज्ञानियों में श्रेष्ठ, काव्यमृत रस के आस्वादन में निपुण योगी तथा अनेक गुणों से युक्त होते हैं।
    यह चक्र दिव्य प्रेम का केन्द्र है और आध्यात्मिकता का द्वार है।  समर्पण की भावनाएं यहीं जन्म लेती हैं। भावनात्मक आसक्ति व लगाव से सम्बंधित विष्णु ग्रंथि यहीं अवस्थित होती है। जब यह ग्रंथि खुल जाती है तो व्यक्ति स्वार्थ तथा भावनात्मक अस्थिरता से मुक्त हो जाता है तथा हृदय निर्मल, निष्काम, निःस्वार्थ और ईश्वरीय दिव्य प्रेम रस में डूब जाता है।
    इस चक्र के प्रधान वाले लोग समाजसेवी तथा दूसरों का निर्वाह करने वाले होते हैं। इनमें स्पर्श या अपनी ऊर्जा द्वारा दूसरों के कष्ट दूर करने की क्षमता विकसित हो जाती है। इस चक्र के जागृत होने से लोगों में आध्यात्मिक और टेलीपैथी जैसे गुणों का विकास होता है।  इस चक्र की देवी श्री जगदम्बा माँ हैं और बीज मंत्र ' यं ' है।
    इसका संतुलन बिगड़ने पर हृदय और श्वास रोग, स्तन कैंसर, छाती में दर्द, उच्च रक्तचाप, रक्षाप्रणाली विकार आदि रोग होते हैं। 
    विशुद्ध चक्र
    यह कंठ में स्थित होता है। इसमें 16 पंखुड़ियों वाला कमल होता है। यहां 16 नाड़ियां मिल कर कमल के फूल की आकृति बनाती हैं। इसका रंग आसमानी होता है और चिन्ह अर्द्धचंद्र है। इसका व्यास छः सेंटीमीटर होता है। लेकिन अपनी स्वर-यंत्र का प्रयोग करने वाले लोगों जैसे गायक व अध्यापक आदि में यह बड़ा हो जाता है। इस चक्र में अ से अः तक 16 ध्वनियां निकलती हैं। यह थायरॉयड अंतःस्रावी ग्रंथि से सम्बंधित है। यह थायरॉयड,  स्वर-यंत्र, फेफडे, श्वास-नलिका पथ और आहार तंत्र को नियंत्रित करता है।
    विशुद्ध चक्र संचार, संवाद और संप्रेषण का केन्द्र है। यह व्यक्ति को अपने अनुभवों के बारे में बोलने की तीव्र इच्छा शक्ति प्रदान करता है। यह चक्र श्रवण का भी केन्द्र है और मनुष्य के सुनने की शक्ति इतनी विकसित कर देता है कि वह कानों से ही नहीं मन से भी सुनने लगता है। यह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रचनात्मकता, आत्मानुशासन, दायित्व और नेतृत्व का विकास करता है। इस चक्र का ध्यान करने से मनुष्य के रोग, दोष, भय, चिंता, शोक आदि दूर होते हैं और वह लम्बी आयु को प्राप्त करता है। यह चक्र शरीर निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चक्र आकाश तत्व प्रधान है और शरीर जिन 5 तत्वों से मिलकर बनता है, उसमें एक तत्व आकाश भी होता है। आकाश तत्व शून्य है तथा इसमें अणु का कोई समावेश नहीं है।
    मानव जीवन में प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए आकाश तत्व का अधिक महत्व है। यह तत्व मस्तिष्क के लिए आवश्यक है और इसका नाम विशुद्ध रखने का कारण यह है कि इस तत्व पर मन को एकाग्र करने से मन आकाश तत्व के समान शून्य और शुद्ध हो जाता है। इस चक्र में बाहरी और आंतरिक विषों को निष्क्रिय करने की क्षमता होती है। यह चक्र पिछले कटु और नकारात्मक अनुभव को निकाल कर जीवन को परमानन्द (Bliss) से भर देता है। जागृत होने पर यह मनुष्य में जीवन शक्ति, रचनात्मकता और सच्चा ज्ञान भर देता है। इस चक्र के देवता श्री कृष्ण राधा हैं और बीज मंत्र ' हं ' है।  
    इसका संतुलन बिगड़ने पर थायरॉयड विकार, जुकाम और ज्वर, संक्रमण, मुंह, जबड़ा, जीव्हा, कंधा और गर्दन सम्बंधी रोग, उग्रता, हार्मोन विकार, मनोदशा विकार, रजोनिवृत्ति जनित रोग आदि रोग होते हैं। 
    अजना या आज्ञा चक्र
    अजना चक्र दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है। इसमें 2 बड़ी पंखुड़िया वाले कमल का अनुभव होता है। इसकी दो पंखुड़ियां आत्मा-परमात्मा, तर्क-वितर्क, पिनियल-पिट्यूट्री, इड़ा-पिंगला और नर-नारी को इंगित करती है। सारी द्विविधता (Duality) यहीं मिलती है। इसमे एक त्रिकोण है, जो योनि का द्योतक है। इस त्रिकोण में एक श्वेत लिंग है। इसका रंग गहरा नीला होता है।
    अजन का अभिप्राय आज्ञा या निगरानी करना है। इसे गुरू चक्र भी कहते हैं। यह शीर्ष ग्रंथि (Pineal) ग्रंथि से सम्बंधित है, जो मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव करती है। यह हार्मोन सोने या जागने की क्रिया को नियंत्रित करत है। यह मस्तिष्क के निचले भाग, बाई आंख, कान, नाक, और नाड़ी तंत्र को नियंत्रित करता है। यहां दो ध्वनियां निकलती रहती हैं। इस स्थान पर पिनियल और पिट्यूट्री ग्रंथियां मिलती हैं। इसके जागरण का केन्द्र भौंहों के बीच का बिन्दु है जिसे ब्रह्माध्य कहते हैं। ध्यान, एकाग्रता और आत्मदर्शन के लिए यह बिन्दु बहुत विश्ष्ट है। इस पर ध्यान करने से सम्प्रभात समाधि की योग्यता आती है। मूलाधार से इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना अलग-अलग प्रवाहित होती हुई इसी चक्र पर मिलती हैं और चैतन्यता की एक धारा के रूप में सहस्रार को जाती हैं। इसलिए योग में इस चक्र को त्रिवेणी भी कहा गया है। योग ग्रंथ में इसके बारे में कहा गया है। ।
    इड़ा भागीरथी गंगा  पिंगला  यमुना नदी।
    तर्योमध्यगत नाड़ी सुषुम्नाख्या सरस्वती।।
    इड़ा को गंगा, पिंगला को जमुना और सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहा गया है। इन नाड़ियों का जहां मिलन होता है, उसे त्रिवेणी कहते हैं। जब साधक गहरे ध्यान में होता है और उसकी सारी संवेदनाएं शून्य हो जाती हैं तब अजना से सहस्रार तक जाने के निर्देश इसी चक्र से मिलते हैं।  जो मनुष्य अपने मन से इन चक्रों पर ध्यान करता है, उसके सभी पाप नष्ट होते हैं और दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। इस चक्र का सम्बंध जीवन को नियंत्रित करने से है। 
    इसे शिव का तीसरा नेत्र कहते हैं। इसे अन्तर्ज्ञान का नेत्र भी कहते हैं क्योंकि यह अन्दर देखता है। कुछ लोग इसे दिव्य-चक्षु कहते हैं क्योंकि योगियों को ईश्वरीय अन्तरदृष्टि और श्रुतिप्रकाश इसी चक्र से मिलता है। यहीं पहुंच कर मनुष्य को मोक्ष का द्वार दिखाई देता है। यहीं चरमानन्द, अतिसंवेदन-बोध, सूक्ष्म दृष्टि, अतीन्द्रिय श्रवण, अन्तरज्ञान, असाधारण शक्तियां प्राप्त होती हैं। इसी छठे चक्र में मनुष्य को दूरबोध (Telepathy) और पुनर्जन्म का ज्ञान होता है। आज्ञा चक्र मन और बुद्धि का मिलन स्थान है। यह उर्ध्व शीर्ष बिन्दु ही मन का स्थान है। इसे रुद्र ग्रंथि कहते हैं। सुषुम्ना मार्ग से आती हुई कुण्डलिनी शक्ति का अनुभव योगी को यहीं आज्ञा चक्र में होता है। योगाभ्यास व गुरू की सहायता से साधक कुण्डलिनी शक्ति को सहस्रार चक्र में विलीन करा कर दिव्य ज्ञान व परमात्मा तत्व को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करता है। संवेदनाओं और पांच तत्वों के परे छठा चक्र सूर्य और चन्द्रमा से प्रभावित होता है। इसकी धातुएं स्वर्ण और रजत हैं। इसका बीज मंत्र  ' शं '  है।
    इसका संतुलन बिगड़ने पर थायरॉयड विकार, जुकाम और ज्वर, संक्रमण, मुंह, जबड़ा, जीव्हा, कंधा और गर्दन सम्बंधी रोग, उग्रता, हार्मोन विकार, मनोदशा विकार, रजोनिवृत्ति जनित रोग आदि रोग होते हैं। 
    सहस्रार चक्र
    सहस्रार चक्र मस्तिष्क के ऊपर ब्रह्मरंध में अपस्थित  6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है। ऊपर से देखने पर इसमें कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देता है। इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं। इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं। इसका चिन्ह खुला हुआ कमल का फूल है जो असीम आनन्द के केन्द्र होता है। इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है। इस चक्र में अ से क्ष तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है। यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है।
    यह आत्मा का उच्चतम स्थान है। इस चक्र को देख कर व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र का अनुमान लगाया जा सकता है। इसका विस्तार, रंग, गति, आभा और बनावट देख कर व्यक्ति की चैतन्यता, आध्यात्मिक योग्यता और अन्य चक्रों से समन्वय का अनुमान लगाया जा सकता है। अच्छा योगाभ्यास करने वाले साधक का चक्र ओजस्वी और चमकदार होता है। सच्चे स्वप्न देखने की क्षमता विकसित हो जाती है। यदि इस चक्र में लचीलापन है तो इसका मतलब है कि व्यक्ति आसानी से अपनी आत्मा को शरीर से निकाल कर कहीं अन्यत्र ले जा सकता है। नीचे के बाकी 6 चक्रों से बिलकुल अलग यह एक अति विशिष्ट और उन्नत चक्र है। यह ईश्वरधाम और मोक्ष का द्वार है। जब यह चक्र अच्छी स्थिति में है तो अन्य चक्र स्वतः जागृत हो जाते हैं। जो साधक अपनी कुण्डलिनी जाग्रत कर लेते हैं तो कुण्डलिनी बाल रूप बाला त्रिपुरा सुन्दरी के रूप में ऊपर उठती है। थोड़ा और ऊपर पहुंचने पर वह यौवन को प्राप्त कर राजराजेश्वरी का रूप धरती है और सहस्रार चक्र तक वह संपूर्ण स्त्री ललिताम्बिका का रूप धर लेती है।  जो साधक कुण्डलिनी को सहस्रार तक ले कर  आते हैं, वे परमानन्द को प्राप्त करते हैं, जिसकी सर्वोच्च अवस्था समाधि है। कुण्डलिनी के इस जागरण को शिव और शक्ति का मिलन कहते हैं। इस मिलन से आत्मा का अस्तित्व खत्म हो जाता है और वह परमात्मा में लीन हो जाती है। इस चक्र पर ध्यान करने से संसार में किये गये बुरे कर्मों का भी नाश होता है। ऐसे साधक अच्छे कर्म करने और बुरे कर्मों का नाश करने में सफल हो जाते हैं। आज्ञा चक्र को सम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा का स्थान कहा जाता है, क्योंकि यही दिव्य दृष्टि का स्थान है। उसे शिव की तीसरी आंख भी कहते हैं। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है। यही सारे चक्रों का मास्टर स्विच है।  
    यह वास्तव में चक्र  नहीं है बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है। जो व्यक्ति सहस्रार चक्र का जागरण करने में सफल हो जाते हैं, वे जीवन मृत्यु पर नियंत्रण कर लेते हैं। सभी लोगों में अंतिम दो चक्र सोई हुई अवस्था में रहते हैं। अतः इस चक्र का जागरण सभी के वश में नहीं होता है। इसके लिए कठिन साधना व लम्बे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है। इसके देवता श्री भगवान शंकर हैं और बीज मंत्र ' ' है।
    इसका संतुलन बिगड़ने पर सिरदर्द, मानसिक रोग, नाड़ीशूल, मिर्गी,  मस्तिष्क रोग, एल्झाइमर, त्वचा में चकत्ते आदि रोग होते हैं।  

    Thursday, February 9, 2012

    Budwig Protocol

    स्टुटगर्ट रेडियो पर डॉ. बडविग का साक्षात्कार





    एकबार स्टुटगर्ट के साउथ जर्मन रेडियो स्टेशन पर 9 नवम्बर, 1967 (सोमवार) को रात्रि के पौने नौ बजे प्रसारित साक्षात्कार में डॉ. बडविग ने सिर उठा  कर गर्व से कहा था और जिसे पूरी दुनिया ने सुना था कि यह अचरज की बात है  कि मेरे उपचार द्वारा कैंसर कितनी जल्दी ठीक होता है। 84 वर्ष की एक महिला को आँत का कैंसर था, जिसके कारण आंत में रुकावट आ गई थी और आपातकालीन शल्यक्रिया होनी थी। मैंने उसका उपचार किया जिससे कुछ ही दिनों में उसके कैंसर की गाँठ पूरी तरह खत्म हो गईऑपरेशन भी नहीं करना पड़ा और वह  स्वस्थ हो गई। इसका जिक्र मैंने मेरी पुस्तक द डैथ ऑफ ए ट्यूमर  की पृष्ठ संख्या 193-194 में किया है।  अस्पताल कैंसर के वे रोगी जिन्हें रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी से कोई लाभ नहीं होता है और जिन्हें से यह कह कर छुट्टी दे दी जाती है कि अब उनका कोई इलाज संभव नहीं है,  भी मेरे उपचार से ठीक हो जाते हैं और इन रोगियों में भी मेरी सफलता की दर 90% है।

    यह सेहत का वार्षिक अंक है। जिसमें आपके ज्ञान-वर्धन के लिए  मेरा लेख संपादक श्री प्रदीप जैन ने प्रकाशित किया है। मैं उनका आभारी हूँ । आप इस कड़ी चटकाइये।
    http://flaxindia.blogspot.in/2011/12/budwig-cancer-treatment.html

    Wednesday, February 8, 2012

    Alasi Maa blessed Amit



    अलसी मैया की अमित पर हुई कृपा और किया खूब लाड़
    कन्या दी  सुन्दर सी साथ में दहेज भी मिला  छप्पर फाड़

    जी हां अलसी मैया जब भी आशीर्वाद देती है दिल खोल कर देती है और अपने सारे खजाने भक्तों के लिए खोल देती है। अमित एक बहुत मामूली परिवार का लड़का है और बी.कॉम., एम.बी.ए. करने के बाद जयपुर में एक नौकरी करने लगा। उसी ऑफिस में सुन्दर सी अमीर घराने की एक लड़की भी काम करती थी। दोनों में प्यार हो गया और दोनों परिवारों में उनकी शादी की खुसर-फुसर होने लगी। लेकिन तभी अमित को अहसास हुआ कि वह तो स्तंभनदोष और शीघ्रस्खलन का शिकार है। मासूम अमित ने अपनी मां को खुल कर बोल दिया कि वह शादी के योग्य नहीं है इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता है। मां पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा। वह मुझे जानती थी इसलिए मुझे फोन करके सारी बात बतलाई। मैंने उसे सांत्वना दी और कहा कि अमित को भरपूर अलसी खिलाओ। डेढ़ महीने बाद अमित मेरी क्लिनिक पर आया। मैं उसे देख कर हैरान था। उसके हावभाव में गजब का आत्मविश्वास था और देखने में सलमान खान जैसा लग रहा था। वह मुझे शादी का कार्ड  देकर बोला कि अंकल 4 दिसंबर की शादी है आप जरूर आना। उसने बतलाया कि अलसी मैया ने उसके  सारे रोग दूर कर दिये हैं और अब उसके परिवार और ससुराल के सभी लोग नियमित अलसी खाने लगे हैं।  उसका इतना आग्रह था, मुझे शादी में जाना ही पड़ा। मैं भी बहुत खुश था कि अलसी मैया ने उसे सुन्दर कन्या का तोहफा दिया और साथ बिन मांगे दहेज (एक करोड़ से ज्यादा) भी छप्पर फाड़ कर दिया।


    इसीलिए मैं कहता हूँ कि आजकल की बालाएं  अलसी खाने वाले युवकों को पसन्द करती है और सुखी दाम्पत्य जीवन का सूत्र अलसी ही है। यह लिंक देखिये। 
    http://flaxindia.blogspot.in/2011/07/blog-post_10.html

    दिनांक - 23 मार्च, 2012 


    अलसी मैया के आशीर्वाद से अमित आज न्यूयॉर्क में हनीमून मना रहा है। आज उसने मुझे फोन करके बतलाया है। 

    Flax Awareness in Ludhiyana


    इस संस्थान ने अलसी के 10 हजार ब्रोचर बंटवाये हैं। बहुत बहुत बधाई और धन्यवाद। मैं हो गया आजीवन आभारी......

    Monday, February 6, 2012

    डॉ. सीगफ्रेड अर्न्स्ट ने कैसे कैंसर को शिकस्त दी

    डॉ. सीगफ्रेड अर्न्स्ट ने कैसे कैंसर को शिकस्त दी 

    डॉ. रोबर्ट विलनर का परिचय 

    डॉ. रोबर्ट विलनर (जन्म – 21 जून, 1929 मृत्यु – 15 अप्रेल, 1995) फ्लोरिडा के विख्यात चिकित्सक थे। वे एम.डी. और पीएच.डी. थे और चालीस वर्षों तक रोगियों की चिकित्सा सेवा में संलग्न रहे। वे एक महान वैज्ञानिक, अनुसंधानकर्ता और चिंतक थे। उन्होंने “द कैंसर सोल्यूशन” और “डेडली डिसेप्शन : “द प्रूफ दैट सैक्स एण्ड एचआईवी डू नॉट कॉज एड्स” जैसी विवादास्पद पुस्तकें लिखी थी। 1978 में उनकी पत्नि को कैंसर हो गया था और कीमोथैरेपी के कारण बहुत वेदना और तकलीफ झेलनी पड़ी थी। उनकी मृत्यु के बाद उन्होंने प्राकृतिक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में रुचि लेना शुरू कर दिया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने देश-विदेश की कई यात्राएं की, अनेकों वैकल्पिक चिकित्सकों तथा रोगियों के साक्षात्कार किया और बहुत प्रभावित हुए। वे अचंभित कि ये उपचार बहुत सरल, सुरक्षित और प्रभावशाली थे। उन्हें लगने लगा कि अब सचमुच वह समय आ गया है जब हमें कैंसर में कीमोथैरेपी और रेडियेशन जैसे मारक उपचार की जगह अन्य वैकल्पिक उपचार को भी अपनाना चाहिये।

    फ्रुडेनस्टेड में डॉ. बुडविग से साक्षात्कार 

     कैंसर के वैकल्पिक उपचार की खोज के सिलसिले में मैं डॉ. जोहाना बुडविग से भी कई बार मिला। शुरू में तो मुझे भी बुडविग के उपचार और विज्ञान पर इतना विश्वास नहीं हो पा रहा था। एक बार मैं फ्रुडेनस्टेड में डॉ. बुडविग के घर पर उनसे साक्षात्कार कर रहा था। तभी अचानक फोन की घंटी बजी और उनकी जर्मन भाषा में एक लंबी वार्तालाप शुरू हो गई। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे फोन का रिसीवर थमाया और बोली, “यह डॉ. सीगफ्रेड अर्न्स्ट का फोन है, जिनके बारे में मैंने आपको बतलाया था, आप भी इनसे बात कर लीजिये। ये मेरे उपचार से ठीक होकर आज मजे से जी रहे है।” मेरी उनसे लगभग दस मिनट तक बात हुई। मैं उनके अनुभव सुन कर हैरान था, हालांकि उनके बारे डॉ. बुडविग मुझे बहुत कुछ बता चुकी थी। 

    मैंने हॉटल आकर सारी बातें डायरी में लिख ली। अगले दिन शुक्रवार था और मैं स्टुटगर्ट से सुबह 8 बजे की फ्लाइट से फ्लोरिडा लौट जाना चाहता था। मैंने सोचा कि मैं आज ही स्टुटगर्ट चला जाऊं ताकि अगले दिन में सुबह जल्दी नहीं उठना पड़े। इसलिए मैंने हॉटल के रिशेप्सनिस्ट को फ्लाइट के टिकिट बुक करने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद वह आकर बोला कि स्टुटगर्ट की फ्लाइट में कोई सीट खाली नहीं है, लेकिन यदि मैं ट्रेन से म्यूनिक चला जाऊँ तो वहां से मुझे फ्लोरिडा के लिए आसानी से फ्लाइट मिल जायेगी। मुझे भी यही ठीक लगा। मैंने चेकऑउट किया और टेक्सी से सीधा रेल्वे-स्टेशन पहुँचा। म्यूनिक के लिए ट्रेन आने ही वाली थी। मैंने टिकिट लिया और वहीं बुक-स्टॉल से बुडविग की कुछ किताबें खरीद ली। इतने में ट्रेन भी प्लेटफॉर्म पर पहुँच गई थी। म्यूनिक यहाँ से 136 किलोमीटर दूर था। मौसम काफी सर्द था और हल्का सा कोहरा भी था। मैंने बुडविग की किताब खोली परन्तु मेरे दिमाग में तो अभी तक डॉ. अर्न्स्ट की एक-एक शब्द गूँज रही थी। 

    इतने में ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, मैंने बाहर देखा तो यह उल्म स्टेशन था, तभी याद आया कि डॉ. अर्न्स्ट यहीं तो रहते हैं। बस मेरा मन डॉ. अर्न्स्ट से मिलना चाह रहा था। बस मैंने तुरन्त अपना सूटकेस पकड़ा और वहीं उतर पड़ा। तब शाम के साढ़े सात बज चुके थे, सर्दी बढ़ चुकी थी और कोहरा भी घना हो चला था। मैंने स्टेशन से ही डॉ. अर्न्स्ट को फोन करके सुबह मिलने का समय ले लिया। उन्होंने कहा कल कि कल पूरा दिन हम साथ रहेंगे और दिन का भोजन भी साथ ही करेंगे। मैंने स्टेशन से सीधा गोल्डन ट्यूलिप हॉटल पहुँचा। मैं थक चुका था और भूख भी लग रही थी। मैंने वेटर के बुलाया और पूछा कि उनके रेस्टॉरेन्ट में क्या-क्या व्यंजन बनते हैं। उसने कहा, “सर, आज रात बहुत सर्द रहने वाली है। बर्फ भी गिर सकती है। इसलिए पहले आप सोनाबाथ का लुफ्त लें और फ्रेश हो जायें। हमारे हॉटल का सोनाबाथ बहुत मशहूर है। तब तक मैं आपके लिए पक्ड प्राइड ड्राई वाइन, एवोकाडो वसाबी सलाद और गर्म सिज़लिंग फज़ीता तैयार करवाता हूँ। 

    अगला दिन मैंने डॉ. अर्न्स्ट के साथ बिताया। 78 वर्ष की उम्र में भी वे काफी बुद्धिमान, मिलनसार, सक्रिय और ऊर्जावान थे। उन्होंने कहा कि डॉ. विलनर, मेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है। यह 18 मार्च, 1978 की बात है जब मेरे पेट में दर्द हुआ और मैंने उल्म के सर्जरी क्लिनिक में पेट का एक्स-रे करवाया। मेरे आमाशय में कैंसर की गांठ का पता चला और तीन दिन बाद 21 मार्च को हाइडलवर्ग की सर्जीकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रश्चियन हरफर्थ ने मेरा ऑपरेशन किया। जब मुझे होश आया तो मुझे बताया गया कि मेरी कैंसर बड़ी आंत में भी 1.1 इंच की गांठ हो गई था और कैंसर तिल्ली तक फैल गया था। हरफर्थ यह सब देख कर घबरा गये थे और बिना शल्य किये पेट सिल देना चाह रहे थे, तभी नर्सिंग इंचार्ज आर्थर बोह्म ने कहा कि अगर हमें डॉ. अर्न्स्ट की जान बचानी है तो हर जोखिम उठा कर भी ऑपरेशन करने चाहिये। टोली के बाकी लोंगो की भी यही राय थी। डॉ. हरफर्थ आखिर ऑपरेशन के लिए राजी हुए और मेरा ऑपरेशन साढ़े छः घन्टे चला। उन्होंने मेरा आमाशय निकाल दिया। आर्थर की गुजारिश पर फादर रुपर्ट मेयर से मेरे लिए प्रार्थना की। लेकिन आठ दिन बाद मेरे डायफ्राम के नीचे पस पड़ गया, जिसके कारण मुझे तेज बुखार हो गया। दोबारा ऑपरेशन करके पस निकाला गया, लेकिन दो दिन बाद ही मेरे फेफड़ों में पानी भर (पल्मोनरी एडीमा) गया। मैंने बहुत तकलीफ सही, सांस बहुत फूलती थी और तीन दिन तो मैं बेहोश ही रहा। मुझे नहीं लगता था कि मैं कभी ठीक हो पाऊँगा। मेरे लिए बहुत लोगों (2000 से ज्यादा) ने मन्नतें मांगी, प्रार्थनाएं की। जापान जैसे सुदूर देश में भी मेरे लिए प्रार्थना की गई। लेकिन आठ हफ्ते बाद धीरे-धीरे मेरी स्थिति में सुधार आने लगा। सभी के प्रयास और प्रार्थना से मैं आखिरकार स्वस्थ हो ही गया। मेरा ठीक होना सभी के लिए खुशी और अचरज की बात थी। 3 मई, 1987 को म्यूनिक के ओलम्पिक स्टेडियम में फादर रुपर्ट मेयर ने मेरे लिए एक सभा आयोजित की थी। इसके बाद फादर से मेरे करीबी रिश्ते बने रहे और वे समय-समय पर मेरी मदद भी करते रहे। परन्तु इससे बाद भी मुझे बहुत कमजोरी और पाचन समबन्धी विकार रहने लगा और मरीज देखना भी बंद करना पड़ा। मुझे मालूम था कि इस तरह के कैंसर में मरीज मुश्किल से एक साल जी पाते हैं। 

    दो साल बाद फिर कैंसर ने फिर अपना असर दिखाया और पूरे पेट में फैल गया और अब कीमोथैरेपी ही एक मात्र उपचार बचा था। वे जानते थे कि कीमो के बड़े खतरनाक दुष्प्रभाव होंगे और फिर भी जीवन शायद ही बच पायेगा, इसलिए उन्होंने कीमो नहीं लेने का निर्णय लिया। तभी किसी ने उन्हें डॉ. बुडविग के प्रोटोकोल के बारे में बतलाया। वे तुरन्त डॉ. बुडविग से मिले, उनसे उपचार अच्छी तरह समझा और पूरे विश्वास से उनका उपचार लेना शुरू कर दिया। वे रोजअपने पेट पर एलडी ऑयल पेक लगा कर सोते थे और एलडी तेल की ही रोज मालिश भी करवाते थे। उन्हें इस उपचार से बहुत फायदा हुआ। मार्च, 1983 में उल्म के प्रोफेसर डॉ फाइफर ने उनकी जाच की और कहा कि वे पूरी तरह कैंसर से ठीक हो चुके हैं। यह सचमुच एक चमत्कार ही था। इसका पूरा श्रेय उन्होंने डॉ. बुडविग के उपचार और एलडी तेल को दिया। परन्तु इसके बाद भी उन्होंने अपनी जीवन-शैली को नहीं बिगाड़ा और रोज अलसी का तेल व पनीर लेना उनके जीवन का नियम ही बन चुका था। वे नियमित डॉ. बुडविग से संपर्क करते रहते थे। आज 15 वर्ष बाद भी वे पूर्णतया स्वस्थ हैं, बस थोड़ा बहुत पाचन संबन्धी विकार रहता है क्योंकि उनका आमाशय निकाल दिया गया था। 

    आज उनके शरीर में आज कैंसर का नामोनिशान भी नहीं है। उन्होंने कहा कि सचमुच ये मेरा तीसरा जीवन है दूसरा जीवन प्रोफेसर हरफर्थ और तीसरा डॉ. बुडविग का दिया हुआ है। वे पूरे दिन उन्हें धन्यवाद देते रहे। उन्होंने कहा कि यह उपचार कैंसर का सबसे बढ़िया उपचार है। हां वे कुछ बातों में बुडविग से सहमत नहीं थे जैसे उन्होंने कहा कि यदि कैंसर की बड़ी गांठे हैं तो शल्य-क्रिया करनी ही चाहिये। जब कि बुडविग कहती थी शल्यक्रिया का निर्णय भी सोच समझ कर लेना चाहिये। डॉ. अर्न्स्ट से मेरी बहुत बातें हुई। उन्होंने बहुत सारी ऐसी बातें बतलाई जो मैं डॉ. बुडविग से सुन चुका था पर विश्वास नहीं कर पा रहा था। डॉ. अर्न्स्ट से मुलाकात मेरे जीवन की एक यादगार घटना बन कर गई। इस उपचार को लेकर मेरे मन में जो भी संशय या शक थे, वे सब अर्न्स्ट से मिल कर दूर हो चुके थे। जब मैं उनसे विदा ले रहा था तभी उनके पुत्र डॉ. मार्टिन भी आ गये थे। उनसे भी कुछ मिनट अच्छी बातें हुई और मैं हॉटल के लिए निकल पड़ा। 

    संदर्भ-ग्रंथ सूची - 
    डॉ. अर्न्स्ट के उपचार का पूरा विवरण निम्न समाचार-पत्रों और पुस्तकों में प्रकाशित हुआ है।  
    • 4 मई 1997 का म्यूनिख चर्च अखबार 
    • डा. फ्रिट्ज की पुस्तक "शुट्जएन्जल वुन्डर" 
    • डॉ. रॉबर्ट विलनर एम.डी., पीएच.डी. की पुस्तक "The Cancer Solution" 
    • डा. जोहाना बुडविग की पुस्तक "Cancer-The Problem and the Solution"

    Wednesday, February 1, 2012

    नीलपुष्पी - यौवन का उपवन



    अलसी है यौवन का उपवन  महकाये तन मन और जीवन 
    रग रग में भरदे प्रेम अगन दिल चाहे पिय से होय मिलन 


    लगभग दो महीने पहले मुझे एक लड़की ने फोन किया था। वह एक मासूम सी भोली-भाली कलाकार थी जिसने नया-नया अन्तरजातीय प्रेम विवाह किया था। उसने मुझे शिकायत के रूप में बतलाया था कि उसका पति रोज लैंगिक संबन्ध बनाता चाहता है, जो उसे रुचिकर और आनंददायक नहीं लगता है। उसे लग रहा था जैसे उसके पति ने सिर्फ शारीरिक संबन्ध बनाने के लिए ही शादी की हो। उसे दाम्पत्य जीवन एक बोझ और मजबूरी लगने लगा था। मुझे लगा कि वह दुर्बल कामेच्छा की शिकार है इसलिए मैंने दोनों पति पत्नि को अलसी खाने की सलाह दी।


    आज फिर उसका फिर फोन आया है और जो प्रतिक्रिया उसने दी है वह सचमुच किसी चमत्कार से कम नहीं हैं। उसने बतलाया कि अब उसके जीवन में कोई परेशानी नहीं है, वह दाम्पत्य जीवन का पूरा आनन्द उठा रही है, वह बहुत खुश है, उसका पति उसे बहुत प्यार करता है, उसका बहुत ध्यान रखता है, यदि पहले घर आता है तो वह तुरन्त उसे फोन करता है कि तुम कहां हो? जल्दी आ जाओ। जब मैंने उससे पूछा कि क्या आपकी कामेच्छा बढ़ी है? क्या संभोग के समय आप पर्याप्त गीलापन महसूस करती हो? क्या आपके पति का स्तंभन ज्यादा प्रबल हुआ है? क्या उनकी स्खलन अवधि बढ़ी है? क्या आप अब ज्यादा आनन्द की प्राप्ति करते है? मेरे सारे प्रश्नों के जवाब में उसने कहा कि सब कुछ पहले की अपेक्षा बहुत-बहुत बढ़िया है। उसने मुझे यह भी बतलाया कि अलसी खाने से उसका शरीर सुडौल बना है, मुहांसे दूर हो गये हैं, त्वचा में गोरापन और चमक आई है, स्तन बड़े और आकर्षक हो गये हैं, उसका आत्मविश्वास बढ़ा है और सभी मित्र अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं। बस और ट्रेन में सभी उसे ही देखते रहते हैं। इसीलिए मैं आपसे हमेशा कहता हूँ कि सफल नारीत्व और मातृत्व की असली कुंजी अलसी ही है। 



    इस कड़ी को चटका कर देखिये......
    आज के कुंवर अलसी बाला की ही कामना करते हैं ??? http://flaxindia.blogspot.in/2011/10/blog-post_9178.html

    मैं गेहूं हूँ

    लेखक डॉ. ओ.पी.वर्मा    मैं किसी पहचान का नहीं हूं मोहताज  मेरा नाम गेहूँ है, मैं भोजन का हूँ सरताज  अडानी, अंबानी को रखता हूँ मुट्ठी में  टा...