Friday, June 10, 2016

नायक नहीं खलनायक हूँ मैं – ट्रांस फैट


जुल्मी बड़ा दुखदायक हूँ मैं 


नायक नहीं खलनायक हूँ मैं – ट्रांस फैट 


         ट्रांस फैट या ट्रांस-अनसेचुरेटेड फैटी एसिड मानव-निर्मित, टॉक्सिक, अखाद्य, और कृत्रिम फैट है। यह एक मृत

और क्षतिग्रस्त अनसेचुरेटेड फैट है, जिसे सस्ते तेलों का आंशिक हाइड्रोजिनेशन करके फैक्ट्री में बनाया जाता है।
प्राकृतिक तेलों और जीव-वसा में प्रायः ट्रांस फैट नहीं होते। यह देखने में घी और मख्खन की तरह दिखता है, इसकी शैल्फ लाइफ बहुत ज्यादा होती है यानि इसमें बने व्यंजन में लंबे समय तक दुर्गंध नहीं आती और इसको बनाने में लागत भी बहुत कम आती है। इसलिए यह बेकरी, हलवाई और प्रोसेस्ड फूड निर्माताओं का पसंदीदा फैट है। सिर्फ प्रोसेस्डरफूड में ही ट्रांसफैट नहीं होते, बल्कि घरों में इस्तेनमाल होने वाले तेल और वनस्पंति घी में भी ट्रांस फैट के मामले में भारत की स्थिति तो बहुत ही खराब है। न ठीक से मानक बनाए गए हैं, न उनकी पालना ठीक से होती है। एक बार सी. एस. ई. ने कुछ कंपनियों के वनस्पति तेलों के सैम्पल्स चैक किए, अधिकांश ब्रांड्स में 5 -12 गुना से भी अधिक ट्रांस फैट पाए गए। 2 दिन तक टी.वी. चेनल्स न्यूज़ दिखाते रहे। उसके बाद “वही ढाक के तीन पात”। ट्रांस फैट को लेकर हमारे देश में शिक्षा और जागरुकता की बहुत कमी है। तो आइए दोस्तों, हम सब मिलकर लोगों को ट्रांस फैट के खतरों से अवगत करवाएं और इसे प्रतिबंधित करवाने के लिए समुचित प्रयास करें।

       ट्रांस फैट के मामले में भारत की स्थिति तो बहुत ही खराब है। न ठीक से मानक बनाए गए हैं, न उनकी पालना ठीक से होती है। एक बार सी. एस. ई. ने कुछ कंपनियों के वनस्पति तेलों के सैम्पल्स चैक किए, अधिकांश ब्रांड्स में 5 - 12 गुना से भी अधिक ट्रांस फैट पाए गए। 2 दिन तक टी.वी. चेनल्स न्यूज़ दिखाते रहे। उसके बाद “वही ढाक के तीन पात”। ट्रांस फैट को लेकर हमारे देश में शिक्षा और जागरुकता की बहुत कमी है। तो आइए दोस्तों, हम सब मिलकर लोगों को ट्रांस फैट के खतरों से अवगत करवाएं और इसे प्रतिबंधित करवाने के लिए समुचित प्रयास करें। 
फैटी एसिड मूलतः एक हाइड्रो-कार्बन की लड़ होती है, जो अनसेचुरेटेड (जिसमें डबल बाँड होते है) या सेचुरेटेड (जिसमें कोई डबल बाँड नहीं होते) हो सकती है। अनसेचुरेटेड फैटी एसिड की लड़ से एक ही तरफ के दो हाइड्रोजन अलग होते हैं, और एक डबल-बांड बनता है। यहाँ लड़ कमजोर पड़ जाने के कारण मुड़ जाती है। मुड़ने से फैटी एसिड के भौतिक और रासायनिक गुण प्रभावित होते हैं। ये सामान्य तापक्रम पर तरल बने रहते हैं। इसे सिस विन्यास कहते हैं। 

        सिस विन्यास के विपरीत ट्रांस फैट में विपरीत दिशा के हाइड्रोजन अलग होते हैं अर्थात एक ऊपर की तरफ का तो दूसरा नीचे की तरफ का। फलस्वरूप फैटी एसिड की लड़ सीधी रहती है और आपस में घनिष्टता से जमी रहती है, इसलिए ये सामान्य तापक्रम पर संतृप्त वसा अम्ल की तरह ठोस रहते हैं। यह असामान्य और अप्राकृतिक विन्यास है। 

हाइड्रोजिनेशन - टेक्नोलोजी की मार, दुनिया हुई बीमार 

         हाइड्रोजिनेशन की प्रक्रिया में केटेलिस्ट निकल धातु की उपस्थिति में तेल को तेज तापक्रम पर गर्म करके भारी दबाव से हाइड्रोजन गैस प्रवाहित की जाती है। इससे तेल ठोस होने लगता है। पूर्ण हाइड्रोजिनेशन करने पर बहुत सख्त और मोम जैसा फैट तैयार होता है। इतना सख्त फैट तलने या बेक करने के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए निर्माता हाइड्रोजिनेशन प्रक्रिया को बीच में ही रोक देते हैं और तेल का आंशिक हाइड्रोजिनेशन ही करते हैं। यह बिलकुल बटर की तरह लगता है, सही तापक्रम पर पिघलता है और बेकिंग या तलने के लिए एकदम उपयुक्त होता है। लेकिन आंशिक हाइड्रोजिनेशन की प्रक्रिया में कुछ ट्रांस फैट बन जाते हैं। यहीं से सारी समस्या शुरू होती है। ट्रांस फैट्स का सेवन दिल की धमनियों को अवरुद्ध करता है, हार्ट अटेक का कारक बनता है, कई बीमारियों को दावत देता है और हमारे शरीर को क्रोनिक इन्फ्लेमेशन की भट्टी में झोंक देता है। 

      कुछ स्थितियों में ट्रांस फैट प्राकृतिक फैट्स में भी बन सकते हैं। जैसे मांस और दुग्ध उत्पाद में विद्यमान वेक्सिनिल और कोंजूगेटेड लिनोलिक एसिड में थोडे से ट्रांस फैट बन जाते हैं, लेकिन ये हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाते। कनाडा में हुए शोध के अनुसार बीफ और डेयरी उत्पाद में विद्यमान वेक्सिनिल एसिड एल.डी.एल. कॉलेस्टेरोल और ट्रायग्लीसराइड को कम करते हैं। 

प्रोक्टर एंड गेंबल की जानलेवा सौगात "क्रिस्को" – अब तो खिसको 

        मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी और लाखों-करोडों निर्दोष लोगों के कत्ल की इस घिनौनी कहानी का बीज लगभग एक सदी पहले बोया गया, जब पॉल सेबेटियर को हाइड्रोजिनेशन की तकनीक विकसित करने के उपलक्ष में नोबल पुरस्कार दिया गया। सेबेटियर ने सिर्फ गैस को हाइड्रोजिनेट करने का विज्ञान बनाया, किंतु इससे प्रेरित होकर जर्मनी के रसायनशास्त्री विल्हेम नोरमन ने 1901 में तेल को हाइड्रोजिनेट करने का तरीका बना लिया और 1902 में इसका पेटेंट भी हासिल कर लिया। उस दौर में विलियम प्रोक्टर नाम का एक छोटा सा व्यवसायी साबुन बनाता था और उसका बहनोई जॉर्ज गेंबल मोमबत्तियां बनाकर बेचता था। तब यूरोप के साबुन निर्माता जैतून के तेल से उम्दा साबुन बनाते थे, इसलिए प्रोक्टर के सूअर की चर्बी से बने साबुन की बिक्री कम होती जा रही थी। दूसरी तरफ थोमस एडीसन ने अमेरिका को अपने विद्युत बल्ब की रोशनी से जगमगा दिया था और बेचारे गेंबल की मोमबत्तियां भी नहीं बिक पा रही थी। वक्त की नज़ाकत को समझते हुए दोनों साले-बहनोइयों ने हाथ मिलाया और सिनसिनाटी, ओहियो में प्रोक्टर एंड गेंबल नाम से एक कंपनी बनाई। उन्होंने आनन-फानन में कॉटन सीड के कुछ फार्म खरीदे, नोरमन से हाइड्रोजिनेशन की तकनीक हासिल की और 1911 में कॉटन सीड से क्रिस्को (CRYStalized Cottonseed Oil) के नाम से दुनिया का पहला हाइड्रोजिनेटेड फैट बनाना शुरू किया। बाद में जेनेटिकली मोडीफाइड सोयबीन और सेचुरेटेड पाम ऑयल से क्रिस्को बनने लगा।
William Proctor and George Gamble 
        लेकिन अमेरिका के लोग क्रिस्को को अपनाने में हिचक रहे थे। इसलिए प्रोक्टर एंड गेंबल ने क्रिस्को का खूब प्रचार किया। भ्रामक और झूँठे विज्ञापन तैयार किए गए। क्रिस्को को स्वास्थ्यप्रद, साफ, सस्ता, सुपाच्य, और लार्ड (सूअर की चर्बी से बना फैट) से ज्यादा आधुनिक बतलाया जाने लगा। क्रिस्को में खाना पकाने वाली स्त्रियों को अच्छी पत्नि और मां की संज्ञा दी जाने लगी। उनके घर में अब लार्ड की दुर्गंध नहीं थी और उनके बच्चे चरित्रवान बन रहे थे। प्रोक्टर एंड गेंबल ने एक ही वाक्य से अपने दोनों प्रतिद्वंदियों लार्ड और बटर को हाशिए पर डाल दिया। यहूदियों को आकर्षित करने के लिए तो खासतौर पर लिखा गया कि यहूदी 4000 सालों से क्रिस्कों की प्रतीक्षा कर रहे थे। 

        प्रोक्टर एंड गेंबल ने क्रिस्को की मार्केटिंग में कोई कमी नहीं छोड़ी। पैसा पानी की तरह बहाया गया। क्रिस्को की शैल्फ लाइफ ज्यादा थी तथा बेकिंग और तलने के लिए बटर का सस्ता विकल्प था। इसलिए फास्ट फूड, बेकरी और खाद्य उत्पाद बनाने वाली सभी कंपनियां क्रिस्को का प्रयोग करने लगी। शुरूआत में गृहणियां को बटर छोड़कर क्रिस्कों को अपनाना उचित नहीं लग रहा था। इसलिए उनको लुभाने के लिए प्रोक्टर एंड गेंबल ने रंगीन कुक-बुक्स
बनवाई, जिनमें सभी व्यंजन बनाने में क्रिस्को के प्रयोग की हिदायत दी गई। जगह-जगह वर्क-शॉप किए जाते, क्रिस्को के पैकेट और कुक-बुक्स मुफ्त में बंटवाई जाती। इस तरह धीरे-धीरे पूरी दुनिया को यह घातक फैट खिलाया जाने लगा। हो सकता है तब प्रोक्टर एंड गेंबल को भी पता नहीं हो कि यह ट्रांस फैट मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु साबित होगा। हमारे देश में इसे सबसे पहले डालडा के नाम से बेचा गया। 


       वक्त बीतता गया और धीरे-धीरे ट्रांस फैट ने अपना असर दिखाना शुरू किया। लोग बीमार रहने लगे और चिरकारी प्रदाह (chronic inflammation) के शिकार होने लगे। हृदय रोग, कॉलेस्टेरोल, टाइप-2 डायबिटीज़ और आर्थराइटिस आदि रोगों का आघटन एकदम से बढ़ने लगा। प्रोक्टर एंड गेंबल नहीं चाहती थी कि इसके लिए क्रिस्को को जिम्मेदार माना जाए। इसलिए उन्होंने गुप-चुप तरीके से डॉ. फ्रेड मेटसन की मदद ली। डॉ. मेटसन बहुत बड़े साइंटिस्ट थे और प्रोक्टर एंड गेंबल के हितों के लिए काम करते थे। इन्होंने सरकार की अधूरी लिपिड रिसर्च के क्लिनिकल ट्रायल्स की रिपोर्ट को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने पेश किया, जिसमें यह दर्शाया गया कि हार्ट अटेक और डायबिटीज़ सेचुरेटेड फैट खाने से हो रहे हैं, न कि हाइड्रोजिनेटेड फैट खाने से। डॉ. मेटसन ने एफ.डी.ए. और अमेरिकन हार्ट ऐसोसिएशन के अधिकारियों को खूब पैसा खिलाया। बस फिर क्या था, अमेरिकन हार्ट ऐसोसिएशन भी बटर, घी और सेचुरेटेड फैट्स को ही इन बीमारियों कारण बताने लगे और हाइड्रोजिनेटेड फैट को हृदय-हितैषी साबित करने में जुट गए। 


      लेकिन सच्चाई बिलकुल विपरीत थी। ट्रांस फैट के कारण हृदय रोग, टाइप-2 डायबिटीज़, कैंसर और अन्य क्रोनिक बीमारियां महामारी का रूप ले चुकी थी। जबकि क्रिस्को से पहले इन रोगों का इंसीडेंस बहुत कम था। एक तरफ तो प्रोक्टर एंड गेंबल अपनी सफलता के जश्न मनाती रही, एफ.डी.ए. को मलाई खिलाती रही. दूसरी तरफ हजारों-लाखों निर्दोष लोग बीमार होते रहे, मरते रहे। मानव जाति पर एक बहुत बड़ा अपराध घटित होता रहा। लगभग एक सदी तक मीडिया, एफ.डी.ए. और अमेरिकन हार्ट ऐसोसिएशन ख़ामोश बने रहे, सब कुछ देखते रहे। कोई चाहता ही नहीं था कि लोगों को सच्चाई से अवगत करवाया जाए। चिकित्सक और अध्यापक भी ट्रांस फैट की सही जानकारी नहीं दे रहे थे। 

सीख लो ट्रांस फैट का ज्ञान, बनोगे स्वस्थ और बलवान 

        हमारे स्वास्थ्य के लिए ट्रांस फैट क्यों इतना घातक है? प्राकृतिक और आवश्यक वसा अम्ल (EFAs) और इन
खराब ट्रांस फैट्स की कार्य-प्रणाली में क्या अंतर है? इन सारी बातों को गहराई से समझने के लिए आपको डॉ. जॉहाना बडविग द्वारा किए गए शोध को जानना जरूरी है। डॉ. बडविग जर्मनी के फेडरल इंस्टिट्यूट ऑफ फैट्स एंड ड्रग्स विभाग की चीफ एक्सपर्ट थीं। उन्हें ओमेगा-3 लेडी के नाम से जाना जाता है। डॉ. बडविग ने पहली बार ओमेगा-3 फैट (अल्फा-लिनेलोनिक एसिड) की संरचना और कार्य-प्रणाली का गहन अध्ययन किया और सिद्ध किया कि स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए अल्फा-लिनेलोनिक एसिड की भूमिका सबसे अहम है। उन्होंने यह भी साबित किया कि ट्रांस फैट मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। आज भी ओमेगा-3 फैट्स पर रिसर्च जारी है, लेकिन बडविग की शोध के बारे में चर्चा नहीं होती। यह हम सबके लिए दुर्भाग्य की बात है। पता नहीं क्यों मीडिया और अनुसंधानकर्ता बडविग के विज्ञान पर क्यों ख़ामोश हो जाते हैं। 

       1949 में डॉ. बडविग ने फैट को पहचानने के लिए पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की। इस तकनीक द्वारा उन्होंने पहली बार अनसेचुरेटेड और वाइटल आवश्यक वसा अम्ल (EFAs) - सिस अल्फा-लिनेलोनिक एसिड और सिस लिनोलिक एसिड को पृथक किया, और संरचना का विस्तृत अध्ययन किया। सिस विन्यास में एक ही तरफ के हाइड्रोजन अलग होते हैं और डबल बाँड बनता है। यहाँ चेन कमजोर पड़ जाने के कारण मुड़ जाती है। सबसे खास बात यह है कि इस मोड़ में नेगेटिवली चार्ज्ड ढेर सारे ऊर्जावान इलेक्ट्रोन्स इकट्ठे हो जाते हैं। ये इलेक्ट्रोन्स हल्के और स्वच्छंद होने के कारण ऊपर उठकर बादल की तरह तैरते हुए दिखाई देते हैं, इसलिए इन्हें पाई-इलेक्ट्रोन्स या इलेक्ट्रोन क्लाउड की संज्ञा दी गई है। पाई-इलेक्ट्रोन्स का एक इलेक्ट्रोमेगनेटिक फील्ड बनता है, जो ऑक्सीजन को आकर्षित करता है और कोशिका की भित्ति में प्रोटीन के साथ बंधन बनाकर अवस्थित रखता है। ये पाई-इलेक्ट्रोन्स शरीर में ऊर्जा या जीवन-ऊर्जा या आत्मा के प्रवाह के लिए बहुत जरूरी माने गए हैं। कोशिका की भित्ति में अवस्थित पाई-इलेक्ट्रोन्स रिज़ोनेंस के द्वारा सूर्य के इलेक्ट्रोन्स को आकर्षित और संचित करते हैं। क्वांटम फिजिक्स की गणनाओं के अनुसार सूर्य के इलेक्ट्रोन्स का सबसे अधिक संचय मानुष ("human") करता है। मानुष हमेशा स्वस्थ जीवन जीता है और भविष्य की तरफ अग्रसर रहता है। अमानुष "anti-human" की भी परिकल्पना की गई है। मानुष के विपरीत अमानुष में पाई-इलेक्ट्रोन्स बहुत कम होते हैं, वह हमेशा भूतकाल की तरफ बढ़ता है। उसकी जीवन क्रियाएं और सोच भी शिथिल रहती है, उसमें ऊर्जा और ताकत नहीं होती क्योंकि उसमें सूर्य के इलेक्ट्रोन्स के साथ स्पंदन करते पाई-इलेक्ट्रोन्स अनुपस्थित रहते हैं। ट्रांस फैट में पाई-इलेक्ट्रोन्स अनुपस्थित होने के कारण मनुष्य रोग, गर्त, और मृत्यु की तरफ बढ़ता है। बडविग ने हमेशा इन कातिल ट्रांस फैट्स को मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन बताया और सबूतों के साथ इसको प्रतिबंधित करने की सलाह दी। लेकिन किसी ने ध्यान ही नहीं दिया अन्यथा आज दुनिया का स्वरूप कुछ और ही होता। 



        मैंने गर्म और उबलते तेल में ट्रांस फैट के कणों को देखा है। इनमें अनसेचुर्टेड डबल बाँड भी थे, परंतु ऊर्जावान पाई-इलेक्ट्रोन्स नहीं थे और ये हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हुए। 
- डॉ. जॉहाना बडविग 

ट्रांस फैट के खतरे 

      ट्रांस फैट में ऊर्जावान पाई-इलेक्ट्रोन्स नहीं होने से कोशिका की भित्तियां ऑक्सीजन को आकर्षित करने की क्षमता तथा कोमलता और तरलता खो बैठती है, कोशिका में ऊर्जा का निर्माण बाधित होता है। ट्रांस फैट आवश्यक वसा अम्ल की कार्य-प्रणाली में व्यवधान पैदा करते हैं, बुरे कॉलेस्टेरोल का स्तर बढ़ाते है, और शरीर की रक्षा-प्रणाली को कमजोर बनाते हैं। ट्रांस फैट पहली और तीसरी श्रेणी के प्रदाहरोधी (Anti-inflammatory) प्रोस्टाग्लेंडिन्स का स्त्राव भी कम करते हैं, जिससे शरीर क्रोनिक इन्फ्लेमेशन का शिकार हो जाता है और कई बीमारियों का कारक बनता है। जैसे 
1. कैंसर
2. हृदय रोग, हार्ट अटेक 
3. टाइप-2 डायबिटीज
4. आर्थराइटिस
5. अस्थमा
6. डिप्रेशन 

मुझसे बचकर कहाँ जाओगे 

1. बाजार में मिलने वाले सभी तरह के बिस्किट्स, चाकलेट्स, कैडी, केक, पेस्ट्री, ब्रेड, टोस्ट, पिज्ज़ा, बर्गर तथा सभी बेकरी उत्पादों में भरपूर ट्रांस फैट होता है। 
2. बाजार में उपलब्ध सभी भारतीय व्यंजन जैसे समोसा. कचौड़ी, चाट-पकौड़े, छोले-भटूरे, सभी तरह के नमकीन और मिठाइयों में भरपूर ट्रांस फैट होता है। 
3. सभी स्नेक-फूड जैसे आलू के चिप्स, फ्रैंच फ्राइज़, इंस्टेंट नूडल्स आदि में भरपूर ट्रांस फैट होता है। 
4. वनस्पति और आंशिक हाइड्रोजिनेटेड रिफाइंड तेल में भरपूर ट्रांस फैट होते हैं। 
5. रसोई में अनस्चुरेटेड तेल को गर्म करने पर भी ट्रांस फैट बनते है। इसलिए समझदार ग्रहणियां तलने के लिए सेचुरेटेड फैट का प्रयोग करती हैं।

एफ.डी.ए. का यू-टर्न, खबर बड़ी है गर्म 

         लंबे समय से लोगों, संस्थाओं, और अनुसंधानकर्ताओं के भारी दबाव के बाद एफ.डी.ए. ने आखिरकार मान लिया है कि किसी भी मात्रा में ट्रांस फैट का सेवन हमारे लिए सुरक्षित नहीं है और इसे “generally recognized as safe” श्रेणी से हटा दिया है। जबकि कुछ ही समय पहले तक एफ.डी.ए. ट्रांस फैट को मनुष्य के लिए सुरक्षित बतलाता रहा है और हार्ट अटेक, डायबिटीज, आर्थराइटिस के बढ़ते आघटन के लिए सेचुरेटेड फैट को जिम्मेदार मानता रहा। 

       ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करने में डेनमार्क सबसे आगे रहा है। डेनमार्क ने मार्च, 2003 में हर उस खाद्य-पदार्थ की बिक्री पर पाबंदी लगा दी है, जिसमे 2 प्रतिशत से अधिक ट्रांस फैट हो। इस कानून के बनने से लोगों के आहार में ट्रांस फैट की मात्रा घटकर 1 ग्राम प्रति दिन हो गई है। बाद में कनाडा और स्विटज़रलैंड ने भी इसी तरह के कानून बनाए।

        5 दिसंबर, 2006 में न्यूयॉर्क ते बोर्ड ऑफ हैल्थ ने शहर के सारे रेस्टॉरेंट्स में ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया, जिसे जून, 2008 से लागू किया गया।

        2013 में एफ.डी.ए. ने सभी खाद्य-पदार्थों से ट्रांस फैट्स को हटाने की घोषणा की। जून, 2015 में आखिरी चेतावनी जारी कर दी गई कि तीन साल के अंदर हर खाद्य-पदार्थ से ट्रांस फैट पूरी तरह हटा लिया जाए। एफ.डी.ए. कहता है कि इससे खाद्य उद्योग पर अगले बीस वर्षों में 6.2 बिलियन डॉलर का खर्चा आएगा। खाद्य उद्योग को नए
Prof. Fred Kummerow
तौर-तरीके और तकनीक विकसित करनी होगी। यह डॉ. बडविग और प्रोफेसर कमेरो समेत उन सभी लोगों, संस्थाओं और अनुसंधानकर्ताओं की बहुत बड़ी जीत है, जो ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करवाना चाहते थे। यह सचमुच उत्सव मनाने का समय है। स्वर्ग में बैठी बडविग भी आज मुस्कुरा रही होंगी। इलिनॉइस यूनीवर्सिटी के 100 वर्षीय प्रोफेसर फ्रेड कमेरो लंबे समय से ट्रांस फैट को प्रतिबंधित करवाने के लिए 6 दशकों से प्रयासरत थे। 2009 में इन्होंने एफ.डी.ए. के खिलाफ एक पिटीशन भी फाइल किया था। 

        ट्रांस फैट के मामले में भारत की स्थिति तो बहुत ही खराब है। न ठीक से मानक बनाए गए हैं, न उनकी पालना ठीक से होती है। एक बार सी. एस. ई. ने कुछ कंपनियों के वनस्पति तेलों के सैम्पल्स चैक किए, अधिकांश ब्रांड्स में 5 -12 गुना से भी अधिक ट्रांस फैट पाए गए। 2 दिन तक टी.वी. चेनल्स न्यूज़ दिखाते रहे। उसके बाद “वही ढाक के तीन पात”। ट्रांस फैट को लेकर हमारे देश में शिक्षा और जागरुकता की बहुत कमी है। तो आइए दोस्तों, हम सब मिलकर लोगों को ट्रांस फैट के खतरों से अवगत करवाएं और इसे प्रतिबंधित करवाने के लिए समुचित प्रयास करें। 

ट्रांस फैट के बाद… क्या? 

         ट्रांस फैट प्रतिबंधित होने के बाद खाद्य-उद्योग कौन से फैट का प्रयोग करेंगे? मंहगे और अच्छे फैट तो ये काम में लेने से रहे। काम तो इन्हें सस्ता सोयबीन और पॉम ऑयल ही लेना है। पतली गलियों से कुछ ऐसी सूचनाएं मिल रही हैं कि ये लोग इंटरएस्टेरीफाइड फैट का प्रयोग कर सकते हैं। इंटरएस्टेरीफिकेशन की प्रक्रिया में एक ट्रायग्लीसराइड अणु से फैटी एसिड निकाल कर दूसरे ट्रायग्लीसराइड अणु से चिपका दिया जाता है। इससे फैट ठोस होने लगता है, शैल्फ लाइफ बढ़ जाती है, तलने तथा बेकिंग के लिए उपयुक्त रहता है और ट्रांस फैट भी नहीं बनते। लेकिन यह भी अप्राकृतिक फैट है और शुरूआती शोध के अनुसार इसके प्रयोग से ब्लड शुगर बढ़ती है और अच्छा एच.डी.एल. कॉलेस्टेरोल कम होता है।

3 comments:

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रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-06-2016) को "चुनना नहीं आता" (चर्चा अंक-2371) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kanika Dugal said...

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