Thursday, October 13, 2011

Coronary Artery Bypass Graft (CABG)



हृदय धमनी उपमार्ग निर्माण शल्यक्रिया  या Coronary Artery Bypass Graft (CABG)


हृदय-धमनी उपमार्ग निर्माण शल्यक्रिया या Coronary Artery Bypass Graft (CABG)  को संक्षेप में बाईपास सर्जरी, हृदय बाईपास, सी.ए.बी.जी. या केबेज भी कहते हैं। आजकल कुछ लोग इसे एओर्टोकोरोनरी बाईपास ACG भी कहते हैं।  विश्व की पहली बाईपास सर्जरी 2 मई, 1960 को अमेरिका में डॉ. रोबर्ट गोट्ज़ ने की थी। आज अकेले अमेरिका में 5 लाख बाईपास प्रति वर्ष होते हैं। 

मान लीजिये कि एक सड़क किसी कस्बे में होकर  गुजर रही है। धीरे-धीरे लोगों की भीड़-भाड़ और वाहनों  की आवाजाही और अतिक्रमण बढ़ने के कारण इस सड़क से गुजरना बहुत मुश्किल हो जाता है, कई बार यातायात जाम हो जाता है। तब हम कस्बे के बाहर-बाहर एक बाईपास सड़क या उपमार्ग बना देते हैं ताकि लम्बी दूरी का यातायात निर्बाध चलता रहे। ठीक इसी तरह जब कोई हृदय-धमनी अवरुद्ध हो जाती है तो हम  शल्य क्रिया द्वारा शरीर के किसी अन्य भाग से नस निकालकर उसे हृदय की धमनी में अवरुद्ध हुए स्थान के समानांतर जोड़ कर हृदय में निर्बाध रक्त प्रवाह हेतु वैकल्पिक रक्त-पथ (bypass) बना देते हैं। इसी शल्य-क्रिया तकनीक को बाईपास सर्जरी कहते हैं।

हृदय धमनी उपमार्ग निर्माण शल्यक्रिया  के संकेत

  • जब अवरोध बाँई मुख्य धमनी में हो या तीन मुख्य धमनियों में हो।
  • एन्जियोप्लास्टी विफल हो जाये।
  • बाँया निलय या Left Ventricle ठीक से काम नहीं कर रहा हो। 
  • STEMI  हार्ट-अटेक के तुरन्त बाद।
  • पूर्व में हुए  हार्ट-अटेक के कारण धातक एरिदमिया हो।
  • पूर्व में की गई बाईपास में आरोपित नस में रुकावट आ जाये।  
पारम्परिक बाईपास सर्जरी

यह एक बड़ी शल्यक्रिया है जिसे किसी अच्छे संस्थान में अनुभवी और कुशल हृदय शल्य-चिकित्सक, निश्चेतन  विशेषज्ञ, परफ्युजनिस्ट, नर्सिंगकर्मी और तकनीकी विशेषज्ञों की टोली अंजाम देती है। इसके लिए रोगी को बेहाश करना पड़ता है। पूरी शल्य-क्रिया में 3-6 घन्टे लगते है। रोगी को 7 से ज्यादा दिन भरती रहना पड़ता है। इसका खर्चा डेढ़ से दो लाख रुपये आता है।

बाईपास की तैयारी

रोगी को शल्य-क्रिया के एक या दो दिन पहले भर्ती किया जाता है। उसे इस शल्य-क्रिया के बारे में विस्तार से बताया जाता है, इससे होने वाले लाभ और जोखिम के बारे में भी बतला दिया जाता है। यदि रोगी धूम्रपान करता हो या एस्पिरिन ले रहा है तो ये सब बन्द करने के निर्देश दिये जाते हैं। रोगी के कई तरह के परिक्षण जैसे रक्त और मूत्र की विस्तृत जांच, छाती का एक्सरे, ई.सी.जी., इकोकार्डियोग्राफी, स्पाइरोमीटरी आदि किये जाते हैं। हाल ही में की गई एन्जियोग्राफी सबसे आवश्यक परीक्षण है। निश्चेतन विशेषज्ञ रोगी की जांच कर यह सुनिश्चित कर लेता है कि रोगी इस शल्य-क्रिया के लिये पूर्णतया स्वस्थ है।  साथ ही वह  रोगी को दवाईयां, शल्य-क्रिया की पूर्व रात्री से निराहार रहने और अन्य सारे आवश्यक  निर्देश दे देता है। परिचारिकाएँ  उसकी छाती व उन अंगो की शेविगं कर देती हैं जहाँ से नस निकाली जानी है।

प्री-ऑपरेटिव रूम में
ज्योंही रोगी को प्री-ऑपरेटिव रूम में लाया जाता है, निश्चेतन विशेषज्ञ उसकी कलाई की शिरा में केन्यूला लगा देते हैं।   
ऑपरेशन थियेटर में
निश्चेतन विशेषज्ञ रोगी को बेहोश करके उसकी स्वासनली में एक ट्यूब डालता है जिसे वेन्टीवेटर से जोड़ दिया जाता है। परिचारिकाएँ रोगी के शरीर की छाती और अन्य अंगो पर स्प्रिट और आयोडीन का लेप कर देती हैं।  एन्जियोग्राफी और अन्य परीक्षणों को देखकर शल्य-चिकित्सक निर्णय करता है कि  कितनी धमनियों में वैकल्पिक रक्त-पथ बनाने हैं और इनके लिए नसें या graft कहां से लेने हैं।  रोगी को एक मॉनीटर से जोड़ दिया जाता है, जो उसकी हृदय गति, रक्तचाप, श्वसन-गति और अन्य जरूरी सूचनायें पटल पर निरन्तर प्रतिबिम्बित करता रहता है। मूत्राशय में भी केथेटर डाल कर उसे एक मूत्र की थैली से जोड़ दिया जाता है, ताकि मूत्र-स्रवण की मात्रा पर नज़र रखी जा सके।

अब मुख्य शल्य-क्रिया शुरू होती है। शल्य-चिकित्सकों की एक टोली पैर या हाथ में नश्तर से एक या कई चीरे लगा कर सावधानी से नस निकालते हैं। फिर दूसरी टोली छाती के मध्य में त्वचा को नश्तर से लम्बा काटती है और स्टर्नम (छाती के मध्य की  हड्डी) को आरी ले काट कर छाती को खोल दिया जाता है। शिरा में हिपेरिन प्रवाहित किया जाता है ताकि शल्य-क्रिया के दौरान रक्त पतला बना रहे और थक्के नहीं बने।  अब हृदय के बाहरी खोल पेरीकार्डियम में चीरा लगाने पर हृदय दिखाई देता है।  इसके बाद कई नलियों द्वारा हृदय को हृदय-फुफ्फुस यंत्र (Heart Lung Machine) से जोड़ दिया जाता है जिससे हृदय और फेफड़ों का काम यह मशीन करने लगती है। हृदय को एक ऐसे घोल कार्डियोप्लेजिया में नहला दिया जाता है जिससे उसका तापमान कम हो जाता है और उसका धड़कना भी बंद हो जाता है।

हृदय बन्द होने पर उसके बाद ग्राफ्टिंग का काम शुरू किया जाता है। हमने पहले से ही पैर की नस या पेट की धमनी का ग्राफ्ट तैयार रखा जाता है। हृदय की धमनियों के अवराध को ध्यान से देख कर चिन्हित किया जाता है। अवरोध के आगे पोलीप्रोपाइलीन धागे से धमनी को खोल कर ग्राफ्ट से सिल देते हैं। ग्राफ्ट के दूसरे सिरे का को सीधा महाधमनी या एओरटा से जोड़ा जाता है।  इस तरह सारे ग्राफ्ट लगा दिये जाते हैं। यदि ग्राफ्ट इन्टरनल मेमेरी धमनी से लेना हो तो उसका एक सिरा एओरटा से जुड़ा रहने दिया जाता है और दूसरा नीचे का सिरा हृदय की धमनी से जोड़ा जाता है। आजकल ग्राफ्ट शिरा के स्थान पर धमनियों से लेना अच्छा माना जाता है।  इन्टरनल मेमेरी धमनी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, इसके ग्राफ्ट लम्बे समय (20-30 वर्ष) तक रोगी का साथ देते हैं और खुशकिस्मती से हमारी छाती में दो इन्टरनल मेमेरी धमनियाँ होती हैं।  

बाईपास का कार्य पूरा होने पर रोगी के शरीर को गर्म किया जाता है, जिससे या तो हृदय स्वतः ही धड़कना शुरू कर देता है अन्यथा अस्थाई पेसमेकर द्वारा विद्युत के झटके देकर शुरू कर दिया जाता है। इसके बाद हृदय और फेफड़ों को रक्त संचार व्यवस्था से वापस जोड़ दिया जाता है और वे पहले की तरह काम करने लगते हैं। हार्ट लंग मशीन को हटा दिया जाता है और हृदय की सतह पर दो पेसमेकर की तारें लगा दी जाती हैं। इन  तारों को अस्थाई पेसमेकर से जोड़ दिया जाता है। दिल की धड़कन के अनियमित होने पर यह पेसमेकर उसे नियंत्रित कर लेता है। छाती की हड्डियों को स्टील के तारों द्वारा मजबूती से सिलकर त्वचा में टांके लगा दिए जाते हैं। आपरेशन में तीन-चार घंटे का समय लगता है और इस दौरान रोगी को चार से छह यूनिट तक रक्त चढ़ाना पड़ सकता है।

आई.सी.यू. में
आपरेशन के बाद अगले 24 से 48 घंटे तक मरीज को डाक्टर व नर्स आदि के निगरानी में रिकवरी रूम में रखा जाता है। कार्डियक मॉनीटर की तारें इलेक्ट्रोड के जरिए मरीज की छाती से लगी होती है और ईसीजी तथा हृदय की गति लगातार रिकार्ड होते रहते हैं। एक धमनी में एक केन्यूला डली रहती है जिसे मरीज के रक्तचाप का पता चलता है, जबकि दूसरा केन्यूला गर्दन की नस में डला होता है और यह नस के भीतर का दबाव बताता है। मरीज की छाती में भी दो नली डली होती हैं जिनसे छाती के भीतर एकत्र हो रहा द्रव बाहर आता रहता है। ये सारी नलियां आपरेशन के एक दिन बाद निकाल दी जाती हैं। इनके अलावा आपरेशन के 16 से 24 घंटे बाद तक रोगी की सांस नली में एक एंडोट्रेकियल टयूब डली रहती है। यह नली रेस्पिरेटर यंत्र से जुड़ी होती है। यह रोगी को श्वसन में मदद करता है। जब रोगी अच्छी तरह सांस लेने लगता है तो रेस्पिरेटर को हटा दिया जाता है। जब तक यह नली श्वास नली में होती है रोगी न तो कुछ खा पी सकता है और न ही बातचीत कर पाता है। रोगी के मुंह और नाक पर एक आक्सीजन मास्क भी लगा दिया जाता है, ताकि रोगी को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन मिलती रहे। आमतौर पर आपरेशन के 10-15  दिन बाद रोगी को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है। तब तक उसकी छाती और पैर के जख्म भी सूख जाते हैं। पैर से नस निकालने के कारण कुछ दिनों तक पैर में सूजन रह सकती है। लेकिन पैर ऊपर उठाकर आराम करने और चलते समय पैर पर क्रैप बैंडेज बांधने से सूजन कम हो जाती है।
विशेष सन्देश
यह हमेशा याद रखें कि कोरोनरी एन्जियोप्लास्टी या बाईपास सर्जरी सिर्फ आपकी हृदय-धमनी में आये अवरोध का तात्कालिक जीवन-रक्षक उपचार भर है, ताकि आपको हृदय-रोधगलन या एन्जाइना से होने वाली जटिलताओं से बचाया जा सके। इस उपचार का ऐथेरोस्क्लिरोसिस की रोगजनकता पर कोई असर होने वाला नहीं है। जब तक आप कोरोनरी धमनी-रोग के जोखिम घटक को चिन्हित कर दूर नहीं करेंगे और जीवनशैली को नहीं सुधारेंगे, तब तक धमनियों में ये प्लॉक बनते रहेंगे।

डॉ. नरेश त्रेहा के प्रयासों से हृदय शल्य-चिकित्सा में भारत बना हाई-टेक



पद्मश्री और हृदय शल्य-क्रिया के मसीहा डॉ. नरेश त्रेहन अनेक क्रान्तिकारी प्रयोग करते आये हैं और पूरे विश्व में अपनी विशेष पहचान बनाई है“Ace of Heart” के नाम से विख्यात इस जादूगर ने हाल ही गुड़गांव, दिल्ली में  43 एकड़ में फैले 1250 शय्याओं, गहन चिकित्सा इकाइयों (कुल बेड्स 300), 45 शल्यकक्षों और हाई-टेक उपकरणों से सुसज्जित एक सात सितारा, विश्वस्तरीय, बहुविभागीय और सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थान मेदांत द मेडिसिटी का निर्माण किया है, जो देश और विश्व का सबसे बड़ा चिकित्सा-संस्थान है और हमारे देश की शान है। इस संस्थान को बनने में तीन वर्ष लगे और 1200 करोड़ रुपये की लागत आई। अन्य संस्थानों की अपेक्षा यहाँ उपचार का खर्च कम आता है। गरीब मरीजों के मुफ्त इलाज के लिए मेदान्ता में व्यवस्था भी की गई है जिससे धन के अभाव में जरूरतमंद निराश नहीं लौटें।  ये राष्ट्रपति के निजी चिकित्सक हैं। इन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, लालबहादुर शास्त्री पुरस्कार, डॉ. बी.सी.रॉय अवार्ड, ज्वेल ऑफ इन्डिया आदि अनेकों पुरस्कारों से नवाजा गया है। ये अब तक लगभग 75000 सफल हार्ट सर्जरी कर चुके हैं।  ये 20 वर्ष से रोज योग करते हैं और कभी-कभी मेदान्ता की केन्टीन का समोसा खाने से भी नहीं चूकते हैं। ये अपने रोगियों को हमेशा अलसी खाने की सलाह भी देते हैं।
  
जहाँ धड़कते दिल पर सर्जरी करने में विश्व के बड़े-बड़े महारथियों के हाथ डर के मारे काँपते हैं वहीं हृदयरोग- चिकित्सा का यह सुल्तान धड़ल्ले से बीटिंग हार्ट सर्जरी और मिनिमल इनवेजिव तकनीक (एक छोटे से छेद द्वारा) द्वारा सर्जरी करता हैं। कॉर्डियक स्टेम सेल तकनीक की शुरुआत भी इन्होंने की है।  

यह शहँशाह कोरोनरी बाइपास सर्जरी की विकास-यात्रा में शुरू से ही सहभागी रहा है। सन् 2002 में इन्होंने देश में पहली बार रोबोटिक सर्जरी की शुरूआत की थी।  तब तीन बाजुओं वाले रोबोट उपलब्ध थे, लेकिन आज रोबोटिक टेकनोलोजी बहुत विकसित हो चुकी है और चार बाजुओं वाले रोबोट इन्सानी हाथों से ज्यादा बढ़िया शल्यक्रिया करने में सक्षम हैं। मेदान्ता में चिकित्सकों को रोबोटिक सर्जरी की बेहतरीन शिक्षा दी जाती है।

धड़कते दिल पर शल्य-क्रिया या बीटिंग हार्ट सर्जरी

शुरूआत में बायपास क्रिया हृदय की धड़कन रोक कर किया जाता था। इससे दूसरे अंगों जैसे, गुर्दे, यकृत, फेफड़ा  आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ता था। बीटिंग हार्ट सर्जरी नामक आधुनिक नई विधि से हृदय के केवल उस स्थान के स्थिर किया जाता है जहां शल्य-क्रिया होनी है। रोगी को मात्र एक सप्ताह ही अस्पताल में रहना होता है। बाईपास सर्जरी की नई तकनीक में बीटिंग हार्ट सर्जरी पूर्णतया सफल है।

मिनिमल इन्वेसिव तकनीक

आधुनिक स्टेबलाइजर उपकरण की मदद से अब मात्र तीन इंच जितने छोटे कट लगाकर भी धमनी बाईपास सर्जरी की जाती है। अब इसके लिये लंबे चीर-फाड़ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस तकनीक की विशेषता यह है कि इसे हृदय के ऊपरी भाग पर लगाकर इससे हृदय को आवश्यकतानुसार घुमाया जा सकता है। इस कारण हृदय के पिछले और किनारे के भागों को भी मिनिमल इनवेसिव तकनीक से देखना सरल हो गया है। इस तकनीक में हार्ट-लंग मशीन की भी आवश्यकता नहीं होती है। ओपन हार्ट सर्जरी की अपेक्षा छाती में एक छोटा सा चीरा लगता है, जो देखने में भी बुरा नहीं लगता। चीरा छोटा होने से रक्त-स्राव भी बहुत कम होता है और तीन से चार दिन में रोगी वापस घर जा सकते हैं। इसका व्यय भी पुरानी ओपन-हार्ट तकनीक की तुलना में 50-60 हजार रुपये कम आता है।   

रोबोटिक हार्ट सर्जरी    

रोबोटिक सर्जरी में सर्जन  शल्यकक्ष के एक कोने में या अन्य किसी भी दूरस्थ स्थान पर स्थित कम्प्यूटर-कन्सोल  पर बैठा कम्प्यूटर के स्क्रीन को देख कर मशीन के विशेष कन्ट्रोल्स (जॉयस्टिक्स) को अपने पैर व हाथों से नियंत्रित कर रोबोट्स को सर्जरी करने के निर्देश देते हैं।  रोबोट की कीमत 12 लाख डालर होती है और  एक ऑपरेशन में डिस्पोजेबल्स का खर्च 55000 रुपये आता है। रोबोट रूपी इस छोटी मशीन में धातु से बने चार पतले-पतले हाथ होते हैं, ये छोटे से छिद्रों द्वारा हृदय तक पहुँच कर इतनी उम्दा, उन्नत, सटीक और सूक्ष्म शल्यक्रिया करते हैं जो शल्य-चिकित्सक के लिए हाथों से करना संभव नहीं है।  चिकित्सकों की एक टोली रोगी के साथ रहती है। इनका कार्य रोबोट की मदद करना, जरूरत पड़े तो हार्ट-लंग मशीन प्रयोग करना, रोबोट को इन्स्ट्रूमेन्ट्स देना आदि है। मरीज के सीने में रोबोट के हाथों को घुसाने के लिए सीने में छोटे-छोटे छेद किये जाते हैं।  एक बाँह के सिरे पर 3-डी कैमरा लगा होता है, अन्य तीन शल्यक्रिया करते हैं। रोबोट पर लगा कैमरा अन्दर की त्रि-आयामी

तस्वीरों को बड़ा करके कम्प्यूटर-पटल पर प्रसारित करता है। आजकल रोबोट द्वारा दो धमनियों में ग्राफ्ट लगाना संभव है, परन्तु भविष्य में दो से ज्यादा धमनियों में ग्राफ्ट लगाना संभव हो जायेगा। सामान्यतः ग्राफ्ट इन्टरनल मेमेरी धमनियों से लिए जाते हैं।   इस सर्जरी में पूरे सीने को खोलने की जरूरत नहीं होती बल्कि छोटे से छेद किये जाते हैं, हार्ट-लंग मशीन काम में नहीं ली जाती है, शारीरिक आघात कम होता है, दुष्प्रभाव न्यूनतम होते हैं, रोगी को 2-4 दिन में घर भेज दिया जाता है और  वह शीघ्र ठीक (कुछ ही हफ्तों में) होकर अपने कार्य पर जल्दी लौटता हैआजकल हाइब्रिड सर्जरी भी की जा रही है जिसमें एक ओर रोबोट धमनियों में ग्राफ्ट लगा रहा होता है और उसी समय दूसरी टीम कुछ छोटी धमनियों की एन्जियोप्लास्टी कर रही होती है।  क्या चमत्कार है!!!

कार्डियक स्टेम सेल है वरदान

कार्डियक स्टेम सेल तकनीक के नतीजे आशा के अनुरूप रहे हैं। खासकर हार्ट अटैक के बाद हृदय की मांसपेशियों को जो क्षति पहुंचती है, उसकी भरपाई करने में स्टेम सेल तकनीक के नतीजे काफी अच्छे रहे हैं। कार्डियक स्टेम सेल थेरैपी के अंतर्गत स्टेम सेल्स हृदय रोगी के अपने बोन-मैरो से लिए जाते हैं। स्टेम सेल्स का रोगग्रस्त हृदय में प्रत्यारोपण करने में ट्रांसमायोकॉर्डियल रीवस्कुलराइजेशन तकनीक उपयोग में लायी जाती है और दूसरी विधि के तहत इन्ट्राकार्डियल इंजेक्शन के माध्यम से स्टेम सेल्स को प्रत्यारोपित करते हैं।

दिल के दौरे के बाद पुनर्वास या Cardiac Rehab Program
पुनर्वास का मुख्य उद्देश्य दिल के दौरे के कारण हुई जटिलताओं को दूर करना, मानसिक रूप से आत्मविश्वास जगाना, व्यवसाय पर पुनरस्थापित करना व जोखिम घटकों को उलटना है ताकि दिल का दौरा पुनः नहीं आ पाए। साधारणतया पुनर्वास दिल के दौरे के पहले दिन से ही शुरू किया जाता हैं।

दिल के दौरे के बाद के पहले दस दिन दौरे के बाद पहले बहत्तर घंटे लेटे रहने या आराम की जरूरत रहती  हैं। किसी भी आरामदायक अवस्था में आप लेट सकते हैं। फ़िजियोथेरापिस्ट आपके हाथ-पाँव की हल्की सी एक्सरसाइज  में मदद करते हैं। चौथे दिन आपको आमतौर पर शय्या से बाहर उतरने व कुर्सी पर बैठने की इजाजत दी जाती हैं। मरीज अपनी शय्या के आसपास एक-दो चक्कर लगा सकता हैं।

पाँचवें रोज शौच आदि के लिये शौचालय तक जाना, दाढ़ी बनाना व 20-25 मीटर तक चलना ऊचित हैं।

छठें रोज  हार्ट अटैक के बाद पाँचवें-छठें रोज तक यदि मरीज की स्थिति नियंत्रण में हैं व कोई तकलीफ नहीं हो व प्रारंभिक खून व हृदय के परीक्षण से चिकित्सक निश्चिंत हो जाएं तो रोगी को गहन चिकित्सा कक्ष से वार्ड में भेज दिया जाता हैं। वहाँ फ़िजियोथेरापिस्ट की मदद से व्यायाम आदि शुरू कराये जाते हैं।

दूसरे सप्ताह  साधारणतया दसवें-ग्यारहवें दिन मरीज को घर भेज दिया जाता हैं। इस दौरान घर में अंदर या बाहर धीरे-धीरे चलना अपेक्षित हैं।

दिल के दौरे के बाद तीसरे सप्ताह  मरीज कुछ हल्के-फुल्की शारीरिक क्रियायें कर सकता है। ध्यान रखने की बात यह है कि शरीर को ज्यादा कष्ट न दिया जाए।

चौथे सप्ताह  घर के किसी व्यक्ति के साथ सुबह व शाम की सैर पचास कदम से शुरूआत करिए।  धीरे-धीरे दूरी  बढ़ाई जा सकती हैं और महीने के अंत तक एक किलोमीटर तक जाया जा सकता हैं। मगर चढ़ाई से बचना चाहिए। छठें से आठवें सप्ताह तक  रोजमर्रा की जिंदगी व क्रियाकलाप शुरू किए जा सकते हैं।

ध्यान रखिए
1-   यदि आपको सीने में दर्द हो या भारीपन लगे, चक्कर आए, साँस फूले या गला अवरुद्ध होने का एहसास हो  तो तुरंत आराम करना आवश्यक है। चिकित्सक को अपनी स्थिति के बारे में बराबर बताते रहिए व दवाइयाँ बराबर लें। साथ में आइसोर्डिल रखना भी ठीक है।
2-   आमतौर पर चिकित्सक अस्पताल मे छुट्टी करने से पहले दिल की संकुचन क्षमता जाँचने के लिये ईको-कार्डियोग्राम करते हैं। जिससे भविष्य में सीने के दर्द व दिल का दौरा के बारे में जाना जा सके, दवाइयाँ निर्धारित की जा सकें व भविष्य में दिये जाने वाला उपचार सुनिश्चित किया जा सके।

आहार के बारे में विशेष निर्देश
खानपान का दिल के मरीज के लिये विशेष महत्व हैं। पहले दो दिन बहुत हल्का आहार दिया जाता है। फिर धीरे-  धीरे कम वसा वाला खाना दिया जाता है। घर पर पहुँचने के बाद हल्का भोजन लें ताकि आपका वजन ना बढ़े  और यदि ज्यादा है तो वजन कम करना चाहिए।
1- वसायुक्त खाना बिल्कुल नहीं या कम मात्रा में लेना चाहिए। मांसाहारियों के लिए चिकन व फिश उपयुक्त है।
2- खाना पकाने के लिए तिल या सरसों का कच्ची घाणी का तेल प्रयोग करें। 
3- अंडे नहीं खायें  या ज्यादा से ज्यादा दो प्रति सप्ताह।
4- खाने में हरी सब्जियां व फलों की मात्रा बढ़ाएं,  सिमित मात्रा में सैंधा नमक ही प्रयोग करें।
5- धूम्रपान व मदिरा पर पूरी पाबंदी हैं।

अन्य सावधानियाँ

1- सीढ़ियाँ धीरे-धीरे चढ़ें। 4-5 सीढ़ी के बाद आराम करें। पहले कुछ सप्ताह घर ही रहें।
2- वजन उठाना या किसी तरह का तनाव नुकसानदेह साबित हो सकता है।
3- कार चलाना आमतौर पर चार से छह सप्ताह बाद शुरू करें। भीड़-भाड़ आपको मानसिक तनाव दे सकती है।
4- चिकित्सक द्वारा लिखी गई दवाइयाँ समय पर लें। हर सप्ताह एक बार अपने चिकित्सक से जरूर परामर्श करें। यदि आपको उच्च रक्तचाप या मधुमेह हैं तो और कड़े नियंत्रण की आवश्यकता है।

2 comments:

KUNWAR RATAN SINGH BANNA said...

SIR YOU ARE JENIUS ? THANKS A LOT

SIR I AM KUNWAR RATAN PARTAP SINGH

YOUR BLOG VERY NICE.

KUNWAR RATAN SINGH BANNA said...

SORRY SIR
MY ENGLISH WEAK