Saturday, July 16, 2011

Diabetic Nephropathy

मधुमेह के मरीजो में गुर्दों की विफलता के जोखिम घटक



• सामान्यतः 5 से 15 साल की अवधि तक आप मधुमेह से पीड़ित हों।



• आनुवंशिक कारणों से।



• उच्च-रक्तचाप नियंत्रित न हो।



• रक्त-शर्करा नियंत्रित में न हो।



• यदि आप धूम्रपान भी करते हों।



• अनियंत्रित कॉलेस्ट्रोल।



डायबीटिक नेफ्रोपैथी



मधुमेह के दुष्प्रभावों से धीरे-धीरे गुर्दों का खराब होना बड़ी सामान्य बात हो गई है, इस रोग को डायबिटीक नेफ्रोपैथी कहते हैं। टाइप-2 डायबिटीज के रोगियों की संख्या विस्फोटक गति से बढ़ रही है, साथ ही आजकल चिकित्सा सुविधायें भी अच्छी हो गई हैं जिसके फलस्वरूप डायबिटीज के रोगी ज्यादा दिन तक जीते है। अतः डायबिटीक नेफ्रोपैथी के रोगियों की संख्या भी बढ़ रही है। मधुमेह के 20 से 30 प्रतिशत रोगियों को नेफ्रोपैथी की तकलीफ हो जाती है, यह संख्या 40% जा सकती है। मधुमेह में प्रायः गुर्दे तुरंत विफल नहीं होते हैं। मधुमेह गुर्दों का भक्षण धीरे-धीरे करती है। लेकिन निम्न पहलुओं को हमेशा ध्यान में रखें। जरा सी कोताही मुसीबत का सबब बन सकती है।



• अब मधुमेह के रोगियों में गुर्दा प्रत्यारोपण की चिकित्सा (ट्रान्सप्लान्टेशन) संभव हो गयी है।



• हालही में हुई कई शोध से मालूम हुआ है कि डायबिटीज रोगियों में नेफ्रोपैथी की अवस्था से बचा जा सकता है, यदि सही समय पर जाँच द्वारा इसका पता कर लिया जाये।



• यदि मूत्र परीक्षण के बाद मालूम हो जाता है कि मूत्र में एलब्यूमिन की मात्रा विसर्जित हो रही है तो समझ लीजिए गुर्दों में नेफ्रोपैथी की अवस्था होने जा रही है। यदि आपके पेशाब में 24 घंटे में 30 मि.ग्रा. से ज्यादा अल्ब्यूमिन जा रहा है तो इसे माइक्रो एलब्यूमिनुरिया कहते हैं। 24 घंटे के एकत्रित मूत्र में 300 मि. ग्रा. से ज्यादा अल्ब्यूमिन निकले तो इसे क्लिनिकल एलब्यूमिनुरिया कहते हैं।



• माइक्रो एलब्यूमिनुरिया होने के बाद 20-40 प्रतिशत रोगी बिना किसी विशिष्ट चिकित्सा के क्लिनिकल नेफ्रोपैथी की अवस्था में चले जाते हैं।



• क्लिनिकल एलब्यूमिनुरिया यह भी बताता है कि मरीज को हृदयाघात होने की संभावना बढ़ गई है। इसलिए अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि टाइप-2 मधुमेह रोगी को माइक्रो एलब्यूमिनुरिया के स्टेज में जांच द्वारा पता कर लिया जावे और जरूरी बचाव के उपाय शुरू कर दिये जायें।



डायबीटिक नेफ्रोपैथी के चरण



डायबीटिक नेफ्रोपैथी को पांच चरणों में बांटा गया है।



प्रथम चरण – (प्रारंभिक डायबिटीज) डायबिटीज के आरंभिक दबाव के चलते Glomerular Filtration Rate या वाहिका गुच्छीय निस्यन्दन दर मामूली बढ़त लेती है।



द्वितीय चरण – (विकासशील डायबिटीज) GFR बढ़ी रहती है या सामान्य हो जाती है परन्तु वृक्क के क्षतिग्रस्त होने से मूत्र में एल्ब्युमिन का विसर्जन (Microalbuminuria या अत्यन्नसारमेह) शुरू हो जाता है। द्वितीय चरण के रोगी में एल्ब्युमिन का विसर्जन 30 मि.ग्रा. प्रति 24 घंटे से ज्यादा होता है। यदि सतर्कता न बरती जाये तो रोगी आगे चलकर गुर्दा की विफलता का शिकार हो जाता है। अतः रोगी का समय-समय पर मूत्र परीक्षण होना चाहिये ताकि माइक्रोएलब्युमिनुरिया को आरंभिक अवस्था में ही पकड़ लिया जाये।



तृतीय चरण – वृक्क की क्षति बढ़ने से रोगी को क्लिनिकल माइक्रोएलब्युमिनुरिया हो जाता है। मूत्र का डिपस्टिक टेस्ट पोजिटिव आता है। इस चरण में एल्ब्युमिन का विसर्जन 300 मि.ग्रा. प्रति 24 घंटे से ज्यादा होता है और सामान्यतः रक्तचाप भी बढ़ जाता है।



चौथा चरण – गुर्दों की क्षति जारी रहती है, मूत्र में एल्ब्युमिन का विसर्जन और बढ़ जाता है। इस चरण में गुर्दों की क्षति इतनी बढ़ जाती है कि रक्त में यूरिया और क्रियेटिनिन बढ़ने लगते हैं। कार्यप्रणाली काफी प्रभावित होती है।



पांचवा चरण – इस चरण में GFR बहुत कम होकर 10 ml प्रति मिनट तक पहुँच जाता है, गुर्दें अपना कार्य करने में लगभग अक्षम हो जाते हैं और डायलेसिस तथा गुर्दा प्रत्यारोपण के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता।


डायबिटीक नेफ्रोपैथी के लक्षण



• आरंभिक अवस्था में कोई लक्षण नहीं।



• हाथों, पैरों और चेहरे पर सूजन।



• वजन बढ़ना।



• खुजली (आखिरी अवस्था में)।



• सुस्ती (आखिरी अवस्था में)।



• मूत्र में रक्त आना ।



• हृदय-गति दोष - रक्त में पोटेशियम की मात्रा बढ़ने के कारण।



• पेशियों का फड़कना।



• जैसे जैसे गुर्दे की क्षति बढ़ती जाती है, गुर्दा रक्त से दूषित पदार्थ विसर्जित करने में कठिनाई होती है और रक्त में दूषित पदार्थ जैसे यूरिया आदि की मात्रा बढ़ने लगते हैं। इस स्थिति को यूरीमिया कहते हैं। यूरीमिया में रोगी अस्त-व्यस्त या कनफ्यूज हो जाता है तथा बेहोश होने लगता है।



और अंत में ............ जीवन संग्राम सम्पन्न हो जाती है।



डायबिटीक नेफ्रोपैथी का निदान



डायबिटीज के रोगी में नैफ्रोपैथी के आरंभिक संकेतों और लक्षणों को यदि समय रहते चिन्हित कर लिया जाये और उनका सघन उपचार शुरू कर दिया जाये तो हम गुर्दों की आरंभिक क्षति को सही कर सकते हैं और बढ़ने से रोक सकते हैं या लम्बे समय तक गुर्दों को इस घातक कुप्रभाव से बचाये रख सकते हैं। इसके लिये हर बार चिकित्सक को माइक्रोएलब्युमिनुरिया की जांच करवाते हैं। डायबिटीक नेफ्रोपैथी होने का पता आपको चल ही नहीं पायेगा जब तक आप डॉक्टर के पास परीक्षण नहीं करवाएंगे।



परीक्षण



• मूत्र की जांच पेशाब में प्रोटीन का आना। यह अच्छा लक्षण नहीं है।



• रक्त में यूरिया और क्रिएटिनिन का सामान्य से ज्यादा होना ।



• पेशाब में लाल रक्त कोशिकाएं और पस सेल्स की उपस्थिति।



• हिमोग्लोबिन की कमी।



• रक्त में कैल्शियम , पोटेशियम और फोस्फोरस की जांच ।



• अल्ट्रासोनिक जांच ।



• मूल रूप से गुर्दों की विफलता का पता बढ़े हुए यूरिया और क्रिएटिनिन से चलता है ।

डायबिटीक नेफ्रोपैथी से बचाव



• डायबिटीज और रक्तचाप का पूरा उपचार ।



• नियमित रूप से चिकित्सकीय परीक्षण और रक्त की जांच।



• खाने में नमक, चर्बी और प्रोटीन की मात्रा कम रखें।



• धूम्रपान न करें।



• नियमित व्यायाम करें। वज़न को कम रखें।



• दर्द निवारक गोलियां बिना डाक्टरी सलाह के न लें।





डायबिटीक नेफ्रोपैथी का उपचार

याद  रखिये  आरम्भ  में डायबीटिक नेफ्रोपैथी  का  इलाज सस्ता , शर्तिया और  टिकाऊ है। देर  होने  पर महंगा, कष्टदायक और सीमित होगा।
आरम्भिक उपचार

• ब्लड शुगर को बिल्कुल सामान्य रखें- इससे माइक्रो अल्बुमीनुरिया या नेफरोपैथी की अवस्था को टाला जा सकता है।



• उच्च रक्तचाप का नियंत्रण- अगर मधुमेह के रोगी का रक्तचाप तो थोड़ा भी ज्यादा रहता है तो नेफरोपैथी होने की संभावना बढ़ जाती है। रक्तचाप को नियंत्रित कर हम उनका जीवन दीर्घ कर सकते हैं। मधुमेह प्रकार-एक में मृत्युदर को 94 प्रतिशत से घटाकर 45 प्रतिशत तक किया जा सकता है, यदि रक्तचाप नियंत्रित रखा जाये। 18 साल से ज्यादा के रोगियों में सिस्टोलिक रक्तचाप 130 एवं डायस्टोलिक 80 से कम रखने की हिदायत दी जाती है।



• गुर्दो को डायबिटीक नेफ्रोपैथी बचाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है Angiotensin-Converting Enzyme Inhibitors ए.सी.ई. इन्हीबीटर्स (एनालेप्रिल, लिसिनोप्रिल, रेम्पिरिल, ट्रेंडोलेप्रिल आदि)। इसे जिन रोगियों को उच्च रक्तचाप नहीं है उन्हें भी देने की सलाह दी गयी है। जिन्हें ए.सी.ई. इन्हीबीटर्स के पार्श्व-प्रभाव हो जाते हैं, उन्हें Angiotensin Receptor Blocker (ARB’s) ग्रुप की दवाएं जैसे लोसार्टन, टेल्मिसार्टन या ऑल्मेसार्टन आदि देना चाहिये। दवाओं का इस्तेमाल अपने चिकित्सक के परामर्श के बाद ही करें।



• भोजन में प्रोटीन की मात्रा कम करें-



पहले के हुए शोधों के अनुसार (जानवरों में) प्रोटीन कम देने से गुर्दों में इनट्राग्लोमेरुलर प्रेशर कम पाया गया एवं नेफरोपैथी से बचाव की संभावना उजागर हुई है। नये शोधों के में बढ़ी नेफरोपैथी हुई की अवस्था में 0.8 ग्राम प्रति किलो प्रतिदिन के हिसाब से प्रोटीन देने की बात कही गयी है।



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