Saturday, September 10, 2011

Kidney Dialysis & Transplant



डायलिसिस
जब वृक्क-वात के कारण गुर्दों की रक्त से अपशिष्ट पदार्थ (यूरिया, क्रियेटिनिन, विद्युत-अपघट्य या Electrolytes, जल आदि) उत्सर्जित करने की क्षमता इतनी कम हो जाये कि वाहिकागुच्छीय निस्येदन दर या Glomerular Filtration Rate (GFR) घटते-घटते मात्र 10 एम.एल. प्रति मिनट रह जाये और मूत्र की मात्रा धटते-घटते 500 एमएल से भी कम रह जाये तो डायलेसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण ही विकल्प बचते हैं। डायलेसिस  में एक अर्धपारगम्य निस्येदन झिल्ली या Semipermeable membrane के एक तरफ रक्त और दूसरी तरफ एक विशेष तरह का Diasylate fluid या डायलिसिस द्रव विपरीत दिशा में प्रवाहित किया जाता है जो रक्त से विसरण और रसाकर्षण या Diffusion  & Osmosis की प्रक्रिया द्वारा अपशिष्ट पदार्थ खींच लेता है।
डायलिसिस के संकेत
  • जी एफ आर 10 एम.एल. प्रति मिनट से कम हो जाये।
  • वृक्क-वात या Kidney Failure के लक्षण दिखाई देने लगे।
  • तीव्र श्वास-कष्ट या breathlessness, रक्त में पोटेशियम की मात्रा अत्याधिक हो जाना, रक्तस्राव, पेरीकार्डाइटिस या एनकेफेलोपेथी होने पर तुरन्त आपातकालीन डायलिसिस किया जाता है।
हीमोडायलिसिस
हमारे देश में हीमोडायलिसिस ही ज्यादा प्रचलित है। इस प्रक्रिया में हर बार दो मोटी सुइयाँ लगानी पड़ती हैं, 300 ये 500 एम.एल. प्रति मिनट की गति से काफी सारा रक्त निकाला जाता है, इसलिए फूली हुई नसें होना अतिआवश्यक हैं। हीमोडायलिसिस के लिए शरीर से रक्त निकालने के लिए निम्न तीन विकल्प होते हैं।
आर्टीरियो-वीनस फिस्ट्यूला या धमनी शिरा भगन्दर
लम्बी अवधि महीनों-सालों तक हीमोडायलिसिस करने के लिए सबसे ज्यादा उपयोग की  जाने वाली यह पद्धति सुरक्षित होने के कारण उत्तम है। सामान्यतः जी एफ आर 30 एम. एल. प्रति मिनट से कम (लेफ्रोपोथी की चौथा चरण)  होने पर एक छोटी सी शल्य क्रिया द्वारा बायी कलाई में शिरा और धमनी को आपस में जोड़ कर फिस्ट्यूला बना दिया जाता है। धमनियों में शिराओं की अपेक्षा रक्त का दबाव बहुत अधिक होता है जिसके कारण चार सप्ताह में हाथ की नसों में पर्याप्त फुलाव आ जाता है। इन फूली हुई नसों में दो अलग-अलग जगहों पर विशेष प्रकार की दो मोटी फिस्ट्यूला नीडल डाली जाती है। इन फिस्ट्यूला नीडल की मदद से हीमोडायलिसिस के लिए रक्त बाहर निकाला जाता है और शुद्ध करने के बाद शरीर में अन्दर पहुँचाया जाता है। फिस्ट्यूला किये गये हाथ से हल्के दैनिक कार्य किये जा सकते हैं।
ए.वी. फिस्ट्यूला का लम्बे समय तक संतोषजनक उपयोग करने के लिए क्या सावधानी जरूरी होती है?
ए.वी. फिस्ट्यूला की मदद से लम्बे समय (सालों) तक पर्याप्त मात्रा में डायलिसिस के  लिए रक्त मिल सके इसके लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक हैः-

               ए.वी. फिस्ट्यूला यदि ठीक से काम करे तो ही हीमोडायलिसिस के लिए उससे पर्याप्त रक्त लिया जा सकता है। संक्षेप में, डायलिसिस करानेवाले रोगियों की जीवन डोर ए.वी. फिस्ट्यूला की योग्य कार्यक्षमता पर आधारित होती है।
               फिस्ट्यूला बनाने के बाद नस फूली रहे और पर्याप्त मात्रा में उससे रक्त मिल सके इसके लिए हाथ की कसरत नियमित करना आवश्यक है। फिस्ट्यूला की मदद से हीमोडायलिसिस शुरू करने के बाद भी हाथ की कसरत नियमित करना अत्यंत जरूरी है।
               रक्त के दबाव में कमी होने के कारण फिस्ट्यूला की कार्यक्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिसके कारण फिस्ट्यूला बंद होने का डर रहता है। इसलिए रक्त के दबाव में ज्यादा कमी न हो इसका ध्यान रखना चाहिए।
               फिस्ट्यूला कराने के बाद प्रत्येक मरीज को नियमित रूप से दिने में तीन बार (सुबह, दोपहर और रात) यह जाँच लेना चाहिए कि फिस्ट्यूला ठीक से काम कर रही है या नहीं। ऐसी सावधानी रखने से यदि फिस्ट्यूला अचानक काम करना बंद कर दे तो उसका निदान तुरंत हो सकता है। शीघ्र निदान और योग्य उपचार  से फिस्ट्यूला फिर से काम करने लगती है।
               फिस्ट्यूला कराये हुए हाथ की नस में कभी भी इंजेक्शन या ड्रिप नहीं लेना चाहिए। उस नस से परीक्षण के लिए रक्त भी नहीं देना चाहिए।
               फिस्ट्यूला कराये हाथ पर ब्लडप्रेशर नहीं मापना चाहिए।
               फिस्ट्यूला कराये हाथ से वजनदार चीजें नहीं उठानी चाहिए। साथ ही, ध्यान रखना चाहिए कि उस हाथ पर ज्यादा दबाव नहीं पड़े। खासकर सोते समय फिस्ट्यूला कराये हाथ पर दबाव न आए उसका ध्यान रखना जरूरी है।
               फिस्ट्यूला को किसी प्रकार की चोट न लगे, यह ध्यान रखना जरूरी है। उस हाथ में घड़ी, जेवर (कड़ा, धातु की चूड़ियाँ ) इत्यादि जो हाथ पर दबाव डाल सकती हों,  उन्हें नहीं पहनना चाहिए।
               ए.वी. फिस्ट्यूला की फूली हुई नसों में अधिक दबाव से साथ बड़ी मात्रा में रक्त प्रवाहित होता है। यदि किसी कारण अकस्मात् फिस्ट्यूला में चोट लग जाए और रक्त बहने लगे तो बिना घबराए, दूसरे हाथ से भारी दबाव डालकर रक्त को बहने से रोकना चाहिए। हीमोडायलिसिस के पश्चात् इस्तेमाल की जानेवाली पट्टी को कसकर बाँधने से रक्त का बहना प्रभावशाली रूप से रोका जा सकता है। उसके बाद तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। बहते रक्त को रोके बिना डॉक्टर के पास जाना जानलेवा हो सकता है। यदि ऐसी स्थिति में रक्त के बहाव पर तुरंत नियंत्रण नहीं किया जा सके तो थोड़े समय में मरीज की मौत भी हो सकती है।
               फिस्ट्यूला वाले हाथ को साफ रखना चाहिए और हीमोडायलिसिस कराने से पहले हाथ को जीवाणुनाशक साबुन से धोना चाहिए।
               हीमोडायलिसिस के बाद फिस्च्युला से रक्त को निकलने से रोकने के लिए हाथ पर खास पट्टी (Tourniquet) कस कर बाँधी जाती है। यदि यह पट्टी लंबे समय तक बंधी रह जाए, तो फिस्ट्यूला बंद होने का भय रहता है।
आर्टीरियो वीनस ग्राफ्ट
 जिन रोगियों में नसों की स्थिति फिस्ट्यूला के लिए योग्य नहीं हो, तो उनके लिए ग्राफ्ट का उपयोग किया जाता है।  इसमें शल्य क्रिया द्वारा एक लूप के शक्ल की कृत्रिम नली हाथ या पैरों की धमनी और शिरा के बीच जोड़ दी जाती है। यह दो सप्ताह में तैयार हो जाता है। इसमें सुइयाँ कृत्रिम नली में लगाई जाती हैं। मँहगा होने के कारण यह बहुत कम प्रयोग किया जाता है।
हीमोडायलिसिस केथेटर
आपातकालीन परिस्थितियों में पहली बार तत्काल हीमोडायलिसिस करने के लिए यह सबसे प्रचलित पद्धति है। ये केथेटर गर्दन या जाँघ की मोटी शिराओं (Internal Jugular, Subclavian or Femoral vein) में लगाये जाते हैं। यह केथेटर बाहर के भाग में दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित होता है। बिना कफ के केथेटर कुछ ही हफ्तों तक प्रयोग किये जा सकते हैं, उसके बाद संक्रमण या रक्त स्राव का भय रहता है। लेकिन कफ वाले केथेटर छोटी सी शल्य क्रिया द्वारा लगाये जा सकते हैं और दो साल तक चल सकते हैं।

डायलिसिस के लिए आवश्यकताएँ
         फिस्ट्यूला द्वारा फूली नसें या ग्राफ्ट या केथेटर।
         डायलिसिस मशीन जो रक्त को पंप करती है और पूरी प्रक्रिया की देखरेख करती है।  
         कृत्रिम गुर्दा या डायलाइज़र जो रक्त का शुद्धीकरण करता है।
         डायलाइसेट द्रव जो रक्त से दूषित पदार्थ खींचता है।

हीमोडायलिसिस मशीन

डायलाइजर
डायलाइज़र आठ इन्च लम्बी और डेढ़ इन्च मोटी पारदर्शक प्लास्टिक की नली से बनता है। इसमें विशेष तरह के प्लास्टिक की अर्धपारगम्य झिल्ली से बनी दस हजार बाल जैसी अंदर से पोली महीन नलियाँ होती हैं। डायलाइज़र के उपर और नीचे के भागों में ये पतली नलियाँ इकट्ठी होकर बड़ी नली बन जाती हैं, जिससे शरीर से रक्त लाने वाली और ले जाने वाली मोटी नलियाँ जुड़ जाती हैं। डायलाइज़र के उपरी तथा नीचे के हिस्सों में बगल में डायलिसिस द्रव के प्रवेश और निकास के लिए मोटी नलियाँ जुड़ी हुई होती हैं।


हीमोडायलिसिस मशीन 
आइये मैं जटिल सी दिखने वाली डायलिसिस मशीन से आपका परिचय करवा दूँ। हीमोडायलिसिस की प्रक्रिया चार घन्टे तक चलती है। उस बीच शरीर का सारा रक्त 12 बार शुद्ध होता है। यह सामान्यतः सप्ताह में 3 या 4 बार किया जाता है। यह एक बार में शरीर से 250-300 मि.ली. रक्त प्रति मिनट पंप द्वारा तेज गति से खींच कर कृत्रिम गुर्दे या डायलाइज़र में पहुँचाया जाता है।  रक्त का शुद्धीकरण यहीं होता है। यहाँ आनेवाला रक्त एक सिरे से अन्दर जाकर हजारों पतली नलिकाओं में बंट जाता है। डायलाइज़र में दूसरी तरफ से दबाव के साथ आनेवाला डायलिसिस द्रव रक्त के शुद्धीकरण के लिए पतली नलियों के आसपास विपरीत दिशा में प्रवाहित होता है। । इस तरह इस व्यवस्था में अर्धपारगम्य झिल्ली के एक तरफ रक्त और दूसरी तरफ डायलाइसेट रहता है। इस क्रिया में पतली नलियों से रक्त में उपस्थित क्रीएटिनिन, यूरिया जैसे उत्सर्जी पदार्थ डायलिसिस द्रव में मिल कर बाहर निकल जाते हैं। इस तरह डायलाइज़र में एक सिरे से आनेवाला अशुद्ध रक्त जब दूसरे सिरे से निकलता है, तब वह साफ हुआ  शुद्ध रक्त होता है।  साफ रक्त शरीर में वापस पंप कर दिया जाता है। शरीर से बाहर आने पर रक्त के जमने की आशंका रहती है इसलिए इसमें हिपेरिन पंप द्वारा हिपेरिन मिला दिया जाता है ताकि रक्त जमें नहीं। मशीन डायलिसिस द्रव में तापमान, क्षार (बाइकार्बोनेट) आदि का सन्तुलन बनाए रखती है। पूरे परिवहन पथ में रक्त के प्रवाह और दबाव पर भी निगरानी रखी जाती है। किडनी फेल्योर से शरीर में आई सूजन अतिरिक्त पानी के जमा होने से होती है। डायलिसिस क्रिया में मशीन शरीर से ज्यादा पानी को निकाल देती है। हीमोडायलिसिस के दौरान रोगी की सुरक्षा के लिए कई प्रकार की व्यवस्थाएं होती हैं।   
डायलिसिस द्रव 
हीमोडायलिसिस के लिए विशेष प्रकार का अत्याधिक क्षारयुक्त द्रव (हीमोकॉन्सेन्ट्रेट) दस लीटर के प्लास्टिक के जार में मिलता है। इस हीमोकॉन्सेन्ट्रेट का एक भाग और 34 भाग शुद्ध पानी को मिलाकर डायलाइसेट  बनता है। हीमोडायलिसिस मशीन डायलाइसेट   के क्षार तथा बाइकार्बोनेट की मात्रा शरीर के लिए आवश्यक मात्रा के बराबर रखती है। डायलाइसेट बनाने के लिए उपयोग में लिए जाने वाला पानी क्षाररहित, लवणमुक्त एवं शुद्ध होता है, जिसे विशेष तरह आर.ओ. प्लान्ट (Reverse Osmosis Plant – जल शुद्धीकरण यंत्र) के उपयोग से बनाया जाता है।
हीमोडायलिसिस किस जगह किया जाता है?
 सामान्य तौर पर हीमोडायलिसिस अस्पताल के विशेषज्ञ स्टॉफ द्वारा नेफ्रोलोजिस्ट की सलाह के अनुसार और उसकी देखरेख में किया जाता है। बहुत ही कम तादाद में मरीज हीमोडायलिसिस मशीन को खरीदकर, प्रशिक्षण प्राप्त करके पारिवारिक सदस्यों की मदद से घर में ही हीमोडायलिसिस करते हैं। इसके लिए धनराशि, प्रशिक्षण और समय की जरूरत पड़ती है।
क्या हीमोडायलिसिस पीड़ादायक और जटिल उपचार है?
नहीं, हीमोडायलिसिस एक सरल और पीड़ारहित क्रिया है। रोगी सिर्फ हीमोडायलिसिस कराने अस्पताल आते हैं और हीमोडायलिसिस की प्रक्रिया पूरी होते ही वे अपने घर चले जाते हैं। अधिकांश मरीज इस प्रक्रिया के दौरान (लगभग चार घण्टे का समय) सोने, आराम करने, लेपटॉप पर काम करने, टी.वी. देखने, संगीत सुनने अथवा अपनी मनपसंद पुस्तक पढ़ने में बिताते हैं। बहुत से मरीज इस प्रक्रिया के दौरान हल्का नाश्ता, चाय अथवा ठंडा पेय लेना पसंद करते हैं।
सामान्यतः डायलिसिस के दौरान कौन-कौन सी तकलीफें हो सकती हैं?
 डायलिसिस के दौरान होनेवाली तकलीफों में रक्त का दबाव कम होना, पैर में दर्द होना, कमजोरी महसूस होना, उल्टी आना, उबकाई आना, जी मिचलाना इत्यादि शामिल हैं।
हीमोडायलिसिस के मुख्य फायदे 
         कम खर्चे में डायलिसिस का उपचार।
         अस्पताल में विशेषज्ञ स्टॉफ एवं डॉक्टरों द्वारा किए जाने के कारण हीमोडायलिसिस सुरक्षित है।
         यह कम समय मे ज्यादा असरकारक उपचार है।
         संक्रमण की संभावना बहुत ही कम होती है।
         रोज कराने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
         अन्य मरीजों के साथ होने वाली मुलाकात और चर्चाओं से मानसिक तनाव कम होता है। 
हीमोडायलिसिस के मुख्य नुकसान
         यह सुविधा हर शहर/गाँव  में उपलब्ध नहीं होने के कारण बार-बार बाहर जाने की तकलीफ उठानी पड़ती है।
         उपचार के लिए अस्पताल जाना और समय की मर्यादा का पालन करना पड़ता है।
         हर बार फिस्ट्यूला नीडल को लगाना पीड़ादायक होता है।
         हेपेटाईटिस के संक्रमण की संभावना रहती है।
         खाने में परहेज रखना पड़ता है।
हीमोडायालिस के रोगियों के लिए जरूरी सूचनाएँ
    नियमित हीमोडायलिसिस कराना लम्बे समय तक स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है। उसमें अनियमित रहना या परिवर्तनकरना शरीर के लिए हानिकारक है।
        दो डायलिसिस के बीच शरीर के बढ़ते वजन के नियंत्रण के लिए खाने में परहेज (पानी और नमक कम लेना) जरूरी है।
         हीमोडायलिसिस के उपचार के साथ-साथ मरीज को नियमित रूप से दवा लेना और रक्त के दबाव तथा डायबिटीज पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है।

डायलिसिस के सहारे अपनी जिन्दगी चलाने वाले गुर्दा रोगियों के लिए एक अच्छी खबर है


अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अस्पतालों में होने वाले लंबे उबाऊ तथा खर्चीले डायलिसिस प्रक्रिया के मुकाबले एक हल्की डायलिसिस मशीन विकसित की है जिसे रोगी घर, दफ्तर तथा सामान्य कामकाज के दौरान कमर में पेटी की तरह बांध सकता है और यह वर्तमान मशीन की तरह प्रभावी रूप से काम करेगी।  यह उपकरण प्रारम्भ में लगभग 50,000 रुपये की कीमत में बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। यह नया उपकरण वर्तमान डायलिसिज मशीन से मिलता जुलता है तथा इस उपकरण में मरीजों की व्यक्तिगत दिनचर्या कतई प्रभावित नहीं होगी। इस उपकरण में एक छोटी बैटरी, कम ऊर्जा से चलने वाला डायलाजर, बैटरी तथा सोल्वेन्ट कारट्रिज का उपयोग किया जाएगा जो कि मरीजों के रक्त को साफ करने की प्रक्रिया को तेज करेगाउससे गम्भीर गुर्दा पीड़ित रोगियों को स्पतालों के चक्कर काटने से छुटकारा मिलेगा। 
पेरीटोनियल डायलिसिस
पेरीटोनियम या उदरावरण एक झिल्ली होती है जो  उदरगुहा तथा उदर में स्थित विभिन्न आंतरिक अंगों पर लिपटी रहती है और उन्हें स्थिर रखती है। इस झिल्ली में लाखों महीन रक्त-केशिकाएँ होती हैं। उदरगुहा में डायलिसिस द्रव भरने पर यह अर्धपारगम्य निस्येदन चलनी की तरह कार्य करती है और रक्त से अपशिष्ट पदार्थ अलग कर स्वच्छ करती है। इसे ही पेरीटोनियल डायलिसिस या पी डी कहते हैं।
डायलिसिस द्रव
डायलिसिस द्रव में सामान्य मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट, आघातरोधी या बफर और ग्लूकोज होते हैं। ग्लूकोज ओस्मोटिक आकर्षण से पानी को खींचता है। यदि ग्लूकोज की सान्द्रता ज्यादा होगी तो पानी भी ज्यादा खींचेगी। सामान्यतः 1.5%, 2.5% और 4.25% ग्लूकोज की मात्रा वाले डायलिसिस द्रव मिलते हैं। एक समस्या यह आती है कि  ग्लूकोज की कुछ मात्रा मुख्य रक्त प्रवाह में चली जाती है इसलिए डायबिटीज के रोगी में दवाओं या इन्सुलिन की मात्रा थोड़ा बढ़ानी पड़ती है। इकोडेक्सट्रिन नामक शर्करा पेरीटोनियम को पार नहीं कर पाती है, लेकिन फिलहाल यह रात्रि-चक्र में ही प्रयोग में ली जा रही है।
कन्टीन्युअस एम्बूलेट्री पेरीटोनियल डायलिसिस CAPD
यह डायलिसिस रोगी अपने घर या ऑफिस में स्वयं या किसी की मदद से कर सकता है। रोगी घूम फिर सकता है, ऑफिस या बाहर जा सकता है। डायलिसिस की प्रक्रिया जारी रहती है। दुनिया के विकसित देशों में लोग इसे ही लेना पसन्द करते हैं। हमारे यहाँ कम प्रचलित है क्योंकि यह मँहगा विकल्प है।
पेट में डायलिसिस द्रव डालने के लिए एक नरम और लचीली केथेटर या नली पेट में स्थाई तौर पर डाली जाती है। नली के पेट में डालने वाले सिरे की तरफ कई छोटे-छोटे छिद्र होते हैं और डेक्रोन नामक विशेष तरह के पॉलीएस्टर से बने दो कफ होते हैं, जो छेद में बनने वाले स्कार टिश्यू से चिपक जाते हैं। इसके लिए नाभि के लगभग एक इंच नीचे और बाहर की ओर त्वचा को इंजेक्शन से सुन्न किया जाता है। फिर नश्तर से छेद करके नली को पेट में डाल कर 5-6 से.मी. बाहर छोड़ दिया जाता है। यह नली पेट और आँतों को बिना नुकसान पहुँचाये स्थिर रहती है।  
इस नली द्वारा प्लास्टिक की नरम थैली में भरा दो लीटर डायलिसिस द्रव पेट में डाला जाता है और लगभग चार घन्टे बाद उस द्रव को बाहर निकाल लिया जाता है। द्रव खाली करने के लिए नरम प्लास्टिक की थैली व डायलिसिस द्रव से भरी मुख्य थैली की नलियाँ आपस में जुड़ी रहती हैं और दोनों को खोलने तथा बन्द करने के लिए अलग-अलग घुन्डियाँ होती हैं। चित्र देखने से सारी स्थितियाँ स्पष्ट हो जाती हैं। जितनी देर द्रव पेट में रहता है उसे ड्वेल समय कहते हैं, उस अवधि में रक्त से अपशिष्ट पदार्थ छन कर निकल जाते हैं।  दिन भर में तीन या चार बार द्रव डाला जाता है। पेट में द्रव डालने और खाली करने का कार्य रोगी स्वयं कर सकता है। पेट में संक्रमण जाने का खतरा थैलियों की संयुक्त नली को पेट में लगी नली से जाड़ते समय समय रहता है। अतः यह कार्य साबुन और एन्टीसेप्टिक लोशन से अच्छी तरह हाथ धो कर करना चाहिये।
पेरीटोनियल इक्विलिब्रेशन टेस्ट
यह देखने के लिए कि डायलिसिस शरीर से अपशिष्ट पदार्थ जैसे यूरिया आदि ठीक तरह से निकाल रहा है चिकित्सक पेरीटोनियल इक्विलिब्रेशन (PET) टेस्ट करते हैं। डायलिसिस के शुरू के कुछ हफ्तों में यह टेस्ट बहुत आवश्यक होता है। पी.टी. में यह देखा जाता है कि चार घन्टे में डायलिसिस द्रव में से कितनी ग्लूकोज रक्त में अवशोषित हुई और शरीर से कितना यूरिया व क्रियेटिनिन द्रव में उत्सर्जित हुआ। पेरीटोनियम में अपशिष्ट पदार्थों के  आवागमन की दर हर व्यक्ति में अलग अलग होती है। यदि आपकी आवागमन दर ज्यादा है, यानी आप डायलिसिस द्रव से ग्लूकोज का अवशोषण जल्दी करोगे तो आपको डायलिसिस द्रव का ड्वेल समय ज्यादा नहीं रखना चाहिये वर्ना आप डायलिसिस द्रव से ज्यादा ग्लूकोज अवशोषण करोगे।
क्लियरेन्स टेस्ट में 24 घन्टे में एकत्रित द्रव का तथा द्रव निकालते समय रक्त का नमूना 
लिया जाता है और दोनों नमूनों में यूरिया की मात्रा से अनुमान लगा लिया जाता है कि डायलिसिस कितने प्रभावशाली ढंग से कार्य कर रहा है। डायलिसिस के शुरू के कुछ  महीनों या सालों तक रोगी कुछ मूत्र भी विसर्जित करता है, यदि ज्यादा मूत्र बन रहा हो तो उसमें भी यूरिया की मात्रा देख लेना चाहिये।
पेट से निकाले द्रव, मूत्र और रक्त के परीक्षण से आपका चिकित्सक यूरिया क्लियरेन्स, जिसे KT/V कहते हैं और क्रियेटिनिन क्लियरेन्स की गणना कर लेता है। यदि डायलिसिस शरीर से पर्याप्त यूरिया और क्रियेटिनिन नहीं निकाल पा रहा हो तो चिकित्सक डायलिसिस द्रव की मात्रा या आयतन बढ़ा देगा।
मुख्य फायदे
         रोगी को अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।
         सुईयाँ नहीं चुभती हैं, रक्त नहीं बहता है। 
         रोगी काम पर जा सकता है और घूमने फिरने की स्वतंत्रता भी रहती है।
         गुर्दे को लम्बे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है।
         जीवन की गुणवत्ता अच्छी रहती है। 
         शरीर से अपशिष्ट पदार्थ निरन्तर बाहर निकलते रहते हैं।
मुख्य नुकसान
         हीमोडायलिसिस की अपेक्षा कम प्रभावी है।
         इस क्रिया में शरीर से काफी प्रोटीन भी निकल जाता है। इसलिए नियमित रूप से ज्यादा प्रोटीन वाला आहार लेना अति आवश्यक है। चिकित्सक रक्तचाप, शरीर में सूजन की उपस्थिति और परीक्षणों के आधार पर आपके लिए पानी, नमक और पोटेशियम की मात्रा की गणना कर देगा।
         पेट में संक्रमण (पेरीटोनाइटिस) का जाखिम रहता है। पेट में दर्द होना, बुखार आना और पेट से निकलने वाला द्रव यदि गंदा हो तो यह संक्रमण के लक्षण हैं। संक्रमण आँतो से भी आ सकता है यदि रोगी को कब्ज़ हो और वह शौच के लिए ज्यादा ताकत लगाए। संक्रमण होने पर एन्टीबायोटिक दे दिये जाते हैं।
         द्रव की वजनदार थैली लटकाये रखना मुश्किल होता है।
इन्टरमीटेन्ट पेरीटोनियल डायलिसिस IPD
चिकित्सालय में भर्ती हुए मरीज को जब कम समय के लिए डायलिसिस की जरूरत पड़े  तब यह डायलिसिस किया जाता है। सामान्य तौर पर यह डायलिसिस 36 घंटे तक चलता है और इस दौरान 30 से 40 लीटर द्रव का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार का हर तीन से पाँच दिन में कराना पड़ता है। इस डायलिसिस में मरीज को पलंग पर बिना करवट लिए सीधा सोना पड़ता है। इस वजह से यह डायलिसिस लम्बे समय के लिए अनुकूल नहीं है। 
ऑटोमेटेड पेरीटोनियल डायलिसिस
यह डायलिसिस स्वचालित साइक्लर नामक मशीन द्वारा सामान्यतः रात्रि में दिया जाता  है। रोगी आराम से सोता रहता है और साइक्लर पेट में डायलिसिस द्रव डालने और खाली करने का कार्य निश्चित अंतराल पर कर देता है। साइक्लर में सारे पेरामीटर्स जैसे डायलिसिस द्रव की मात्रा, भरने और खाली करने का समय आदि सभी पहले प्रोग्राम कर दिये जाते हैं। कोई गड़बड़ होने पर स्वतः अलार्म बज जाता है। रात भर में रक्त शुद्ध हो जाता है।



गुर्दा प्रत्यारोपण

ई.एस.आर.डी. या वृक्कवात के रोगियों के लिए गुर्दा प्रत्यारोपण सस्ता, सही, सफल, सम्पूर्ण, सुरक्षित, सर्वश्रेष्ठ और सुविधाजनक विकल्प है। गुर्दा प्रत्यारोपण चिकित्सा विज्ञान की प्रगति की निशानी है और वृक्कवात के रोगियों लिए ईश्वर का वरदान है। गुर्दा प्रत्यारोपण में एक स्वस्थ कार्यात्मक गुर्दा रोगी के शरीर में, जिके दोनों गुर्दे विफल हो गये हों लगाया जाता है। भले गुर्दा प्रत्यारोपण का आरंभिक खर्चा ज्यादा हो परन्तु पाँच वर्ष के व्यय को ध्यान में रखा जाये तो यह डायलिसिस से काफी किफायती और सस्ता पड़ता है। गुर्दे दूषित पदार्थों के उत्सर्जन के अलावा विटामिन डी, इरेथ्रोपोइटिन (जो अस्थिमज्जा में जाकर लाल रक्त-कणों का निर्माण करता है), रक्तचाप नियंत्रण करने वाले विभिन्न तत्वों का स्राव भी करते हैं। डायलिसिस में सिर्फ दूषित पदार्थों का उत्सर्जन होता है, जब कि प्रत्यारोहित गुर्दा 10-12 वर्ष या इससे भी लम्बी अवधि तक ये सारे कार्य करता है। डायलिसिस में रोगी स्वयं को अपाहिज सा महसूस करता है और हर बात के लिए परिवारजनों पर निर्भर रहता है।  डायलिसिस की उत्सर्जन क्षमता सामान्य गुर्दे की तुलना में 10-15 प्रतिशत ही होती है। यदि प्रत्यारोहित गुर्दा भी काम करना बंद करदे तो दूसरी बार गुर्दा प्रत्यारोपण का विकल्प बचता है। गुर्दा प्रत्यारोपण के विफल होने की संभावना मात्र 5-10 प्रतिशत रहती है। अच्छे जीवन के लिए इतना जोखिम तो लिया ही जा सकता है। गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद रोगी सामान्य जीवन जीता है और जीवन की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है। ये ऊर्जावान, प्रसन्न और आशावान महसूस करते हैं तथा मनोरंजन व खेलकूद कर सकते हैं। ये अपनी नौकरी या व्यवसाय सहजता से कर सकते हैं। ये लैंगिक संसर्ग सामान्य रूप से कर सकते हैं। स्त्रियाँ बच्चे को जन्म दे सकती हैं।  डायलिसिस कराने के बंधन से रोगी मुक्त हो जाता है। आहार में कम परहेज करना पड़ता है। रोगी शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।
गुर्दा दान कौन कर सकता है?
सामान्यतः 18 से 55 साल की उम्र के दाता की गुर्दा ली जाती है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे को गुर्दा दे सकते हैं। जुड़वा भाई-बहन आदर्श माने जाते हैं। पर यह आसानी से नहीं मिलते हैं। माता पिता, भाई, बहन सामान्य रूप से गुर्दा देने के लिए पसंद किए जाते हैं। यदि इनसे गुर्दा नहीं मिल सके तो अन्य पारिवारिक सदस्य जैसे चाचा, बुआ, मामा, मौसी वगैरह की गुर्दा ली जा सकती है। यदि यह भी संभव नहीं हो, तो पति-पत्नी  की गुर्दा की जाँच करानी चाहिए। विकसित देशों में पारिवारिक सदस्य की गुर्दा नहीं मिलने पर ब्रेन डेथ (दिमागी मृत्यु) हुए व्यक्ति के गुर्दे (केडेवर गुर्दा) को प्रत्यारोपित किया  जाता है। गुर्दा दान करने वालों को सीधे मोक्ष प्राप्त होती है।
गुर्दा दान कौन नहीं कर सकता है?  
               मनोरोगी क्योंकि उसकी सहमति मान्य नहीं होती है।
               जो किसी दवा या मदिरा का व्यसन करता हो।
               जिसे गुर्दे का कोई गम्भीर रोग या गुर्दे में पथरी हो।
               डायबिटीज के साथ गुर्दा रोग भी हो।
               जिसे तीव्र उच्च-रक्तचाप, कैंसर, जीर्ण विषाणु या कीटाणु संक्रमण या जीर्ण यकृत रोग हो।
               जो गर्भवती हो।
               जिसे बहुत ज्यादा मोटापा हो।
               जिसकी उम्र <18 या >65 हो।
विफल गुर्दे के सभी मरीज किस कारण से गुर्दा प्रत्यारोपण नहीं करा सकते हैं?
गुर्दा उपलब्ध न होनाः
गुर्दा प्रत्यारोपण के इच्छुक रोगियों को पारिवारिक सदस्यों से योग्य गुर्दा या केडेवर गुर्दा न मिलना। यह गुर्दा प्रत्यारोपण के अल्प उपयोग का प्रमुख कारण है।
महँगा उपचारः
वर्तमान समय में, गुर्दा प्रत्यारोपण का कुल खर्च जिसमें ऑपरेशन, जाँच, दवाइयाँ और अस्पताल का खर्च शामिल है, करीब-करीब तीन से पाँच लाख या ज्यादा होता है। अस्पताल से घर जाने के पश्चात दवाईयाँ और जाँच कराने का खर्च भी काफी ज्यादा लगता है। पहले साल यह खर्च दस से पंद्रह हजार रूपये प्रतिमाह तक पहुँच जाता है।
पहले साल के बाद इस खर्च में कमी आने लगती है। फिर भी दवाईयों का सेवन जिन्दगी भर करना जरूरी होता है। इतना ज्यादा खर्च की वजह से कई मरीज गुर्दा प्रत्यारोपण नहीं करवा सकते हैं।
गुर्दा प्रत्यारोपण की सलाह कब नहीं दी जाती है?
मरीज की उम्र अधिक होना, मरीज का एड्स अथवा कैंसर से पीड़ित होना इत्यादि स्थिति में गुर्द प्रत्यारोपण जरूरी होने पर भी नहीं किया जाता है। हमारे देश में बच्चों में भी बहुत कम गुर्दा प्रत्यारोपण होता है।
गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए क्या आवश्यक है?
               रोगी जिसका जिसके दोनों गुर्दे पूरी तरह विफल हो गये हैं और वह शल्यक्रिया के लिहाज़ से पूरी तरह स्वस्थ हो।
               गुर्दा दानदाता जिसका रक्त रोगी के रक्त से मेल खाता हो।
               नेफ्रोलोजिस्ट जो प्रत्यारोपण की सारी गतिविधियों का प्रबंधन करता है।
               यूरोलोजिस्ट जो मुख्य शल्यक्रिया करता है।
               गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए मान्यता प्राप्त अस्पताल जहाँ सारे संसाधन उपलब्ध हों। 
दानदाता की जाँच
रोगी के परिवार से विस्तृत बात-चीत के बाद दानदाता से भूत, वर्तमान और व्यक्तिगत चिकित्सकीय इतिहास पूछा जाता है, चिकित्सकीय और कई तरह के परीक्षण किये जाते हैं। सबसे पहले रोगी से दानदाता का रक्त मेच किया जाता है। रक्त मेच होने के बाद दानदाता के गुर्दों की कार्य क्षमता को विस्तार से परखा जाता है। यदि गुर्दे ठीक से कार्य कर रहे हों तभी दानदाता को प्रत्यारोपण के लिए स्वस्थ माना जाता है। कुछ विशिष्ट परीक्षणों से कीटाणु संक्रमण और CMV और EBV विषाणु की उपस्थिति का पता लगाया जाता है। यदि गुर्दे या मूत्रपथ में संक्रमण हो तो उसका पूरी तरह उपचार किया जाता है। गुर्दे के कई अन्य परीक्षण जैसे क्रियेटिनिन क्लियरेंस,  DTPA GFR किये जाते हैं। गुर्दों की संरचना अध्ययन करने के लिए रीनल एन्जियोग्राम, डिजिटल सब्सट्रेक्शन एन्जियोग्राम या सी.टी. एन्जियोग्राम किये जाते हैं।

एच.एल.ए. टेस्ट और लिम्फोसाइट क्रोसमेच
ल्यूकोसाइट एंटीजन मेचिंग प्रत्यारोपण की दीर्घकालीन सफलता का द्योतक है। आइडेन्टीकन जुड़वाँ बच्चों में यह 100% मेच करता है। इसके अलावा भी कुछ एंटीजन होते हैं जो प्रत्यारोपित गुर्दे का तिरस्कार कर सकते हैं। इसके लिए लिम्फोसाइट भी मेच किये जाते हैं।
मुख्य शल्य क्रिया  
यदि रोगी शल्य क्रिया के लिए स्वस्थ है तो दो शल्य-चिकित्सकों की टोलियां रोगी और दानदाता की शल्यक्रिया एक साथ शुरू करते हैं। इस शल्य चिकित्सा के में 3-4 घंटे लगते हैं। दानदाता के शरीर से गुर्दा निकाल कर उसे एक विशेष द्रव में अच्छी तरह धोकर रोगी के पेट की श्रोणि गुहा में उदरावरण के बाहर प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। गुर्दे की धमनी और शिरा को श्रोणिफलक (Rt. Iliac Artery & Vein) धमनी और शिरा से तथा मूत्र नली को मूत्राशय से जोड़ देते हैं। दानदाता का गुर्दा आजकल दूरबीन शल्यक्रिया से भी निकाला जाता है। एक सफल ऑपरेशन के बाद नए गुर्दे में रक्त प्रवाह शुरू हो जाता है। आमतौर पर नए गुर्दे सर्जरी के बाद 24 घंटे के भीतर काम शुरू कर देते हैं सामान्यतः रोगी के पुराने गुर्दों को वैसे ही शरीर में छोड़ देते हैं।
शरीर द्वारा नये गुर्दे का अपमान, तिरस्कार तथा रेगिंग और उसका उपचार 
दानदाता और रोगी की सारी क्रोसमेचिंग करने के उपरान्त भी शरीर के रक्षा विभाग के सिपाही पराये गुर्दे को पहचान लेते हैं तथा इसे एक आतंकवादी घुसपेठ मानते हुए नये गुर्दे से लड़ने और रेगिंग करने निकल पड़ते हैं। इसलिए इन्हें शांत रखने के लिए विशेष तरह की सलेक्टिव इम्युनोसप्रेसिव दवाएँ दी जाती हैं जिनके प्रभाव से ये सिपाही नये गुर्दे को तो बक्श देते हैं पर शरीर का बाकी रक्षा कार्य सुचारु रूप से करते रहते हैं। इसके लिए साइक्लोस्पोरिन या ट्रेकोलिमस, माइकोफेनोलेट या एज़ाथायोप्रिन कोर्टिज़ोन्स के साथ दी जाती हैं। सिरोलिमस और एवरोलिमस नई दवाएँ हैं। ये दवाएँ आजीवन लेनी पड़ती हैं।
गुर्दा प्रत्यारोपण की हानियाँ क्या हैं?
               बड़ी शल्यक्रिया की जरूरत पडती है, परन्तु वह संपूर्ण सुरक्षित है।
               शुरू में सफलता मिलने के बावजूद कुछ रोगियों में बाद में गुर्दा फिर से खराब होने की संभावना रहती है।
               गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद नियमित दवा लेने की जरूरत पडती है। शुरू में यह दवा बहुत ही महँगी होती है। यदि दवा का सेवन थोड़े समय के लिए भी बन्द हो जाए, तो प्रत्यारोपित गुर्दा काम करना बंद कर सकती है।
               यह उपचार बहुत महँगा है। ऑपरेशन और अस्पताल का खर्च, घर जाने के बाद नियमित दवा एवं बार-बार लेबोरेटरी से जाँच कराना इत्यादि खर्च बहुत महँगा (तीन से पांच लाख तक) होता है।
गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद जानने योग्य सूचनाएँ
संभावित खतरेः
गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद संभावित प्रमुख खतरे नये गुर्दे का शरीर द्वारा अस्वीकार होना (गुर्दा रिजेक्शन), संक्रमण होना, ऑपरेशन संबंधित खतरों का भय होना और  दवा का उल्टा असर होना है।
गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद क्या अन्य कोई दवा लेने की जरूरत पडती है?
हाँ, जरूरत के अनुसार गुर्दा प्रत्यारोपण कराने के बाद मरीजों द्वारा ली जाने वाली दवाईयों में उच्च रक्तचाप की दवा, कैल्सियम, विटामिन्स इत्यादि दवाईयाँ हैं। अन्य कोई बीमारी के लिए यदि दवा की जरूरत पडे, तो नये डॉक्टर से दवा लेने से पहले उसे यह बताना जरूरी होता है कि मरीज का गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ है और हाल में वह कौन कौन सी दवाई ले रहा है।
नये गुर्दा की देखभाल के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएँ
गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद गुर्दा पाने वाले मरीज को दी जानेवाली महत्वपूर्ण सूचनाएँ निम्नलिखित हैं।
               डॉक्टर के निर्देशानुसार नियमित ढंग से दवा लेनी अत्यंत जरूरी है। यदि दवा अनियमित रूप से ली जाए, तो नया गुर्दा के खराब होने का खतरा रहता है।
               प्रारंभ में मरीज का ब्लडप्रेशर, पेशाब की मात्रा और शरीर के वजन को नियमित रूप से नापकर एक डायरी में लिखना जरूरी होता है।
               डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित रूप से लेबोरेटरी में जाकर जाँच करानी चाहिए और फिर नेफ्रोलोजिस्ट से नियमित चेकअप कराना जरूरी है।
               रक्त और पेशाब की जाँच विश्वासपात्र लेबोरेटरी में ही करानी चाहिए। रिपोर्ट में यदि कोई बड़ा परिवर्तन दिखाई दे तो लेबोरेटरी बदलने के बजाय नेफ्रोलॉजिस्ट को तुरंत सूचित करना आवश्यक है।
               बुखार आना, पेट में दर्द होना, पेशाब आना, अचानक शरीर के वजन में वृद्धि होना या कोई अन्य तकलीफ हो रही हो, तो तुरंत नेफ्रोलॉजिस्ट से संपर्क करना जरूरी है।
गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद संक्रमण से बचने के लिए निर्देश
               शुरू-शुरू में संक्रमण से बचने के लिए स्वच्छ, जीवाणुरहित मास्क पहनना जरूरी है, जिसे रोज बदलना चाहिए।
               रोज साफ पानी से नहाने के बाद धूप में सुखाएं एवं प्रेस किये कपड़े पहनने चाहिए।
               घर को पूरी तरह से स्वच्छ रखना चाहिए।
               बीमार व्यक्ति से दूर रहना चाहिए। प्रदूषणवाली, भीड़-भाड़ वाली जगह जैसे मेला वगैरह में जाने से बचना चाहिए।
               हमेशा स्वच्छ उबला हुआ पानी पीना चाहिए।
               घर में ताजा बना भोजन साफ बरतनों में लेकर खाना चाहिए।
               खाने पीने संबंधित सभी निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना चाहिए।

गुर्दा प्रत्यारोपण में स्टेम कोशिका तकनीक का उपयोग

अब गुर्दा प्रत्यारोपण करवाने के बाद मरीज को जीवनपर्यन्त दवाएं नहीं खानी पड़ेंगी और साथ ही प्रति वर्ष एक से डेढ़ लाख दवाइयों पर होना वाला खर्चा भी बचेगा। है।  सवाई मानसिंह अस्पताल, जयपुर के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. एल. सी. शर्मा और यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. टी. सी. सदासुखी ने 2011 में देश  में पहली बार स्टेम सैल (स्टेम कोशिका) तकनीक का इस्तेमाल कर गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया है।  दो माह बाद प्रतिरोध क्षमता कम करने वाली (इम्यूनोसप्रेसिव) दवाएं बंद कर दी गई।

डॉक्टरों ने रोगी को टोटल लिम्फोइड रेडियेशन (रेडियेशन थैरेपी) दी फिर उसकी मां के कूल्हे के हिस्से की अस्थि-मज्जा (बोन मैरो) से स्टेम सैल लिए। एंटीबॉडी ड्राइव सैल साइटोटॉक्सिन तकनीक से कैमपैथ दवा डाल कर इससे किलर सेल्स को अलग किया फिर 225-250 मिली तक स्टेम सेल रोगी के शरीर में डाले। इसमें करीब छह घंटे का समय लगा। इसके बाद गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया। प्रत्यारोपण के बाद रोगी की प्रतिरोधक क्षमता को कम करने के लिए उसे खास तरह की दवाएं दी गई। इससे मरीज का शरीर नए गुर्दे व स्टेम सैल को स्वीकार कर सकता है। इससे पहले हावर्ड मेडिकल स्कूल, बोस्टन, अमेरिका में ऐसा गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ था।


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