Monday, February 6, 2017

ट्रांस फैट - टेक्नोलोजी की मार दुनिया हुई बीमार


ट्रांस फैट -  टेक्नोलोजी की मार दुनिया हुई बीमार
( डॉ. आशा मिश्रा उपाध्याय से)


नयी दिल्ली 02 फरवरी (वार्ता)। अमेरिका और यूरोप समेत विश्व के अधिकांश देशों ने कई साल पहले जिस खतरनाक ट्रांस फैट पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी थी, उस फैट का हमारे यहां अभी भी वनस्पति और रिफांइड तेलों में भरपूर प्रयोग हो रहा है। इस वजह से देश में हृदय, मधुमेह, अल्ज़ाइमर, कैंसर आदि घातक बीमारियां तेजी से पैर पसार रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ट्रांस फैट को हमारे शरीर को दिनभर में मिलने वाली ऊर्जा का एक प्रतिशत हिस्सा से कम रखने की अनुशंसा की है। गैर सरकारी संस्था सेंटर फॉर साइंस एडं इनवायरमेंट (सीएसई) ने वर्ष 2012 में 30 ब्रांडेड तेलों पर अनुसंधान करके बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया था। सीएसइ ने इन तेलों का अपनी प्रयोगशाला में परीक्षण करके कहा था,“हमें रसोई के तेल से धीमा जहर मिल रहा है और हम हर रोज खतरनाक बीमारियों की गिरफ्त में जा रहे हैं।” इस संस्था ने इन तेलों में डेनमार्क के अंतरराष्ट्रीय मानक दो प्रतिशत से कहीं अधिक पांच से 23 प्रतिशत तक ट्रांस फैट की मौजूदगी की पुष्टि की थी। सीएसई की इस पहल के बाद भारतीय खाद्य एवं सुरक्षा मानक प्राधिकरण (एफसएएसएआई) ने तेल कंपनियों के लिए भार से 10 प्रतिशत से कम ट्रांस फैट का मानक तय किया और इस वर्ष फरवरी तक इसे पांच प्रतिशत लाने के लिए अधिसूचना जारी की गयी है। सीएसई के खाद्य एवं सुरक्षा डिविजन के प्रोग्राम मैनेजर अमित खुराना ने यूनीवार्ता को बताया,“सरकार ने ट्रांस फैट के बारे में नोटिफिकेशन जारी किया है कि इसे पांच प्रतिशत पर लाना है लेकिन देखिए कब तक इसे अमल में लाया जाता है। दस से पांच प्रतिशत पर लाए जाने का सरकार का कदम स्वागतयोग्य है। इससे हमारे स्वास्थ्य पर काफी फर्क पड़ेगा। लेकिन भविष्य में इसे ‘नीयर जीरो’ लाना होगा। हमारी मांग है कि खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग पर इसकी लेबलिंग होनी चाहिए। साफ-साफ अक्षरों में सेचुरेटेड और ट्रांस फैट की मात्रा के बारे में उल्लेख होना चाहिए। हमने बाजार में मौजूद कई नामी -गिरामी कंपनियों के खाद्य तेलों पर अध्ययन किया था और उनमें स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक ट्रांस फैट की मौजूदगी पांच से 23 गुना अधिक पायी थी। वर्ष 2012 में हमारे अध्ययन के बाद एफएसएसएआई ने वर्ष 2013 में ट्रांस फैट का लेबल 10 प्रतिशत करने और वर्ष 2015 तक इसे पांच प्रतिशत करने के बारे में नोटिफिकेशन जारी किया था। फिलहाल यह लेबल 10 प्रतिशत है लेकिन पांच प्रतिशत के लेबल की समय सीमा को बढ़ा कर इस वर्ष फरवरी तक कर दिया गया है। उम्मीद है इस पर गंभीरता से अमल किया जायेगा।” सीएसई की निदेशक सुनिता नारायण ने कहा है कि पी गोपीचंद राष्ट्रीय हीरो इसलिए नहीं हैं कि उन्होंने दो ऑलंपिक मेडलिस्ट, साइना नेहवाल और पीवी सिंधु को तैयार किया है। वह इसलिए आदरणीय और सम्मानीय हैं कि सॉफ्ट ड्रींक के लिए विज्ञापन करने से मना करने वाले वह इकलौते स्पोर्ट्स मैन हैं। सुश्री नारायण के अनुसार दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में एफएसएसएआई से जंक फूड और प्रसिद्ध हस्तियों से अस्वास्थ्यकर खाद्य एवं पेय पदार्थों के बारे में विज्ञापन के संबंध में गाइडलाइंस तैयार करने को कहा था। लेकिन इस दिशा में कहां कुछ हुआ है। ब्रांड लॉबी की कोशिश होती है कि इस तरह की कोई अच्छी चीज अमल में नहीं आए।

स्पेन में “बडविग प्रोटोकॉल” के तहत कैंसर के खिलाफ वैकल्पिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र का संचालन करने वाले डॉक्टर एल जेनकिंस ने यूनीवार्ता से आज विशेष बातचीत में कहा कि मानवीय हितों के लिए अद्वितीय काम करने वाली सीएसई ने केवल भारत की जनता की आंखें ही नहीं खोल दीं बल्कि कुंभकर्ण की नींद सो रहे एफएसएसएआई को भी झकझोर कर उठा दिया है। डॉ. जेनकिंस ने कहा “आपकी सरकार को जागना ही होगा और अपने लोगों की रक्षा करनी ही होगी क्योंकि एक देश मुट्ठी भर “कंपनियों” से नहीं, एक-एक नागरिक को मिलाकर बनता है और देश का स्वास्थ्य हर हाल में सर्वोपरि है।” उन्होंने बताया कि दिल की बीमारियों समेत कई गंभीर रोगों के लिए जिम्मेदार ट्रांस फैट पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए। उन्होंने कहा,“हमारे देश में स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन फूड सेक्यूरिटी एडं न्यूट्रीशन एजेंसी (एईएसएएन) ने वर्ष 2009 में विधेयक का प्रारूप तैयार किया और कानून लाकर देश के बाजार में ट्रांस फैट का मानक अधिकतम दो प्रतिशत तय किया गया है। मेरी इच्छा है कि इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाये।” उन्होंने कहा,“कैंसर की प्राकृतिक चिकित्सा की खोज करने और इसके बाद इस बीमारी से जूझ रहे कई लोगों को नयी जिंदगी देने वाली जर्मनी की डॉक्टर जॉहाना बडविग ने कई साल पहले ने घोषणा कर दी थी कि ट्रांस फैट हमारी सेहत का बड़ा दुश्मन है। लेकिन तेल कंपनियों और सरकार की मिलीभगत के कारण इस पर किसी प्रकार का ध्यान नहीं दिया गया और ना ही उनकी खोज को महत्व दिया गया। कैंसर पर नियंत्रण की दिशा में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए डॉ. बडविग को नोबल पुरस्कार के लिए सात बार चयनित किया गया था। उन्होंने नोबल समिति की उस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था कि वह अपनी प्राकृतिक उपचार पद्धति में कैंसर के उपचार में आधुनिक चिकित्सा पद्धति को भी शामिल करें और उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिला। हमें लाभ से ऊपर उठकर काम करना होगा तभी हम सच्चे अर्थों में विश्व को एक परिवार के रूप में समेट सकते हैं।”

ट्रांस फैट के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले जाने-माने चिकित्सक डॉ ओ पी वर्मा ने कहा कि बच्चे और युवा जिस तेजी से फास्ट फूड और चटपटे खाद्य पदार्थों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, उसी रफ्तार से बाजारों में बिकने वाले कुकिंग तेलों और पैक्ड फूड जहरीले होते जा रहे हैं। हम जो रकम ट्रांस फैट खाने से बीमार हो रहे लोगों के इलाज पर खर्च कर रहे हैं, वह हम हमारी प्रगति पर खर्च करते। दुख की बात है कि आज हमारी हैल्थ केयर सर्विसेज़ हैल्थ इंडस्ट्री बन चुकी हैं। आज इनका सिद्धांत है, पहले बीमार करो फिर उपचार करो और दोनों से कमाओ। पहले 50 रुपये की लागत से बना पिज्जा 500 रुपये में खिलाएंगे और जब हमें कैंसर या कोई दूसरा रोग हो गया तो मुट्ठी भर दवा के हजारों और लाखों वसूलेंगे।” उन्होंने कहा “ट्रांस फैट टॉक्सिक, अखाद्य और कृत्रिम फैट है। इसे सस्ते तेलों का आंशिक हाइड्रोजिनेशन करके फैक्टरी में बनाया जाता है। प्राकृतिक तेल और जीव-वसा में प्राय: यह फैट नहीं होता है। यह देखने में घी और मक्खन की तरह होता है और इसकी शेल्फ लाइफ बहुत अधिक होती है, यानी इसमें बने व्यंजन अधिक देर तक चलते हैं। इसको बनाने में लगात भी कम आती है। इसलिए यह बेकरी, हलवाई और प्रोसेस्ड फूड निर्माताओं का मनपंसद फैट है। घरों में इस्तेमाल होने वाले रिफाइंड ऑयल और वनस्पतियों में भी यह फैट होता है। फैटी एसिड मूलत: एक हाइड्रो-कार्बन की लड़ होती है जो अनसेचुरेटेड अथवा सेचुरेटेड हो सकती है। अनसेचुरेटेड फैटी एसिड़ की लड़ से एक ही तरफ के दो हाइड्रोजन अलग होते हैं और एक डबल बांड बनता है। यहां यह लड़ कमजोर पड़ने के कारण मुड़ जाती है और भरपूर मात्रा में ऊर्जावान इलेक्ट्रोन इकट्ठे हो जाते हैं। मुड़ने से इसके भौतिक और रासायनिक गुण प्रभावित होते हैं। ये सामान्य तापमान पर तरल बने रहते हैं। इसे सिस विन्यास कहते हैं । सिस विन्यास के विपरीत ट्रांस फैट में उलटी दिशा में हाइड्रोजन अलग होते हैं यानी एक ऊपर की तरफ तो दूसरा नीचे की तरफ। इसके कारण फैटी एसिड की लड़ सीधी रहती है और आपस में जमी रहती है। यही कारण है कि ये सामान्य तापमान पर संतृप्त वसा अम्ल की तरह ठोस रहते हैं। यह असामान्य और अप्राकृतिक विन्यास है।” उन्होंने कहा,“हाइड्रोजिनेशन की प्रक्रिया में केटेलिस्ट निकल धातु की उपस्थिति में तेल को तेज तापमान पर गर्म करके भारी दबाव से हाइड्रोजन गैस प्रवाहित की जाती है। इससे तेल ठोस होने लगता है। तेल का आंशिक हाइड्रोजिनेशन ही किया जाता है, क्योंकि पूरा करने पर यह पत्थर की तरह कठोर हो जाता है और इसका उपयोग संभव नहीं होता । जानी-मानी कंपनियों के नमकीन चिप्स, बर्गर, छोले भटूरे, समोसा, कचौडी, पकौडी, कैंडी, पिज्जा, चॉकलेट, आइसक्रीम आदि में भारी मात्रा में ट्रांस फैट पाया जाता है।”

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Friday, January 20, 2017

जर्मनी के ‘बडविग प्रोटोकॉल’ ने कैंसर से जंग में लिखी नयी इबारत 



नयी दिल्ली, 19 जनवरी (वार्ता) अमेरिका एवं अन्य देशाें में कैंसर पर लगातार हो रहे शोध और नयी दवाओं की खोज के बावजूद न तो मरीजों की संख्या कम हो रही है और न ही मौतों का सिलसिला थम रहा है । इसके उलट सुरसा के मुंह की तरह इस ‘महाकाल’ का आकार बढ़ता जा रहा है, लेकिन मेडिकल साइंस की इन असफलताओं के बीच नोेबल पुरस्कार के लिए सात बार चयनित होने वाली डॉ़ जॉहाना बडविग की वैकल्पिक उपचार विधि से उम्मीदों के दीप जल रहे हैं और कई जिन्दगियां चहचहा रहीं हैं । जर्मनी की ‘पीपुल्स अगेंस्ट कैंसर’ सोसायटी के संस्थापक एवं कैंसर के परम्परागत एवं वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के क्षेेत्र में जाने-माने शोधकर्ता लोथर हरनाइसे ने यूनीवार्ता से आज विशेष बातचीत में ‘बडविग थेरेपी’ के माध्यम से विश्वभर में कैंसर पर विजय के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्हाेंने कहा कि बर्लिन के महान जीव रसायन शास्त्री डॉ. ओटो वारबर्ग ने कैंसर पर उस समय विजय का अर्द्ध शंखनाद किया था जब उन्होंने इसके कारण की पहचान कर ली थी। उन्हें इस खोज के लिए वर्ष 1931 नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। डाॅ़ वारबर्ग ने कई शोधों के माध्यम से यह साबित किया कि यदि कोशिकाओं में ऑक्सीजन की मात्रा को 48 घंटे के लिए 35 प्रतिशत कम कर दिया जाए तो वे कैंसर कोशिकाओं में परिवर्तित हो जाती हैं। सामान्य कोशिकाएं अपनी जरुरतों के लिए ऑक्सीजन की उपस्थिति में ऊर्जा बनाती है, लेकिन ऑक्सीजन के अभाव में कैंसर कोशिकाएं ग्लूकोज को फर्मेंट करके ऊर्जा प्राप्त करती हैं। कैंसर पर कई पुस्तकें लिखने वाले लोथर हरनाइसे ने कहा कि यदि कोशिकाओं को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे तो कैंसर का अस्तित्व संभव नहीं है। उन्होंने कहा, “हमें मालूम है कि जीवों मेें हो रही अनेक रासायनिक क्रियाओं में शामिल कार्बनिक यौगिक एडीनोसीन ट्राइफास्फेट (एटीपी) में एडीनीन , राइबोस और तीन फास्फेट वर्ग होते हैं। इसका कोशिकाओं की विभिन्न क्रियाओं के लिए ऊर्जा बनाने में विशेष महत्व है। हमारे शरीर की ऊर्जा एटीपी है और ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज के एक अणु से 38 एटीपी बनते हैं लेकिन फर्मेंटेशन से सिर्फ दो एटीपी प्राप्त होते हैं। डॉ़ वारबर्ग और अन्य शोधकर्ता मान रहे थे कि कोशिका में ऑक्सीजन को आकर्षित करने के लिए दो तत्व जरूरी होते हैं, पहला सल्फरयुक्त प्रोटीन जो कि पनीर में पाया जाता है और दूसरे कुछ फैटी एसिड्स जिनकी पहचान नहीं हो पा रही थी। डॉ़ वारबर्ग भी अपने जीवनकाल में इन रहस्यमय फैट्स को पहचानने में सफल नहीं रहे। ”

डॉ हरनाइसे ने कहा,“ विश्व विख्यात जर्मन बायोकेमिस्ट और चिकित्सक डॉ़ जॉहाना बडविग ने डॉ़ वारबर्ग की शोध को अंजाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया । उन्होंने फिजिक्स, बायोकेमिस्ट्री तथा फार्मेसी में मास्टर और नेचुरोपेथी में पी.एच.डी. की डिग्री हासिल की । जर्मन सरकार के फेडरल इंंस्टीट्यूट ऑफ फैट्स रिसर्च में ‘सीनियर एक्सपर्ट ’थीं। उन्होंने फैट्स और कैंसर उपचार के लिए बहुत शोध किए। डॉ. बडविग ने 1949 में पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीक विकसित की जिससे कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पादन की गुत्थी सुलझ गयी यानी उन्होंने ‘रहस्यमय फैट्स’ की पहचान करने में कामयाबी हासिल कर ली, जिसकी दुनिया भर के वैज्ञानिक खोज कर रहे थे।” देशभर में घूम-घूम कर बडविग थेरेपी की अलख जगाने के महंती काम में लगे लोथर हरनाइसे ने कहा कि डाॅ़ बडविग ने ओमेगा-3 फैट के मुखिया ‘अल्फा लिनोलेनिक एसिड’और ओमेगा-6 फैट के मुखिया ‘लिनोलिक एसिड’ की पहचान की। ये अलसी (फ्लेक्स सीड्स) के कोल्ड-प्रेस्ड तेल में भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये हमारे शरीर में नहीं बन सकते इसलिए इन्हें ‘असेंशियल फैट्स’ का दर्जा दिया गया है। ये इलेक्ट्रोन युक्त अनसेचुरेटेड फैट्स हैं। इनमें सक्रिय, ऊर्जावान और नेगेटिवली चार्ज्ड इलेक्ट्रोन्स की अपार संपदा होती है। इलेक्ट्रोन्स वजन में हल्के होते हैं और मूल अणु से ऊपर उठ कर बादल की तरह विचरण करते हुए दिखाई देते हैं इसलिए डाॅ़ बडविग ने इन्हें ‘इलेक्ट्रोन क्लाउड’ नाम दिया । उन्होंने अपनी पेपर क्रोमेटोग्राफी तकनीस से इसका गहन अध्ययन करने के बाद घोषणा की कि इलेक्ट्रोन्स ही कोशिकाओं में ऑक्सीजन खींचते हैं। डाॅ़ बडविग ने अपनी पुस्तक में यह भी लिखा है कि फैट्स हमारे शरीर के लिए सबसे जरूरी तथा सजीव तत्व हैं। मानव शरीर में भरपूर इलेक्ट्रोंस होते हैं, उसमें सूर्य के फोटोन्स को आकर्षित और संचय करने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है। जब तक हमारे शरीर में भरपूर फैटी एसिड्स तथा ऑक्सीजन रहती है, सारी जीवन क्रियाएं सुचारु रूप से चलती हैं। इसके विपरीत अवसाद एवं शोक में रहने वाले व्यक्तियों में इलेक्ट्रोंस बहुत कम होते हैं। वे ऊर्जाहीन तथा कमजोर होते हैं। उनकी जीवन क्रियाएं शिथिल रहती हैं और वे विभिन्न रोगों से ग्रस्त रहते हैं।”

उन्होंने कहा कि डाॅ़ बडविग ने यह भी लिखा है कि हमारा सूर्य से प्रेम संयोग मात्र नहीं है। हमारे शरीर की लय सूर्य की लय से इतनी मिलती है कि हम सूर्य की ऊर्जा का सबसे अधिक अवशोषण करते हैं। हाइली सेचुरेटेड फैटी एसिड्स का सेवन करने से यह क्षमता आैर बढ़ जाती है । इनमें भरपूर इलेक्ट्रोंस होते हैं जिनका विद्युत-चुंबकीय प्रभाव सूर्य से निकले फोटोन्स को आकर्षित करता है। ‘क्वांटम फिजिक्स’ के महान वैज्ञानिक डेस्यौर ने लिखा है कि यदि मनुष्य के शरीर में सूर्य के फोटोन्स की मात्रा 10 गुना बढ़ा दी जाए तो मनुष्य की उम्र 10,000 वर्ष हो जाएगी । वर्ष 1998 से 2003 तक डॉ़ बडविग के छात्र रहे लोथर हरनाइसे ने कहा, “पेपर क्रोमेटोग्राफी से यह भी स्पष्ट हो गया कि ट्रांसफैट से भरपूर वनस्पति और गर्म करके बनाए गए रिफाइंड तेलों में ऊर्जावान इलेक्ट्राॅन्स गायब थे और वे श्वसन विष साबित हुए। डाॅ़ बडविग ने इन्हें स्यूडो फैट की संज्ञा दी । इनको इंसान का सबसे बड़ा शत्रु बताया और उन्होंने इन्हें प्रतिबंधित करने की पुरज़ोर वकालत भी की थी। डॉ़ बडविग को कोशिकाओं में ऑक्सीजन को आकर्षित करने के लिए दोनों जरूरी तत्वों की जानकारी हो गयी थी और उन्होंने अपनी उपचार विधि शुरु कर दी। उन्होंने कैंसर के 640 मरीजों के खून के नमूने लिए और मरीजों को अलसी का तेल तथा पनीर मिला कर देना शुरू कर दिया। तीन महीने बाद फिर उनके खून के नमूने लिए गए। उन्हें अपने ‘प्रयोग’ का चौंका देने वाला परिणाम मिला। मरीजों का हीमोग्लोबिन बढ़ गया था। वे ऊर्जावान और स्वस्थ दिख रहे थे और उनकी गांठे छोटी हो गई थी। अलसी के तेल का ‘जादुई’ नतीजा चमत्कृत करने वाला था। डाॅ़ बडविग ने अलसी के तेल और पनीर के मिश्रण और स्वस्थ आहार-विहार को मिला कर कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया। यह “बुडविग प्रोटोकोल”के नाम से विख्यात हुआ। यह उपचार क्वांटम फिजिक्स पर आधारित है। तीस सितम्बर 1908 को जन्मी डाॅ़ बुडविग ने वर्ष 1952 से 2002 तक कैंसर के हजारों रोगियों का सफलतापूर्वक इलाज किया। उन्हें हर तरह के कैंसर में 90 प्रतिशत सफलता मिली। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी अपने कैंसर के उपचार के लिए बडविग पद्धति का सहारा लिया था। यूनान के ‘फादर ऑफ मेडिसिन’ हिपोक्रेटस ने कहा था कि आधुनिक युग में भोजन ही दवा का काम करेगा और डॉ़ बडविग ने इसे साबित कर दिया। बडविग उपचार से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया, ह्रदयाघात अस्थमा, अवसाद आदि बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं। डॉ़ बडविग ने अपनी इस खोज के बारे में कई देशों में व्याख्यान दिया। उन्होंने ‘फैट सिंड्रोम’, ‘डेथ आॅफ ए ट्यूमर”, ‘फ्लेक्स आयल – ए ट्रू एड अगेन्स्ट अार्थराइटिस’, ‘हार्ट इन्फार्कशन’, ‘कैंसर एंड अदर डिजीज़ेज’,‘आयल प्रोटीन कुक बुक’, आैर ‘कैंसर – द प्रोबलम एंड द सोल्यूशन’ पुस्तकें भी लिखीं। नोबल पुरस्कार के लिए उन्हें सात बार नामित किया गया लेकिन अपनी उपचार विधि में कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी को शामिल करने की शर्त को मानने से इन्कार करने के कारण उन्हें इस पुरस्कार से वंचित रखा गया। नोबल पुरस्कार देने ‘वालों’ को डर था बडविग उपचार विधि को मान्यता मिलने से 200 बिलियन डालर का कैंसर व्यवसाय रातों रात धराशाही हो जायेगा। डाॅ़ बडविग ने जर्मन रेडियो पर वर्ष 1965 में एक साक्षात्कार में कहा था, “यह अचरज की बात है कि मेरे उपचार से कैंसर तेज़ी से ठीक होता है। एक महिला को तीन साल से कोलोन में कैंसर था जो लीवर और आमाशय में फैल चुका था। पेट में मायोमा भी हो चुका था। वह स्विटजरलैंड से गोटिंजन सर्जरी क्लीनिक पर आई थी। उसे क्लीनिक के कई डाॅक्टर ने देखा और क्रिसमस के दिन उसकी सर्जरी होने जा रही थी। उन्हें डर था कि उसके कैंसर की गांठ आंत को पूरी तरह ब्लॉक कर देगी लेकिन मेरी सलाह पर डाॅक्टर ने ऑपरेशन नहीं किया। मैंने उसे ऑयल-प्रोटीन डाइट देना शुरू किया। सात हफ्ते में उसकी गांठ पूरी तरह ठीक हो गई और हमने उसे घर भेज दिया। आश्चर्य की बात यह थी कि पासपोर्ट में उसकी फोटो देख कर स्विट्जरलैंड के कस्टम अधिकारी विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि यह पासपोर्ट इसी महिला का है क्योंकि उसकी शक्ल बिलकुल बदल चुकी थी। ”

उन्होंने कहा था, “वर्ष 1978 में उल्म के मशहूर डॉ़ अर्नस्ट को पेट का कैंसर हुआ, जो पूरे पेट में फैल चुका था। उनकी मेजर सर्जरी हुई। दो साल बाद कैंसर ने फिर अपना असर दिखाया और पूरे पेट में फैल गया। उन्होंने कीमो नहीं ली और मुझसे उपचार करवाया। वह स्वस्थ हो गये। मेरे उपचार से कैंसर के वे रोगी भी ठीक हो जाते हैं, जिन्हें रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी से कोई लाभ नहीं होता है और जिन्हें यह कह कर छुट्टी दे दी जाती है कि अब उनका कोई इलाज संभव नहीं है। इन रोगियों में भी मेरी सफलता 90 प्रतिशत है। ” लोथर हरनाइसे ने कहा कि कैंसर रोधी डॉ. बडविग उपचार पद्धति एक पूरी तरह से अलग जीवन शैली है। संक्षिप्त में कहा जाये तो इसमें अलसी का तेल और खास रूप से तैयार पनीर के साथ-साथ ताजा, इलेक्ट्रॉन्स युक्त और ऑर्गेनिक आहार शामिल हैं जिनमें अधिकांश खाद्य पदार्थ सलाद और जूस के रूप में लिये जाते है ताकि रोगी को भरपूर एंजाइम्स मिले। इस उपचार में सुबह सबसे पहले प्रो-बायोटिक्स से भरपूर सॉवरक्रॉट (खमीर की हुई पत्ता गोभी) का जूस या छाछ लेना होता है। ­इसमें भरपूर एंजाइम्स और विटामिन सी होते हैं। नाश्ते से आधा घंटा पहले बिना चीनी की गरम हर्बल या ग्रीन टी दी जाती है। इसके अलावा करीब 20 मिनट तक मरीज को धूप का सेवन अनिवार्य रखा गया है। इससे मरीज के शरीर में विद्यमान इलेक्ट्रॉन्स सूर्य के फोटोन्स को आकर्षित करते हैं और ये फोटोन्स शरीर में पहुंच कर सेहत में निखार लाते हैं। इस पद्धति में योग, प्राणायाम एवं ध्यान को विशेष स्थान दिया गया है। ‘कीमोथेरेपी हील्स कैंसर एंड वर्ल्ड इज फ्लैट ’नाम की किताब लिखने वाले लोथर हरनाइसे ने व्यंग्य किया है कि कीमोथेरेपी से कैंसर का इलाज उतना ही सत्य है जितना यह बताना कि धरती चपटी है। डॉ़ बडविग अविवाहित थीं और उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं है। उनकी बडविग उपचार विधि रूपी ‘विरासत’ को जन-जन तक पहुंचाने की मुहिम छेड़ने वाले श्री लोथर हरनाइसे ने कई पुस्तकें लिखीं हैं लेकिन यह पुस्तक कुछ माह के अंदर बेस्टसेलर बन गयी। इसमें उन्होंने 100 से अधिक वैकल्पिक कैंसर चिकित्सा प्रणालियों पर वर्षों तक किए गए शोध ,कैंसर से जंग जीतने वाले लोगों तथा मरीजों के साक्षात्कार और अनुभव के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने कैंसरमुक्त जीवन के लिए ‘तीन ई’ कार्यक्रम को शामिल किया है। पहला उत्तम आहार (ईट ईल) दूसरा उत्सर्जन (इलिमिनेट टॉक्सिन) और तीसरा ऊर्जा (एनर्जी)। उन्होंने कहा कि भारत में डॉ़ ओम प्रकाश वर्मा बडविग प्रोटोकॉल से कैंसर रोगियों का सफल इलाज कर रहे हैं। राजस्थान के कोटा में मरीज उनसे संपर्क करके नयी जिंदगी पा रहे हैं । इस इलाज में तीन माह के अंदर अंतर सामने आने लगता है। उन्होंने कहा कि ‘बडविग कैंसर उपचार, अलसी महिमा, दैविक रसायन अलसी एवं कैंसर काॅज एंड क्योर समेत कई पुस्तकें लिखने वाले डॉ़ वर्मा ने यह ठानी है कि जब तक देश के सारे कैंसर अस्पताल बंद नहीं हो जाते बडविग उपचार विधि के बारे में लोगों काे जागरुक करने की उनकी ‘तपस्या’जारी रहेगी। डॉ़ वर्मा ने अलसी और पनीर के मिश्रण का नाम ‘ओमखंड’ रखा है। डॉ़ वर्मा ने कहा “बडविग आहार का सबसे मुख्य व्जंजन सूर्य की अपार ऊर्जा और इलेक्ट्रॉन्स से भरपूर ओमखंड है जो अलसी के कोल्ड-प्रेस्ड तेल और लो-फैट पनीर को ब्लेंड करके बनाया जाता है। बडविग उपचार पद्धति से कैंसरमुक्त भारत बनाने का सपना सच किया जा सकता है।” डॉ़ वर्मा ने यह भी कहा कि लोथर हरनाइसे ने 19 मई 2003 में अपने गुरु डॉ़ जॉहाना बडविग के निधन के बाद उनके अधूरे कामों को पूरा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया है । आशा.श्रवण वार्ता

Thursday, January 19, 2017

Cancer - Cause And Cure


Cancer is uncontrolled growth of abnormal cells in a part of the body. The question is what is the prime cause of cancer. Your oncologist will never tell you this. But long back in 1931, Dr warburg proved clearly that prime cause of cancer is oxygen deficiency in the cells. Without oxygen cells get energy by fermenting glucose, and produce very little energy along with some lactic acid. He proposed that some unknown fat and sulfur containing protein is required to attract oxygen into the cells. In 1949, Dr Budwig developed a technology to identify these fats, they are electron rich Alpha-linolenic and Linoleic acids, found in flaxseed oil. When Flax oil is blended with cottage cheese and consumed, they make healthy cell membranes and pull oxygen like a magnet into the cells. Thus energy production is restored in the cells and cancer starts healing naturally.

Wednesday, January 18, 2017

शाहजादी हल्दी ‘स्वास्थ्य सोना’ बरसाये, विज्ञान भी चमत्कृत


शाहजादी हल्दी ‘स्वास्थ्य सोना’ बरसाये, विज्ञान भी चमत्कृत


नयी दिल्ली 01 दिसंबर (वार्ता) आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा में चमत्कारी औषधि के ‘खिताब’ से नवाजी गयी हल्दी वैज्ञानिकों की भी पसंद बन गयी है और उन्होंने अपने शोध में कैंसर, दिल की बीमारी, डिमेंशिया, गठिया एवं सोरायसिस समेत कई बीमारियों की राेकथाम में भारतीय मसालों की इस ‘सरताज’ को कारगर पाया है। राष्ट्रपति के निजी चिकित्सक पद्मश्री प्रोफसर (डॉ़ ) मोहसिन वली ने यूनीवार्ता के साथ खास बातचीत में आज कहा कि हल्दी का लोहा अब वैज्ञानिक भी मान रहे हैं। रंग में ही नहीं गुणों में भी ‘सोना’ हल्दी को सर्दी -जुकाम से लेकर कैंसर और दिल से जुड़ी बीमारियों से लड़ने में सक्षम पाया गया है। ह्रदय रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर वली ने कहा“ वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हल्दी का मुख्य घटक ‘करक्यूमिन’ न केवल कैंसर की कोशिकाओं को मारने और उनकी वृद्धि रोकने में सक्षम है बल्कि वह हमारे दिल का सबसे अच्छा दोस्त भी है। करक्यूमिन हमारे शरीर में पहुंच कर धमनियों के भीतर ‘प्लाक’नहीं जमने देता है जिससे खून में क्लॉट नहीं बन पाता है। क्लॉट बनने से ह्दयाघात का गंभीर खतरा हो जाता है। इसके अलावा प्लाक नसों को संकरा बना देता है जिससे खून का प्रवाह बाधित होने लगाता है।” सबसे कम उम्र (33)में राष्ट्रपति का चिकित्सक बनने वाले का गौरव हासिल करने वाले प्रोफेसर वली ने कहा “उचित मात्रा में सेवन करने से हल्दी का यह पीला घटक खराब कोलेस्ट्रॉल को 56 प्रतिशत तक घटाकर कोेलेस्ट्राॅल ऑक्सिडेशन को कम करता है। यह हमारे खून के सीरम ट्राइग्लिसराइड्स स्तर को भी 27 प्रतिशत तक कम करता है। कुल मिलकर यह टोटल कोलेस्ट्राॅल को भी 33़ 8 प्रतिशत कम करके दिल को मजबूती से धड़कने में अहम भूमिका निभाता है। इसमें एंटी-इन्फ्लैमटोरी और एंटी-ऑक्सिडेंट गुण भी हैं। ” उन्होंने कहा “मसलन हर बीमारी की शुरुआत इन्फ्लैमेशन से ही होती है और कई तरह के ‘धारधार हथियारों से लैस’ हल्दी ऐसे दुश्मनों को तो पहले ही पटकनी दे देती है। यह हमारे शरीर से फ्री रेडिकल्स को निकाल बाहर करती है। फ्री रैडिकल्स शरीर के जोड़ों पर सूजन पैदा करते हैं जिससे हमें असहनीय दर्द होता है और कालांतर में जोड़ों काे बेहद नुकसान भी पहुंचता है। यह गठिया की बीमारी में भी कारगर है।”
जेरियाट्रिक्स (जरारोग)चिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रोफेसर वली ने कहा कि कैंसर और करक्यूमिन का 36 का आंकड़ा है। करक्यूमिन तेजी से बढ़ते कैंसर की कोशिकाओं पर लगाम लगाता है। उन्होंने कहा“हल्दी पर हम वैज्ञानिकों ने जो शोध किए हैं उसके मद्देनजर हम यह कह सकते हैं कि यह एक शाहजादी की तरह है और सोने की तरह दमकती यह हमें स्वस्थ्य एवं सुंदर बनाकर लंबी जिंदगी देने में सक्षम है। हल्दी पर देश ही नहीं विदेशों में भी लगातार शोध हो रहे हैं। ब्रिटेन के कॉर्क कैंसर रिसर्च सेंटर में किए गए परीक्षण में करक्यूमिन का प्रयोग में गले की कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने में बेहद कारगर पाया गया। डॉ़ शैरन मैक्केना और उनकी टीम के अनुसार करक्यूमिन ने 24 घंटों के भीतर कैंसर की कोशिकाओं को मारना शुरू कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि करक्यूमिन कैंसर के नए इलाज विकसित करने में सहायक हो सकता है। इसके अलावा हल्दी मधुमेह के मरीजों के लिए भी फायदेमंद है। इसमें मौजूद एंटिओक्सीडेंट हड्डियो में होने वाली समस्याओं से भी बचाते हैं। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली हल्दी सांस संबंधी बीमारियों में भी राहत पहुंचाती है। ” पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के चिकित्सक रहे प्रोफेसर वली ने कहा “हमने अंबा हल्दी और लाल मिर्च पर शोध किया है। लाल मिर्च में भी करक्यूमिन पाया जाता है लेकिन उसकी तीखी प्रकृति के कारण हम उसका उपयोग सीमित ही कर सकते हैं। हल्दी हर गंभीर बीमारी की रोकथाम में कारगर है और इस तरह की बीमारियों को जड़ से खत्म करने के लिए ‘कंसन्ट्रेट करक्यूमिन’ की खुराक पर हो रहे शोधों के बाद चिकित्सकों की राय से अच्छी तरह अमल में लाया जा सकेगा। ” यह पूछने पर कि आपके पास भी कैंसर के मरीज आते हैं और ऐसे मरीजों का आप कैसे उपचार करते हैं, प्रोफेसर वली ने कहा“ हां ,आज ही मेरे पास आंत में कैंसर का एक मरीज आया था और हमने उसे इस तरह की बीमारियों के इलाज करने वाले वैद्य के पास भेज दिया ताकि उसे उचित मार्गदर्शन और इलाज मिल सके। कैंसर के तीसरे अथवा चौथे स्टेज में पता लगने पर इलाज मुश्किल होता है लेकिन हां, इतना जरूर कह सकते हैं कि आयुर्वेद से जुड़े इलाज से कैंसर के रोगी को दर्दनाक मौत नहीं मिलती है और उसकी उम्र भी अपेक्षाकृत अधिक होती है। यह कहा जा सकता है कि प्रकृति से जुड़कर और दादा-दादी की जीवन शैली को अपनाकर गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। हमारी अच्छाइयों को विदेशी अपना रहे हैं और हम उनकी बुरी आदतों की नकल करके स्वयं पर इठलाते हैं। सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करने की हमारी परम्परा रही है लेकिन अमेरिका में कई स्थानों पर लोग सूरज ढ़लने के बाद भोजन नहीं ग्रहण करते और होटल, रेस्तरा आदि भी बंद हो जाते हैं। जितना हम आयुर्वेदिक दवाओं का उपायोग करते हैं उससे 50 प्रतिशत अधिक दवाओं का हम निर्यात करते हैं।” उन्होंने कहा“ हमारे यहां आयुष मंत्रालय का गठन एक अच्छी पहल है। सरकार को गिलोए, मुलेठी, दालचीनी, कलौंजी ,अर्जुन की छाल, मेथी आदि “रत्नों ”का पेटेंट कराना चाहिए। औषधीय वृक्ष अर्जुन की छाल तो दिल की बाइपास सर्जरी तक कर सकती है। आयुर्वेद ने तो सदियों पहले इसे हृदय रोग की महान औषधि घोषित कर दिया था। आयुर्वेद के प्राचीन विद्वानों में वाग्भट, चक्रदत्त और भावमिश्र ने इसे हृदय रोग की महौषधि स्वीकार किया है। यह पूछने पर कि निरोगी बने रहने के लिए प्रतिदिन हल्दी कितनी मात्रा में लेनी चाहिए, प्रोफेसर वली ने कहा कि रोज के खाने में पांच ग्राम हल्दी आवश्यक है। दूध में उबालकर लेने से इसका बेहतर नतीजा मिलता है। उन्होंने यह भी कहा कि कच्ची हल्दी का रस त्वचा पर लगाने और उसका सेवन करने से सोरायसिस की बीमारी में भी बहुत लाभ मिलता है। इस बीमारी से परेशान लोगों को अपने चिकित्सकों से संपर्क करके यह तय करना चाहिए की हल्दी का उपयोग वे किस तरह करें।
तीन राष्ट्रपतियों के निजी चिकित्सक बनने वाले पहले डॉक्टर ने कहा कि हल्दी प्राकृतिक एंटीबायोटिक है। इसलिए यह पेट और त्वचा संबंधी बीमारियों को जड़ से खत्म करती है। इसके सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है और बीमार होने की संभावना कम हो जाती है। यह ऊर्जा देने के साथ खून को साफ रखती है। इसमें छिपे गुण सेहत और सौंदर्य दोनों के लिए लाभदायक हैं। प्रोफेसर वली ने कहा “धरती पर वरदान हल्दी में बढ़ती उम्र को रोकने की अद्भुत क्षमता है। यह आपकी बढ़ती उम्र के प्रभाव का पता नहीं लगने देती है। ” पूर्व राष्ट्रपति आर वेंटकरमण के निजी चिकित्सक रहे प्रोफेसर वली ने कहा“ हमें अगर जीवन शैली से जुड़े कुछ बढ़िया जानने और पढ़ने को मिलता है तो हम कुछ समय तक इसे अमल में लाने के लिए रोमांचित रहते हैं लेकिन आंखों से ओझल हो जाने के बाद प्रेरणा शक्ति खत्म हो जाती है। ”चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2007 में पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर वली ने कहा “क्यों न महत्वपूर्ण जानकारियों को सुंदर फ्रेम में मढ़कर शयन कक्ष में जगह दें और इन्हें दैनिक जीवन में लाकर अपने जीवन को स्वस्थ्य बनाएं।” अमेरिका आैर ईरान में भी हल्दी पर नये शोध हुए हैं जिसमें करक्यूमिन को सोरायसिस की बीमारी में कारगर पाया गया है। इस संबंध में अमेरिकन एकेडमी ऑफ डरमाटोलोजी और ईरान की फार्मास्यूटीकल रिसर्च पत्रिका में शोध पत्र प्रकाशित हुआ है। इस बीच भोपाल में राजीव गांधी प्राैद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति पीयूष त्रिवेदी यूनीवार्ता को बताया कि करक्यूमिन के चिकित्सीय गुणों से प्रेरित होकर उनकी टीम कनाडा के एडवांस मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ़ एच ली की टीम के साथ मिल कर रही है। प्रोफेसर त्रिवेदी ने कहा“हमने अपने पिछले शोध में हल्दी से दो एंटीकैंसर मॉलिक्यूल ढ़ूढ़ें हैं जो बिना किसी दुष्प्रभाव के कैंसर की कोशिकाओं को तेजी से मारने में सक्षम होगें। सीटीआर -17 और सीटीआर -20 मॉलिक्यूल विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार में कारगर साबित हो सकते हैं। ” उन्होंने कहा“ हल्दी एंटीसेप्टिक और हीलिंग प्रोपट्रीज पर 12 से अधिक सालों के शोध के बाद इन दो मॉलिक्यूल की खोज हो पायी है। हमने इसका यूएस पेटेंट भी करा लिया है। हम अब एडवांस शोध कर रहे हैं। हमने 30 साल के अपने अनुभव से सिंथेटिक रूप से नये मॉलिक्यूल तैयार किये हैं। कम्प्यूटर पर काम करके मॉल्कूल की गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं कि यह कहां जाकर फिट होगा और किस तरह से काम करेगा। ”उन्होंने कहा“ हमने जो मॉलिक्यूल तैयार किए हैं वे नयाब हैं और यह किसी ‘लिटरेचर’ में मौजूद नहीं है। शोध एडवांस स्टेज में है और पूरा होने पर कैंसर के खिलाफ बेहद कारगर हथियार साबित हो सकता है। प्रोफेसर त्रिवेदी ने कहा कि कैंसर में विटामीन बी 17 बहुत कारगर है और एपरिकोट(खुबानी) के बीज में और गेहूं के जवारे में यह विटामिन अत्यधिक मात्रा में मिलता है। उन्होंने कहा “हल्दी के चिकित्सकीय गुणों के प्रति लोगों का रूझान बढ़ रहा है और बाजार में आज कल करक्यूमिन कैप्सूल के रूप में भी बिक रहा है ।” आशा आजाद उपाध्याय वार्ता

Tuesday, January 17, 2017

Cancer - Cause and Cure

   Cancer - Cause and Cure


Cancer is uncontrolled growth of abnormal cells in a part of the body. The question is what is the prime cause of cancer. Your oncologist will never tell you this. But long back, Dr Warburg proved clearly that prime cause of cancer is oxygen deficiency in the cells. Without oxygen cells get energy by fermenting glucose, and produce very little energy along with some lactic acid. He proposed that some unknown fat and sulfur containing protein is required to attract oxygen into the cells. In 1949, Dr Budwig developed a technology to identify these fats. They are electron rich Alpha-linolenic and Linoleic acids, found in flax seed oil. When Flax oil is blended with cottage these and consumed. They make healthy cell membranes and pull oxygen like a magnet into the cells. Thus energy production is restored in the cells and cancer start healing naturally.