Wednesday, October 5, 2011

Mobile causes Cancer


कर्णप्रिय से कैंसर


पहले भी ऐसी गीदड़ भभकियाँ आती रही हैं। बावजूद इनके मोबाइल धारकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। भारत की सवा अरब आबादी में से 70 करोड़ से अधिक लोगों के पास मोबाइल है। भले ही खाने को अनाज और पहनने को लंगोटी न हो, मगर हमारे आदिवासी मामा भी शान से मोबाइल पर बात करते हैं। दुनिया की आबादी 6 अरब से अधिक है और पूरी दुनिया में पाँच अरब मोबाइल धारक हैं। इस बा्र विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)ने चेतावनी दी है कि मोबाइल और बिना तार के संचार साधनों से निकलने वाली विद्युत चुंबकीय तरंगों से मस्तिष्क के कैंसर का खतरा हो सकता है। हू ने चौदह देशों के कोई 31 विशेषज्ञों की कमेटी बनाई थी, उस कमेटी ने विभिन्न अध्ययनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। वैसे हू का कहना है कि यह प्रामाणिक सत्य नहीं है, इसमें और शोध की आवश्यकता है। लेकिन हमारे मोबाइल बहादुर ऐसी चेतावनियों से डरते-वरते नहीं। आखिर मोबाइल चीज बड़ी है मस्त,मस्त। एक पैसा प्रति सेकंड में लो कर लो बात, कितना सस्ता। कईं बैचेन दिलों को करार आ जाता है। बात करते-करते तन और मन सब डोलने लगते हैं। पिया रतलाम जाए चाहे रंगून प्रेयसी की जद में रहते हैं। और क्या रखूं, ले मुन्ना से बात कर। हाँ मुन्ना क्या हाल है। क्या आवाज नहीं आ रही है। रुक अभी बंद मत करना, मैं गैलरी में आती हूँ। यहाँ सिग्नल नहीं मिल रहे। हाँ अब बोल, कब आएगा तू। चाची कैसी है। चल चाची को दे फोन। हाँ चाची कैसी हो तुम, वहाँ गर्मी कैसी पड़ रही है। अरे यहाँ तो बहुत मुश्किल हो रही है, क्या बताऊँ। और बस चलता रहता है बतरस, बढ़ता रहता है टाक टाइम, घटता जाता है बैलेंस। बैलेंस नहीं हो तो मिस काल मार दो। कुछ यार तो गजब ढाते हैं मिसेस को भी मिस काल मारते हैं। अब हू कितनी भी चेतावनी दे, भला ये मोबाइल वीर डरेंगे क्या। अरे कैंसर से डराने वाला हू आर यू। जैसे लाख चेतावनी और डरावने चित्रों के बाद भी लोगों का सिगरेट, गुटखा नहीं छूटता, वैसे ही मोबाइल अब छूटने वाला नहीं है। वैसे हू ने फोकट कमेटी बनाई और शोध किया। हमारे दीक्षितजी इस मामले में पहले से ही शिक्षित हैं। मोबाइल से दस कदम दूर रहते हैं। फिर भले ही दीक्षिताइन पर उनका बस न चले।





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