Saturday, October 8, 2011

Gazal



ग़ज़ल  

मेरी ग़ज़ल तुम्हारा हँसी गाल हो गई
उस की रदीफ़ जैसे सियह ख़ाल हो गई
फिर उन की क़ामयाब कोई चाल हो गई
सरहद की जंग जिन के लिए ढाल हो गई
सरकार जब भी देश की पामाल हो गई
सरहद पे जंग छेड़ के ख़ुशहाल हो गई
पौ बारह लोकतन्त्र में नेताओं के हुये
बेचारी जनता कैसी फटे हाल  हो गई
क़ुदरत ने तो बनाई ज़मीं एक थान में
बँट-बँट के सरहदों में ये रुमाल हो गई
कैसे करुँगा अब के भी बिटिया तुझे विदाअ
मिल में तो अब की साल भी हड़ताल हो गई
इक वक़्त था कि दाल में काले से ख़ोफ था
सारी ही काली अब तो मगर दाल हो गई
मिलता शरफ़ जो वस्ल का क्या होता जाने हाल
उस ने नज़र से ही छुआ, मैं लाल हो गई
इक बेवफ़ा पे माले-मुहब्बत लुटा दिया
मैं मालदार हो के भी कंगाल हो गई
कमसिन से अच्छा कौन है सारे जहान में
सब दोस्तों के जी का वो जंजाल हो गई


कठिन शब्द =   ख़ाल = तिल, पामाल = पद-दलित,
शरफ़ = सौभाग्य, माले-मुहब्बत = प्रेम रुपी पूँजी

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