Thursday, October 13, 2011

Diabetes - Heart Complications C.A.D.


डायबिटीज के रोगियों में हृदय रोग
मधुमेह के रोगी में हृदय रोग होना सामान्य बात है। अमरीकी हृदय संगठन के अनुसार डायबिटीज के रोगियों में दो तिहाई से तीन चौथाई मृत्यु हृदय रोगों से होती है। डायबिटीज के रोगी में यदि उच्च रक्तचाप, धूम्रपान, LDL कोलेस्ट्रोल ज्यादा होना और माता-पिता को कम उम्र में ही दिल कि बीमारी होना जैसे जोखिम घटक विद्यमान हों तो हृदय रोग होने और उससे मृत्यु होने की संभावना और बढ़ जाती है। एक अध्ययन के मुताबिक डायबिटीज के रोगी को हृदय रोग से मरने का जोखिम सामान्य व्यक्ति से 5 गुना ज्यादा होता है। हृदय रोग विशेषज्ञ कहते हैं कि डायबिटीज के रोगी में हृदय रोग के जोखिम घटकों का उपचार उतनी ही सतर्कता से करें, जितना किसी रोगी का  हृदयाघात के बाद किया जाता है।
मधुमेह में हृदय तीन प्रकार की निकृतियां हो सकती हैं।
1. कोरोनरी हृदय धमनियों में ऐथेरोस्क्लिरोसिस रोग
2. ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी जनित  समस्याएँ
3. कॉर्डियोमायोपैथी
ऐथेरोस्क्लिरोसिस हृदयाघात का मुख्य कारण है। आटोनोमिक न्यूरोपैथी होने के कारण अचानक मृत्यु का होना,  हृदय-गति का असाधारण रूप से बढ़ना, खड़े होने के पर रक्तचाप का गिरना, हृदयाघात होने पर दर्द का न होना जैसी जटिलताएं होती हैं।  कारडियोमायोपैथी होने से हृदय की पेशियां बढ़ (Hypertrophy) जाती हैं जो आगे चल कर हार्ट फेल्यर की समस्या पैदा कर देती है। हार्ट फेल्यर रोग में हृदय की पेशियां कमजोर हो जाती है जिस कारण वे शरीर में पर्याप्त रक्त प्रवाहित नहीं कर पाती है। इसके फलस्वरूप फेफड़ों में पानी का दबाव बढ़ जाता है या/और सांस लेने में तकलीफ होती है, शरीर के अन्य हिस्सों में भी पानी जमा हो जाता है जिसके कारण सूजन आ जाती है।
हृदय-धमनी रोग Coronary artery disease या अरक्तता हृदय ischemic heart disease रोग
हृदय-धमनी रोग Coronary artery disease या अरक्तता हृदय ischemic heart disease रोग में मुख्य रोगजनकता धमनियों का कड़ापन या ऐथेरोस्क्लिरोसिस (Atherosclerosis) है। ऐथेरोस्क्लिरोसिस में हृदय की धमनियों की आन्तरिक सतह में वसा, कॉलेस्टेरोल और अन्य कोशिकीय उत्सर्जी तत्वों जमाव हो जाता है, जिसके कारण धमनियाँ अवरुद्ध होने लगती हैं और हृदय को पर्याप्त रक्त नहीं पहुँच पाता है। ऐथेरोस्क्लिरोसिस की रोगजनकता में कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं जिन पर चर्चा आवश्यक है।

आजकल हृदयरोग विशेषज्ञों ने ऐक्यूट कोरोनरी सिन्ड्रोम नाम का एक नया रोग-समूह परिभाषित किया है जिसमें निम्न तीन रोगों को शामिल किया है।   
1-   एस-टी सेगमेन्ट एलीवेशन मायोकार्डियल इनफार्कशन (STEMI) - वह हृदय-रोगगलन जिसमें एस-टी सेगमेन्ट का उठाव होता है।
2-   नोन एस-टी सेगमेन्ट एलीवेशन मायोकार्डियल इनफार्कशन (NSTEMI) - इसमें एस-टी सेगमेन्ट का उठाव नहीं होता है।
3-   अस्थिर एन्जाइना (Unstable Angina)। 

हृदय-धमनी रोग या अरक्तता हृदयरोग की रोगजनकता
प्रदाह

अब तो मुख्य धारा के चिकित्सक और वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि ट्राँस फैट और रिफाइन्ड तेलों के प्रयोग और हमारे आहार में ओमेगा-3 तथा ओमेगा-6 के अनुपात में आये परिवर्तन (सामान्यतः यह यह अनुपात 1:2 होना चाहिये जो आहारशैली में आये बदलाव के कारण आजकल 1:40, 1:80 या 1:160 हो गया है) के कारण शरीर में दूसरी श्रंखला के प्रदाहक प्रोसिटाग्लेन्डिन्स (Series 2 Inflamatory Prostaglandins) बनते हैं, जो धमनियों की आँतरिक सतह को प्रदाहग्रस्त कर क्षति पहुँचाते हैं और यहीं से ऐथेरोस्क्लिरोसिस की शुरूआत होती है। कॉलेस्ट्रोल क्षतिग्रस्त धमनी की मरम्मत हेतु इसकी आँतरिक सतह पर वसा, कॉलेस्ट्रोल, बिम्बाणु और अन्य तत्वों का लेप कर देता है। 

कॉलेस्ट्रोल
ऐथेरोस्क्लिरोसिस की रोगजनकता में कॉलेस्ट्रोल और उसके वाहन लाइपोप्रोटीन अहम भूमिका निभाते हैं। कॉलेस्ट्रोल हमारे शरीर की हर कोशिका में पाया जाता है। रक्त में घुलनशील न होने के कारण यह अपने परिवहन के लिए एक विशेष प्रकार के गोल अणु लाइपोप्रोटीन को वाहन के रूप में प्रयोग करता है। लेकिन कॉलेस्ट्रोल द्वारा धमनी की आँतरिक सतह पर किया गया रक्षात्मक लेप कभी-कभी उखड़ जाता है, जिससे वहाँ थक्का बन जाता है तथा धमनी अवरुद्ध हो जाती है और हार्ट अटेक हो जाता है। इस तरह आपने देखा कि भलाई करने पर भी यह मुन्ना (कॉलेस्ट्रोल) दशकों से बदनामी की ज़िल्लत झेल रहा है। जब कि ऐथेरोस्क्लिरोसिस का असली कारण तो ट्राँसफैट और ओमेगा-3 तथा ओमेगा-6 के अनुपात का बिगड़ना है जिससे प्रदाहक (Inflamatory) प्रोसिटाग्लेन्डिन्स बनते हैं। आज मैं इसे “ट्राँसफैट सिन्ड्रोम” का नाम देता हूँ। ऐथेरोस्क्लिरोसिस तो इस ट्राँसफैट सिन्ड्रोम के कई लक्षणों में से एक लक्षण  है।  

ऑक्सीडेशन
ऐथेरोस्क्लिरोसिस की रोगजनकता (Pathogenesis) में ऑक्सीडेशन भी विशेष महत्व रखता है। ऑक्सीडेशन घातक मुक्त-कणों के आक्रमण से होने वाली एक विध्वँसक व प्रदाहक प्रक्रिया है। शरीर में बाहरी या आँतरिक स्रोत से मुक्त-कणों का आक्रमण होता रहता है जिन्हें हमारी रक्षा-प्रणाली नष्ट करती रहती है, यह क्रिया शरीर में चलती रहती है और संतुलन बना रहता है। लेकिन मुक्त-कणों में अत्यधिक वृद्धि होने पर शरीर में प्रदाहक गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं।  

धमनियों में अवरोध होना
इस तरह हृदय की धमनियाँ ऐथेरोस्क्लिरोसिस के कारण कड़ी और संकीर्ण हो जाती हैं, कालान्तर में इनका अस्थिकरण तक हो जाता है। ज्यों ज्यों धमनियों की संकीर्णता बढ़ती है, रक्त-प्रवाह कम होता है और हृदय की पेशियों को ऑक्सीजन युक्त रक्त की आपूर्ति भी कम होने लगती है। इस तरह हृदय की पेशियाँ, जो जिन्दगी भर बिना थके और बिना रुके निरन्तर कार्य करती हैं, अरक्तता ischemia के कारण कमजोर या रुग्ण होने लगती हैं। इन कड़ी और संकीर्ण धमनियों के चोट-ग्रस्त होने की संभावना भी रहती है।

अन्तिम स्थिति हृदय-रोधगलन heart attack
हृदय-अवरोधगलन निम्न दो में से एक या दोनों स्थितियों में होता है।
          धमनी पूरी तरह अवरुद्ध हो जाये और अरक्तता के कारण प्रभावित हृदय पेशियाँ मृत होने लगे।
          धमनी पर लगे लेप में दरार पड़ने या टूट जाने पर बिम्बाणु इस क्षतिग्रस्त प्लॉक plaque पर   रक्त का थक्का बना देते हैं। यदि यह थक्का धमनी को पूरी तरह अवरुद्ध कर दे तो होर्ट अटेक हो जाता है।
हृदय-धमनी रोग के जोखिम घटक
हृदय-धमनी रोग अमेरिका में मृत्यु का सबसे मुख्य कारण है। पिछले कुछ दशकों में धूम्रपान में आई कमी और आहारशैली में आये थोड़े सुधार के कारण वहाँ इसकी व्यापकता कम हुई है, जो पुनः स्थिर हो गई है (शायद लोगों में मोटापा बढ़ने के कारण)। लेकिन हमारे यहाँ गंगा उलटी बह रही है। हृदय-धमनी रोग की व्यापकता साल दर साल बढ़ती ही जा रही है।
  • उम्र – उम्र बढ़ने के साथ हृदय-धमनी रोग का जोखिम भी बढ़ता है। इससे मरने वाले 85% रोगी 65 वर्ष से बड़े होते हैं।
  • लिंग – वैसे तो इस रोग का जोखिम स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में ज्यादा होता है। परन्तु रजोनिवृत्ति के बाद यह आँकड़ा उल्टा हो जाता है। जी हाँ रजोनिवृत्ति के बाद स्त्रियों में इस रोग का जोखिम ज्यादा रहता है।
  • वंशानुगत – जिन लोगों के माता-पिता या अन्य पूर्वज रक्तचाप या हृदयरोग से पीड़ित रहे हों, उन्हें इस रोग की संभावना ज्यादा रहती है।
  • जीवनशैली संबंधी घटक-
धूम्रपान – धूम्रपान हृदयरोगों का सबसे बड़ा जोखिम घटक है। धूम्रपान से रक्तचाप व एल.डी.एल. कॉलेस्ट्रोल बढ़ता है, बिंबाणुओं का चिपचिपापन बढ़ता है और धमनियों में थक्का बनने की संभावना बढ़ती है। हृदयरोग से मरने वाले रोगियों में से 20% रोगी धूम्रपान करते हैं। कम धूम्रपान करने या परोक्ष धूम्रपान करने वालों (धूम्रपान करने वालों के सानिध्य में रहने वाले लोगों) को भी इस रोग का जोखिम काफी रहता है। 
मदिरापान – आहारशास्त्री कहते हैं कि सिमित मात्रा में मदिरा लेना (सप्ताह में दो-चार बार 140 एम.एल. रेड वाइन या 340 एम.एल. बियर या 40 एम.एल. हार्ड ड्रिंक) तो हितकारी है और अच्छे एच.डी.एल. कॉलेस्ट्रोल को भी बढ़ाती है। परन्तु इससे ज्यादा मात्रा में मदिरा सेवन करना हृदय के लिए घातक सिद्ध होता है। 
आहार -  अधिक नमक और खराब कॉलेस्ट्रोल युक्त आहार (तले हुए व्यंजन, फास्ट फूड, जंक फूड, कचौड़ियाँ, समोसे, छोले-भटूरे आदि) हृदयरोगों को दावत देता है।
शारीरिक निष्क्रियता - व्यायाम और शारीरिक सक्रियता हृदय के लिए लाभप्रद है, मोटापे से बचाती है और खराब कॉलेस्ट्रोल को कम करती है। निष्क्रिय जीवन जीने वाले लोगों में हृदय-धमनी रोग होने का जोखिम दोगुना होता है।
स्थूलता और चयापचय सिन्ड्रोम (Metabolic Syndrome)
उदर क्षेत्र में वसा का जमाव हृदयरोग का जोखिम बढ़ाता है। साथ में स्थूलता रक्तचाप और डायबिटीज का जोखिम भी बढ़ाती है। चयापचय सिन्ड्रोम डायबिटीज होने के पहले का एक बहुआयामी रोग-समूह है जिसमें सामान्यतः निम्न लक्षण हो सकते हैं। 1- सेबाकार स्थूलता 2- एच.डी.एल. कॉलेस्ट्रोल कम होना 3- ट्राइग्लीसराइड व एल.डी.एल. कॉलेस्ट्रोल ज्यादा होना 4- उच्च रक्तचाप 5- इन्सुलिन प्रतिशोध। यह हृदय-धमनी रोग की जोखिम भी बढ़ाता है।  
कॉलेस्ट्रोल और लाइपोप्रोटीन्स की विकृतियाँ
एल.डी.एल. कॉलेस्ट्रोल और ट्राइग्लीसराइड हृदय के लिए खलनायक हैं और हृदय-धमनी रोग का जोखिम बढ़ाते हैं तो दूसरी ओर एच.डी.एल. कॉलेस्ट्रोल हृदय को हृदय-धमनी रोग से सुरक्षा देकर नायक की भूमिका निभाते हैं। सामान्यतः रक्त में लिपिड-प्रोफाइल की जाँच की जाती है जिसमें कॉलेस्ट्रोल, LDL, HDL और ट्राइग्लीसराइड आदि सभी टेस्ट शामिल हैं। LDL और  HDL के अनुपात से हृदयरोग के जोखिम का निर्धारण किया जाता है।
उच्च रक्तचाप और मधुमेह
उच्च रक्तचाप हृदय-धमनी रोग का प्रमुख कारण माना जाता है। मधुमेह में यदि रक्त-शर्करा नियंत्रित न रखी जाये तो उच्च रक्तचाप, कॉलेस्ट्रोल विकृतियाँ, नाड़ी-रोग आदि का जोखिम बढ़ता है और ये सब मिल कर हृदय-धमनी रोग की संभावना बढ़ा देते हैं।
परिधीय धमनी रोग
यदि हाथ-पैरों की धमनियाँ ऐथेरोस्क्लिरोसिस से प्रभावित हो जाये तो परिधीय धमनी-रोग हो जाता है। चूँकि हृदय-धमनी रोग और परिधीय धमनी-रोग के जोखिम घटक एक ही हैं, इसलिए जो परिधीय धमनी रोग से ग्रसित होते हैं उन्हें हृदय-धमनी रोग की संभावना रहती ही है।
अवसाद
अवसाद भी हृदय-धमनी रोग का जोखिम घटक है। कई शोधकर्ता मानते हैं कि अवसाद हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। 
होमोसिस्टीन और विटामिन बी की कमी

शरीर में फोलेट, विटामिन बी-6 और बी-12 की कमी होने पर रक्त में होमोसिस्टीन नामक अमाइनो एसिड का स्तर बढ़ जाता है। विटामिन बी की कमी होने पर हृदय-धमनी रोग का जोखिम बढ़ जाता है। होमोसिस्टीन का स्तर हृदय-धमनी रोग में मार्कर का कार्य करता है।

सी-रिएक्टिव प्रोटीन
सी-रिएक्टिव प्रोटीन बढ़ने का मतलब है कि शरीर में प्रदाह की उपस्थिति, जिलका मतलब है कि भविष्य में हृदय-धमनीरोग होने की संभावना ज्यादा है। 
क्लेमाइडिया निमोनिया और साइटोमेगालो विषाणु
कई बार हृदय-धमनी में बने ऐथेरोस्क्लिरोसिस प्लॉक में उपरोक्त जीवाणु पाये गये जिससे यह सन्देह जताया जा रहा है कि इन जीवाणुओं के संक्रमण से भी हृदय-धमनीरोग हो सकता है।

स्थिर एन्जाइना या Stable Angina (Angina Pectoris)

एन्जाइना लेटिन शब्द angere यानी दम घुटना और pectoral यानी छाती से बना है। ज्यादातर यह रोग 30 साल की उम्र से ऊपर के व्यक्तियों को होते हैं।
अस्थिर ऐन्जाइना (Unstable Angina) एक गम्भीर रोग है, यह एक प्रकार से स्थिर ऐन्जाइना और हार्ट अटेक के बीच की स्थिति है। इसमें दर्द विश्राम की अवस्था में भी होता है। कभी-कभी रोगी दर्द के कारण अचानक नींद से जग जाता है। यदि रोगी दर्द से मूर्छित हो जाये, किसी को हल्के से परीश्रम जैसे थोड़ी सी सीढ़ियाँ चढ़ने से ही दर्द हो जाये या दो महीने के अन्तराल में छाती में दर्द के दौरे जल्दी-जल्दी पड़ने लगे और दवाइयाँ का असर भी कम होने लगे तो समझ लीजिये कि आपको स्थिर ऐन्जाइना हो गया है।
लक्षण
         एन्जाइना रोग के होने से पहले रोगी को अपनी छाती के मध्य या बाँई तरफ दबाव, भारीपन, जकड़न, जलन या घुटन की अनुभूति, सांस लेने में परेशानी और बैचेनी जैसे लक्षण प्रकट होते हैं और उसके बाद दर्द शुरू हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसे दिल का दौरा पड़ने वाला है। दर्द पेट के ऊपरी भाग, गर्दन, जबड़े  या कंधे में भी अनुभव किया जा सकता है। यह दर्द सामान्यतः एक या दो मिनट रहता है परन्तु 10-15 मिनट भी रह सकता है। यह दर्द जीभ के नीचे हृदय-धमनी विस्तारक (आइसोर्डिल) की गोली रखने से मिट जाता है।
         एन्जाइना रोग ज्यादा शारीरिक, मानसिक श्रम, भय, घबराहट, अधिक सर्दी लगने अथवा आवश्यकता से अधिक भोजन को खा लेने के कारण हो जाता है। ज्यादा धूम्रपान करने से या  उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) रोग के कारण भी एन्जाइमा का रोग हो सकता है।
         एन्जाइना हृदय की पेशियों में रक्त की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने के कारण होता है। जब आप कोई श्रम करते हैं तो हृदय को अधिक रक्त पंप करना पड़ता है इसलिए उसे रक्त की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। ऐथेरोस्क्लिरोसिस के कारण हृदय-धमनियाँ संकरी और कड़ी हो जाती हैं और हृदय को पर्याप्त रक्त प्रवाहित नहीं कर पाती हैं और हृदय अपनी यह व्यथा दर्द के रूप में हमारे सामने रखता है।   
         एन्जाइना का दर्द हमें चेतावनी है कि हृदय-धमनी रोग का आगमन अपेक्षित है। दिल का दौरा भी कभी पड़ सकता है। हमें अभी से सतर्कता बरतना, जीवन शैली में सुधार लाना और समुचित उपचार करना जरूरी है। एन्जाइना को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिये।  
निदान 
इसके निदान के लिए कोई विशेष परीक्षण नहीं हैं। ई.सी.जी. भी सामान्य रहती है, पर बाद में अरक्तता के कुछ संकेत मिल सकते हैं। लिपिड और थायरोइड के टेस्ट करवाने चाहिये। ट्रेड मिल, थेलियम स्केन और एन्जियोग्राफी से कोरोनरी-धमनियों की स्थिति का जायजा हो जाता है।
उपचार
नाइट्रेट्स
जब एन्जाइना का दौरा पड़े तो तुरन्त विश्राम करना चाहिये और हृदय-धमनी विस्तारक (आइसोर्डिल) की गोली रख लेना चाहिये। इससे दर्द मिट जाता है। एन्जाइना के रोगी को आइसोर्डिल की गोली हमेशा अपने साथ रखना चाहिये। नाइट्रोग्लीसरीन हृदय की धमनियों को फैलाते हैं, जिससे हृदय को ज्यादा रक्त मिलता है। आजकल इसके स्प्रे और त्वचा पर चिपकाने हेतु चकत्ते भी मिलते हैं। दीर्घकालीन नाइट्रोग्लीसरीन नियमित देने से एन्जाइना के दौरे कम पड़ते हैं।

बीटाब्लॉकर
बीटाब्लॉकर हृदयगति और रक्तचाप कम करते हैं ताकि हृदय की पेशियों में रक्त की माँग कम हो अतः एन्जाइना के लक्षणों में राहत देते हैं। अनुसंधानों से यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि ये हमें हार्ट-अटेक और अचानक मृत्यु  से बचाते हैं।
केल्शियम चेनल ब्लॉकर (सी.सी.बी.) हृदय की पेशियों और रक्त-वाहिकाओं में केल्शियम के प्रवेश-द्वार को अवरुद्ध करते हैं, हृदय-धमनी विस्तारक हैं,  हृदय में रक्त की आवक बढ़ाते हैं,  रक्तचाप और हृदय गति कम करते हैं। इस तरह हृदय को कम कार्य करना पड़ता है और इस तरह एन्जाइना का दर्द दूर करती है।  

कैलशियम चेनल ब्लॉकर CCBs

कैलशियम चेनल ब्लॉकर हृदय और रक्त-वाहिकाओं की स्निग्ध पेशी-कोशिकाओं में स्थित कैलशियम चेनल्स में केलशियम की आवाजाही को बाधित करते हैं। जिससे कोशिकाओं में कैलशियम की मात्रा कम हो जाती है अतः हृदय की पेशियों की आकुंचन-शक्ति (cardiac contractility) भी कम हो जाती है और रक्त-वाहिकाओं का विस्तारण (vasodilation) होता है। फलस्वरूप रक्तचाप कम होता है। यह कैलशियम चेनल ब्लॉकर का नेगेटिव आइनोट्रोपिक प्रभाव है। इसलिए इन्हें कार्डियोमायोपैथी के रोगियों को नहीं देना चाहिए। कुछ CCBs हृदय में विद्युत प्रवाह को भी बाधित करते हैं जिसके फलस्वरूप हृदयगति कम होती है। यह CCBs का नेगेटिव क्रोनोट्रोपिक (हृदयगति कम करना) प्रभाव है, इस कारण इनका प्रयोग एट्रीयल फिब्रिलेशन और फ्लटर में किया जाता है। चूंकि CCBs रक्तचाप कम करते हैं, कई बार बेरोरिसेप्टर रिफ्लेक्स के कारण रक्तचाप और हृदयगति बढ़ जाती है, जिसे प्रभावशून्य करने के लिए साथ में बीटाब्लॉकर भी दिये जाते है।
रक्तचाप और हृदयगति कम होने से हृदय की ऑक्सिजन की जरूरत कम होती है अतः हृदय पर कार्य का दबाव कम होता है, इसलिए ये एन्जाइना में दिये जाते हैं। मुख्य रूप से एमलोडिपिन (डाईहाइड्रोपाइरिडिन), डिलटिएजाम और वेरापेमिल प्रयोग किये जाते हैं।  
ए.सी.ई. इन्हिबीटर्स
ए.सी.ई. इन्हिबीटर्स धमनियों का विस्तारण करते हैं और हृदय के रक्त की आवक बढ़ाते हैं। डायबिटीज और कमजोर हृदय के लिए बहुत उपयुक्त हैं। 
आइवाब्रेडीन
यदि बीटाब्लॉकर देने में कोई विवशता हो और हृदयगति भी ज्यादा हो तो आजकल नई दवा आइवाब्रेडीन (5 mg सुबह शाम) दी जाती है।

रेनोजेलीन

यदि एन्जाइना के दर्द में नाइट्रेट, बीटाब्लॉकर, ACE  इन्हिबिटर्स और CCBs आदि काम न कर पायें तो रेनोजेलीन दी जाती है। यह हृदय-कोशिका में लेट सोडियम करेन्ट को अवरुद्ध करता है, जिससे सोडियम पर निर्भर केलशियम चेनल को प्रभावित करता है। इस तरह यह परोक्ष तरीके से केलशियम ओवरलोड से बचाता है।  अन्य दवाईयों के विपरीत यह रक्तचाप और हृदयगति को प्रभावित नहीं करती है। इसे अक्सर नाइट्रेट या बीटाब्लॉकर्स के साथ दिया जाता है। इसकी मात्रा 500-1000 मि.ग्रा. प्रतिदिन है।
निकोरान्डिल
निकोरान्डिल हृदय और धमनियों में पोटेशियम-चेनल्स को खोलता है, जिससे पेशियों का विस्तारण होता है और परिधीय वाहिकीय प्रतिशोध कम होता है फलस्वरूप हृदय आसानी से रक्त पंप करता है। यह हृदय की धमनियों का भी विस्तारण करता है, जिससे हृदय को ज्यादा रक्त (यानी ज्यादा ऑक्सीजन) मिलता है। यह शिराओं का भी विस्तारण करता है, जिससे हृदय को रक्त कम पहुँचता है।  इस तरह यह एन्जाइना में बहुत लाभदायक है।
एस्पिरिन
एस्पिरिन और कॉलेस्ट्रोल कम करने की दवाइयाँ भी दी जानी चाहिये।

कोरोनरी-धमनी रोग में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख औषधियाँ
दवा का नाम
व्यवसाइक नाम
वर्जना
पार्श्र्वप्रभाव
मात्रा
एमलोडिपीन
(डाइहाइड्रोपाइरिडीन सी.सी.बी.)
Amlovas, Amlokind, Amlodac, Amlogard, Amlong, Amlopress
स्तनपान, अस्थिर हृद्शूल, हृदयजनित आघात, एओर्टिक स्टिनोसिस
पैरों में सूजन, थकावट, चक्कर, क्षिप्र-हृदयता, सरदर्द, अपच, पेट-दर्द,  मितली, पुरुषों में असाधारण स्तनवृद्धि, पुरुषहीनता, अवसाद, अनिद्रा, क्षिप्र-हृदयता (Tachycardia)
Adults : 5 mg once daily
Maximum : 10 mg daily.
डिलटियाजेम (नोन-डाइहाइड्रोपाइरिडीन सी.सी.बी.)
Angizem 30/60, Angizem-CD 90/120/180, Dicard (30/ 60/SR-90), Dilcontin-XL 90/120/180
चिरकारी हृदपात (CHF), COPD,  निम्न रक्तचाप, दृदरोध (Heart Block), हृदमंदता (Bradycardia) 
निम्न रक्तचाप, हृदमंदता, चक्कर,  चेहरे पर तमतमाहट
Adults: Initially 30mg, 2-5 times daily before meals & at bed time.  Increase gradually to maximum of  240 mg in 3-4 divided doses daily. Sustained release: 60-120 mg twice daily.
वेरापेमिल
Calaptin 40/80/SR120/SR240/Amp 2.5/2ml
निम्न रक्तचाप, हृदयजनित आघात, दूसरे या तीसरे दर्जे का AV दृदरोध (Second- or third-degree AV Heart Block), एट्रियल फ्लटर और फिब्रिलेशन, बायें निलय की दुष्क्रियता, अतिसंवेदनशीलता
एडीमा, जुखाम, एन्जियोएडीमा
सरदर्द, चेहरे पर तमतमाहट, चक्कर, सूजन, अतिमूत्रता, थकावट, मितली, कब्जी, त्वचा में लाल चकत्ते
Oral: 40-80 mg 3-4 times daily (Max 480 mg/day)
ग्लीसराइल
ट्राइनाइट्रेट
Angised 0.5 mg, Nitrocontin CR 2.6/6.4, Nitroderm TTS 5/10 mg, Nitroject 5mg/ml 5/10 ml Inj
हृदयजनित आघात, निम्न रक्तचाप, नाइट्रेट का सेवन कर रहे रोगी कभी  सिलडेनाफिल (वियाग्रा) आदि नहीं लें
सर में हल्कापन या चक्कर, सरदर्द, थकावट, क्षिप्र-हृदयता, चेहरे पर तमतमाहट,
Acute attack 0.5 mg every 3 min till pain subsides, SR/CR 2.5-6.5 mg 8-12 hours
आइसोसोर्बाइड-5-मोनोनाइट्रेट
Monotrate 10/20/40/50 mg, Monotrate-OD 25/50 mg, Monocontin CR 25/50 mg, ISMO 10/20 mg, ISMO Retard 40 mg
निम्न रक्तचाप, हृदयजनित आघात,
चेहरे पर तमतमाहट, सरदर्द, क्षिप्र-हृदयता, चक्कर, त्वचा में चकत्ते, पसीना आना 
10-20 mg  दिन में दो बार, SR Tab 40 mg once a day
आइसोसोर्बाइडडाईनाइट्रेट
Isordil 5 mg SL-Tab/10 mg Tab, Sorbitrate 5/10 mg
अतिसंवेदनशीलता, हृदय-रोगगलन संग हृदयजनित आघात
चेहरे पर तमतमाहट, सरदर्द, क्षिप्र-हृदयता, चक्कर, त्वचा में चकत्ते, पसीना आना, कमजोरी
तुरन्त लाभ हेतु 5-10 mg जीभ के नीचे, बाद में 5-10 mg 3-4 बार  दिन में, SR Tab 40-80 mg /day
निकोरान्डिल
(पोटेशियम चेनल उत्प्रेरक)
Korandil 5/10 mg, Nikoran 5/10 mg Tab/10/20 SR-Tab/2/48 mg Vial
हृदयजनित आघात, निम्न रक्तचाप, स्तनपान, बायें निलय की दुष्क्रियता, अतिसंवेदनशीलता
 सरदर्द, चक्कर, मितली, वमन, चेहरे पर तमतमाहट, कमजोरी, गुदा से रक्तस्राव, निम्न रक्तचाप, क्षिप्र-हृदयता (Tachycardia), यकृत-वात, मुँह में छाले
5-20 mg प्रति दिन दो मात्राओं में विभाजित करलें। अधिकतम 30 mg प्रतिदिन
रेनोजेलीन
Renexa XR Tab 500/1000 mg
यह ई.सी.जी. में QT अवधि को बढ़ता है इसलिए इसे  यकृत-रोग में नहीं देते हैं, क्योंकि यह भी QT अवधि बढ़ाता है।
कब्जी, चक्कर, सरदर्द, मितली, एलर्जी (खुजली, श्वास-कष्ट, आवाज में भारीपन, मुँह, होंठ, जीभ में सूजन या चकत्ते), मूत्र में रक्त, दृष्टि में धुँधलापन, छाती में दर्द, बुखार, अनियमित नब्ज, सूजन, गले में खारिश, अस्तव्यस्तता, त्वचा में जलन, सुन्नता या सिरहन
500/1000 mg दिन में दो बार

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