Saturday, October 8, 2011

Poem Kamsin

                                                  कविता

लिया झपट
मेरी अस्मिता को कपोत
मेरी आत्मशक्ति को
निचोड़ चुका है
अंतिम सीमा तक कोई
अपने स्वामित्व के जाल में
फाँस लीं
मेरे ममत्व की मछलियाँ
मेरे हर मन्तव्य के
अर्थ के
अनर्थों की बमबारी से
कर दिया भस्मीभूत
मेरी भावनाओं का हिरोशिमा
और अब
न जाने किस प्रपंच में
पूछ रहे हैं मुझ से
चीख़-चीख़ कर
क्या हो गया है तुम्हें
जानना चाहते हैं मुझ से आहिस्ता-आहिस्ता........
कैसे बदल गई मैं इतना ?
...... क्या हो गया है मुझे?

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