Sunday, September 4, 2011

Stroke


मस्तिष्क - शरीर का सरकिट बोर्ड
  • मस्तिष्क की औसत चौड़ाई = 140 मि.मि./5.5 इंच, लम्बाई = 167 मि.मि./6.5 इंच, ऊंचाई = 93 मि.मि./3.6 इंच और भार 1300-1400 ग्राम होता है।
  • मस्तिष्क के आधे न्यूरोन्स सेरीबेलम में होते हैं जब कि आकार में वह मस्तिष्क के दसवें हिस्से के बराबर होता है। 
  • मस्तिष्क का 85% हिस्सा सेरीब्रल कॉर्टेक्स होता है।
  • ब्रह्माण्ड में 100 बिलियन सितारे होते हैं और इतने ही मस्तिष्क में न्यूरोन होते हैं।
  • सेरीब्रल कॉर्टेक्स के विभिन्न उपांगों का प्रतिशत - फ्रन्टल लोब 41%, टेम्पोरल लोब 22%, पेराइटल लोब 19% और ओसिपिटल लोब 18% होता है।
  • मस्तिष्क के बांये गोलार्ध में 18.6 करोड़ न्यूरोन अधिक होते हैं, इसे प्रमुख गोलार्ध (Dominant Hemisphere) कहते हैं।
  • मस्तिष्क में 750-1000 मि.ली. रक्त प्रति मिनट प्रवाहित होता है, जिससे उसे 46 cm3 ऑक्सीजन प्राप्त होती है।  इस ऑक्सीजन का  6% सफेद-द्रव्य (White Matter) को और शेष स्लेटी-द्रव्य (Grey Matter) को मिलता है।   
  • मस्तिष्क ऑक्सीजन के बिना 4 से 6 मिनट जीवित रह सकता है, उसके बाद इसकी कोशिकायें मरने लगती हैं।
  • न्यूरोन्स में सूचनाओं के प्रवाह की न्यूनतम गति 416 कि.मी. प्रति घन्टा है जो विश्व की सबसे तेज सुपर कार से भी अधिक है।
  • मस्तिष्क को रक्त मिलना बंद हो जाये तो 10 सेकण्ड में व्यक्ति बेहोश हो जाता है।
  • मस्तिष्क का भार शरीर का मात्र 2% होता है लेकिन यह शरीर की 20% ऊर्जा ग्रहण करता है। इस ऊर्जा से 25 वाट का बल्ब जल सकता है।
  • मस्तिष्क में 70,000 विचार प्रतिदिन आते हैं।
  • तीस वर्ष के बाद मस्तिष्क हर साल 0.25% सिकुड़ जाता है।
  • मस्तिष्क में जितने विद्युत संदेश एक दिन में पैदा होते हैं उतने दुनिया भर के टेलीफोन भी नहीं करते हैं।
क्या होता है स्ट्रोक या दौरा या ब्रेन अटेक?
मस्तिष्क और नाड़ियों  को जीवित और सक्रिय रहने के लिए भरपूर ऑक्सीजन और पौषक तत्वों की निरंतर आवश्यकता रहती है जो रक्त द्वारा प्राप्त होते हैं। मस्तिष्क और नाड़ी-तंत्र के सभी हिस्सों में विभिन्न रक्त-वाहिकाऐं निरंतर रक्त पहुँचाती है। जब भी इनमें से कोई रक्त-वाहिका क्षतिग्रस्थ या अवरुद्ध हो जाती है तो मस्तिष्क के कुछ हिस्से को रक्त मिलना बन्द हो जाता है। यदि मस्तिष्क के किसी हिस्से को 3-4 मिनट से ज्यादा रक्त की आपूर्ति बन्द हो जाये तो मस्तिष्क का वह भाग ऑक्सीजन व पौषक तत्वों के अभाव में नष्ट होने लगता है,  इसे ही स्ट्रोक या दौरा कहते हैं।  
सबसे अच्छी बात यह है कि चिकित्सा-विज्ञान ने इस रोग के उपचार में बहुत तरक्की कर ली है और आज हमारे न्यूरोलोजिस्ट पूरा ताम-झाम लेकर बैठे हैं और उनके पिटारे में इस रोग के बचाव और उपचार के लिए क्या कुछ नहीं है। इसीलिए पिछले कई वर्षों में स्ट्रोक से मरने वाले रोगियों का प्रतिशत बहुत कम हुआ है।  बस यह जरुरी है कि रोगी बिना व्यर्थ समय गंवाये तुरन्त अच्छे चिकित्सा-कैंन्द्र पहुँचे ताकि उसका उपचार जितना जल्दी संभव हो सके शुरू हो सके। समय पर उपचार शुरू हो जाने से मस्तिष्क में होने वाली क्षति और दुष्प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है। 
स्ट्रोक की व्यापकता
  • विश्व में हर 45 सेकन्ड में किसी न किसी को स्ट्रोक हो जाता है (एक वर्ष में 700,000)।
  • विश्व में हर तीन मिनट में स्ट्रोक का एक रोगी परलोक सिधार जाता है।
  • स्ट्रोक हृदयरोग और कैंसर के बाद मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण है।
  • हमारे देश में 60 वर्ष से ऊपर की उम्र के लोगों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक है।
  • 15 से 59 आयुवर्ग में मृत्यु का पांचवां सबसे बड़ा कारण है।
  • स्ट्रोक दीर्घकालीन विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है।
  • मधुमेह के रोगियों में स्ट्रोक का जोखिम 2-3 गुना अधिक रहता है।
  • उच्त-रक्तचाप के 30-50% रोगियों को स्ट्रोक का जोखिम रहता है।  
  • हर छठे व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी स्ट्रोक होता है।
  • हर साल 29 अक्टूबर को स्ट्रोक जागरूकता दिवस मनाया जाता है।
  • नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्युरोलोजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक NINDS द्वारा करवाए गए एक पांच सालाना अध्ययन से पता चला है जिन लोगों को स्ट्रोक शुरू होने के तीन घंटे के भीतर टीपीए दवा का इन्जेक्शन दे दिया जाता है, उनमें स्ट्रोक से पैदा हुई खराबी के ठीक होने की संभावना 30% और बढ़ जाती है तथा तीन महीने बाद इनमें नाम मात्र की अक्षमता ही शेष रह जाती है और अक्सर लक्षण पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं ।
FAST यह फास्ट किस बला का नाम है?
FAST या एफ.ए.एस.टी. स्ट्रोक के प्रमुख लक्षणों को तुरन्त पहचानने और बिना समय गंवाये रोगी को अस्पताल ले  जाने और जागरुकता लाने का स्मृतिसूत्र (Mnemonic) है। ताकि रोगी का समय पर उपचार शुरू हो सके और उसकी जान बचाई जा सके। इसे इंगलैन्ड के स्ट्रोक विशेषज्ञों ने 1998 में विकसित किया था। आप इसे याद रखें और दूसरे लोगों को भी बतलायें।
यहाँ  FAST का मतलब है।
 
F =
Facial weakness
रोगी हँसे तो एक तरफ का चेहरा, होंठ या आँख लटक जांये,
A =
Arm weakness
रोगी को दोनों हाथ उठा कर सामने फैलाने को कहा जाये तो एक हाथ ठीक से उठ न पाये और अगर उठ भी जाये तो वापस नीचे झुक जाये,
S =
Speech difficulty
रोगी की आवाज लड़खड़ाये, वह  छोटे-छोटे वाक्य भी न बोल पाये और समझ में नहीं आये कि वह क्या कह रहा है।                                      
T =
Time to act
ऐसी स्थिति में रोगी को तुरन्त अच्छे अस्पताल ले जाइये ताकि 3 घन्टे के भीतर उसे टिश्यु प्लाज्मिनोजन एक्टिवेटर का इन्जेक्शन लग जाये और उसकी जान बचाई जा सके।

कारण
स्ट्रोक में  मस्तिष्क का कुछ हिस्सा रक्त-प्रवाह बाधित होने के कारण मृत होने लगता है। मुख्यतः स्ट्रोक दो प्रकार का होता है।  पहला है अरक्तता या इस्केमिक स्ट्रोक जो सबसे आम है और किसी धमनी के अवरुद्ध होने की वजह से होता है। दूसरा है  रक्तस्राव दौरा या हेमोरेजिक स्ट्रोक जो किसी रक्त-वाहिका के फटने या रिसाव होने पर होता है। एक तीसरे प्रकार का छोटा और अस्थाई दौरा भी होता है जिसे क्षणिक-अरक्तता दौरा या Transient Ischemic Attack (TIA) कहते हैं, इसमें मस्तिष्क का रक्त-प्रवाह थोड़ी देर के लिए बाधित होता है।
1- अरक्तता दौरा या इस्केमिक स्ट्रोक –
80-85 प्रतिशत स्ट्रोक इस्केमिक स्ट्रोक ही होते हैं।  यह मस्तिष्क की किसी धमनी के संकीर्ण या अवरुद्ध होने के कारण होता है।  यह स्ट्रोक भी दो विकृतियों के कारण होता है।
थ्रोम्बोटिक स्ट्रोक – यह स्ट्रोक मस्तिष्क को रक्त पहुँचाने वाली कोई धमनी जैसे  केरोटिड या मस्तिष्क की कोई अन्य धमनी (सेरीब्रल, वर्ट्रिब्रोबेसीलर या कोई छोटी धमनी) में खून जम जाने या थक्का (Clot) बनने से होता है। एथेरोस्क्लिरोसिस रोग में धमनियों की भीतरी सतह पर फैट जमा हो जाता है, जिसे प्लॉक कहते हैं। थ्रोम्बोटिक स्ट्रोक इस प्लॉक पर खून का थक्का बन जाने से धमनी में आई रुकावट के कारण होता है। 
एम्बोलिक स्ट्रोक – में मस्तिष्क से दूर कहीं किसी रक्त-वाहिका में बना (अमूमन हृदय में) खून का थक्का या कोई कचरा रक्त के साथ बह कर मस्तिष्क की किसी पतली धमनी में आकर फंस जाता है और रक्त के प्रवाह में रुकावट पैदा करता है। इस तरह के थक्के को एम्बोलस कहते हैं। यह एम्बोलस प्रायः हृदय के दोनों ऊपरी कक्षों (Atria या आलिन्द) के असामान्य रूप से धड़कने  (Atrial Fibrillation) से बनता है। आलिन्दों के असामान्य और अनियमित तरीके से धड़कने (या फड़फड़ाने) से हृदय खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता है, हृदय में एकत्रित खून के थक्के बन जाते हैं जो  रक्त प्रवाह में बह कर मस्तिष्क की धमनी में जाकर फंस जाते हैं ।   
2- रक्तस्राव दौरा या हेमोरेजिक स्ट्रोक
हेमोरेजिक स्ट्रोक मस्तिष्क की किसी रक्त-वाहिका  में रक्तस्राव या रिसाव होने के कारण होता है। यह इस्केमिक स्ट्रोक से ज्यादा गंभीर रोग है। यह मुख्यतः रक्तचाप के बहुत बढ़ जाने, रक्त-वाहिका में कमजोरी से आये फुलाव (Aneurysms) या नसों की किसी जन्मजात विकृति जैसे Arteriovenous Malformation के फट जाने से होता है। हेमोरेजिक स्ट्रोक भी दो तरह के होते हैं।   
इन्ट्राक्रेनियल हेमोरेज - इस स्ट्रोक में मस्तिष्क की कोई नस फट जाती है, रक्तस्राव होता है जो आसपास फैल जाता और मस्तिष्क के ऊतकों  को क्षति पहुँचाता है।  रक्त-वाहिका में रिसाव हो जाने से आगे की मस्तिष्क कोशिकाओं को रक्त की आपूर्ति भी घट जाती है जिसके फलस्वरूप वह क्षेत्र भी क्षतिग्रस्त हो जाता है। इस स्ट्रोक का प्रमुख कारण उच्च-रक्तचाप है। कालान्तर में उच्च-रक्तचाप के कारण रक्त-वाहिकाएँ कड़ी, कमजोर और भंगुर हो जाती हैं, जो रक्तचाप के बढ़ने से फट जाती हैं।
सबअरेकनोयड हेमोरेज – इस स्ट्रोक में रक्तस्राव मस्तिष्क की सतह या सतह के समीप की किसी वाहिका में होता है और रक्त मस्तिष्क और कपाल के बीच की जगह (सबअरेकनोयड स्पेस) में एकत्रित हो जाता है। इस रक्त-स्राव के होते समय रोगी को खोपड़ी में बिजली कड़कने जैसी आवाज के साथ अचानक प्रचण्ड दर्द होता है और उसे लगता है जैसे उसका सिर फट जायेगा। यह स्ट्रोक मुख्यतः रक्त-वाहिका में जन्मजात या बाद में बने एन्युरिज्म (वाहिका का गुब्बारे की तरह कमजोर होकर फूल जाना) के फट जाने से होता है। रक्तस्राव के बाद मस्तिष्क की वाहिकाओं में आकर्ष (vasospasm) हो जाता हैं जिससे भी आसपास के मस्तिष्क ऊतक क्षतिग्रस्त होते हैं।
स्ट्रोक के जोखिम घटक
  • परिवार में किसी को स्ट्रोक या दिल का दौरा पड़ा हो या स्वयं रोगी को दिल का दौरा या TIA हुआ हो।
  • उम्र 55 वर्ष से ज्यादा हो।
  • मधुमेह - यदि आपको मधुमेह है तो निश्चित तौर पर आपको स्ट्रोक का खतरा भी काफी बढ़ जाता है। सामान्यतः जब मस्तिष्क की कोई धमनी में रुकावट आती है तो उसके आसपास की धमनियां उस अंग को रक्त पहुँचाने की कौशिश करती हैं, लेकिन डायबिटीज के रोगी में आसपास की ये धमनियां भी एथेरोस्क्लिरोसिस (धमनियों का कड़ा होना) के कारण काफी हद तक खराब हो चुकी होती हैं और रक्त की कमी से जूझते मस्तिष्क को कोई राहत देने में असमर्थ होती है। यानी डायबिटीज में स्ट्रोक से मस्तिष्क को क्षति अधिक होती है।  रक्तचाप 115/75 mm Hg से ज्यादा होना स्ट्रोक का जाखिम घटक माना गया है।
  • सिकल-सेल एनीमिया, माइग्रेन और फाइब्रोमस्कुलर डिस्पेप्सिया।
  • निष्क्रिय जीवनशैली, स्थूलता, अति-मदिरापान, धूम्रपान या परोक्ष धूम्रपान और कॉलेस्ट्रोल 200 mg/dL से अधिक होना।
  • गर्भनिरोधक गोलियाँ,  हार्मोन्स जैसे इस्ट्रोजन, नशीली दवाइयां जैसे कोकीन आदि।           
  • हृदयरोग -  हृदयपात (heart failure), संक्रमण, केरोटिड स्टिनोसिस, माइट्रल स्टिनोसिस और अनियमित हृदय अनुक्रम (abnormal heart rhythm)।    
क्षणिक अरक्तता दौरा या Transient ischemic attack (TIA)

इसमें रोगी को लक्षण तो स्ट्रोक जैसे ही होते हैं, जो थोड़ी ही देर (प्रायः 24 घन्टे से कम) रहते हैं
टी.आई.ए. होने के पाँच साल के अन्दर 35% लोगों  को पूर्ण स्ट्रोक होने की संभावना रहती है, जिनमें से 50% को तो पहले महीने में ही स्ट्रोक हो जाता है। सच्चाई यह है कि टी.आइ.ए. हमे चेतावनी देता है और कहता है – मानव अभी भी समय है सतर्क हो जाइये। जाँच करवा कर बचाव की दिशा में चलिये।
प्रारंभिक लक्षण

दौरा पड़ने का समय ध्यान रखें क्योकि उपचार करते समय कई निर्णय इसी पर निर्भर करेंगे। स्ट्रोक या दौरे के निम्न लक्षण होते हैं।
चलने में दिक्कत होने लगे – यदि रोगी अचानक लड़खड़ाने लगे या चक्कर आ जाये, शरीर का संतुलन और सामंजस्य बिगड़ने लगे यो समझ लीजिये उसे दौरा पड़ा है।
बात करने और समझने में परेशानी होने लगे – रोगी भ्रमित और अस्तव्यस्त लगता है, वह धीरे, अस्पष्ट तथा  लड़खाकर मुश्किल से बोल पाता है, अपनी तकलीफ बतलाने के लिए उसे सही शब्द याद नहीं आ पाते हैं। हम समझ नहीं पाते हैं कि वह क्या कहना चाहता है।    
चेहरे या शरीर में एक तरफ पक्षाघात (लकवा) या सुन्नता – रोगी के शरीर में एक तरफ अचानक कमजोरी, सुन्नता या लकवा हो जाता है। यदि रोगी अपने दोनों हाथ सीधे फैलाने की कौशिश करता है तो एक हाथ नीचे झुक जाता है। मुँह की मांस-पेशिया कमजोर होने से होंठ एक तरफ लटक जाते हैं और मुँह से लार टपकने लगती है। 
एक या दोनों आँखों से देखने में कठिनाई हो – रोगी को एक या दोनों आँखों से धुँधला दिखाई देने लगे, हर चीज दो दो दिखाई दे या आँखों के आगे अंधेरा छा जाये। 
तेज सिर दर्द – रोगी को उलटी या चक्कर के साथ इतना तेज सिर दर्द हो कि उसे लगे जैसे उसका सिर फट जायेगा। रोगी कहे कि उसे ऐसा सिर दर्द जीवन में कभी नहीं हुआ।
स्ट्रोक के प्रकार
मिडिल सेरीब्रल-आर्ट्री स्ट्रोक या MCA Stroke
MCA में रुकावट आने से मस्तिष्क में जिस तरफ क्षति हुई है उसके विपरीत या उलटी तरफ शरीर की माँस-पेशियों  में कमजोरी, लकवा और संवेदना विकार होता है। तथा  साथ ही जिस तरफ क्षति हुई है उस तरफ अर्ध-दृष्टिदोष (hemianopsia) आ जाता है अर्थात उस तरफ अंधापन  आ जाता है तथा रोगी की निगाहें उसी तरफ रहती हैं। रोगी अपने  मित्रोंरिश्तेदारों या चीजों को पहचान नहीं पाता है।  यदि स्ट्रोक प्रमुख गोलार्ध (dominant hemisphere) में हुआ है तो रोगी को बोलने या समझने में परेशानी होती है। लेकिन स्ट्रोक अप्रमुख-गोलार्ध       (Nondominant hemisphere) में हुआ है तो बेपरवाही, बेखबरी और बेखुदी जैसे लक्षण होते हैं। चूँकि MCA मस्तिष्क में बाहों और हाथों के नियंत्रण-क्षेत्र को रक्त की आपूर्ति करती है इसलिए कमजोरी, लकवा या संवेदना-विकार आदि लक्षण पैरों की अपेक्षा हाथों में ज्यादा होते हैं।
ऐन्टीरियर सेरीब्रल आर्टरी स्ट्रोक या ACA स्ट्रोक
ACA स्ट्रोक मुख्यतः फ्रन्टल लोब के कार्यों को प्रभावित करता है जैसे उग्र व्यवहार, शब्दों, जुमलों या मुद्राओं को अकारण बार-बार दोहराना, चैतन्यता विकार (altered mental status), सही निर्णय न ले पाना, ग्रेस्पिंग व सकिंग रिफ्लेक्स आदि।  ACA में रुकावट आने से मस्तिष्क में जिस तरफ क्षति हुई है उसके विपरीत या उलटी तरफ मांस-पेशियों में कमजारी, अक्षमता तथा संवेदना-दोष, लड़खड़ा कर चलना और  मूत्र-असंयमता (urinary incontinence) जैसे लक्षण होते हैं।
पोस्टीरियर सेरीब्रल-आर्ट्री स्ट्रोक या PCA Stroke
PCA Stroke में दृष्टि और विचार संबन्धी विकार होते हैं जैसे अर्ध-दृष्टिदोष (hemianopsia) अर्थात एक तरफ अंधापन, मस्तिष्क-जनित अंधापन, घर वालों व परिजनों को न पहचान पाना (visual agnosia), चैतन्यता विकार (altered mental status), स्मृतिदोष आदि।
वर्टीब्रोबेसीलर आर्टरी स्ट्रोक
वर्टीब्रोबेसीलर आर्टरी स्ट्रोक में क्रेनियल-नाड़ियों, सेरीबेलम और ब्रेन-स्टेम से संबन्धित विविध और विस्तृत लक्षण होने के कारण इसको पकड़ पाना बहुत मुश्किल होता है। इसमें क्रेनियल-नाड़ी विकार स्ट्रोक की तरफ और मोटर विकार उलटी तरफ होते हैं। इसके प्रमुख लक्षण हैं चक्कर आना, आँख का अकारण अविरत हिलते रहना (Nystagmus), द्विदृष्टिता (Diplopia), निगलने में द्क्कत (Dysphagia), अटक-अटक कर बोलना (Dysarthria), चेहरे में संवेदना-विकार (Facial hypesthesia), मूर्छा (Syncope), दृष्टि-क्षेत्र दोष (Visual field deficits), लड़खड़ा कर चलना (Ataxia) आदि।
लेक्युनर स्ट्रोक
लेक्युनर स्ट्रोक मस्तिष्क की गहराई में स्थित छोटी-छोटी धमनियों के अवरोध के कारण होता है, जिसका माप बहुत छोटा प्रायः 2-20 मिलिमीटर होता है। इसमें या तो केवल चालक-विकार (Motor Symptoms) होंगे या फिर केवल संवेदना-विकार होंगे। कभी केवल लड़खड़ा कर चलने की तकलीफ हो सकती है। छोटा होने के कारण इसमें प्रायः स्मृति, बोधन, वाणी और चैतन्यता संबन्धी लक्षण नहीं होते हैं।
दुष्प्रभाव
स्ट्रोक के कारण कई अस्थाई या स्थाई अक्षमता या अपंगता हो सकती है जो इस बात पर निर्भर करती है कि रक्त का प्रवाह मस्तिष्क के किस भाग में और कितनी देर बन्द रहा।  स्ट्रोक में निम्न अक्षमता या अपंगता हो सकती है।
पक्षाघात - माँस-पेशियों में दुर्बलता व गतिहीनता– स्ट्रोक में मांस-पेशियाँ दुर्बल, गतिहीन, बेकार, निष्क्रिय और निर्जीव सी हो जाती हैं। स्ट्रोक के कारण मस्तिष्क में जिस तरफ क्षति हुई है उसके विपरीत या उलटी तरफ शरीर की माँस-पेशियों  में कमजोरी और लकवा पड़ता है। अर्थात यदि मस्तिष्क में खराबी बांई तरफ हुई है तो शरीर का दायां भाग लकवा-ग्रस्त होता है। यदि पक्षाघात या लकवा शरीर के आधे भाग को प्रभावित करता है तो इसे हेमीप्लेजिया (Hemiplegia) और  आधे शरीर में आई माँस-पेशियों की दुर्बलता या कमजोरी को हेमीपरेसिस (Hemiparesis) कहते हैं।  हेमीपरेसिस  या हेमीप्लेजिया के कारण रोगी को चलने-फिरने या कोई चीज पकड़ने में दिक्कत होती है।
कभी कुछ मांस-पेशियों का एक समूह बेकार हो जाता है जैसे कि बेल्स पाल्सी में आधे चहेरे की पेशियां लकवा-ग्रस्त होती हैं। दौरा पड़ने पर रोगी के मुँह और गले की मांस-पेशियाँ कमजोर और निष्क्रिय हो जाती हैं और उन पर रोगी का नियंत्रण नहीं रहता है, जिससे उसे निगलने और बोलने में दिक्कत (dysphagia और dysarthria) हो सकती है। रोगी  शरीर में संतुलन और सामंजस्य बनाये रखने में (ataxia) भी असमर्थ महसूस करता है।
संवेदनात्मक (Sensory) विकार और दर्द – स्ट्रोक में स्पर्श, दर्द, तापमान,  गुंजन आदि संवेदनाओं को महसूस करने की क्षमता कम हो जाती है। पक्षाघात से ग्रस्त पैर या हाथ में दर्द, सुन्नता, चुभन, जलन या  झनझनाहड़ (paresthesia) हो सकती है। स्मृति, विचार और सीखने की योग्यता कमजोर पड़ जाती है।  कुछ रोगियों को अपने लकवा-ग्रस्त हाथ या पैर की अनुभूति ही नहीं होती है। कई रोगी हाथ या पैर के असहनीय दर्द से परेशान रहते हैं। यह दर्द कई बार गतिहीन जोड़ों आई अकड़न की वजह से भी होता है। माँस-पेशियों में अकड़न और जकड़न आ जाना सामान्य बात है।  उसके हाथ में ठंड के प्रति संवेदना बहुत बढ़ सकती है। यह दुष्प्रभाव आमतौर पर स्ट्रोक के कई हफ्तों के बाद होता है।  संवेदनात्मक विकार के कारण मूत्रत्याग  और मलविसर्जन पर नियंत्रण भी कमजोर पड़ जाता है। 
वाणी, भाषा और संप्रेक्षण  विकार (Speech, Language and Communication disabilities) -  
स्ट्रोक के 25%  रोगियों को बोलने, पढ़ने, लिखने और समझने में दिक्कत होती है। अपने विचारों को भाषा और वाणी के माध्यम से व्यक्त न कर पाने को वाचाघात या (aphasia) कहते हैं। स्मृति, विचार और सीखने की योग्यता कमजोर पड़ जाती है। कभी रोगी को उपयुक्त  शब्द या वाक्य याद तो होता है पर वह बोल नहीं पाता है इसे वाणीदोष (dysarthria) कहते हैं।    
बोधन, विचार और स्मृति विकार (Cognitive, Thought and Memory Problems)– स्ट्रोक रोगी की सजगता और अल्पकालीन स्मृति का ह्रास होता है। याददाश्त कमजोर पड़ जाती है या रोगी भ्रमित, अस्तव्यस्त, बुद्धिहीन और विवेकहीन दिखाई देता है।  रोगी कोई योजना बनाने, नया काम सीखने, निर्देशों का पालन करने में असमर्थ महसूस करता है। कई रोगियों को निर्णय लेने, तर्क-वितर्क करने और चीजों को समझने में बहुत दिक्कत होती है। कई बार रोगी को अपने शरीर में आई अयोग्यता और अपंगता का अनुमान और अनुभूति भी नहीं होती है। 
भावनात्मक विकार (Emotional Disturbances) – स्ट्रोक से रोगी में कई भावनात्मक और व्यक्तित्व सम्बंधी परिवर्तन होते हैं।  स्ट्रोक के रोगी अक्सर भय, चिंता, तनाव, कुंठा, क्रोध, उग्रता, संताप, अकेलेपन और अवसाद का शिकार हो ही जाते हैं। रोगी अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है और उसके लिए अकारण चीखना, चिल्लाना, हंसना  या मुस्कुराना सामान्य बात हो जाती है।  उन्हे अपने दैनिक कार्य करने में भी कठिनाई होती है और परिवार के किसी सदस्य या नौकर पर आश्रित रहना पड़ता हैं।
लैंगिक विकार – स्ट्रोक के बाद लैंगिक समस्याएं होना स्वाभाविक बात है। स्ट्रोक के कारण रोगी और उसके जीवनसाथी के आपसी रूमानी संबन्धों में शिथिलता आ जाती है। कई बार स्ट्रोक के वर्षों बाद तक रोगी लैंगिक अयोग्यता का शिकार बना रहता है। स्ट्रोक के बाद दी जाने वाली डिप्रेशन की दवाइयाँ भी लैंगिक विकार पैदा करती है। माँस-पेशियों में दर्द, एंठन, खिंचाव, जोड़ों में आई जकड़न  और शारीरिक निष्चलता भी लैंगिक संसर्ग को अरुचिकर और कष्टदायक बना देती है। स्ट्रोक के कारण जननेन्द्रियों में चेतना और संवेदना भी बहुत कम हो जाती है, पुरुषों में स्तंभनदोष होना सामान्य बात है और मस्तिष्क में कामेच्छा और लैंगिक हार्मोन्स को नियंत्रित करने वाला उपांग हाइपोथेलेमस भी क्षतिग्रस्त हो जाता है।
परीक्षण और निदान
स्ट्रोक का सही उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि रोगी को स्ट्रोक इस्केमिक है या हेमोरेजिक है और मस्तिष्क के किस हिस्से में नुकसान हुआ है। कई बार स्ट्रोक जैसे लक्षण मस्तिष्क में अर्बुद (Tumor) तथा किसी दवा के प्रभाव से भी हो सकते हैं। डॉक्टर इन सबकी जाँच करेगा। वह स्ट्रोक के जोखिम का आंकलन करने के लिए भी कुछ परीक्षण करेगा।
शारीरिक परीक्षण – डॉक्टर रोगी और उसके परिजनों से विस्तार में पूछताछ करेगा कि रोगी को क्या क्या तकलीफ हुई, कब शुरू हुई और तब वह क्या कर रहा था। फिर देखेगा कि क्या रोगी को अभी भी वह तकलीफ है। वह यह भी पूछेगा कि क्या रोगी को कभी सिर में चोट लगी थी और वह कौन सी दवाइयाँ ले रहा है। वह पूछेगा कि रोगी को या परिवार के किसी सदस्य को कभी हृदयरोग, स्ट्रोक या  टीआईए (TIA) तो नहीं हुआ था। इसके बाद वह रोगी का रक्तचाप नापेगा और स्टेथोस्कोप से हृदय और गर्दन में केरोटिड धमनी की जाँच करेगा और पता लगा लेगा कि केरोटिड धमनी में एथेरोस्क्लिरोसिस तो नहीं हुआ है। वह ऑफ्थेल्मोस्कोप द्वारा आँखों के दृष्टि-पटल की जाँच करके पता लगा लेगा कि दृष्टि-पटल पर रक्त के थक्के या कॉलेस्ट्रोल के क्रिस्टल तो नहीं बनें हैं। 

रोगी के प्रयोगशाला-परीक्षण स्ट्रोक के कारण और अन्य सह-विकारों के बारे में जानने के उद्देश्य से किये जाते हैं।

संम्पूर्ण रक्त-परीक्षण (Complete Blood Cell Count) -यह रक्त की प्रमुख जांच है जिससे स्ट्रोक के कुछ अन्य कारणों पोलीसाइथीमिया, थ्रोम्बोसाइटोसिस, थ्रोम्बोसाइटोपीनिया, ल्युकीमिया आदि की जानकारी मिलती है

रक्त रसायन-परीक्षण (Blood Chemistry Panel) - इसमें रक्त शर्करा, युरिया, क्रियेटिनीन, कोएगुलेशन स्टडीज (BT, CT, PT, PTT, Fibrinogen etc.) आदि परीक्षण किये जाते हैं। यदि एन्टीकोएगुलेन्ट देने हों तो कोएगुलेशन स्टडीज जरूरी होती है और इनसे कोएगुलोपैथी की जानकारी भी मिलती है। हृदय के एन्जाइम्स (ट्रांसएमाइनेज) और बायोमार्कर्स भी किये जाते हैं क्योंकि स्ट्रोक और हृदयरोग का सम्बंध चोली-दामन का होता है। ब्लड गैस एनेलीसिस भी कर लिया जाता है ताकि रक्त में ऑक्सिजन का स्तर और अम्ल-क्षार संतुलन का अनुमान हो सके।


इनके अलावा जरूरत पड़ने पर लिपिड प्रोफाइल, प्रेगनेन्सी टेस्ट, रियुमेटॉयड फेक्टर, ई.एस.आर., एन्टीन्युक्लियर बॉडी, होमोसिस्टीन आदि भी किये जाते हैं। मेनिन्जाइटिस और सबअरेक्नॉयड हेमरेज को पहचानने के लिए लंबर-पंक्चर किया जाता है।    
सी.टी.स्केन
स्ट्रोक में सी.टी.स्केन सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक जांच है। सी.टी.स्केन मस्तिष्क की संरचना का सटीक और त्रिआयामी चित्रण करता है। हालांकि एम.आर.आई. की तस्वीरें ज्यादा अच्छी और साफ होती हैं परन्तु स्ट्रोक के आरंभिक निदान में प्लेन सी.टी.स्केन कई कारणों से एम.आर.आई. से भी बढ़िया और सुविधाजनक  माना जाता है क्योंकि यह हर जगह उपलब्ध होता है और दस मिनट से कम में हो जाता है यह बहुत अहम बात है क्योंकि यहाँ सुरक्षित समय की खिड़की (Time Window) बहुत छोटी होती है। दूसरा रोगी के शरीर में पेसमेकर, एन्युरिज्म क्लिप आदि लगे हने के कारण  एम.आर.आई. करना संभव न हो तो भी सी.टी.स्केन किया जा सकता है। बिना दवा के किये गये सी.टी.स्केन से मस्तिष्क की संरचना और रक्तस्राव की जानकारी मिल जाती है जिससे इस्केमिक और हेमोरेजिक स्ट्रोक को पहचानना आसान हो जाता है। बाद में जब भी फुरसत और मौका मिलता है या जरूरी होता है एम.आर.आई. करवाली जाती है।
सी.टी.एंजियोएग्राफी (CTA) एक विशेष तरह का सी.टी.स्केन होता है जिसमें एक्सरे की दृष्टि से अपारदर्शी दवा या डाई नस में छोड़ी जाती है और एक्सरे द्वारा रक्त वाहिकाओं के त्रिआयामी चित्र लिये जाते हैं।  सी.टी.एंजियोएग्राफी से एन्यूरिज्म, एट्रियोवीनस मालफोरमेशन्स या वाहिकाओं में रुकावट  का पता चलता है।   
केरोटिड अल्ट्रासाउन्ड – से हमे केरोटिड धमनी में बने रक्त के थक्कों और उसके  संकुचन की जानकारी मिलती है।  इसमें एक ट्रान्सडूसर को केरोटिड-धमनी के ऊपर की त्वचा पर धुमाया जाता है, इससे उच्च आवृत्ति की ध्वनि-तरंगे निकल कर ऊतकों में जाती हैं और परावर्तित होकर पुनः ट्रान्सडूसर में लौटती हैं और मशीन के पटल पर केरोटिड-धमनी का रेखा-चित्र प्रदर्शित करती है।
इकोकार्डियोग्राफी -  एक विशेष तरह की अल्ट्रासाउन्ड तकनीक है जो हृदय की संरचना की जानकारी देती है। इसके द्वारा चिकित्सक को मालूम हो जाता है कि कैसे हृदय में बना एम्बोलस रक्त-सरिता में बहता हुआ मस्तिष्क पहुँचा और स्ट्रोक का कारण बना। आपका चिकित्सक ट्रान्सइसोफेजियल इकोकार्डियोग्राफी (TEE) भी करना चाहेगा क्योंकि इसमें हृदय की बेहद स्पष्ट और विस्तृत तस्वीरें खिंचती है। इसमें रोगी को एक लचीली रबर की नली निगलनी पड़ती है, जिसमें एक छोटा सा ट्रान्सडूसर लगा होता है। क्योंकि ट्रान्सडूसर भोजन नली में बिलकुल हृदय के समीप रहता है इसलिए यह हृदय की स्पष्ट तस्वीरें खींचता है। 
आरटीरियोग्राफी -  यह  तकनीक रक्त-वाहिकाओं के अपेक्षाकृत ज्यादा स्पष्ट त्रिआयामी चित्र खींचती है। इसमें जांघ के ऊपरी हिस्से में एक छोटा सा चीरा लगा कर  रबर का एक महीन केथेटर जांघ की धमनी में घुसा कर मस्तिष्क  की मुख्य धमनियों केरोटिड या वर्टीब्रल  में पहुँचाया जाता है। फिर डाई धमनी  में छोड़ दी जाती है और मशीन एक्सरे द्वारा चित्र खींच लेती है।      
चुम्बकीय गुन्जन चित्रीकरण या मेग्नेटिक रिजोनेन्स इमेजिंग (MRI) स्ट्रोक के निदान और उपचार में एम.आर.आई.  एक महान तकनीक साबित हुई है। इस तकनीक में तीव्र चुम्बकीय क्षेत्र और रेडियो तरंगों की मदद से मस्तिष्क की स्पष्टतम और विस्तृत त्रिआयामी तस्वीरें खींची जाती हैं। एम.आर.आई. इस्केमिक स्ट्रोक से क्षतिग्रस्त हुए मस्तिष्क के ऊतकों को प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान लेती है। एम.आर.आई. मस्तिष्क के ऊतकों में चयापचय के कारण आई विकृतियों को भी पहचान लेती है। मेग्नेटिक रिजोनेन्स एन्जियोग्राफी (MRA) में नसों में  डाई छोड़ कर मस्तिष्क और ग्रीवा की धमनियों के चित्र लिये जाते हैं।  
उपचार
स्ट्रोक एक आपातकालीन रोग है और यहाँ हर पल कीमती है। यहाँ समय ही जीवन रेखा है। स्ट्रोक में मस्तिष्क की कोशिकायें मृत होने लगती हैं। ज्यों ही लगे कि रोगी को स्ट्रोक हुआ है, तुरन्त आपातकालीन एम्बुलेन्स से रोगी को पास के अच्छे चिकित्सा कैंन्द्र लेकर जाइये। निम्न बिन्दुओं को हमेशा ध्यान में रखिये।
स्ट्रोक की संजीवनी बूंटी - टिश्यु प्लाज्मिनोजन एक्टिवेटर rTPA - रोगी को यदि स्ट्रोक होने के तीन घन्टे के भीतर टिश्यु प्लाज्मिनोजन एक्टिवेटर दे दिया जाता है तो यह धमनियों में जमे खून के थक्के को घोल कर इनका पुनर्नलीकरण देता  है और मस्तिष्क की रक्त-आपूर्ति को पुनर्स्थापित कर देता है। कोई कहता है यह रोगी के जीवन की कुंजी है तो कोई इसे स्ट्रोक-उपचार का इंजन कहता है।  हमें सिर्फ तीन घन्टे का मुबारक वक्त मिलता है। इसी विन्डो ऑफ अपोर्चुनिटी में टिश्यु प्लाज्मिनोजन एक्टिवेटर देकर रोगी का जीवन बचाना होता है और यह तभी संभव है जब दौरा पड़ने के एक घन्टे के अन्दर रोगी अस्पताल पहुँचा दिया जाये।
TIME LOST = BRAIN LOST
TIME = BRAIN
रोगी को दौरा किस समय पड़ा या वह कब तक पूर्णतः स्वस्थ था या उसे दौरे के लक्षण कब पता चले यह याद रखना बहुत जरूरी है। इस समय को ठीक से याद रखें।  इसके बिना टीपीए देने का निर्णय करना मुश्किल होगा।
कई बार स्ट्रोक रात में होता है जब रोगी सो रहा होता है और उसे जगने पर ही पता चलता है कि उसे स्ट्रोक हुआ है। दौरा पड़ने के बाद रात्रि में कई बार रोगी मदद के लिए परिजनों को आवाज भी नहीं लगा पाता है। ऐसी स्थितियों  में उपचार में विलम्ब होना स्वाभाविक है। 
रोगी में स्ट्रोक के लक्षण होने पर यह कभी मत सोचिये कि शायद रोगी थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा और तकलीफ बढ़ेगी तो बाद में अस्पताल ले चलेंगे।
डॉक्टर को घर पर मत बुलाइये, घर पर वह कुछ नहीं कर पायेगा।
रोगी को कोई घरेलू उपचार या एस्पिरिन मत दीजिये। डॉक्टर अपने हिसाब से जरूरत होगी तो दे देगा। 
रोगी अपने वाहन से चिकित्सा कैंन्द्र जाने की कभी न सोचे।
कमाले–बुजदिली   है पस्त  होना   अपनी  नजरों  में,
अगर थोड़ी-सी हिम्मत हो तो फिर क्या हो नहीं सकता।
प्रारंभिक उपचार
स्ट्रोक का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि रोगी को स्ट्रोक इस्केमिक है या हेमोरेजिक है। प्रारंभिक उपचार में निम्न पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
  • स्ट्रोक के उपचार में यह आवश्यक है कि रोगी से पूछताछ, रक्त आदि की जाँच, सी.टी.स्केन, अन्य आपातकालीन उपचार,  सी.टी.स्केन का विश्लेषण, स्ट्रोक का निदान और आगे के उपचार की रूपरेखा बनाना आदि सभी कार्य एक घन्टे में पूरे कर लेना चाहिये।
  • स्ट्रोक के उपचार की मुख्य धुरी मस्तिष्क के अरक्तता क्षेत्र Penumbra (मस्तिष्क का वह भाग जो अरक्तता के कारण पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ है) में रक्तप्रवाह को पुनर्स्थापित करना है। इसके लिए मस्तिष्क पर हुए अरक्तता-आघात की गंभीरता और अवधि को न्यूनतम किया जाता है। इसके पहले कि मस्तिष्क के ऊतक स्थाई रूप मरने लगें टीपीए के इंजेक्शन से अवरुद्ध धमनी का पुनर्नलीकरण कर  दिया जाता है।  
  • दोनों हाथों की अच्छी शिराओं में 18 गॉज का केन्युला लगा कर शिरा-पथ तैयार किये जाते हैं, जिसके द्वारा आवश्यकतानुसार इन्जेक्शन और तरल द्रव्य चढ़ाये जायेंगे। 
  • ऑक्सीजन दी जाती है यदि SPO92% से कम हो ताकि मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे।
  • रोगी को यदि श्वसन लेने में दिक्कत हो तो समुचित उपचार किया जाता है।
  • हार्ट अटेक के विपरीत स्ट्रोक में तुरन्त एस्पिरिन नहीं दी जाती है।
  • स्ट्रोक के साथ-साथ उसके सह-विकारों का उपचार भी आवश्यक है। ब्लड-शुगर पर नजर रखना और उसे सामान्य रखना जरूरी है। स्ट्रोक में रोगी को बुखार हो सकता है। ऐसी अवस्था में मुँह या मलद्वार से पेरासीटामोल दी जाती है।
स्ट्रोक के उपचार में सुरक्षित समय की खिड़की छोटी होने के कारण विशेषज्ञों ने निम्न प्रोटोकोल को ध्यान में रखने की सलाह दी है।
  • द्वार से डाक्टर की अवधि  10 मिनट
  • द्वार से सीटी स्केन की अवधि  25 मिनट
  • द्वार से सीटी स्केन की व्याख्या की अवधि  45 मिनट
  • द्वार से दवा की अवधि  60 मिनट
  • द्वार से आइ.सी.यू. बेड  तक की अवधि 3 घन्टे
थ्रोम्बोलाइटिक उपचार -   
थ्रोम्बोलाइटिक दवा (खून के थक्कों को घोलने वाली दवा) इस्केमिक स्ट्रोक में  मस्तिष्क का रक्तप्रवाह पुनर्स्थापित करती है और रोगी को लक्षण-मुक्त करने में बहुत सहायता करती है। लेकिन दुर्भाग्य से यह कुछ रोगियों के मस्तिष्क में रक्तस्राव कर सकती है। इसलिए चिकित्सक सारे पहलुओं को ध्यान में रख कर बहुत सूझबूझ और विवेक से निर्णय लेता है कि रोगी को थ्रोम्बोलाइटिक दवा देनी चाहिये या नहीं।


स्ट्रोक के लिए रिकोम्बिनेन्ट डीएनए तकनीक से बनी सिर्फ एल्टीप्लेज  (rTPA) ही अनुमो­­दित की गई है। यह rTPA स्ट्रोक के रोगी के लिए मूर्छित लक्ष्मण का जीवन बचाने के लिए वीर हनुमान द्वारा द्रोणगिरि पर्वत से लाई गई संजीवनी बूटी के समान है।  इसे स्ट्रोक होने के तीन घन्टे (ताजा शोध के नतीजों के अनुसार साढ़े चार घन्टे तक दी जा सकती है) के भीतर ही स्ट्रोक से होने वाली क्षति को प्रभावशून्य करने और अपंगता को रोकने के लिए दिया जाता है। यह खून के थक्कों को घोल देती है। इसे जितना जल्दी दिया जायेगा,  स्वास्थ्य-लाभ उतनी जल्दी और अच्छा होगा। यह बहुत महँगी दवा है, 50 मिलीग्राम की शीशी की कीमत 40,000 रुपये है। इसे हेमोरेजिक या रक्तस्रावी-स्ट्रोक में  कभी नहीं दिया जाता है। क्योंकि इससे मस्तिष्क में रक्त-स्राव हो सकता है और लेने के देने पड़ सकते हैं। इसे बाँह की शिरा में छोड़ा जाता है। इसे देने के बाद रोगी को कम से कम 24 घन्टे आई.सी.यू. में रखा जाता है और एहतियात रखी जाती है कि रक्तस्राव न हो। इसका सबसे घातक दुष्प्रभाव रक्तस्राव है। इसे निम्न स्थितियों में नहीं दिया जाता है।
  • रोगी की उम्र 18 वर्ष से कम हो।
  • इन्ट्राक्रेनियल हेमोरेज।
  • हाल में ही दिल का दौरा पड़ा हो।
  • गर्भावस्था व स्तनपान।
  • पिछले तीन महीने में सिर में गहरी चोट लगी हो।
  • रक्तस्राव विकार।
  • पिछले 14 दिन में रोगी की कोई शल्यक्रिया हुई हो।
  • मूत्र या मल में हाल के दिनों में रक्त आया हो।
  • रोगी एन्टीकोएगुलेन्ट दवायें प्रयोग कर रहा हो।
  • मूर्छा या कोमा।
आर.टी.पी.ए. या एल्टीप्लेज की मात्रा की गणना निम्न सूत्र से की जाती है।   
एल्टीप्लेज कुल मात्रा = 0.9 मिलीग्राम/ किलो शारीरिक भार के हिसाब से (अधिकतम मात्रा 90 मिलीग्राम)  
इस मात्रा का 10% न्युरोलोजिस्ट द्वारा शिरा में 60 सेकण्ड में धीरे-धीरे छोड़ा जाता है। शेष 90% मात्रा ड्रिप द्वारा एक घन्टे की अवधि में पूरी दे दी जाती है। 
एस्पिरिन –
इस्केमिक स्ट्रोक के बाद दूसरे दौरे को रोकने और खून को पतला रखने के लिए एस्पिरिन सर्वश्रेष्ठ और स्थापित दवा है। अमूमन इसकी 325 मिलीग्राम की गोली आपातकालीन कक्ष में दे दी जाती है। यदि रोगी पहले से एस्पिरिन ले रहा है तो इसकी मात्रा कम कर दी जाती है। रक्त को पतला रखने वाली अन्य दवायें जैसे डायपिरीडेमोल, कोमाडिन, हिपेरिन, टिक्लोपिडीन, क्लोपिडोग्रेल आदि भी प्रयोग की जाती हैं, परन्तु एस्पिरिन ही सबसे ज्यादा प्रचलित है।  
इडारावोन (Aravon)
यह एक नया और उमदा प्रति-ऑक्सीकारक है जो 2001 से जापान में स्ट्रोक की प्रारंभिक अवस्था में सफलतापूर्वक  प्रयोग में लिया जा रहा है। यह पहली सेरीब्रल न्यूरोप्रोटेक्टिव दवा है जो स्ट्रोक की प्राथमिक अवस्था में चमत्कारी असर दिखाती है। यह रियेक्टिव ऑक्सीजन स्पिसीज़ (ROS) को सफाया कर मस्तिष्क में अरक्तता से जन्मे प्रदाह या Inflamation (जिसके कारण मस्तिष्क में सूजन और कोशिकीय क्षति की वजह से इनफार्क्शन हो जाता है) को  शांत करता है और शरीर के अन्य अंगों में भी ऑक्सीकारक तत्वों को चुन-चुन कर मारता है।  यह एथेरोस्क्लिरोसिस की प्रगति को भी रोकता है। आरटी.पीए. के विपरीत इसे स्ट्रोक होने के 24 घन्टे के भीतर 30 मिलि ग्राम सुबह शाम सेलाइन में मिला कर दिया जाता है। इसकी सुरक्षा खिड़की आरटी.पीए. से बड़ी होती है। इसे 14 दिन तक भी दिया जा सकता है।  इसे इस्केमिक और हेमोरेजिक दोनों तरह के स्ट्रोक में दिया जा सकता है। 
सिटिकोलीन
यह एक सुरक्षित और स्मृतिवर्धक रसायन है  जिसे स्ट्रोक के उपचार में प्रयोग में लिया जाता है।  यह मस्तिष्क में फोस्फेटाइडिलकोलीन का स्तर बढ़ाता है। फोस्फेटाइडिलकोलीन  मस्तिष्क की कोशिकाओं के लिए बहुत जरूरी यौगिक माना गया है। साथ में यह मस्तिष्क के एक उपांग हिपोकेम्पस, जो स्मृति का कैन्द्र माना जाता है, में एसिटाइलकोलीन का स्तर बढ़ाता है। एसीटाइलकोलीन एक नाड़ी संदेशवाहक है जो विभिन्न नाड़ी कोशिकाओं में संपर्क और समन्वय बढ़ाता है। इसलिए सिटिकोलीन स्मृति और संज्ञानात्मकता (Cognition) में वृद्धि करता है।  यदि स्ट्रोक होने के 24 घन्टे के भीतर   सिटिकोलीन दे दिया जाता है तो  यह मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है।  इसकी मौखिक मात्रा 1000-2000 मिलिग्राम प्रतिदिन है, जिसे दो खुराक में विभाजित करके दिया जाता है। इसे शिरा में भी दिया जाता है।  अनिद्रा, सिरदर्द, दस्त, उच्च (या निम्न) रक्तचाप, छाती में दर्द, धुँधली दृष्टि आदि इसके पार्ष्वप्रभाव हैं। गर्भावस्था और स्तनपान में यह वर्जित है। 
अस्पमाररोधी या एन्टीसीज्योर दवाएँ – हालांकि स्ट्रोक में सीज्योर या मिर्गी के जैसे दौरे बहुत कम पड़ते हैं। परन्तु यदि बार-बार पड़ें तो खतरनाक स्थिति बन जाती है। इनके लिए डायजेपाम और लोरेजेपाम पहले उपचार माने जाते हैं।
एन्टीहाइपरटेन्सिव दवाएँ – लेबेटालोल, एनालेप्रिल, निकार्डिपीन, सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड आदि प्रयोग में ली जाती है। स्ट्रोक में रक्तचाप नियंत्रण बहुत बुद्धिमानी से किया जाता है। आर.टी.पी.ए.  देने के दौरान तो 24 घन्टे तक और ज्यादा सतर्कता रखी जाती है।  रक्तचाप के बढ़ने से रक्तस्राव की संभावना बढ़ती है और ज्यादा कम हो जाये तो अरक्तता बढ़ सकती है। 

यदि सिस्टोलिक रक्तचाप SBP 185 से अधिक या डायस्टोलिक रक्तचाप DBP 110-139 बना रहे तो 10 मि.ग्रा. लेबेटालोशिरा में 1-2 मिनट में दे दिया जाता है और रक्तचाप हर 5-10 मिनट के अन्तराल में नापा जाता है। यदि रक्तचाप कम न हो तो हर 10-20 मिनट में  10 या 20 मि.ग्रा. लेबेटोल  दिया जा सकता है। लेबेटालोल की कुल मात्रा 150 मि.ग्रा. से अधिक न दी जाये।  ध्यान रखें कि रक्तचाप कम भी न हो पाये।

यदि फिर भी डायस्टोलिक रक्तचाप 140 से अधिक बना रहे  तो सोडियम नाइट्रोप्रुसाइड 0.5-10 mg/kg/minute के हिसाब से शिरा में ड्रिप द्वारा छोड़ें। पूरी सतर्कता बरतें।  
आपातकालीन शल्य उपचार –
पिछले वर्षों में स्ट्रोक के उपचार में बहुत प्रगति हुई है और कई नई तकनीकें और शल्य-क्रियाएं विकसित हुई है, जिन्हे चिकित्सक आज धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं और रोगियों को जीवन दान दे रहे है।
आल्टीप्लेज  (rTPA) सीधा मस्तिष्क के अरक्तता-ग्रस्त क्षेत्र में  छोड़ना  चिकित्सक जांघ के ऊपरी हिस्से में चीरा लगा कर जांघ की धमनी में केथेटर डाल कर मस्तिष्क तक पहुँचा कर सीधा उस जगह छोड़ता है जहाँ धमनी में रुकावट आई है। इस तकनीक में सुरक्षित समय का झरोखा थोड़ा बड़ा होता है।
चिकित्सक धमनी में जमा खून का थक्का एक विशेष केथेटर के द्वारा पकड़ कर निकाल देते हैं और धमनी का अवरोध तुरन्त ठीक हो जाता है।
केरोटिड एन्डआरटेक्टॉमी - स्ट्रोक के बाद दूसरे स्ट्रोक या टी.आई.ए. के जोखिम को कम करने के प्रयोजन से बुरी तरह अवरुद्ध केरोटिड या अन्य धमनी को साफ करने के लिए शल्यक्रिया भी की जाती है। इस क्रिया में शल्य-चिकित्सक गर्दन में स्थित केरोटिड धमनी के ऊपर और नीचे के दोनों  सिरों को बाँध देता है, फिर केरोटिड धमनी में चीरा लगा कर धमनी के अन्दर जमा सारे प्लॉक को निकाल कर धमनी को पुनः सिल देता है और धमनी के सिरों को खोल देता है। इस क्रिया से इस्केमिक स्ट्रोक का जोखिम कम हो जाता है।  हालांकि कभी-कभी धमनी के घावों पर बने थक्के  टूट कर हृदय या मस्तिष्क की धमनियों में फँस सकते हैं और रोगी को हार्ट अटेक या स्ट्रोक हो सकता है।
एन्जियोप्लास्टी और स्टेन्ट -  कोरोनरी बेलून एन्जियोप्लास्टी की भांति मस्तिष्क की प्लॉक से अवरुद्ध धमनियों को बेलून से फुला कर चौड़ा कर दिया जाता है। इस क्रिया में एक बेलून केथेटर के सिरे पर विशिष्ट धातु का बना स्टेन्ट पिचकी हुई अवस्था में चढ़ाकर अवरुद्ध धमनी में घुसाया जाता है। जब केथेटर का अन्तिम छौर अवरोध तक पहुँच जाये तो बेलून को फुलाया जाता है, जिससे स्टेन्ट फैल कर लोक हो जाता है और धमनी को भी फैला देता है। इसके बाद बेलून को पिचका कर केथेटर को वापस खींच लिया जाता है।   
हेमोरेजिक स्ट्रोक का उपचार
हेमोरेजिक स्ट्रोक के उपचार का मुख्य उद्देश्य रक्तस्राव को रोकना और मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण बढ़ते दबाव को कम करना है। भविष्य में जोखिम कम करने हेतु शल्यक्रिया  भी एक विकल्प है। यदि रोगी पहले से कोमाडिन या बिंबाणुरोधी दवा क्लोपिडोग्रेल ले रहा है तो उनके प्रभाव को निष्क्रिय करने के लिए उचित दवा या रक्त दिया जाता है। रक्तचाप को कम करने के लिए, सीज्योर को रोकने के लिए और मस्तिष्क में वेजोस्पाज्म रोकने के लिए दवाएँ दी जाती हैं। हेमोरेजिक स्ट्रोक में टीपीए, एन्टीकोएगुलेन्ट्स और बिंबाणुरोधी (खून को पतला करने की दवाइयाँ) एस्पिरिन आदि कभी भी नहीं दी जाती हैं।  क्योंकि ये रक्तस्राव को बढ़ा  सकती हैं।  
ज्यों ही मस्तिष्क में रक्तस्राव रुक जाये रोगी को पूर्ण आराम और सपोर्टिव उपचार दिया जाता है। ताकि इस बीच मस्तिष्क में हुआ रक्तस्राव घुलने लगे।  यदि रक्तस्राव ज्यादा हुआ हो तो मस्तिष्क से रक्त को निकालने और दबाव कम करने हेतु शल्यक्रिया की जाती है। हेमोरेजिक स्ट्रोक में रक्त-वाहिकाओं के विकारों और असामान्यताओं को  ठीक करने के लिए भी शल्यक्रिया की जाती है। स्ट्रोक के बाद या एन्युरिज्म या एट्रियोवीनस मालफोरमेशन्स (AVM) के फटने का जोखिम हो तो  निम्न शल्य क्रियाएँ की जाती हैं।
एन्युरिज्म क्लिपिंग – एन्युरिज्म के आधार पर एक छोटा सा धातु का क्लिप लगा दिया जाता है और उसे मुख्य रक्त-प्रवाह से अलग कर दिया जाता है, जिससे एन्युरिज्म से रक्तस्राव होने की संभावना खत्म हो जाती है। क्लिप हमेशा लगा छोड़ दिया जाता है।
एवीएम (एट्रियोवीनस मालफोरमेशन्स) को शल्यक्रिया द्वारा निकाल देना -  हालांकि बड़े और मस्तिष्क में गहराई पर स्थित एवीएम को निकाल पाना हमेशा संभव नहीं होता है। लेकिन छोटे एवीएम को आसानी से निकाल दिया जाता है और एवीएम के फटने की संभावना तो समाप्त हो जाती है फिर भी रक्तस्राव का जोखिम तो रहता ही है।
स्ट्रोक से बचने के उपाय
यदि आपको  डायबिटीज है और आपके चिकित्सक को लगता है कि आपको एथेरोस्क्लिरोसिस (धमनियों का कड़ा होना) भी है तो वह आपको आहार एवं जीवनशैली में सुधार करने के लिए कहेगा तथा रक्त को पतला रखने के लिए कुछ दवाइयां भी देगा। स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए  आपको निम्न बिंदुओं का सख्ती से पालन करने की सलाह देगा।
  • धूम्रपान तुरंत बंद करें।
  • नियमित लिपिड प्रोफाइल चेक करवाते रहें और यदि रक्त में LDL कोलेस्ट्रोल की मात्रा  100 mg/dl   से ज्यादा है तो उसे कम करने हेतु दवाइयां लें।
  • फल, सब्जियाँ और रेशायुक्त भोजन खूब खायें।
  • कॉफी, संत्रप्त वसा, चीनी, रिफाइन्ड तेल, वनस्पति घी,  एनीमल फैट, फास्ट फूड, और परिष्कृत फूड आदि का सेवन न करें। 
  • मदिरापान एक पैग प्रतिदिन से ज्यादा कभी ना लें।
  • अपना वजन संतुलित रखें।
  • रक्त-चाप नियमित नपवाते रहें और ज्यादा रहे तो दवा लें।
  • चिकित्सक द्वारा बतलाए गये आहार निर्देशों का पालन करें।
  • रोज तेज भ्रमण करे और व्यायाम करें।
इस आलेख का अंत मैं एक शेर के साथ कर रहा हूँ जो स्ट्रोक के रोगियों को समर्पित है।
जमाने  से   जो  डरते  हैं,  जलीलोखार होते हैं
बदल  देते हैं  जो  माहौल  वो  खुद्दार  होते  हैं,
हजारों   डूबते   हैं   नाखुदाओं   के  भरोसे  पर
चलाते हैं जो   खुद चप्पू  वो अक्सर पार होते हैं।
                                       शब्दार्थ : जलीलो -खार बर्बाद,  नाखुदा - मल्लाह, नाविक, कर्णधार

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